आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92
श्लोक 93 से 101 सुभद्रा की शारीरिक शोभा
सुभद्रा के चरण नूपुरों की ध्वनि से कामदेव के नगाड़ों-से बजते हैं। उनकी जंघाएं और नितम्ब कामदेव की नसैनी और गृह-से हैं। रोमावली से कामदेव-रूपी सर्प उनकी नाभि से स्तनों तक पहुंचता है। वह हार और चोली से सर्पिणी-सी शोभती है। उसकी भुजाएं कल्पवृक्ष के अंकुर, करतल विजय-रेखाओं से युक्त, और मुख कामदेव की आयुधशाला-सा है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 37 – Shlok 93 to 101
श्लोक ( Shlok ) 93
तत्क्रमौ नूपुरामञ्जुगुज्जितैर्मुखरीकृतौ । मदनद्विरदस्येव तेनतुर्जयडिण्डिमम् ॥९३॥
नूपुरोंकी मनोहर झंकारसे वाचालित हुए उसके दोनों चरण ऐसे जान पड़ते थे मानो कामदेवरूपी हाथीके विजय के नगाड़े ही बजा रहे हों ॥९३॥
Her anklets chimed with a melodious resonance, and her graceful feet, thus made eloquent, seemed as though they beat the victory drums of Kāma, the god of desire, likened to a triumphant elephant in conquest.93
श्लोक ( Shlok ) 94
निःश्रेणीकृत्य तज्जङ्घे सदूरुद्वारबन्धनाम् । वासगेहास्थयाऽनङ्गस्तच्छ्रोणीं नूनमासदत् ॥९४॥
ऐसा मालूम होता था मानो कामदेव अपने निवासगृहपर पहुंचने की इच्छासे उस सुभद्राकी दोनों जंघाओंको नसैनी बनाकर जिसमें उत्तम ऊरु ही दरवाजे के बन्धन हैं ऐसे उसके नितम्बों पर जा पहुंचा हो ।॥९४॥
It seemed as though Kāma, in his yearning to reach his abode, had made Subhadrā’s thighs his ladder, and ascended to her hips—where her shapely loins formed the very threshold of that secret dwelling.94
श्लोक ( Shlok ) 95
निःसृत्य नाभिवल्मीकात् कामकृष्णभुजङ्गमः । रोमावलीछलेनास्या ययौ कुचकरण्डकौ ॥९५ll
रोमावलीके छलसे कामदेव-रूपी काला सर्प उसकी नाभिरूपी बामीसे निकलकर उसके स्तनरूपी पिटारेके समीप जा पहुंचा था ।।९५।।
Deceived by the snare of her delicate line of down, the dark serpent of Kāma emerged from the burrow of her navel and crept toward the treasure-chest of her breasts.95
श्लोक ( Shlok ) 96
निर्मोकमिव कामाहेः दधानोद्धं स्तनांशुकम् । भुजगीमिव तद्धृत्यै सै कामेकावलीमधात् ॥९६॥
वह सुभद्रा कामरूपी सर्पकी कांचलीके समान सुन्दर स्तनवस्त्र (चोली) धारण करती थी और उस कामरूप सर्पको सन्तुष्ट करने के लिये सर्पिणीके समान श्रेष्ठ एकावली हारको धारण करती थी ।। ९६ ।।
Subhadrā wore a breast-cloth as fair as the cast-off slough of the serpent of desire, and to appease that very serpent—Kāma incarnate—she adorned herself with a single, exquisite garland, like a serpent-maiden offering her grace.96
श्लोक ( Shlok ) 97
बभ्रे हारलतां कण्ठलग्नां सा नाभिलम्बिनीम् । मन्त्ररक्षामिवानङ्गग्रथितां कामदीपिनीम् ॥९७।।
वह कण्ठमें पड़ी हुई, नाभि तक लटकती हुई और कामको उद्दीपित करनेवाली जिस हाररूपी लताको धारण कर रही थी वह ऐसी मालूम होती थी मानो कामदेवके द्वारा गूंथा हुआ और मन्त्रोंसे मंत्रित हुआ रक्षाका डोरा ही हो ॥९७।।
The garland she wore—gracing her neck, cascading down to her navel, and enflaming the fires of desire—seemed no mere ornament, but a sacred thread woven by Kāma himself, infused with mantras and bound as a charm to protect the sovereignty of sensual delight.97
श्लोक ( Shlok ) 98
हाराक्रान्तस्तनाभोगा सा स्म धत्ते परां श्रियम् । सीतेव यमकाद्रिस्पृक्प्रवाहा सरिदुत्तमा ॥९८॥
जिसके स्तनोंका मध्यभाग हारसे व्याप्त हो रहा है ऐसी वह सुभद्रा इस प्रकारकी उत्कृष्ट शोभा धारण कर रही थी मानो जिसका प्रवाह दोनों ओरके यमक पर्वतोंको स्पर्श कर रहा है ऐसी उत्तम सीता नदी ही हो ।। ९८ ।।
With the garland resting upon the valley between her breasts, Subhadrā shone with such surpassing beauty as if she were the celestial river Sītā herself—her flowing current touching the twin peaks of flanking mountains.98
श्लोक ( Shlok ) 99
बाहू तस्या जितानङ्गपाशौ लक्ष्मीमुदूहतुः । कामकल्पद्रुमस्येव प्ररोहौ दोप्तभूषणौ ॥९९॥
कामदेवके पाशको जीतनेवाली तथा देदीप्य-मान आभूषणोंसे सुशोभित उसकी दोनों भुजाएं ऐसी शोभा धारण कर रही थीं मानो काम-रूपी कल्पवृक्षके दो अंकुरे ही हों ॥ ९९।।
Adorned with radiant ornaments and triumphant over the very noose of Kāma, her two arms gleamed with such splendor as though they were tender shoots sprung from the wish-fulfilling tree of desire itself.99
श्लोक ( Shlok ) 100
रेजे करतलं तस्याः सूक्ष्म रेखाभिराततम् । जयरेखा इवाबिभ्रदन्यस्त्री निर्जयाजिताः ॥१००॥
सूक्ष्म रेखाओंसे व्याप्त हुआ उसका करतल ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो अन्य स्त्रियोंके पराजयसे उत्पन्न हुई विजयकी रेखाएं ही धारण कर रहा हो ।।१००।।
Her palm, adorned with delicate lines, shone resplendently— as though it bore the very marks of triumph, etched by the defeat of all other women.100
श्लोक ( Shlok ) 101
मुखमुद्भू तनूदर्यास्तरलापाङ्गमाबभौ । सशरं समहेष्वासं ‘जयागारमिवातनोः ॥१०१॥
जिसकी भौंहें ऊपरको उठी हुई हैं और जिसमें चंचल कटाक्ष हो रहे हैं ऐसा उस कृशोदरीका मुख ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो बाण और महाधनुषसे सहित कामदेवकी आयुधशाला ही हो ॥ १०१ ॥
Her brows arched high, and her playful glances cast like arrows—such was the radiance of that slender-waisted maiden’s face, as if it were the very armory of Kāma, equipped with bow and quiver. 101
श्लोक 102 से 111
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92
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