आदिपुराण 34 पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 34 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 34 (श्लोक 1 से 223)
चक्रवर्ती भरत कैलास पर्वत से अपनी सेना के साथ अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं, जो गंगा के प्रवाह-सा शोभायमान है। अयोध्या नगरी सज्जित होकर उनका स्वागत करती है, परंतु उनका चक्ररत्न गोपुर द्वार पर रुक जाता है, जिससे लोग आश्चर्य और शत्रु की उपस्थिति का अनुमान लगाते हैं। भरत पुरोहित से इसका कारण पूछते हैं, जो संदेह करते हैं कि उनके भाई, विशेषकर बाहुबली, अहंकारवश उनकी आज्ञा नहीं मान रहे। पुरोहित सलाह देते हैं कि क्रोध त्यागकर दूतों के माध्यम से भाइयों को समझाया जाए, क्योंकि क्षमा ही श्रेष्ठ मार्ग है। दूत भाइयों को भरत की सेवा का संदेश देते हैं, पर भाई केवल अपने पिता वृषभदेव की आज्ञा मानने का निश्चय करते हैं। वे वृषभदेव के पास जाकर उनकी शरण लेते हैं, जो उन्हें वैराग्य और दीक्षा का मार्ग सुझाते हैं। भाई दीक्षा लेकर तीव्र तप करते हैं, द्वादशांग श्रुतस्कंध का अध्ययन कर ज्ञान और चारित्र में विशुद्धता प्राप्त करते हैं। वे ग्रीष्म, वर्षा, और शीत में कठिन तप सहते हैं, एकांत जंगलों और श्मशानों में निर्भय होकर निवास करते हैं। छह महाव्रतों का पालन कर, परिग्रह और ममता त्यागकर, वे शुद्ध आहार लेते हैं और सुख-दुख को समान मानते हैं। तप से उनकी आत्मा स्वर्ण-सी चमकती है, और वे अणिमा-महिमा जैसी ऋद्धियां प्राप्त करते हैं। तप को यज्ञ मानकर वे मोक्षमार्ग पर अग्रसर होते हैं। अंततः, वृषभदेव के पुत्र दीक्षा लेकर मोक्ष की कामना करते हैं, और भरत उन्हें वश में नहीं कर पाता। वे रत्नत्रय की साधना से पापों का नाश करते हैं और जैन धर्म के प्रचार में संलग्न रहते हैं।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 34
श्लोक 1 से 11 चक्रवर्ती भरत का अयोध्या की ओर प्रस्थान
चक्रवर्ती भरत, कैलास पर्वत से उतरकर अपनी सेना के साथ अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं, जो नदियों के साथ समुद्र की ओर बहती गंगा के समान शोभायमान है। अयोध्या नगरी साफ-सुथरी और चंदन से सुगंधित होकर स्वागत के लिए तैयार है। नगरी के समीप पहुंचने पर भरत का चक्ररत्न गोपुर द्वार पर रुक जाता है, जिससे नगरी कुंकुम जैसी लालिमा और चमक से युक्त प्रतीत होती है। लोग चक्र के रुकने को सूर्य के समान या किसी क्रूर ग्रह के प्रभाव से जोड़कर आश्चर्य और भय मिश्रित विचार करते हैं, यह मानते हुए कि कोई शत्रु अभी भी जीतने योग्य हो सकता है।
श्लोक 12 से 21 चक्ररत्न के रुकने पर विचार-विमर्श
सेनापतियों द्वारा चक्ररत्न के रुकने की सूचना मिलने पर भरत आश्चर्यचकित होकर विचार करते हैं कि उनकी अजेय गति वाला चक्र आज क्यों रुका। वे पुरोहित को बुलाकर गंभीर वचनों में कारण जानने का आदेश देते हैं। भरत की वाणी विजयलक्ष्मी की दूती-सी प्रतीत होती है। वे प्रश्न करते हैं कि सभी दिशाओं को जीतने वाला चक्र उनके अपने नगर के द्वार पर क्यों रुका, और क्या कोई शत्रु या द्वेषी उनके घर में ही मौजूद है। वे यह भी विचार करते हैं कि दुष्ट हृदय वाले लोग प्रायः महान पुरुषों की उन्नति से ईर्ष्या करते हैं।
श्लोक 22 से 31 शत्रु और चक्ररत्न के महत्व पर विचार
भरत कहते हैं कि महापुरुष दूसरों की उन्नति पर ईर्ष्या नहीं करते, परंतु क्षुद्र लोग ऐसा करते हैं। वे संदेह करते हैं कि कोई अहंकारी उनके घर में ही उनकी आज्ञा का पालन नहीं कर रहा, जिसके कारण चक्र रुक गया। वे कहते हैं कि छोटे शत्रु को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, जैसे आंख में पड़ी धूल या पैर में चुभा कांटा दुख देता है। चक्ररत्न के रुकने का कारण गंभीर है, क्योंकि यह राज्य का प्रमुख अंग है। भरत पुरोहित से इसका कारण जानने को कहते हैं, क्योंकि वे ही इस रहस्य को समझ सकते हैं। पुरोहित को संबोधित कर भरत संक्षिप्त वचनों में अपनी बात रखते हैं।
श्लोक 32 से 41 पुरोहित का परामर्श
पुरोहित भरत की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि उनकी वाणी में माधुर्य और सरलता अद्वितीय है। वे स्वीकार करते हैं कि वे केवल शास्त्रज्ञ हैं, परंतु भरत जैसे राजा को राजनीति की समझ में कोई समकक्ष नहीं। पुरोहित बताते हैं कि चक्ररत्न तब तक नहीं रुकता जब तक दिग्विजय पूर्ण न हो। वे संकेत देते हैं कि भरत ने बाहरी शत्रुओं को जीत लिया, परंतु घर के भीतर (अंतर्मंडल) अभी शुद्धता की आवश्यकता है। विशेष रूप से, उनके भाई उनकी आज्ञा का पालन नहीं कर रहे, जो चक्र के रुकने का कारण हो सकता है।
श्लोक 42 से 51 सजातीय विरोध और बाहुबली की भूमिका
पुरोहित कहते हैं कि सजातीय लोग भी बलवान की राह में बाधा बन सकते हैं, जैसे सूर्यकांत मणि सूर्य के सामने चमकती है। भरत के निन्यानबे भाई, विशेषकर बाहुबली, अहंकारवश केवल आदिनाथ को प्रणाम करने का निश्चय करते हैं। पुरोहित सुझाते हैं कि शीघ्र प्रतिकार आवश्यक है, क्योंकि शत्रु, ऋण, या अग्नि का छोटा अंश भी उपेक्षित नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं कि पृथिवी का शासन केवल भरत को करना चाहिए, न कि अनेक राजाओं को। यदि भाई आज्ञाकारी न हों, तो दूतों के माध्यम से या युद्ध द्वारा उन्हें वश में करना होगा।
श्लोक 52 से 61 एकमात्र शासक का महत्व और क्रोध
पुरोहित कहते हैं कि राज्य और कुलवती स्त्रियां एक ही पुरुष के अधीन होनी चाहिए। भाइयों को या तो भरत को प्रणाम करना होगा या जैन धर्म की शरण लेनी होगी। सजातीय लोग परस्पर विरोध से जलते हैं, परंतु अनुकूल रहकर आनंद देते हैं। पुरोहित सुझाते हैं कि भाई शांति से भरत की आज्ञा मानें। इसके जवाब में, भरत क्रोधित होकर कहते हैं कि उनके भाई बिना कारण वैर कर रहे हैं। वे उन्हें दंड देने की बात कहते हैं, यह मानते हुए कि उनके अहंकार को चक्र के संताप से ठीक करना होगा।
श्लोक 62 से 71 बाहुबली के अहंकार पर क्रोध और समाधान की शुरुआत
भरत कहते हैं कि उनके भाई, विशेषकर बाहुबली, यौवन के उन्माद में योद्धा होने का दंभ पाले हैं। वे घोषणा करते हैं कि पृथिवी का उपभोग केवल वही करेंगे, और भाइयों को उनकी आज्ञा माननी होगी, अन्यथा युद्ध अपरिहार्य है। वे बाहुबली के अहंकार को विशेष रूप से निंदनीय मानते हैं, क्योंकि वह बुद्धिमान और प्रेमी होने के बावजूद विरोध कर रहा है। क्रोध में बढ़-चढ़कर बोलने पर पुरोहित उन्हें शांत करते हैं और उपायपूर्वक कार्य शुरू करने का सुझाव देते हैं, जिसे भरत स्वीकार करते हैं।
श्लोक 72 से 81 क्रोध पर नियंत्रण और दूतों के माध्यम से समाधान
पुरोहित चक्रवर्ती भरत को समझाते हैं कि क्रोध जितेंद्रिय पुरुषों के लिए अनुचित है, क्योंकि उन्होंने छह अंतःशत्रुओं (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य) को जीत लिया है। वे कहते हैं कि क्रोध कार्य की सिद्धि में संदेह पैदा करता है और जो राजा अपने अंतःशत्रुओं को नहीं जीत सकता, वह कार्य-अकार्य का ज्ञान नहीं कर सकता। पुरोहित सुझाते हैं कि क्षमा ही पृथिवी को जीतने का श्रेष्ठ साधन है और भरत को शांत रहकर दूतों के माध्यम से भाइयों को वश में करना चाहिए। वे सलाह देते हैं कि दूत पत्र और भेंट के साथ भाइयों को भरत की सेवा करने का संदेश दें, क्योंकि उनकी सेवा पितृ-समान और लाभकारी है।
श्लोक 82 से 91 दूतों का संदेश और भाइयों की प्रतिक्रिया
पुरोहित कहते हैं कि भाइयों के बिना भरत का राज्य संतोषजनक नहीं, क्योंकि साम्राज्य भाइयों के साथ ही आनंददायक होता है। दूतों को भाइयों को विश्वास दिलाने और पत्र के माध्यम से संदेश देने को कहा जाता है। यदि शांतिपूर्ण प्रयास विफल हों, तो आगे की कार्रवाई पर विचार करना चाहिए। पुरोहित लोकापवाद से बचने और यश की रक्षा की सलाह देते हैं। भरत उनकी बात मानकर क्रोध छोड़ देते हैं और दूतों को भाइयों के पास भेजते हैं। दूत संदेश सुनाते हैं, जिसे सुनकर भाई कहते हैं कि बड़ा भाई पूज्य है, परंतु वे केवल अपने पिता आदिनाथ की आज्ञा मानते हैं।
श्लोक 92 से 101 भाइयों का पिता के प्रति समर्पण
भाई स्वीकार करते हैं कि भरत का संदेश उचित है, परंतु वे अपने पिता वृषभदेव को ही प्रमाण मानते हैं, जिन्होंने उन्हें ऐश्वर्य प्रदान किया। वे कहते हैं कि वे स्वतंत्र नहीं, बल्कि पिता की आज्ञा के अधीन हैं और भरत से कुछ लेना-देना नहीं चाहते। भाइयों ने दूतों का सत्कार किया, उपहार और पत्र के साथ उन्हें विदा किया, और फिर अपने पिता वृषभदेव के पास पहुंचे। वहां उन्होंने विधिपूर्वक प्रणाम और पूजा की, यह कहते हुए कि वे केवल उनकी ही उपासना करेंगे, क्योंकि उनकी कृपा से ही उन्हें समृद्धि मिली है।
श्लोक 102 से 111 भाइयों की वृषभदेव के प्रति भक्ति
भाई कहते हैं कि वे केवल वृषभदेव को प्रणाम करेंगे, क्योंकि उनका मन अन्य को नमन करने में संतुष्ट नहीं। वे उपमाएं देते हैं, जैसे राजहंस का मानसरोवर छोड़कर अन्य तालाब न जाना, या चातक का मेघ जल के अतिरिक्त अन्य जल न पीना। वे वृषभदेव की शरण में दीक्षा लेकर भय और मानभंग से मुक्त होना चाहते हैं। वे उनसे हितकारी और सुखदायी मार्ग बताने की प्रार्थना करते हैं, ताकि उनकी भक्ति दृढ़ हो और वे दोनों लोकों में उनकी सेवा में रहें।
श्लोक 112 से 121 वृषभदेव का उपदेश
वृषभदेव राजकुमारों को समझाते हैं कि अभिमानी और बलवान होने के बावजूद उन्हें दूसरों के सेवक नहीं बनना चाहिए। वे कहते हैं कि विनाशी राज्य, चंचल जीवन, और यौवन का उन्माद व्यर्थ है। सेनाएं, धन, और विषय भोग तृष्णा को बढ़ाते हैं और तृप्ति नहीं देते। वे कहते हैं कि भाइयों ने सभी विषयों का आस्वादन किया, फिर भी संतोष नहीं मिला। वृषभदेव सलाह देते हैं कि जब तक पुण्य का उदय है, भरत को राज्य करने देना चाहिए और इस अस्थिर राज्य के लिए व्यर्थ विवाद नहीं करना चाहिए।
श्लोक 122 से 131 दीक्षा और तप का मार्ग
वृषभदेव कहते हैं कि धर्मरूपी वृक्ष का दयारूपी फूल धारण करने से मुक्तिरूपी फल प्राप्त होता है। तप ही अभिमान की रक्षा करता है और दीक्षा, गुण, और दया से युक्त तपस्वी जीवन ही श्रेष्ठ राज्य है। उनके उपदेश से राजकुमारों में वैराग्य जागता है और वे दीक्षा ग्रहण कर वन की ओर प्रस्थान करते हैं। दीक्षा को राजकन्या की तरह ग्रहण कर वे सुखी होते हैं। तीव्र तप से उनका शरीर कृश, परंतु तप की लक्ष्मी से देदीप्यमान होता है। वे जिनकल्प चारित्र में स्थित होकर तप करते हैं।
श्लोक 132 से 141 तप और ज्ञान का अध्ययन
राजकुमार तपरूपी लक्ष्मी के प्रति समर्पित होकर राज्यलक्ष्मी को भूल जाते हैं। उन्होंने द्वादशांग श्रुतस्कंध का अध्ययन कर आत्मा को तप से अलंकृत किया। स्वाध्याय से मन और इंद्रियों का निरोध कर वे आचारांग से मुनि आचरण, सूत्रकृतांग से धर्मक्रियाएं, स्थानाध्ययन से तत्त्वरत्न, समवाय से द्रव्य ज्ञान, व्याख्याप्रज्ञप्ति से प्रश्न-उत्तर, धर्मकथानास से कथाएं, और उपासकाध्ययन से श्रावकाचार का ज्ञान प्राप्त किया। इस प्रकार, वे विशुद्ध चारित्र और ज्ञान से युक्त होकर धर्म का प्रचार करते हैं।
श्लोक 142 से 151 श्रुतज्ञान और तप की साधना
राजकुमारों ने द्वादशांग श्रुतस्कंध के अध्ययन से गहन ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने अन्तःकृत और अनुत्तर विमानौपपादिक अंगों से तीर्थंकरों के उपसर्गों और अनुत्तर विमानों में उत्पन्न मुनियों का वृत्तांत जाना। प्रश्नव्याकरण से जीवों के सुख-दुख का वर्णन, विपाकसूत्र से कर्मों की प्रकृतियों का ज्ञान, और दृष्टिवाद से दृष्टि के भेद समझकर वे जैन शास्त्रों में भक्ति और तीव्र तप में लीन हो गए। चौदह पूर्वों का अध्ययन कर वे श्रुतज्ञान से विशुद्ध तप करने लगे। ग्रीष्म में सूर्य की तपन सहते हुए वे आतापन योग में तप करते थे।
श्लोक 152 से 161 कठिन तप और धैर्य
मुनिराज ग्रीष्म में तपी हुई शिलाओं पर खड़े होकर, वर्षा में वृक्षों के नीचे रात बिताकर, और शीत में बर्फ सहते हुए कठिन तप करते थे। वे मौन और धैर्य के साथ प्रकृति के संताप को सहन करते थे। ग्रीष्म के दावानल, वर्षा के मूसलधार जल, और शीत की बर्फ में भी वे अडिग रहकर आतापन, ध्यान, और निश्चल योग धारण करते थे। उनका धैर्य और तप उनकी आत्मा को समुद्र की तरंगों-सा देदीप्यमान करता था, और वे तीनों कालों में कठिन योग को धारण करते थे।
श्लोक 162 से 171 वैराग्य और मोक्षमार्ग की दृढ़ता
मुनियों ने भोगों को माला के समान तुच्छ मानकर त्याग दिया और जीवन को चंचल समझकर मोक्षमार्ग में दृढ़ता अपनाई। वे जिनेन्द्रदेव के मार्ग में संतोष के साथ संलग्न थे। जैन धर्म के प्रति उनकी श्रद्धा अटल थी, और वे छह महाव्रतों (अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, परिग्रहत्याग, रात्रिभोजनत्याग) का पालन करते थे। परिग्रह और ममता से मुक्त होकर वे जिनेन्द्रदेव के मोक्षमार्ग की आराधना में तत्पर थे, और उनकी आत्मा विशुद्धता की ओर अग्रसर थी।
श्लोक 172 से 182 एकांतवास और निर्भयता
मुनिराज परिग्रह त्यागकर एकांत और पवित्र स्थानों में निवास करते थे। वे गाँवों में एक दिन और नगरों में पाँच दिन से अधिक नहीं ठहरते थे। सिंह, व्याघ्र, और अन्य हिंसक जीवों से भरे जंगलों और गुफाओं में वे निर्भय होकर रहते थे। श्मशानभूमियों में डाकिनियों, उल्लुओं, और शृगालों के बीच भी वे ध्यानमग्न रहते थे। उनकी निर्भयता और धैर्य उन्हें जिनेन्द्रदेव के उपदेशों के अनुसार शांत और स्थिर रखते थे।
श्लोक 183 से 191 ध्यान और दयालुता
मुनिराज अंधेरी रातों में भयंकर वनों और जंगली हाथियों के बीच ध्यानमग्न रहते थे। वे स्वाध्याय और ध्यान में लीन होकर रात नहीं सोते थे, बल्कि सूत्रों के चिंतन में जागते रहते थे। पर्यंकासन या वीरासन में रात बिताते थे। परिग्रह और ममता से मुक्त होकर वे आकाश-से निर्लेप थे। वे सभी प्राणियों को पुत्र-सा मानकर मातृवत व्यवहार करते थे, और जीव-अजीव के भेद को जानकर प्रासुक स्थानों में निवास करते थे।
श्लोक 192 से 201 रत्नत्रय और शुद्ध आहार
मुनियों ने रत्नत्रय (समीचीन दर्शन, ज्ञान, चारित्र) के लिए सावद्य कार्यों का त्याग किया। वे छह काय जीवों की रक्षा करते थे और दीनता से मुक्त होकर मोक्ष को लक्ष्य बनाए रखते थे। तीन गुप्तियों (मन, वचन, काय की संयम) के धारक थे और कामभोगों से उदासीन रहते थे। वे शुद्ध अन्न ही ग्रहण करते थे, और शंकित, अभिहृत, उद्दिष्ट, या क्रयक्रीत आहार से बचते थे। मौन और ईर्यासमिति के साथ भिक्षा लेते थे, और सुख-दुख, मान-अपमान को समान मानते थे।
श्लोक 202 से 211 तप की विशुद्धता और संतोष
मुनिराज शरीर की स्थिति के लिए न्यूनतम आहार लेते थे, जैसे गाड़ी के लिए चिकनाई। वे आहार मिलने पर संतुष्ट नहीं होते थे और न मिलने पर विषाद करते थे। गोचरीवृत्ति के साथ शुद्ध भोजन ग्रहण कर तपोवन की ओर प्रस्थान करते थे। तप से उनका शरीर कृश हो गया, पर उनकी प्रतिज्ञा अडिग रही। परीषहों (कष्टों) को जीतकर उनकी आत्मा तपे हुए स्वर्ण-सी चमकने लगी। तप की अग्नि से उनकी आत्मा विशुद्ध होकर मोक्ष की ओर अग्रसर थी।
श्लोक 212 से 223 तप यज्ञ और मोक्ष की प्राप्ति
तप से मुनियों के शरीर चमड़ा और हड्डी मात्र रह गए, पर वे ध्यान की विशुद्धता में लीन थे। तप से अणिमा-महिमा जैसी ऋद्धियां प्रकट हुईं। उन्होंने तप को यज्ञ मानकर भगवान वृषभदेव के वचनों को मंत्र, दया को दक्षिणा, और मोक्ष को फल बनाया। वे मुनि भावनाओं का पालन करते हुए सभी विकारों को त्यागकर मोक्षमार्ग पर अग्रसर थे। भगवान वृषभदेव के पुत्रों ने दीक्षा लेकर तीर्थरूपी मानसरोवर के राजहंस बनकर मोक्ष की कामना की। भरत उन्हें वश में न कर सका, पर वे अपने पिता के मार्ग पर चलकर पापों का नाश करने वाले बने।
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द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
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