आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
श्लोक 192 से 201 भरत और देवों की पूजा
भरत मंत्रियों, राजाओं, और स्त्रियों के साथ बाहुबली की पूजा करते हैं। वे रत्नों का अर्घ, गंगा-जल, मोतियों से अक्षत, और पारिजात-पुष्पों से पूजा करते हैं। इंद्र आदि देव रत्न-छत्र, सिंहासन, और गंधकुटी से उनकी पूजा करते हैं। स्वर्ग के वृक्षों से फूल बरसते हैं, और नगाड़े बजते हैं। केवलज्ञान से युक्त बाहुबली मुनियों के मध्य चंद्रमा-से शोभते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 36 – Shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192
सामात्यः समहीपाल. सान्तःपुरपुरोहितः । तं बाहुचलियोगीन्द्रं प्रणनामाधिराट् मुदा ॥१९२॥
सम्राट् भरतेश्वरने मन्त्रियोंके साथ, राजाओके साथ और अन्त पुरकी समस्त स्त्रियो तथा पुरोहितके साथ उन बाहुबली मुनिराजको बडे हर्षसे नमस्कार किया था ॥ १९२॥
With ministers and monarchs by his side,With the royal priest and all the women of the inner palace,Emperor Bharata, in a spirit of great joy,
Prostrated himself before the sage Bāhubali,Paying homage to the noble ascetic with reverence profound.192
श्लोक ( Shlok ) 193–195
किमत्र बहुना रत्नैः कृतोऽर्घः स्वर्णदीजलम् । पाद्यं रत्नार्चिषो दीपास्तण्डुलेज्या च मौक्तिकैः ॥ १९३॥हविः पीयूषपिण्डेन धूपो देवद्रुमांशकैः । पुष्पार्चा पारिजातादिसुरागसुमनश्चयैः ॥ १९४॥ सरत्ना निधयः सर्वे फलस्थाने नियोजिताः। पूजां रत्नमयीमित्थं रत्नेशो निरवर्तयत् ॥१९५॥.
इस विषयमें अधिक कहाँतक कहा जावे, संक्षेपमें इतना ही कहा जा सकता है कि उसने रत्नोका अर्घ बनाया था, गंगाके जलकी जलधारा दी थी, रत्नोंकी ज्योतिके दीपक चढाये थे, मोतियोसे अक्षतकी पूजा की थी, अमृतके पिण्डसे नैवेद्य अर्पित किया था, कल्पवृक्षके टुकड़ो (चूर्णो) से धूपकी पूजा की थी, पारिजात आदि देववृक्षोके फूलोके समूहसे पुष्पोकी अर्चा की थी, और फलोंके स्थानपर रत्नों-‘सहित समस्त निधियाँ चढ़ा दी थी इस प्रकार उसने रत्नमयी पूजा की थी ।।१९३-१९५॥
Why speak at length of Bharata’s devotion?
Let it suffice to say this much—He fashioned an argha of precious gems,Poured sacred water from the holy Gaṅgā,Lit lamps whose flames danced with the brilliance of jewels,And offered rice-grains of worship made of lustrous pearls.He presented divine food shaped from nectar itself,Burned incense blended with the dust of wish-fulfilling trees,And made floral offerings from celestial blossoms—
Pārijāta and other heavenly blooms in fragrant profusion.In place of earthly fruits, he laid forth treasures untold,Adorning the worship with all the riches of the world.Thus did he perform a ratnamayī pūjā—
A worship woven entirely of jewels.193–195
श्लोक ( Shlok ) 196
सुराश्चासन कम्पेन ज्ञाततत्केवलोदयाः । चक्रुरस्य परामिज्यां गता ध्वरपुरःसराः ॥१९६॥
आसन कम्पायमान होनेसे जिन्हे बाहुबली के केवलज्ञान उत्पन्न होनेका बोध हुआ है ऐसे इन्द्र आदि देवोने आकर उनकी उत्कृष्ट पूजा की ।।१९६।।
When their divine thrones began to tremble,The gods—Indra and the rest—understoodThat Bāhubali had attained Kevalajñāna,
The highest state of perfect knowledge.They descended and offered unto him A worship of the most exalted kind,Worthy of one who had reached supreme enlightenment. 196
श्लोक ( Shlok ) 197
वयुर्मन्दं स्वरुद्यानतरुधूननचुञ्चवः । तदा सुगन्धयो वाताः स्वर्जुनीशीकराहराः ॥१९७॥
उस समय स्वर्गके बगीचेके वृक्षोंको हिलाने-‘में चतुर तथा गगा नदीकी बूँदोंको हरण करनेवाला सुगन्धित वायु धीरे-धीरे वह रहा था ॥१९७।।
At that moment, a fragrant breeze began to flow—Gentle, graceful, and skilled in stirring The trees of the celestial gardens,As if stealing drops from the sacred Gaṅgā To perfume the air with divine sweetness.197.
श्लोक ( Shlok ) 198
मन्द्रं पयोमुचां मार्गे दध्वनुश्च सुरानकाः। पुष्पोत्करो ‘दिवोऽपतत् कल्मानोकहसंभवः ॥१९८॥
देवोके नगाड़े आकाशमें गम्भीरतासे बज रहे थे और कल्पवृक्षोसे उत्पन्न हुआ फूलो-का समूह आकाशमे पड़ रहा था ॥१९८॥
In the heavens, the celestial drums of the gods Resounded with deep and solemn thunder,While showers of blossoms, born of the wish-fulfilling trees,Drifted down gently from the sky,Adorning the moment with divine celebration.198
श्लोक ( Shlok ) 199
रत्नातपत्रमस्योच्चैर्निर्मितं सुरशिल्पिभिः । परार्थ्यमणिनिर्माणमभाद् दिव्यं च विष्टरम् ॥१९९॥
उनके ऊपर देवरूपी कारीगरोके द्वारा बनाया हुआ रत्नोंका छत्र सुशोभित हो रहा था और नीचे बहुमूल्य मणियोका बना हुआ दिव्य सिंहासन देदीप्यमान हो रहा था ॥१९९।।
Above him shimmered a radiant jeweled canopy,Wrought by celestial artisans with divine craftsmanship;And below, a resplendent throne of priceless gems Gleamed with otherworldly light, Glorifying the sage in his supreme attainment. 199
श्लोक ( Shlok ) 200
स्वयं व्यध्यतास्योच्चैः प्रान्तयोश्चामरोन्करः । सभावनिश्च तद्योग्या पप्रथे प्रथितोदया ॥२००॥
उनके दोनों ओर ऊँचाईपर चमरों का समूह स्वयं ढुल रहा था तथा जिसका ऐश्वर्य प्रसिद्ध है ऐसी उनके योग्य सभाभूमि अर्थात् गन्धंकुटी भी बनायी गयी थी ॥२००।।
On either side, at a lofty height,Divine yak-tail fans swayed of their own accord,And a grand Gandhakutī—a celestial hall of fragrance,
Worthy of his majesty and renowned splendor—Was wondrously manifest, befitting his supreme state.200
श्लोक ( Shlok ) 201
सुरैरित्यर्चितः प्राप्तकेवलर्द्धिः स योगिराट् । व्यद्युतन्मुनिभिर्जुष्टः शशीवोडुभिराश्रितः ॥२०१॥
इस प्रकार देवोने जिनकी पूजा की है और जिन्हे केवलज्ञानरूपी ऋद्धि प्राप्त ‘हुई है’ ऐसे वे योगिराज अनेक मुनियोसे घिरे हुए इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे मानो नक्षत्रो-से घिरा हुआ चन्द्रमा ही हो ॥२०१॥
Thus adorned by the worship of the gods,And endowed with the supreme power of Kevalajñāna,That sovereign among sages—Yogirāj
Stood resplendent, surrounded by countless ascetics,Even as the radiant moon shines forth in glory,Encircled by a host of stars in the night sky.201
श्लोक 202 से 212
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
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