आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 |
श्लोक 72 से 81 गर्भाधान और प्रीति-सुप्रीति क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 1 से 3)
अर्हंत भगवान, गणधरदेवों, और केवलियों के निर्वाण के समय प्रयुक्त तीन पवित्र अग्नियों को सिद्ध प्रतिमा की वेदी के समीप स्थापित करना चाहिए। गर्भाधान क्रिया में अर्हंत की पूजा के बाद शेष पवित्र द्रव्यों से मंत्रपूर्वक इन अग्नियों में आहुति देनी चाहिए, जिनके मंत्र सात प्रकार के हैं। श्रावकों को व्यामोह छोड़कर इन मंत्रों का उपयोग करना चाहिए। गर्भाधान के बाद संतान हेतु बिना विषयानुराग के समागम करना चाहिए। तीसरे माह में प्रीति क्रिया होती है, जिसमें मंत्रपूर्वक जिन पूजा, तोरण बंधन, और दो पूर्ण कलश स्थापित किए जाते हैं। गृहस्थ प्रतिदिन घंटा-नगाड़े बजवाएं। पांचवें माह में सुप्रीति क्रिया होती है, जिसमें अग्नि और देवता की साक्षी में समस्त विधियां की जाती हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
त्रयोऽग्नयोऽर्हद्गणभृच्छेष केवलिनिवृतौ । ये हुतास्ते प्रणेतव्याः सिद्धार्चावेद्युपाश्रयाः ॥७२॥
अर्हन्त भगवान् (तीर्थ कर) के निर्वाणके समय, गणधरदेवोंके निर्वाणके समय और सामान्य केवलियोंके निर्वाणके समय जिन अग्नियोंमें होम किया गया था ऐसी तीन प्रकारकी पवित्र अग्नियां सिद्ध प्रतिमाकी वेदीके समीप ही तैयार करनी चाहिये ।। ७२ ।।
At the liberation of the Arhat Lord (Tīrthaṅkara),At the liberation of the Gaṇadhara Lords,And at the liberation of ordinary Kevalīs,The sacred fires used in their homa (sacrificial fire rites)Of these three kinds must be kindled near the altar of the perfected image.72
श्लोक ( Shlok ) 73
‘तेष्वर्ह दिज्याशेषांशैराहुतिर्मन्त्रपूर्विका । विधेया शुचिभिर्द्रव्यैः पुंस्पुत्रोत्पत्तिकाम्यया ॥७३॥
प्रथम ही अर्हन्त देवकी पूजा कर चुकनेके बाद शेष बचे हुए पवित्र द्रव्यसे पुत्र उत्पन्न होनेकी इच्छा कर मंत्रपूर्वक उन तीन अग्नियोंमें आहुति करनी चाहिये ॥७३॥
After first completing the worship of the Arhant Lord,One should, with mantra and pure intention, offer oblations into the three sacred fires—Using the remaining consecrated substances,With the heartfelt wish for the birth of a noble son.73
श्लोक ( Shlok ) 74
तन्मन्त्रास्तु यथाम्नायं वक्ष्यन्तेऽन्यत्र पर्वणि । सप्तधा पीठिका जातिमन्त्रादिप्रविभागतः ॥७४॥
उन आहुतियोंके मंत्र आगेके पर्वमें शास्त्रा-नुसार कहे जावेंगे। वे पीठिका मंत्र, जातिमंत्र आदिके भेदसे सात प्रकार के हैं ।॥७४।।
The mantras for those oblations shall be prescribed in accordance with the scriptures in the following section.They are of seven kinds, distinguished as the Pīṭhikā Mantra, Jāti Mantra, and others.74
श्लोक ( Shlok ) 75
विनियोगस्तु सर्वासु क्रियास्वेषां ” मतो जिनैःअव्यामोहादतस्तज्ज्ञै प्रयोज्यास्त उपासकैः ॥७५॥
श्रीजिनेन्द्रदेवने इन्हीं मंत्रोंका प्रयोग समस्त क्रियाओंमें बतलाया है इसलिये उस विषयके जान-कार श्रावकोंको व्यामोह (प्रमाद) छोड़कर उन मंत्रोंका प्रयोग करना चाहिये ॥७५।।
The venerable Jineśvara Himself has prescribed the use of these very mantras in all sacred rites.Therefore, those householders who are learned in this tradition should, casting aside all negligence, employ them with due reverence.75
श्लोक ( Shlok ) 76
गर्भाधानक्रियामेनां प्रयुज्यादौ यथाविधि । सन्तानार्थ विना रागाद् दम्पतिभ्यां न्यवेयताम् ॥७६।।इति गर्भाधानम् ।
इस प्रकार कही हुई इस गर्भाधानकी क्रियाको पहले विधिपूर्वक करके फिर स्त्री-पुरुष दोनों को विषयानुरागके बिना केवल सन्तानके लिये समागम करना चाहिये ॥७६॥ इस प्रकार यह गर्भाधान क्रियाकी विधि समाप्त हुई ।
Thus, having first performed the rite of conception (Garbha-ādhāna) in accordance with proper procedure,The man and woman should unite—not out of sensual desire, but solely for the purpose of begetting a virtuous child.76 Thus ends the prescribed procedure for the Ādhāna Kriyā—the Rite of Conception.
श्लोक ( Shlok ) 77
गर्भाधानात परं मासे तृतीय सम्प्रवर्तते । प्रीतिर्नाम क्रिया प्रीतैर्याऽनुष्ठेया द्विजन्मभिः ॥७७॥
गर्भाधानक बाद तीसरे माहमें प्रीति नामकी क्रिया होती है जिसे संतुष्ट हुए द्विज लोग करते हैं ।॥ ७७।।
In the third month following conception, the rite known as Prīti (Affection) is performed—It is undertaken by satisfied and contented Brāhmaṇas, in a spirit of sacred fulfillment.77
श्लोक ( Shlok ) 78
तत्रापि पूर्ववन्मन्त्रपूर्वा पूजा जिनेशिनाम् । द्वारि तोरणविन्यासः पूर्णकुम्भौ च सम्मतौ ॥७८॥
इस क्रियामें भी पहलेकी क्रियाके समान मन्त्रपूर्व क जिनेन्द्रदेवकी पूजा करनी चाहिये, दरवाजेपर तोरण बांधना चाहिये तथा दो पूर्ण कलश स्थापन करना चाहिये ॥७८॥
In this rite too, as in the previous one, worship of the Jineśvara should be performed with proper mantras.A festoon (toraṇa) should be hung at the doorway,And two auspicious, fully filled water pots (pūrṇa-kalaśas) should be ceremonially installed.78
श्लोक ( Shlok ) 79
तदादि प्रत्यहं भेरीशब्दो घण्टाध्वनान्वितः । यथाविभवमेवैतैः प्रयोज्यो गृहमेधिभिः ॥७९॥इति प्रीतिः ।
उस दिनसे लेकर गृहस्थोंको प्रतिदिन अपने वैभवके अनुसार घंटा और नगाड़े बजवाने चाहिये ।। ७९।। यह दूसरी प्रीति क्रिया है।
From that day onward, householders should, in accordance with their means and prosperity,Arrange for the daily sounding of bells and ceremonial drums.Thus is completed the second rite, known as Prīti Kriyā (the Rite of Affection).79
श्लोक ( Shlok ) 80
आधानात् पञ्चमे मासि क्रिया सुप्रीतिरिष्यते । या सुप्रीतैः प्रयोक्तव्या परमोपासकव्रतैः ॥८०॥
गर्भाधानसे पांचवें माहमें सुप्रीति क्रिया की जाती है जो कि प्रसन्न हुए उत्तम श्रावकों के द्वारा की जाती है ।।८०।।
In the fifth month following conception, the rite known as Suprīti (Deep Affection) is performed—It is undertaken by noble and joyous householders, filled with pious delight. 80
श्लोक ( Shlok ) 81
तत्राव्युक्तो विधिः पूर्वः सर्वोऽर्हविशसन्निधौ । कार्यो मन्त्रविधानज्ञैः साक्षीकृत्याग्निदेवताः ॥८१॥ इति सुप्रीतिः ।
इस क्रियामें भी मंत्र और क्रियाओंको जाननेवाले श्रावकोंको अग्नि तथा देवताकी साक्षी कर अर्हन्त भगवान्की प्रतिमाके समीप पहले कही हुई समस्त विधि करनी चाहिये ।।८१।। यह तीसरी सुप्रीति नामकी क्रिया है।
In this rite as well, the householders—versed in mantras and sacred procedures—Should perform all the previously prescribed rites near the image of the Arhant Lord,In the presence of fire and divine witnesses, with due solemnity.81 Thus is completed the third rite, known as Suprīti Kriyā (the Rite of Deep Affection).
श्लोक 82 से 91
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 |
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