Hindi Translation of Adi purana Parv 28
श्लोक 1 से 11 : चक्रवर्ती भरत का प्रस्थान और सेना की शोभा
अथानन्तर-दूसरे दिन सवेरा होते ही जो प्रातःकालके समय करने योग्य समस्त क्रियाएं कर चुके हैं ऐसे चक्रवर्ती भरतने चक्ररत्नके पीछे पीछे प्रस्थान किया ।।१।। शत्रु-समूह के पराक्रमको नष्ट करनेवाला तथा स्वयं दूसरों के द्वारा उल्लंघन न करने योग्य चक्ररत्न और शत्रुओंको दण्डित करनेवाला दण्डरत्न, ये दोनों ही रत्न चक्रवर्तीकी सेनाके आगे आगे रहते थे ॥२॥ चक्ररत्न एक हजार देवोंके द्वारा रक्षित था और दण्डरत्न भी इतने ही देवोंके द्वारा रक्षित था । वास्तवमें चक्रवर्तीकी विजयके कारण ये दो ही थे, शेष सामग्री तो केवल शोभा के लिये थी ।।३।। अबकी बार चक्रवर्ती ने, जिसका शरीर विजयार्ध पर्वत के साथ स्पर्धा कर रहा है ऐसे विजयपर्वत नामके पूज्य हाथीपर सवार होकर प्रस्थान किया था ।।४।। उस समय ऐसा मालूम होता था मानो समुद्र पर्यन्त पूर्व दिशाको जीतने के लिये उद्यत हुए महाराज भरतको उस हाथी के छल से विजयार्ध पर्वत ही धारण कर रहा हो ।।५।। जिस प्रकार देदीप्य-मान मुकुटको धारण करनेवाला इन्द्र ऐरावत हाथी पर चढ़ा हुआ सुशोभित होता है उसी प्रकार देदीप्यमान मुकुटको धारण करनेवाला भरत शरद् ऋतुके बादलोंके समान सफेद और देवों के द्वारा दिये हुए उस विजयपर्वत हाथीपर चढ़ा हुआ सुशोभित हो रहा था ।।६।। भरतेश्वर के ऊपर लगा हुआ सफेद छत्र ऐसी शोभा धारण कर रहा था मानो छत्रके वहानेसे यशकी उत्पत्ति का स्थान हो हो ।।७।। लक्ष्मी के हास्यके समान निर्मल और शरऋतुकी चांदनीके समान संतापको नष्ट करनेवाली चमरोंकी पंक्ति महाराज भरतके चारों ओर ढुलाई जा रही थी ॥८॥ विजय नामके हाथी पर आरूढ़ हुए और विजय प्राप्त करानेवाले प्रकाशमान अस्त्रोंसे देदीप्यमान होनेवाले भरतेश्वर जयलक्ष्मीके कटाक्षोंके लक्ष्य बन रहे थे। भावार्थ उनकी ओर विजय-लक्ष्मी देख रही थी ।।९।। जिस प्रकार देव लोग इन्द्रके पीछे पीछे चलते हैं उसी प्रकार हजारों मुकुटबद्ध वड़े बड़े राजा लोग चारों ओर भरत महाराजके पीछे पीछे चल रहे थे ॥१०॥ ‘आज बहुत दूर जाना है और समुद्रके समीप ही ठहरना है इसलिये जल्दी करो’ इस प्रकार सेना-पति लोग सैनिकों को जल्दी जल्दी उठा रहे थे ।।११।।
श्लोक 12 से 21 : सेना का समुद्र की ओर प्रयाण और गंगा के साथ समानता
‘अरे जल्दी करो, महाराज प्रस्थान कर गये, और आजका पड़ाव बहुत दूर है’ इस प्रकार सेनापतियोंके वचन सेनाको क्षोभित कर रहे थे ।।१२।। ‘आज समुद्र तक चलना है, गङ्गाके द्वारपर ठहरना है और आज ही समुद्रको उल्लं-घन कर मागधदेवको वश करना है ।।१३।। आज हम लोग, जिसमें ऊंची ऊंची लहरें उठ रही हैं ऐसे समुद्रको देखेंगे और आज ही समुद्रको उल्लंघन करनेके लिये महाराजकी मुहर सहित आज्ञा है’ ।।१४।॥ इस प्रकार परस्पर वार्तालाप करते हुए सैनिकोंने प्रस्थान किया, उस समय प्रयाण-कालमें बजनेवाले नगाड़ोंके उठे हुए शब्दने आकाशको शब्दायमान कर दिया था ।।१५।। तदनन्तर, जिसका शब्द सब ओर फैल रहा है ऐसी वह सेना गङ्गा नदी के किनारे किनारे लम्बी होकर इस प्रकार चलने लगी मानो उसकी लम्बाईका नाप करती हुई ही चल रही हो ।।१६।। उस समय वह सेना ठीक गङ्गा नदीका अनुकरण कर रही थी क्योंकि जिस प्रकार गङ्गा नदीमें हंस चलते हैं उसी प्रकार उस सेनामें चमर ढुलाये जा रहे थे, जिस प्रकार गङ्गा नदी में बगुला उड़ा करते हैं उसी प्रकार उस सेनामें ध्वजाएं फहराई जा रही थीं और जिस प्रकार गङ्गा नदीमें अनेक तरङ्ग उठा करते हैं उसी प्रकार उस सेनामें अनेक घोड़े उछल रहे थे ।।१७।। वह सेना समुद्रकी ओर इस प्रकार जा रही थी मानो दूसरी गङ्गा नदी ही जा रही हो क्योंकि जिस प्रकार गङ्गा नदीमें राजहंस निवास करते हैं उसी प्रकार उस सेनामें भी राजहंस अर्थात् श्रेष्ठ राजा लोग निवास कर रहे थे और जिस प्रकार गङ्गा नदीकी गति कहीं भी स्खलित नहीं होती उसी प्रकार उस सेनाकी गति भी कहीं स्खलित नहीं हो रही थी ।।१८।। अथवा उस सेनाने गङ्गा नदीको जीत लिया था क्योंकि गङ्गा नदी विपरीत अर्थात् उल्टी प्रवृत्ति करने-वाली थी (पक्षमें विपरीत पक्षियोंसे व्याप्त थी) परन्तु सेना विपरीत नहीं थी अर्थात् सदा चक्रवर्तीके आज्ञानुसार ही काम करती थी, गङ्गा नदी निम्नगा अर्थात् नीच पुरुषको प्राप्त होनेवाली थी (पक्षमें ढालू स्थानकी ओर बहनेवाली थी) परन्तु सेना उसके विरुद्ध उन्नतगा अर्थात् उन्नत पुरुष-चक्रवर्तीको प्राप्त होनेवाली थी और इसी प्रकार गङ्गा त्रिमार्गगा अर्थात् तीन मार्गोसे गमन करनेवाली थी (पक्षमें त्रिमार्गगा, यह गंगाका एक नाम है) परन्तु सेना अनेक मार्गोंसे गमन करनेवाली थी ॥१९॥ गङ्गा नदी के किनारे किनारे जाती हुई वह सेना अपनी फहराती हुई ध्वजाओंसे ऐसी जान पड़ती थी मानो वनकी धूलिसे भरे हुए आकाशरूपी आंगनको ध्वजाओंके वस्त्रोंसे साफ ही कर रही हो ।॥२०॥ महाराज भरतकी सेनाओंने उत्तरकी ओर बहनेवाली तथा आनेवाली जिन अन्य अनेक नदियों और सेनाओंको पार किया था वे परस्परमें एक दूसरेके अनुरूप थीं अर्थात् नदियां सेनाओंके समान थीं और सेनाएं नदियोंके समान थों, क्योंकि जिस प्रकार नदियां दुर्विगाह्य अर्थात् कठिनतासे प्रवेश करने योग्य होती हैं उसी प्रकार सेनाएँ भी कठिनताके प्रवेश करने योग्य होती हैं, जिस प्रकार नदियां महाग्राह अर्थात् बड़े बड़े मगरमच्छोंसे सहित होती हैं उसी प्रकार सेनाएं भी महाग्राह अर्थात् बड़े भारी आग्रहसे सहित होती हैं, और जिस प्रकार नदियां बहुराज कुलस्थिति अर्थात् (बहुराज कुल स्थिति) अनेक राजाओंकी पृथिवीको ग्रहण करनेवाली स्थितिसे सहित होती हैं उसी प्रकार सेनाएं भी बहुराज कुलस्थिति अर्थात् अनेक राजवंशोंकी स्थितिसे सहित होती हैं ।।२१।।
श्लोक 22 से 31 : मार्ग में देशों और शत्रुओं पर विजय
धनवान् महाराज भरत मार्ग में पड़ते हुए अनेक देश, नदियां, पर्वत, वन, किले और खान आदि सबको उल्लंघन करते हुए आगे चले जा रहे थे ।। २२॥ गाय आदि जानवरों के संचारसे रहित वनों में दृष्टि डालते हुए भरतेश्वर ऐसे जान पड़ते थे मानो पृथिवीके छिद्रों राजा जिसे दण्ड रत्न प्राप्त होता है यह देश उसीका होता है इस निश्चयसे आकर महाराज को ढकने के लिये क्षणभर प्रयत्न ही कर रहे हों ।॥ २३॥ मार्गमें घबड़ाये हुए अनेक मण्डलेश्वर राजा भरतको प्रणाम कर रहे थे ।। २४।। मार्ग में महाराज भरतेश्वरके समस्त शत्रु बिना प्रयत्नके ही नम्रीभूत होते जाते थे इसलिये उन्हें कभी यह शब्द नहीं कहने पड़ते थे कि हे राजेन्द्र, आप चक्ररत्न धारण कीजिये और हे सास्थे, तुम रथ चलाओ ।॥२५॥ जीतने की इच्छा करनेवाले अन्य कितने ही राजा लोग युद्धमें भरतेश्वरसे लड़ने के लिये समर्थ नहीं हो सके थे इसलिये नमस्कार के बहाने अपने मुकुटोंसे ही उनके पैरोंकी ताड़ना कर रहे थे ॥ २६॥ महाराज भरत जिस प्रकार अपने राज्य में विभुत्व अर्थात् ऐश्वर्य धारण करते थे उसी प्रकार शत्रुओंके राज्यों में भी विभुत्व अर्थात् पृथिवीका अभाव धारण करते थे- उनकी भूमि छीन लेते थे, (विगत भूर्येषां तेषां भावः विभुत्वम्) और जिस प्रकार अपने राज्यमें भूप-रागानुरंजन अर्थात् राजाओं के प्रेमपूर्ण अनुरागको धारण करते थे उसी प्रकार शत्रुओंके राज्योंमें भी भू-परागा-नुरंजन अर्थात् पृथिवीकी धूलिसे अनुरंजन धारण करते थे, शत्रुओंको धूलिमें मिला देते थे, सो ठीक ही है, क्योंकि महापुरुत्रोंकी चेष्टाएं आश्चर्य करनेवाली होती ही हैं ।॥ २७।। संधि आदि गुणोंके विषयमें कोई भी राजा महाराज भरतके वराबर नहीं था इसलिये सन्धि आदि छहों गुण उन्हींमें चरितार्थ हुए थे। भावार्थ कोई भी राजा इनके विरुद्ध नहीं था इसलिये इन्हें किसीसे सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और आश्रय नहीं करने पड़ते थे ।।२८।। प्रत्येक देशमें भेंट लेकर आये हुए वहां के राजाओंका वड़ी प्रसन्नतासे आदर-सत्कार करते हुए महाराज भरत बहुतसे देशोंको उल्लंघन कर आगे बढ़ते जाते थे ॥ २९॥ भरतेश्वरने न तो कभी तलवारपर अपना हाथ लगाया था और न कभी डोरी ही धनुषपर चढ़ाई थी । उन्होंने केवल अपनी प्रभुत्वशक्तिसे ही पूर्व दिशाको जीत लिया था ।। ३० ।। उन्होंने गोकुलोंके समीप ही गायोंकी रक्षा करनेवाले तथा वनकी लताओंसे जिन्होंने अपने शिरके बालोंका जुडा बांध रखा है ऐसे तरुण ग्वाला देखे ॥ ३१॥
श्लोक 32 से 41 : ग्वालाओं और भीलों का दर्शन
कढ़नियोंके खोंचनेके परिश्रमसे उत्पन्न हुए पसीनेकी बूंदोंसे जिनके मुख व्याप्त हो रहे हैं, जो लीलापूर्वक नितम्बोंको नचा नचा कर स्तनोंको हिलाती हुई दही मथ रही हैं, कढ़नियोंके खींचनेसे जिनकी भुजाएं थक गई हैं, जिनके सब वस्त्र ढीले पड़ गये हैं, जिनके स्तनोंपरका वस्त्र भी नीचेकी ओर खिसक गया है, जिनके कृश उदरमें त्रिवली की रेखाएं साफ साफ दिख रही हैं, रई (फूल) के आघातसे उछल उछलकर शरीरमें जहाँ तहाँ लगी हुई दहीकी बड़ी बड़ी बूंदोंसे जो एक प्रकारकी विचित्र शोभाको पुष्ट कर रही हैं, मन्थन से होनेवाले शब्दोंके साथ साथ ही जिन्होंने कुछ गाना भी प्रारम्भ किया है, जिनके केशपाश का बन्धन खुल गया है और इसीलिये जो कामदेवकी पताकाओंके समान जान पड़ती हैं, तथा गोशाला के आंगनों में अपने इच्छानुसार वार्तालाप करती हुई जिन्होंने दहीका मथना प्रारम्भकिया है ऐसी ग्वालाओंकी स्त्रियोंको देखते हुए महाराज भरतेश्वर कुछ उत्कण्ठित हो उठे थे ॥३२-३६।। जंगली हाथियोंसे भरे हुए वनमें रहनेवाले भील लोगोंने जंगली हाथियोंके दांत और मोती भेंट कर महाराजके दर्शन किये थे ॥ ३७॥ जिनका शरीर श्याम है जिनके शरीरपर अभी रोमराजी प्रकट नहीं हुईं है, उदर भी जिनका कृश है, वस्त्रके समान धारण किये हुए चंचल पत्तोंसे जिनके शरीरका संवरण प्रकट हो रहा है, चमरी गायके बालोंसे बंधे हुए केशपाशोंसे जो बहुत ही सन्दर जान पड़ती हैं, गुंजाफ्लोंसे बनी हुई मालाओंको जिन्होंने अपना कण्ठहार बनाया है, कस्तूरी मृगके बैठनेसे सुगन्धित हुई मिट्टीको आभूषण बनाने की इच्छासे जो वनके किसी एक प्रदेशमें इकट्ठी कर रही हैं, जिनका आकार वास्तवमें सुन्दर है और जो सेनाके देखनेसे विस्मित हो रही हैं ऐसी भीलोंकी कन्याओंको भरतने दूरसे ही देखा था ।।३८-४१।।
श्लोक 42 से 51 : समुद्र के समीप शिविर और उप-समुद्र का दर्शन
कितने ही म्लेच्छ राजाओंने चमरी गायके बाल और कितने ही ने कस्तूरी-मृगकी नाभि भेंट कर भरतके दर्शन किये थे ।।४२।। वहांपर सेनापतिने चक्रवर्तीकी आज्ञा प्राप्त कर अन्तपालोंके लाखों किले अपने वश किये । ॥४३।। अन्तपालोंने अपूर्व अपूर्व रत्नों के समूह तथा सोना चांदी आदि उत्तम धन भेंट कर भरतेश्वरको प्रणाम किया तथा उसकी आज्ञा स्वीकार की ॥४४।। तदनन्तर सेनाके साथ साथ बहुत कुछ दूर मार्गको व्यतीत कर वे गङ्गाद्वारको प्राप्त हुए और उसके बाद ही अपने समान अलंघनीय समुद्रको प्राप्त हुए ।।४५।। उन्होंने समुद्रके समीप ही, समुद्रसे बाहर उछल उछल कर गहरे स्थानमें इकट्ठे हुए द्वीप सम्बन्धी उस जलको देखा जो कि समुद्रके निष्यन्दके समान मालूम होता था अथवा समुद्र के जलके समान ही निश्चल-स्थायी था अर्थात् उपसमुद्रको देखा, समुद्रका जो जल उछल उछलकर समुद्रके समीप ही द्वीपके किसी गहरे स्थानमें इकट्ठा होता जाता है वही उपसमुद्र कहलाता है। उप-समुद्र द्वीपके भीतर होता है इसलिये उसका जल द्वैप्य कहलाता है। उपसमुद्रका जल ऐसा जान पड़ता था मानो समुद्रका स्वेद ही इकट्ठा हो गया हो ।॥४६।। कर्मभूमिरूप युगके प्रारम्भमें जो वर्षा हुई थी तबसे लेकर कालके प्रभावसे बढ़ता हुआ वही जल द्वीपके अन्त भाग तक पहुंच गया था ।।४७।। जो जल समुद्रसे उछल उछलकर द्वीपमें आया था वह अलंघनीय था, बहुत गहरा था और उसने द्वीपके सब समीपवर्ती भागको घेर लिया था इसलिये वही उप-समुद्र कहलाने लगा था ।।४८।। उस उपसमुद्रको देखते हुए भरतने सुखकर मार्गसे जाकर गङ्गाके उपवनकी वेदीके अन्तभागमें सेनाका प्रवेश कराया ॥४९॥ वहां वेदिकामें एक बड़ा भारी तोरणद्वार है जो कि उत्तर द्वार कहलाता है, उसी द्वारसे धीरे धीरे प्रवेश कर वनके भीतर सेनाको ठहराया ।। ५० ।। वहां चक्रवर्तीके शिविरकी जो रचना हुई थी उसकी, उस क्षेत्रके अनुसार, लम्बाई तो अधिक थी परन्तु चौड़ाई कुछ कम थी और उसकी सेनाके विस्तार को कोई उल्लंघन नहीं कर सकता था ।। ५१ ।।
श्लोक 52 से 61 : लवण समुद्र विजय की तैयारी
जो नन्दन वनके समान है तथा जिसके वृक्ष सूर्य के आतापको रोकनेवाले हैं ऐसे उस वनमें भरतकी वह सेना गङ्गा नदीके शीतल वायुके स्पर्शसे सुखपूर्वक निवास करती थी ॥५२॥ यद्यपि मागध देवको वश करना यह कार्य पौरुष-साध्य है अर्थात् पुरुषार्थसे ही सिद्ध हो सकता है तथापि उसमें दैवकी प्रमाणता मानकर लवण समुद्रको जीतने के लिये तत्पर हुए भरत महाराजने भगवान् अरहन्त देवके आराधन करनेका विचार किया ।॥५३॥ जिसने मन्त्र तन्त्रोंसे विजयके शस्त्रोंका संस्कार किया है, तीन दिन उपवास किया है, मन्त्रके स्मरणसे जिसका आत्मा पवित्र है, जो पवित्र शय्यापर बैठा हुआ है, स्वयं पवित्र है, सायंकाल और प्रातःकालकी समस्त क्रियाओंमें सावधान है और पुरोहित जिसके समीप बैठा है ऐसे उन भरतने पञ्च परमेष्ठीकी पूजा की ॥५४-५५॥ भरतने विधि-पूर्वक सेनाकी रक्षाके लिये सेनापतिको नियुक्त किया और स्वयं दिव्य अस्त्र धारण कर लवण समुद्रको जीतनेकी इच्छासे प्रस्थान किया ।॥५६॥ समुद्रको उल्लंघन करनेकी इच्छा करने वाले भरतके चित्तमें यह भी चिन्ता नहीं हुई थी कि क्या क्या साथ लेना चाहिये और क्या-क्या यहां छोड़ देना चाहिये सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुषोंका धैर्य ही आश्चर्यजनक होता है ।॥५७॥ जो देवोपनीत अस्त्र-शस्त्रोंसे भरा हुआ है और जिसमें जल स्थल दोनोंपर समान रूपसे चलने वाले दिव्य घोड़े जुते हुए हैं ऐसे अजितंजय नामके रथपर भरतेश्वर आरूढ हुए ।।५८।। जो पत्तोंके समान हरितवर्ण है, जिसपर बहुत ऊंचे चक्रके आकारसे चिह्नित ध्वजा फहरा रही है और जो दिव्य सारथिके द्वारा प्रेरित है-हांका जा रहा है-ऐसे उस रथको वेग-शाली घोड़े ले जा रहे थे ।। ५९ ।। तदनन्तर हे देव, आपकी जय हो इस प्रकार भरतके लिये पवित्र आशीर्वाद देकर मंगलद्रव्य धारण किये हुए पुरोहितने इस नीचे लिखी हुई ऋचाको पढ़ा ॥६०॥ समस्त कर्मबन्धनको नष्ट करनेवाले धर्मनायक-तीर्थकर देव सदा जयवन्त रहते हैं इसलिये उनके प्रसादसे तू भी धर्मपूर्वक विजय प्राप्त कर, सबको जीत ।।६१।।
श्लोक 62 से 102 : समुद्र का वर्णन और भरत की वेदी पर आरूढ़ता
उसी समय पुरोहितने यह भी जोरसे घोषणा की कि हे देव, इस समुद्रमें निवास करनेवाले देव आपके उप-भोग करने योग्य क्षेत्रके भीतर ही रहते हैं इसलिये उन्हें जीतनेके लिये आपका यह समय है ॥६२।। तदनन्तर कुछ वीर पुरुषोंसे घिरे हुए चक्रवर्ती भरत गङ्गाद्वारकी वेदीपर जा चढ़े ।।६३।। चक्रवर्तीने उस गङ्गाद्वारकी वेदीको केवल समुद्रके भीतर प्रवेश करनेका द्वार ही नहीं समझा था किन्तु अपने कार्यकी सिद्धि होनेका भी द्वार समझा था ।। ६४ ।। मंगल वेषको धारण करने-वाले चक्रवर्तीका उस वेदीपर आरूढ होना विजय लक्ष्मीके विवाहकी वेदीपर आरूढ़ होनेके समान बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहा था ।। ६५।। यह वेदी मेरे घरके आंगनकी वेदी है इस प्रकार कल्पना करते हुए भरतने महासागरपर कृत्रिम नदीकी बुद्धिसे दृष्टि डाली थी । भावार्थ-भरतने अपने बलकी अधिकतासे गङ्गाकी वेदीको ऐसा समझा था मानो यह हमारे घरके आंगनकी ही वेदी है और महासमुद्रको ऐसा माना था मानो यह एक छोटी-सी नहर ही है ।।६६।। वे उस बड़ी लम्बी वेदीपर इस प्रकार आरूढ़ हुए थे जैसे अपनी प्रतिज्ञापर ही आरूढ़ हुए हों और समुद्रको उन्होंने ऐसा माना था जैसे उसके दूसरे किनारे पर ही पहुंच गये हों ।॥६७।। उस वेदीपरसे उन्होंने समुद्र देखा, उस समुद्रमें बारबार तटको उल्लंघन करने-वाली लहरें उठ रही थीं, पवन उसका ताड़न कर रहा था और वह अपने गंभीर शब्दोंसे ऐसा मालूम होता था मानो उल्लंघनके भयसे रो ही रहा हो तरंगरूपी भुजाओंसे किनारेपर छोड़े हुए रत्न सहित जलके छोटे छोटे कणोंसे वह ऐसा जान पड़ता था मानो भरतके लिये मोती और अक्षतोंसे मिला हुआ अर्घ ही दे रहा हो। उस समुद्रमें असंख्यात शंख थे, उसने समस्त द्वीपोंको आक्रान्त कर लिया था, वह पाररहित था, उसका कोई उल्लंघन नहीं कर सकता था और न उसे कोई क्षोभित ही कर पाता था इसलिये वह ठीक भरतकी सेनाके समूहका अनुकरण कर रहा था क्योंकि उसमें भी बजाये जानेवाले असंख्यात शंख थे, उसने भी समस्त द्वीप आक्रान्त कर लिये थे-अपने आधीन बना लिये थे, वह भी अपार था, वह भी दूसरोंके द्वारा अलंघनीय तथा क्षोभित करनेके अयोग्य था। वह समुद्र किसी अपस्मार (मृगी) के रोगीके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार अपस्मारका रोगी फेन सहित आती हुई जृम्भिकाओं अर्थात् जमुहाइयोंसे व्याकुल रहता है उसी प्रकार वह समुद्र भी फेन सहित उठती हुई जृम्भिका अर्थात् लहरोंसे व्याकुल था, जिस प्रकार अपस्मारका रोगी किसी के द्वारा पकड़-कर नहीं रखा जा सकता उसी प्रकार वह समुद्र भी किसी के द्वारा नहीं रोका जा सकता और जिस प्रकार अपस्मारका रोगी किसी भी जगह स्थिर नहीं रहता इसी प्रकार वह समुद्र भी किसी जगह स्थिर नहीं था-लहरों के कारण चंचल हो रहा था। वह समुद्र अकस्मात् ही गम्भीर शब्द करता था, विना कारण ही चंचल था और बिना कारण ही उसमें आवर्त अर्थात् भंवर पड़ते थे, इसलिये उसकी दशा किसी अन्यन्त भयभीत मनुष्यके समान हो रही थी क्योंकि अत्यन्त भयभीत मनुष्य भी अचानक शब्द करने लगता है, चिल्ला उठता है, बिना कारण ही कांपने लगता है, और बिना कारण ही आवर्त करने लगता है इधर उधर भागने लगता है। वह समुद्र फेन उठनेसे ऐसा जान पड़ता था मानो हँस ही रहा हो, ज्वार-भाटाओंसे ऐसा मालूम होता था मानो लास्य (नृत्य) ही कर रहा हो, लहरोंसे ऐसा सुशोभित होता था मानो चल ही रहा हो और हिलनेसे ऐसा दिखाई देता था मानो नशे में भूम ही रहा हो अथवा वह समुद्र किसी सर्पके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार सर्प रत्नसहित होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी रत्नसहित था, जिस प्रकार सर्पमें उत्कट विष अर्थात् जहर रहता है उसी प्रकार समुद्रमें भी उत्कट विष अर्थात् जल था, जिस प्रकार सर्प सू सू आदि फुंकारोंसे भयंकर होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी सू सू आदि शब्दोंसे भयंकर था, जिस प्रकार सर्पके देदीप्यमान कांचली होती है उसी प्रकार उस समुद्रके भी देदीप्यमान लहरें थीं, और जिस प्रकार सर्प चंचल रहता है उसी प्रकार वह समुद्र भी चंचल था। अथवा वह समुद्र ऐसा जान पड़ता था मानो अधिक पानी पीनेसे उसे सर्दी (जुकाम) ही हो गई हो और इसीलिये हजारों शब्दोंके बहाने छींकें ही ले रहा हो। अथवा वह समुद्र किसी आद्यून अर्थात् बहुत खानेवाले-पेटू-मनुष्य के समान जान पड़ता था, क्योंकि जिस प्रकार आद्यून मनुष्य बहुत खाता है और बादमें भोजन की अधिकता होनेसे डकारें लेता है उसी प्रकार उस समुद्रने भी समस्त नदियोंका जल पी लिया था और बादमें जलकी अधिकता होनेसे वह भी शब्दोंके बहाने डकारें ले रहा था। वह समुद्र अपने गम्भीर पातालरूपी महाउदरके बहानेसे जलसे कभी तृप्त नहीं होता था और इसी लिये मानो उसने तालु पर्यन्त अपना मुख खोल रखा था । भावार्थ-वह समुद्र किसी ऐसे मनुष्यके समान जान पड़ता था जो बहुत खानेपर भी तृप्त नहीं होता, क्योंकि जिस प्रकार तृप्त नहीं होनेवाला मनुष्य बहुत कुछ खाकर भी तृष्णासे अपना मुख खोले रहता है उसी प्रकार वहसमुद्र भी बहुत कुछ जल ग्रहण कर चुकनेपर भी तृष्णासे अपना मुख खोले रहता था-नदियों का अन्य जल ग्रहण करनेके लिये तत्पर रहता था। वह समद्र समस्त दिशाओंमें व्याप्त होकर शब्द कर रहा था इसलिये ‘रावण’ था, उसने अनेक पहाड़ अपने जलके भीतर डुबा लिये थे इसलिये ‘अचलग्राह’ था। वह सब जीवोंको भय उत्पन्न कराता था इसलिये विभीषण था, अत्यन्त बड़ा था इसलिये ‘अतिकाय’ था और बहुत गहरा होनेसे ‘महोदर’ था इस प्रकार वह ऐसा जान पड़ता था मानो राक्षसोंका समूह ही हो। वह समुद्र अपनी तरङ्गरूपी भुजाओं के द्वारा किनारेकी वेदीपर निरन्तर आघात करता रहता था इसलिये ऐसा जान पड़ता था मानो धक्का देकर उसे अपने समर्यादपनेको ही सुना रहा हो। वह पर्वतके समान ऊंची उठती हुई लहरोंसे किनारेको उल्लंघन कर रहा था इसलिये ऐसा जान पड़ता था मानो नदीरूप स्त्रियोंके साथ संभोग करनेसे अपने आपमें ही नहीं समा रहा हो। उसके शरीरमें अनेक तरंग-रूपी सिकुड़नें उठ रही थीं इसलिये वह वृद्ध पुरुषके समान जान पड़ता था, (पक्षमें अत्यन्त बड़ा था) अथवा वह समुद्र किसी पृथुक अर्थात् बालकके समान मालूम होता था (पक्षमें पृथु क अधिक है जल जिसमें ऐसा था) क्योंकि जिस प्रकार बालक पृथिवीपर घुटनोंके बल चलता है उसी प्रकार वह समुद्र भी लहरोंके द्वारा पृथिवीपर चल रहा था, जिस प्रकार बालक सरकता है उसी प्रकार वह भी लहरोंसे सरकता था, जिस प्रकार बालक अत्यन्त सुन्दर होता है उसी प्रकार वह भी अत्यन्त सुन्दर था। इसके सिवाय वह समुद्र मगरमच्छ आदि जलचरजीवों से सहित था तथा अत्यन्त भयंकर था अथवा वह समुद्र स्पष्ट ही जलाशय (ड और ल में अभेद होने से जडाशय) अर्थात् मूर्ख था क्योंकि लावण्य रहनेपर भी वह उपभोग करने योग्य नहीं था जो लावण्य अर्थात् सुन्दरतासे सहित होता है वह उपभोग करने योग्य अवश्य होता है परन्तु समुद्र वैसा नहीं था (पक्षमें लावण्य अर्थात् खारापन होनेसे किसीके पीने योग्य नहीं था) गंभीरता होनेपर भी वह स्थिर नहीं था, जो गंभीरता अर्थात् धैर्यसे सहित होता है वह स्थिर अवश्य रहता है परन्तु समुद्र ऐसा नहीं था (पक्षमें गंभीरता अर्थात् गहराई होनेपर भी वह लहरोंसे चंचल रहता था) और महत्त्वके रहते हुए भी वह चिल्लाता रहता था-गालियां बका करता था, जो महत्त्व अर्थात् बड़प्पनसे सहित होता है वह बड़ा शान्त रहता है, चिल्लाता नहीं है परन्तु समुद्र ऐसा नहीं था (पक्षमें बड़ा भारी होनेपर भी लहरोंके आघातसे शब्द करता रहता था) इन सब कारणोंसे स्पष्ट है कि वह जड़ाशय अवश्य था (पक्षमें जल है आशयमें जिसके अर्थात् जलसे भरा हुआ था। उस समुद्रके यद्यपि मद्यका संगम नहीं था-मद्य-पानका अभाव था तथापि वह आरूढ मधुविक्रिय था अर्थात् मद्यपानसे उत्पन्न होनेवाले विकार नशाको धारण कर रहा था, इसी प्रकार यद्यपि उसके काम-ज्वर नहीं था तथापि वह उद्रिक्त-कंदर्प था अर्थात् तीव्र काम-विकारको धारण करनेवाला था। भावार्थ इस श्लोकमें इलेष- मूलक विरोधाभास अलंकार है इसलिये प्रारम्भ-कालमें विरोध मालूम होता है परन्तु बादमें उसका परिहार हो जाता है। परिहार इस प्रकार समझना चाहिये कि वह मद्यके संगमसे रहित होकर मधु अर्थात् पुष्परसकी विक्रिया धारण कर रहा था अथवा मनोहर जलपक्षियों की क्रियाएं धारण कर रहा था और कामज्वरसे रहित होकर भी उद्रिक्त-कं-दर्प था अर्थात् जलके अहंकार से सहित था। वह समुद्र किनारेपर आती जाती हुई लहरोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो जिससे कभी तृप्ति न हो ऐसा नदियोंका मीठा जल पीकर लहरों द्वारा संतोपसे गमना-गमन ही कर रहा हो। अथवा वह समुद्र चक्रवर्तीके समान जान पडता था ययोंकि जिस प्रकार चक्रवर्ती अनेक स्त्रियोंके द्वारा सेवित होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी नदीरूपी अनेक स्त्रियोंके द्वारा सेवित था, जिस प्रकार चक्रवर्ती के पास अनेक रत्नोंका परिग्रह रहता है उसी प्रकार उस समुद्रके पास भी अनेक रत्नोंका परिग्रह था, जिस प्रकार चक्रवर्ती महाभोगी अर्थात् बड़े बड़े राजाओंके द्वारा आराधन करने योग्य होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी महाभोगी अर्थात् बड़े-बड़े सर्पोंके द्वारा आराधन करने योग्य था और जिस प्रकार चक्रवर्ती चारों ओर प्रसिद्ध रहता है उसी प्रकार वह समुद्र भी चारों ओर प्रसिद्ध था-व्याप्त था। जल-जन्तुओंके आघातसे उड़ी हुई और बहुत दूरतक ऊंची उछटी हुई जलकी बूंदोंसे वह समुद्र ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो बाकीके समस्त समुद्रोंको जीतनेसे अपनी विजय-पताका ही फहरा रहा हो। उस समुद्र-का नीले रंगका पानी वायुके वेगसे ऊपरको उठ रहा था जिससे वह ऐसा जान पड़ता था मानो कुलाचलरूपी वड़े बड़े खंभोंपर बने हुए जम्बूद्वीपरूपी विशाल घरका नील रत्नोंसे बना हुआ एक ऊंचा कोट ही हो। अथवा वह समुद्र दूसरे श्रुतस्कन्धके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार श्रुतस्कन्ध आदि-अन्त-रहित है त है उसी प्रकार वह समुद्र भी आदि-अन्त-रहित था, जिस प्रकार श्रुतस्कन्ध समस्त पदार्थोंका अवगाहन-निरूपण करनेवाला है उसी प्रकार वह समुद्र भी समस्त पदार्थोंका अवगाहन-प्रवेशन-धारण करनेवाला है, और जिस प्रकार श्रुतस्कन्ध में गंभीर शब्दोंकी रचना है उसी प्रकार उस समुद्रमें भी गम्भीर शब्द होते रहते थे-अथवा वह समुद्र द्रव्यार्थिक नयका आश्रय लेता हुआ सा जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार द्रव्या-थिक नयसे प्रत्येक पदार्थ में नित्य शब्दकी प्रवृत्ति होती है उसी प्रकार उस समुद्रमें भी नित्य शब्द की प्रवृत्ति हो रही थी अर्थात् निरन्तर गंभीर शब्द होता रहता था। अथवा उसकी लहरें क्षण-भंगुर थीं इसलिये वह पर्यायार्थिकके गोचर भी मालूम होता था क्योंकि पर्यायार्थिक नय पदार्थोंको क्षणभंगुर अर्थात् अनित्य बतलाता है। अथवा वह समुद्र किसी दुष्ट राजाके समान मालूम होता था क्योंकि जिस प्रकार दुष्ट राजा सदा तृष्णासे सहित होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी सदा तृष्णासे सहित रहता था अर्थात् प्रतिक्षण अनेक नदियोंका जल ग्रहण करते रहने पर भी संतुष्ट नहीं होता था, जिस प्रकार दुष्ट राजा जल (जड़) अर्थात् मूर्ख मनुष्योंसे घिरा रहता है उसी प्रकार वह समुद्र भी निरन्तर जल अर्थात् पानीसे घिरा रहता था, और जिस प्रकार दुष्ट राजा गुरु अर्थात् पूज्य महापुरुषोंका तिरस्कार करता है उसी प्रकार वह समुद्र भी गुरु अर्थात् भारी वजनदार पदार्थोंका तिरस्कार करता रहता था अर्थात् उन्हें डुबोता रहता था। अथवा वह समुद्र किसी उत्तम राजाके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार उत्तम राजा सत्त्व अर्थात् पराक्रमसे सहित होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी सत्त्व अर्थात् जल-जन्तुओं से सहित था, जिस प्रकार उत्तम राजा अत्यन्त गंभीर होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी अत्यन्त गंभीर अर्थात् गहरा था, जिस प्रकार उत्तम राजाके समीप अनेक भोगी अर्थात् राजा लोग विद्यमान रहते हैं उसी प्रकार उस समुद्रकी बेला (तट) पर भी अनेक भोगी अर्थात् सर्प विद्य-मान रहते थे, जिस प्रकार उत्तम राजाकी वृत्ति उच्च होती है उसी प्रकार उस समुद्रकी वृत्ति भी उच्च थी अर्थात् उसका जल हवासे ऊंचा उठ रहा था और जिस प्रकार उत्तम राजा मर्यादा अर्थात् कुल-परम्परासे आई हुई समीचीन पद्धतिसे सहित होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी मर्यादा अर्थात् पालीसे सहित था। वह समुद्र अपने मध्यमें रहनेवाले अनेक अन्तर्दीपोंकी रक्षा कर रहा था वे अन्तर्डीप उसके अलंघनीय तथा हरण करनेके अयोग्य किलोंके समान जान पडते थे । वह अतिशय गम्भीर समुद्र ऐसा जान पड़ता था मानो सेवकोंके समान निरन्तर बढ़ते हुए, गर्जते हुए और आकाशमें फैले हुए मेघोंके द्वारा ही जलसे भरा गया हो अथवा वह समुद्र किसी ग्रहाविष्ट अर्थात् भूत लगे हुए मनुष्यके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार ग्रहाविष्ट मनुष्य जमीनपर रेंगता है, चलता है, क्षुब्ध होता है, ऊंचा उछलता है और इधर उधर घूमता है अथवा करवटें बदलता है उसी प्रकार वह समुद्र भी लहरोंसे पृथिवीपर रेंग रहा था, चल रहा था, क्षुब्ध था, ऊंचा उछलता और इधर उधर घूमता था अर्थात् कभी इधर लहरता था तो कभी उधर लहरता था, तथा ग्रहाविष्ट मनुष्य जिस प्रकार उज्जृम्भ अर्थात् उठती हुई जमुहाइयोंसे सहित होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी उज्जृम्भ अर्थात् उठती हुई लहरोंसे सहित था, जिस प्रकार ग्रहाविष्ट मनुष्य शब्द करता है उसी प्रकार समुद्र भी शब्द कर रहा था और जिस प्रकार ग्रहाविष्ट मनुष्य कांपता रहता है उसी प्रकार वह समुद्र भी वायुसे कांपता रहता था। उस समुद्रका तल भाग रत्नोंकी किरणोंसे चित्र-विचित्र हो रहा था, उसका जल मोतियोंसे चित्रित था, और वह चारों ओर मगरमच्छोंसे भरा हुआ था इसलिये वह देखनेंमें अच्छा भी लगता था और भयानक भी मालूम होता था। वह समुद्र अनेक रत्नों से भरा हुआ था इसलिये नदीन अर्थात् दीन नहीं था यह उचित था (पक्षमें ‘नदी इन’ नदियोंका स्वामी था) परन्तु अप्राण अर्थात् प्राण रहित होकर भी चिरजीवित अर्थात् बहुत समय तक जीवित रहनेवाला था, समुद्र अर्थात् मुद्रा सहित होकर भी उन्मुद्र अर्थात् मुद्रा-रहित था और झषकेतु अर्थात् मछलीरूप पताकासे सहित होकर भी अमन्मथ अर्थात् कामदेव नहीं था यह विरुद्ध बात थी किन्तु नीचे लिखे अनुसार अर्थमें परिवर्तन कर देनेसे कोई विरुद्ध बात नहीं रहती। वह प्राणरहित होनेपर भी चिरजीवित अर्थात् चिरस्थायी रहनेवाला था अथवा चिरकालसे जल सहित था, समुद्र अर्थात् सागर होकर भी उन्मुद्र अर्थात् उत्कृष्ट आनन्दको देनेवाला था (उद्-उत्कृष्टां मुदं हर्ष राति-ददातीति उन्मुद्रः) और झषकेतु अर्थात् समुद्र अथवा मछलियोंके उत्पातसे सहित होकर भी अमन्मथ अर्थात् काम नहीं था। अथवा वह समुद्र स्पष्ट ही सिद्धालयके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार सिद्धालयका पार दिखाई नहीं देता है उसी प्रकार उस समुद्रका भी पार दिखाई नहीं देता था-दोनों ही अदृष्ट-पार थे, जिस प्रकार सिद्धालय अक्षोभ्य है अर्थात् आकुलता-रहित है उसी प्रकार समुद्र भी अक्षोभ्य था अर्थात् क्षोभित करनेके अयोग्य था उसे कोई गँदला नहीं कर सकता था, जिस प्रकार सिद्धालयका कोई संहार नहीं कर सकता उसी प्रकार उस समूहका भी कोई संहार नहीं कर सकता था, जिस प्रकार सिद्धालय अनुत्तर अर्थात् उत्कृष्ट है उसी प्रकार वह समुद्र भी अनुत्तर अर्थात् तैरनेके अयोग्य था, जिस प्रकार सिद्धालय अव्यक्त अर्थात् अप्रकट है उसी प्रकार वह समुद्र भी अव्यक्त अर्थात् अगम्य था और सिद्धालय जिस प्रकार अमृतास्पद अर्थात् अमृत (मोक्ष) का स्थान है उसी प्रकार वह समुद्र भी अमृत (जल) का स्थान था। कहीं तो वह समुद्र पद्मरागमणियों से संध्या कालके बादलोंकी शोभा अथवा संदेह धारण कर रहा था और कहीं नील मणियोंकी किरणोसे गाढ़ अन्धकारका प्रारम्भ करता हुआ सा जान पड़ता था। कहीं हरित मणियोंकी कान्तिके प्रसारसे उसमें शेवालका संदेह हो रहा था और कहीं वह मूंगाओंके अंकुरोंसे कुंकुम की कान्ति फैला रहा था। कहीं सीपोंके संपुट खुल जानेसे उसमें मोती तैर रहे थे और उनसे वह ऐसा जान पड़ता था मानो ताराओंके समूहसे भरे हुए आकाशकी ओर हँस ही रहा हो । तथा कहींपर किनारेके समीप ही समस्त रत्नोंकी किरणों सहित जलकी छोटी छोटी बूंदें पड़ रही थों उनसे ऐसा जान पड़ता था मानो आकाशरूपी आंगनमें इन्द्रधनुषकी रेखा ही लिख रहा हो । इस प्रकार जो ऊँचे तक करोड़ों रत्नोंसे भरा हुआ था ऐसे उस समुद्रको चक्रवर्तीने अपूर्व महानिधिके समान देखा ।।६८-१०२।।
श्लोक 103 से 111 : समुद्र में रथ का वेग और चक्रवर्ती का प्रभाव
तदनन्तर-महाभाग्यशाली बुद्धिमान् भरतने गम्भीर शब्द करते हुए उस समुद्रको देखकर, दृष्टि मात्रसे ही उसे गायके खुरके समान तुच्छ समझ लिया ॥१०३।। और फिर अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये सिद्ध परमेष्ठीको नमस्कार कर ‘शीघ्र ही रथ बढ़ाओ’ इस प्रकार सारथिके लिये जोरसे प्रेरणा की ।। १०४।। जिनकी रास ढीली कर दी गई है और जिनका वेग मनके समान है ऐसे घोड़ोंके द्वारा ले जाया जानेवाला वह रथ लवणसमुद्रमें जहाजकी नाई शीघ्रताके साथ जा रहा था ॥ १०५।। मनोरथसे पहले रथ जाता है अथवा रथसे पहले मनोरथ जाता है इस प्रकार जिसके वेगकी सम्भावना की जा रही है ऐसा वह रथ समुद्रमें बड़े वेगके साथ जा रहा था ।।१०६।। क्या वह जलस्तम्भिनी विद्यासे थंभा दिया गया था अथवा स्थलपनेको ही प्राप्त हो गया था क्योंकि चक्रवर्तीके घोड़े स्थल समझकर ही जलमें रथ खींचे लिये जा रहे थे ।। १०७।। जिस प्रकार जलके बाहर पहियोंका चीत्कार शब्द होता था उसी प्रकार जलके भीतर भी हो रहा था और जिस प्रकार जलके बाहर घोड़े दौड़ते थे उसी प्रकार जलके भीतर भी दौड़ रहे थे, अहा ! चक्रवर्तीका पुण्य भी कैसा आश्चर्यजनक था ! ॥१०८॥ वे घोड़े बड़ी बड़ी लहरोंसे सींचे जानेपर भी बिना किसी परिश्रमके रथको ले जा रहे थे। उन लहरोंसे उन्हें कुछ दुःख नहीं होता था बल्कि उनका परिश्रम दूर होता जाता था ।।१०९।। रथके पहियेके आघातसे आकाशकी ओर उछलनेवाले जलके समूहने ध्वजाके वस्त्रमें भी जाड्य अर्थात् भारीपन ला दिया था सो ठीक ही है क्योंकि जलका ऐसा ही स्वभाव होता है। भावार्थ-संस्कृत काव्योंमें ड और ल के बीच कोई भेद नहीं माना जाता इसलिये जलानाम् की जगह जडानाम् पढ़कर चतुर्थ चरणका ऐसा अर्थ करना चाहिये कि मूर्ख मनुष्योंका यही स्वभाव होता है कि वे दूसरोंमें भी जाड्य अर्थात् मूर्खता उत्पन्न कर देते हैं ।॥ ११०॥ घोड़ोंके शरीर पर लगाया हुआ अंगराग (लेप) परिश्रमसे उत्पन्न हुए पसीनेसे गीला नहीं हुआ था केवल खुरोंके वेगसे उठे हुए जलके छींटोंसे ही धुल गया था ।।१११।।
श्लोक 112 से 121 : रथ का समुद्र में रुकना और बाण प्रक्षेपण
रथ के पहियों के संघट्टन से क्षण भरके लिये जो समुद्रका जल फटकर दोनों ओर होता जाता था वह ऐसा मालूम होता था मानो आगे होनेवाले सगर आदि चक्रतियोंके लिये सूत्र डालकर मार्ग ही तैयार किया जा रहा हो ॥११२॥ सारथिके द्वारा चलाया हुआ चक्रवर्तीका रथ उनके अभिलषित स्थानपर पहुंच गया और पुण्यरूपी सारथिके द्वारा प्रेरित हुआ उनका मनोरथ भी सफलताको प्राप्त हो गया ॥११३॥ महाराज भरतका रथ समुद्रमें कुछ योजन जाकर जलके भीतर ही खड़ा हो गया मानो समुद्रने ऊपरकी ओर बढ़कर उसके घोड़े ही थाम लिये हों ॥११४।। जब वह रथ समुद्र के भीतर बारह योजन चलकर खड़ा हो गया तब चक्रवर्तीने कुछ कुपित होकर धनुष उठाया ॥११५।। जिसकी प्रत्यंचा (डोरी) स्फुरायमान है और काण्ड वजूके समान है ऐसा वह धनुष जिस समय चक्रवर्तीने प्रत्यंचासे युक्त किया था उसी समय यह जगत् अपने जीवित रहनेके संदेह रूपी भूलापर आरूढ़ हो गया था अर्थात् समस्त संसारको अपने जीवित रहनेका संदेह हो गया था ।।११६।। समस्त दिशाओंको बार-बार शब्दायमान करते हुए चक्रवर्तीके धनुषकी स्फुराय-मान प्रत्यंचाके शब्दने इधर-उधर भागते हुए मच्छोंके समूहसे भरे हुए समुद्रको भी क्षोभित कर दिया था ।।११७।। क्या यह चक्रवर्ती इस समुद्रका संहार करना चाहता है अथवा समस्त संसारका ? इस प्रकार आशंका कर विद्याधर लोग उस समय क्षण भरके लिये आकाशमें खड़े हो गये थे ।।११८।। जो टेढ़ा होकर भी गुणवान् (पक्षमें डोरीसे सहित) और सरल कार्य करनेवाला था (पक्षमें सीधा बाण छोड़नेवाला था) ऐसे उस धनुषपर चक्रवर्तीने प्रशंसनीय-योग्य आसनसे खड़े होकर कभी व्यर्थ न जानेवाला अमोघ नामका बाण रखा ।।११९।। ‘में वृषभदेवका पुत्र भरत नामका चक्रवर्ती हूँ इसलिये मेरे उपभोगके योग्य क्षेत्रमें रहनेवाले सब व्यन्तर देव मेरे अधीन हों इस प्रकार जिसपर स्पष्ट अक्षर लिखे हुए हैं ऐसा हुआ वह चक्रवर्ती के द्वारा चलाया हुआ वाण मुख्य दूतकी तरह पूर्व दिशाकी ओर मुख कर चला ॥ १२०-१२१॥
श्लोक 122 से 131 : मागधदेव का क्रोध और प्रतिक्रिया
और जिसने वज्रपातके शब्दको जीत लिया है ऐसा भारी शब्द करता हुआ तथा मागध देवकी सेनामें क्षोभ उत्पन्न करता हुआ वह बाण आकाश-तलसे मागध देवके निवासस्थानमें जा पड़ा ।।१२२।। क्या यह कल्पान्त कालके वायुसे ताड़ित हुआ समुद्र ही क्षोभको प्राप्त हुआ है ? अथवा जोरसे शब्द करता हुआ वजू पड़ा है? अथवा भूमिकंप ही हो रहा है? इस प्रकार जिनकी बुद्धि अत्यन्त व्याकुल हो रही है ऐसे उसके समीप रहनेवाले व्यन्तरदेव तैयार होकर मागध देवके पास आये और उसे घेरकर खड़े हो गये ।।१२३-१२४।। हे देव, हमारे सभा-भवनके आंगनमें कोई देदीप्यमान बाण आकर पड़ा है उसीसे यह क्षोभ हुआ है इसका दूसरा कारण नहीं है ।।१२५।। हे प्रभो, जिस किसी देव अथवा दानवने यह बाण छोड़ा है हम सब लोग उसका प्रतिकार करनेके लिये तैयार हैं ।। १२६ ।। इस प्रकार रक्षा करनेवाले वीर योद्धाओं ने शीघ्र ही आकर अपने स्वामी मागध देवसे निवेदन किया और मागध देवने भी बड़े जोरसे उन्हें उत्तर दिया कि चुप रहो, इस प्रकार वीर वाक्योंसे कुछ लाभ नहीं है ।।१२७।। तुम लोग वे ही मेरे अधीन रहनेवाले देव हो और में भी वही मागध देव हूं, क्या मुझे कभी पहले अपना शत्रु सहन हुआ है ? यह बात तुम लोगोंने पहले भी कभी सुनी है ? ॥ १२८॥ जो पुरुष पराभव से मलिन हुए हुए अपने प्राणोंको धारण करता है वह गुणोंसे पुरुष नहीं कहलाता किन्तु केवल लिङ्ग से ही पुरुष कहलाता है ॥ १२९।। जो पुरुष, पुरुषोंमें पाये पाये जानेवाले गुणोंके बिना केवल नाम से ही पुरुष बनना चाहता है वह या तो चित्रमें लिखा हुआ पुरुष है अथवा तूण काष्ठ वगैरहसे बना हुआ पुरुष है ।।१३०।। जो अपने पराक्रमसे अपने कुल और जन्मको पवित्र करता है वास्तवमें वही पुरुष कहलाता है, इसके विपरीत जो मनुष्य झूठमूठ ही अपनेको वीर कहता है पृथिवीपर उसका जन्म न लेना ही अच्छा है ।। १३१।।
श्लोक 132 से 141 : मागधदेव का क्रोध और देवों की सलाह
हम लोग शत्रुओंको जीतनेसे ही ‘देव’ कहलाते हैं, इच्छानुसार जहां तहां विहार करने मात्रसे देव नहीं कहलाते इसलिये हम लोगोंकी संपत्ति सदा शत्रुओंको विजय करने मात्रसे ही प्राप्त हो ।। १३२।। जो मनुष्य रत्न आदि वस्तु, हाथी घोड़े आदि वाहन और छत्र चमर आदि राज्यके चिह्न देकर किसी दूसरेकी आरा-धना-सेवा करता है उसका ऐश्वर्य दूसरोंके उपभोगके लिये हो और मैं ऐसे ऐश्वर्यको केवल विडम्बना समझता हूं ।॥१३३।। बाण चलानेवाला यह कोई राजा मुझसे धन चाहता है सो इसके लिये मैं युद्धके साथ साथ निधन अर्थात् मृत्यु दूंगा ।।१३४।। सबसे पहले मैं इस बाण को चूर कर अपने क्रोधरूपी अग्निका पहला ईंधन बनाऊंगा, यही बाण अपने छोटे छोटे टुकड़ों से मेरी क्रोधरूपी अग्निको प्रज्वलित करनेवाला हो ।। १३५।। इस प्रकार वह मागध देव क्रोध से तिरस्कारके साथ साथ कठोर वचन कहकर दांतोंकी कान्तिको संकुचित करता हुआ जब चुप हो रहा ।।१३६।। तब कुल-परम्पराको देखने वाले समीपवर्ती देव उसका क्रोध शमन करनेके लिये उससे कहने लगे सो ठीक ही है क्योंकि राजा लोगोंकी स्थिति विद्याकी अपेक्षा वृद्ध हुए मनुष्योंसे ही होती है, भावार्थ-जो मनुष्य विद्यावृद्ध अर्थात् विद्याकी अपेक्षा बड़े हैं उन्हींसे राजा लोगोंकी मर्यादा स्थिर रहती है किन्तु जो मनुष्य केवल अवस्थासे बड़े हैं उनसे कुछ लाभ नहीं होता ।। १३७।। उन देवोंने जो वचन कहे थे वे समयके अनुकूल थे, अर्थसे भरे हुए थे, परिमित थे, अर्थकी अपेक्षा बहुत विस्तारवाले थे, आकुलता-रहित थे और गंभीर थे सो ठीक ही है क्योंकि मूखोंके ऐसे वचन कभी नहीं निकलते हैं ।॥ १३८।। उन देवोंने कहा कि हे प्रभो, यह ठीक है कि अभिमानी मनुष्योंको अपना पराभव सहन नहीं हो सकता है परन्तु बलवान् पुरुषोंके साथ विरोध करना भी तो अपने पराभवका कारण है ।।१३९।। यह बिलकुल ठीक है कि अपने प्राण अथवा धन देकर भी यशकी रक्षा करनी चाहिये परन्तु वह यश किसी समर्थ पुरुषका आश्रय किये बिना बुद्धिमान् मनुष्योंको किस प्रकार प्राप्त हो सकता है ? ।।१४०।। प्राप्त नहीं हुई वस्तुका प्राप्त होना और प्राप्त हुई वस्तुकी रक्षा करना ये दोनों ही कार्य किसी विजिगीषु राजाके आश्रयके बिना सुखपूर्वक प्राप्त नहीं हो सकतें ॥ १४१ ॥
श्लोक 142 से 151 : मागधदेव का प्रबोधन और चक्रवर्ती की पहचान
हे प्रभो, बलवान् मनुष्योंकी अपेक्षा और भी अधिक बलवान् तथा बुद्धिमान् हैं इसलिये मैं बलवान् हूं इस प्रकार कभी गर्व नहीं करना चाहिये ॥ १४२॥ सिद्धि अर्थात् सफलताकी इच्छा करनेवाले पुरुषको बिना जिचारे कुछ भी कार्य नहीं करना चाहिये इसलिये यह बाण कहांसे आया है ? और किसका है ? पहले इस बातकी खोज करनी चाहिये ॥ १४३॥ इस भारतवर्षमें चक्र-वतियों के साथ तीर्थ कर निवास करेंगे, अवतार लेंगे ऐसे आप्त पुरुषोंके यथार्थ वचन हम लोगों ने अनेक बार सुने हैं ।॥ १४४।॥ विजयको सूचित करनेवाला यह बाण अवश्य ही चक्रवर्तीका ही होगा क्योंकि सघन अन्धकारको नष्ट करनेवाला प्रकाश क्या सूर्यके सिवाय किसी अन्य वस्तु में भी संभव हो सकता है ? अर्थात् नहीं ।। १४५।। अथवा इस विषयमें संशय करना व्यर्थ है। यह बाण चक्रवर्तीका ही है, क्योंकि इसपर खुदे हुए नामके अक्षरोंकी माला साफ साफ ही चक्रवर्तीको प्रकट कर रही है ।। १४६।। इसलिये गन्ध माला अक्षत आदिसे इस बाणकी पूजा कर हम लोगोंको आज ही वहां जाकर उनका यह बाण उन्हें अर्पण कर देना चाहिये और आज ही उनकी आज्ञा मान्य करनी चाहिये ।। १४७।। हे मागध, आप किसी प्रकारके विकारको प्राप्त मत हृजिये, और हम लोगोंके द्वारा कहे हुए इस कार्यका अवश्य ही निश्चय कीजिये, क्योंकि उनके देशमें रहनेवाले आपको उनके साथ विरोध करना उचित नहीं है ।॥१४८॥ इसलिये हे देव, क्रोध करना व्यर्थ है, चक्रवर्तीके साथ वैर करनेसे कुछ शान्ति नहीं होगी क्योंकि नदीके बड़े भारी प्रवाहके प्रतिकूल तैरनेवाला कौन सुखी हो सकता है? अर्थात् कोई नहीं ॥१४९॥ यदि बलवान् मनुष्यको अनुकूल बनाये रखना चाहिये यह नीति है तो चक्रवर्तीको आज ही प्रसन्न करना चाहिये, क्योंकि बड़े पुरुषोंके विषयमें बेंतके समान नम् वृत्ति ही दुःख दूर करनेवाली है ऐसा विद्वान् लोग मानते हैं ।॥१५०।। पूज्य मनुष्योंकी पूजा करनेसे इस लोक तथा परलोक दोनों ही लोकोंमें जीवोंकी उन्नति होती है और पूज्य पुरुषोंकी पूजा का उल्लंघन अर्थात् अनादर करनेसे दोनों ही लोकोंमें पाप बन्ध होता है ॥ १५१।
श्लोक 152 से 161 : मागधदेव का समर्पण और भरत के प्रति नम्रता
इस प्रकार उन देवोंके वचनोंसे जिसे उसी समय कुछ कुछ बोध उत्पन्न हुआ है ऐसे उस मागध देवने मुझे यह हाल मालूम नहीं था यह कहते हुए उनके वचन स्वीकार कर लिये ।। १५२॥ उस समय उसके चित्तमें कुछ घबड़ाहट, कुछ भय, कुछ आशंका, कुछ उद्वेग और कुछ प्रबोध-सा उत्पन्न हो रहा था ।।१५३।। तदनन्तर थोड़ी ही देरमें निर्मल हुई और क्रोधके नष्ट हो जानेसे शान्त हुई उसकी बुद्धिने आगे पीछेका सब हाल देख लिया ।। १५४।। यह वही चक्रर्वातयोंमें पहला चक्रवर्ती भरत है जिसकी कि आज्ञाका कोई उल्लंघन नहीं कर सकता, हम लोगोंको हरएक प्रकारसे इसकी पूजा करनी चाहिये और आदर सहित इसकी आज्ञा माननी चाहिये ।। १५५।। यह चक्रवर्ती है, चरमशरीरी है और जगद्गुरु भगवान् वृषभदेवका पुत्र है, इन तीनोंमेंसे एक एक गुण ही पूज्य होता है फिर जिसमें तीनोंका समुदाय है उसकी तो बात ही क्या कहनी है ? ।।१५६।। इस प्रकार निश्चय कर वह मागध देव शीघ्र ही चक्रवर्तीको देखनेके लिये आकाश-मार्गसे चला, उस समय संभूमको प्राप्त हुए अनेक अच्छे अच्छे देव उसके पीछे पीछे
जा रहे थे ॥१५७।। देदीप्यमान मणियोंसे जड़े हुए मुकुटको किरणोंसे जिसमें इन्द्रधनुष बन रहा है ऐसे आकाशको क्षण भरमें उल्लंघन कर वह मागध देव जहां चक्रवर्ती था उस स्थान पर जा पहुंचा ।।१५८॥ रत्नके पिटारेमें रक्खे हुए बाणको सामने रखकर मागध देवने भरत के लिये नमस्कार किया और कहा कि हे आर्य, मुझे स्वीकार कीजिये अपना ही समझिये ॥१५९॥ हे भद्र, हम अज्ञानी लोग चक्र उत्पन्न होनेके समय ही नहीं आये सो आप हमारे इस भारी अपराधको क्षमा कर दीजिये, हम बार बार प्रार्थना करते हैं ।। १६०।। हे श्रीमन्, आपके चरणोंकी धूलिके स्पर्शसे केवल यह समुद्र ही पवित्र नहीं हुआ है किन्तु आपके चरणकमलोंकी सेवा करनेसे हम लोग भी पवित्र हो गये हैं ।॥ १६१ ॥
श्लोक 162 से 171 : मागधदेव की भेंट और समुद्र का वर्णन
हे प्रभो, यद्यपि ये रत्न अमूल्य हैं और स्वर्गमें भी दुर्लभ हैं तथापि आपकी निधियोंके नीचे रखनेके काम आवें ।॥ १६२।। यह अतिशय देदीप्यमान तथा सूअर, सीप, बांस और हाथी में उत्पन्न न होनेवाले दिव्य मोतियोंसे गुथा हुआ हार आपके वक्षःस्थलके आलिंगनसे पूज्यताको प्राप्त हो तथा ये देदीप्यमान चमकते हुए दोनों कुण्डल आपके कानोंकी संगतिसे पवित्रताको प्राप्त हों ।।१६३-१६४।। इस प्रकार उस मागध देवने एकरूपताको प्राप्त हुए तीनों लोकोंकी सार वस्तुओंके समुदायके समान सुशोभित होनेवाला हार और दोनों दिव्य कुण्डल भरतके लिये सर्पित किये ॥१६५॥ तदनन्तर जिसका चित्त अत्यन्त प्रसन्न हो रहा है ऐसे मागध देवने अनेक प्रकारके रत्नोंसे रत्नों के स्वामी भरत चक्रवर्तीकी पूजा की और फिर उनसे आदर-सत्कार पाकर उन्हींकी संमतिसे वह अपने स्थानपर चला गया ।।१६६।।
अथानन्तर-वहां खड़े रहकर ही अन्तर्वीपों सहित समुद्रको देखते हुए महाराज भरतको कुछ आश्चर्य हुआ सो ठीक ही है क्योंकि वह लवणसमुद्र अनेक आश्चर्योंसे सहित था ।।१६७।। तदनन्तर दांतोंकी किरणेंरूपी पुष्पमंजरीको बिखेरता हुआ सारथि कौतूहल से समुद्रको देखनेवाले भरतसे इस प्रकार कहने लगा ।।१६८।। कि, उछलती हुई चंचल लहरें रूपी भुजाओंके द्वारा धारण किये हुए देदीप्यमान मणियोंके समूह ही जिसकी पूजाकी सामग्री है, जो शब्द करते हुए असंख्यात शंखोंसे आकुल है, जो प्रत्येक बेलाके साथ जोरसे शब्द कर रहा है, वायुके द्वारा कंपित हुआ जल ही जिसके नगाड़े हैं और जो इन सबसे ऐसा जान पड़ता है मानो आपके लिये अर्घ ही देना चाहता हो ऐसा यह समुद्र सदा आपके लिये आनन्द देवे ।। १६९।। आकाशकी ओर उछलता हुआ और चन्द्रमाकी किरणोंके समान कोमल कान्तिवाले जलके छोटे छोटे छींटोंसे व्याप्त हुआ इस समुद्रका यह जल ऐसा जान पड़ता है मानो दिशारूपी स्त्रियों के साथ परिचय करनेके लिये चारों ओरसे हास्य ही कर रहा हो अथवा अपना यश बांटकर प्रत्येक दिशामें फैलाना ही चाहता हो ॥१७०॥ खुली हुई सीपोंके भोतियोंसे व्याप्त हुआ, भूमरके समान काला और मकर मीन, मगरमच्छ आदि जल-जन्तुओंकी राशि समूहसे भरा हुआ यह समुद्रका जल कहीं ताराओं सहित, भूमरके समान श्याम और मकर मीन आदि राशियों से भरे हुए आकाशको जीतता है तो कहीं राजाओंके कुलको जीतना चाहता है क्योंकि जिस प्रकार राजाओंका कुल भोगी अर्थात् राजाओंके समूहसे व्याप्त रहता है उसी प्रकार यह जल भी भोगी अर्थात् सर्पोंके समूहसे व्याप्त है, जिस प्रकार राजाओंका कुल सून्नत अर्थात् अत्यन्त उत्कृष्ट होता है उसी प्रकार यह जल भी सून्नत अर्थात् अत्यन्त ऊंचा है, जिस प्रकार राजाओंका कुल उत्तम स्थिति अर्थात् मर्यादासे सहित होता है उसी प्रकार यह जल भी उत्तम स्थिति अर्थात् अवधि (हद्द) से सहित है, और राजाओंका कुल जिस प्रकार उद्भाट अर्थात् उत्कृष्ट योद्धाओंसे सहित होता है उसी प्रकार यह जल भी उद्भट अर्थात् प्रबल है ।।१७१।।
श्लोक 172 से 181 : समुद्र की तुलना और आश्चर्य
इधर हिमवान् पर्वत से निकला हुआ तथा शरऋतुके बादलोंके समान स्वच्छ कान्तिको धारण करनेवाला गङ्गा नदीका जल प्रवेश कर रहा है और उस ओर सिन्धु नदीका मीठा जल प्रवेश कर रहा है, फिर भी जलके आनेसे इसका संतोष पूरा नहीं होता है, सो ठीक ही है क्योंकि जलाशय (जिसके बीचमें जल है, पक्षमें जड़ आशयवाला मूर्ख) जल (पक्षमें जड़-मूर्ख) के संग्रहसे कभी भी संतुष्ट नहीं होता है। भावार्थ- जिस प्रकार जलाशय अर्थात् मूर्ख मनुष्य जल संग्रह अर्थात् मूर्ख मनुष्योंके संग्रहसे संतुष्ट नहीं होता उसी प्रकार जलाशय अर्थात् जलसे भरा हुआ समुद्र या तालाब जल-संग्रह अर्थात् पानीके संग्रह करनेसे संतुष्ट नहीं होता ।। १७२।। इस समुद्रके उदर अर्थात् मध्यभाग अथवा पेटमें व्याप्त होकर पय अर्थात् जल अथवा दूधसे अत्यन्त पुष्ट हुए तथा चलते हुए कुलाचलोंके समान बड़े बड़े इसके पुत्रोंके समान मगरमच्छ और प्रमाण रहित सन्त्यन्तरीपमिव दुर्गनिवेशनानि ॥१७७।।
अनेक लहरें ये सब चारों ओरसे एक दूसरेको धक्का देते हुए एक ही साथ इस समुद्रमें निवास कर रहे हैं ।।१७३।। हे प्रभो, इस समुद्रके जल ही धन हैं, रस अर्थात् जल अथवा शङ्गार या स्नेहको धारण करनेवाली नदियां ही इसकी स्त्रियां हैं, मगरमच्छ आदि जलचर जीव ही इसके पुत्र हैं और बालू ही इसके रत्न हैं इस प्रकार यह थोड़ी सी विभूतिको धारण करता है तथापि महोदधि इस भारी प्रसिद्धिको धारण करता है यह आश्चर्य की बात है। भावार्थ-इस श्लोकमें कविने समुद्रकी दरिद्र अवस्थाका चित्रण कर उसके महोदधि नामपर आश्चर्य प्रकट किया है। दरिद्र अवस्थाका चित्रण इस प्रकार है। हे प्रभो, इस समुद्रके पास आजीविका के योग्य कुछ भी धन नहीं है। केवल जल ही इसका धन है अर्थात् दूसरोंको पानी पिला पिला-कर ही अपना निर्वाह करता है, इसकी नदीरूप स्त्रियोंका भी बुरा हाल है वे बेचारी रस-जल धारण करके अर्थात् दूसरेका पानी भर भरकर ही अपनी आजीविका चलाती हैं। पुत्र हैं परन्तु वे सब जलचर अर्थात् (जडचर) मूर्ख मनुष्योंके नौकर हैं अथवा मूर्ख होनेसे नौकर हैं अथवा पानीमें रहकर शेवाल बीनना आदि तुच्छ कार्य करते हैं, इसके सिवाय कुल परम्परा से आई हुई सोना-चाँदी रत्न आदिकी संपत्ति भी इसके पास कुछ नहीं है-बालू ही इसके रत्न हैं, यद्यपि इसमें अनेक रत्न पैदा होते हैं परन्तु वे इसके निजके नहीं हैं उन्हें दूसरे लोग ले जाते हैं इसलिये दूसरेके ही समझना चाहिये इस प्रकार यह बिलकुल ही दरिद्र है फिर भी महो-दधि (महा + उ + दधि) अर्थात् लक्ष्मीका बड़ा भारी निवासस्थान इस नामको धारण करता हैं यह आश्चर्य की बात है। आश्चर्यका परिहार ऊपर लिखा जा चुका है ।।१७४।। जो निःश्वासके साथ निकलते हुए धूमसे मलिन हो रहे हैं, जिनके फणाओंके मध्यभागमें रत्नोंकी कान्ति स्पष्ट रूपसे प्रकट हो रही है, जो चारों ओर गोलाकार घूम रहे हैं, जिनके शरीर बहुत लम्बे हैं, और जो अकस्मात् ही क्रोध करने लगते हैं ऐसे ये सर्प इस समुद्रमें अलातचक्रकी शोभा धारण कर रहे हैं ।। १७५।। इस समुद्रका जल चन्द्रमाके शीतल पादों अर्थात् पैरों से (किरणोंसे) स्पर्श किया जा रहा है, इसलिये ही मानो यह क्रोधसे गम्भीर शब्द करता हुआ ज्वारकी लहोंके छलसे बदला चुकानेके लिए अकस्मात् आकाशकी ओर उछल कर दौड़ रहा है सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुष तिरस्कार नहीं सह सकते ।। १७६।। इस समुद्रके जलके भीतर अपनी देवांगनाओंके साथ बड़े वेगसे आते हुए देवोंके हजारों क्रीड़ा करनेके स्थान हैं, हजारों मनोहर वन हैं और हजारों सुन्दर द्वीप हैं तथा वे सब ऐसे जान पड़ते हैं मानो इसके भीतर बने हुए किले ही हों ॥ १७७।। ज्वार-भाटाओंसे चंचल हुआ यह समुद्र इस वनके बाहर मेरा जाना नहीं हो सकता है इसलिये इसपर प्रकट क्रोध करता हुआ अपने किनारेके वनको वायुके वेगसे अतिशय चंचल और पृथिवी तथा आकाशके मध्य भागको रोकनेवाली अनेक लहरों के समूहसे व्यर्थ ही ताड़न कर रहा है ॥ १७८।। हे प्रभो, यह गरजता हुआ समुद्र ऐसा जान पड़ता है मानो अपने ऊंचे शब्दोंसे कुल पर्वतोंको यही कह रहा है कि हे कुलपर्वतो, तुम्हारी ऊँचाई बहुत है इसीलिए क्या तुम अपने पैरों अर्थात् अन्तके भागोंसे हम लोगोंकी ताड़ना कर रहे हो ? तुम्हारी यह व्यर्थकी ऊंचाई क्या उल्लंघन करनेके अयोग्य है? क्या तुम हमारे समान अलंध्य अथवा गंभीर हो ? ॥ १७९॥ इधर यह सांपका बच्चा अपना बिल समझ कर प्रसन्न होता हुआ, मुख फाड़े हुए मच्छके मुखमें दौड़ा जा रहा है और वह भी अपने गले रूप बिलमें लगे हुए इस सांपके बच्चेको अपने अन्तरेंगमें संचित हुई निर्दयताके कारण निगल रहा है ॥१८०॥ इधर यह मछलियोंका समूह पद्मराग मणिकी किरणोंसे व्याप्त हुए इस समुद्रके जलको मांस समझकर उसे लेनेके लिये दौड़ता है और फिर अकस्मात् ही अग्नि समझकर वहांसे लौट आता है ।। १८१॥
श्लोक 182 से 191 : समुद्र के जीव और किनारे की शोभा
हे देव, इधर देखिये, चंचल लहरोंसे जिसकी दृष्टि चंचल हो रही है और जो बहुत ही बूढ़ा है ऐसा यह मच्छ इस रथको मछलियोंको खानेवाला बड़ा मच्छ समझकर निश्चल दृष्टिसे देख रहा है, हमारा ख्याल है कि यह बड़ा मूर्ख है ।। १८२॥ इधर रत्नसहित फणाके अग्रभागसे अपने मस्तकको ऊंचा उठाकर आकाशकी ओर देखते हुए ये सर्प ऐसे जान पड़ते हैं मानो इस महासमुद्रने अपने तरंगोंरूपी बड़े बड़े हाथोंसे दीपकोंके समूह ही धारण कर रखे हों ।॥ १८३॥ जिसके भीतर करोड़ों रत्न देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसा यह महा-समुद्रका जल सर्पों के इधर-उधर जानेसे ऐसा दिखाई देता है मानो फैले हुए अन्धकारको नष्ट करते हुए, जलते हुए और चलते हुए अनेक दीपकोंसे सहित महानील मणियोंका बना हुआ घर ही हो ॥ १८४॥ जिस समय यह समुद्र वायुके आघातसे पुष्कर (एक प्रकारका बाजा) के समान गंभीर और ऊंचे शुब्द करता है उस समय इस द्वीपके किनारेपर इन उन्मत्त मयूरोंके साथ साथ नृत्य करती हुई ये देवकन्याएं निरन्तर क्रीड़ा किया करती हैं ।॥ १८५।। वर्षाऋतुमें बादलों के समूह और इस समुद्रका जल दोनों एक समान रहते हैं क्योंकि वर्षाऋतुमें बादलोंके समूह काले रहते हैं और समुद्रका जल भी काला रहता है, बादलोंके समूह जोरसे गरजते हुए आनन्दित होते हैं और समुद्रका जल भी जोरसे शब्द करता हुआ आनन्दित होता है-लहाता रहता है, बादलोंके समूहमें बिजली चमकती है और समुद्रके जलमें भी सर्पोंके ऊंचे उठे हुए फणाओं पर रत्न चमकते रहते हैं, इस प्रकार बादलोंके समूह अपने समान इस समुद्रके जलका आलिंगन करते हुए वर्षाऋतुमें किसी दूसरी जगह नहीं जा सकते यह स्पष्ट है ॥ १८६॥ कमलके समान सुन्दर मुखको धारण करनेवाले हे देव, समुद्रके किनारे किनारेकी इन वनपंक्तियोंको देखिये जिनमें कि सूर्यका संताप बिलकुल ही शान्त हो गया है, जहां तहां विस्तृत जल भरा हुआ है, जो फूलोंसे व्याप्त हो रही हैं और जो बड़ी बड़ी लहरोंके उछलते हुए जलकी बूंदोंसे धोई हुई नीले रंगकी साड़ियोंके समान जान पड़ती हैं ।॥ १८७।। इस समुद्रके किनारेके वनमें उपद्रव रहित तथा स्वभावसे ही सुख देनेवाले स्थानपर आकर सरस कलमी धानोंको खाते हुए ये हरिण बहुत काल तक इन तालाबोंके चारों ओर घूमा करते हैं ।॥ १८८।। इस किनारेके वनमें कान्ति से प्रकाशमान सुवर्णमय स्थानोंको देखकर जिसे दावानलकी शंका हो रही है ऐसा यह हरिणों का समूह बहुत शीघ्र किनारेकी पृथिवीकी ओर लौटता हुआ दौड़ा जा रहा है ।।१८९॥ यह समुद्र, जिनके जल रूपी सूक्ष्म वस्त्र कुछ कुछ नीचेकी ओर खिसक गये हैं ऐसी नदीरूपी स्त्रियों को लावण्य अर्थात् सुन्दरताके कारण (पक्षमें खारापनके कारण) अपनी ओर बुलाता हुआ तथा तरंगोंके द्वारा बार-बार उनका आलिगन करता हुआ भी कभी तृप्तिको प्राप्त नहीं होता सो ठीक ही है क्योंकि जो अत्यन्त रसिक अर्थात् कामी (पक्षमें जल सहित) होता है वह इस संसार में अनेक बार संभोग करनेपर भी तृप्त नहीं होता है ।। १९०।। जो छोटी छोटी बूंदोंके पानी के सींचनेसे स्वच्छ हो गई हैं, निरन्तर लताओंसे गिरते हुए फूलोंके उपहारसे जो सदा सुन्दर जान पड़ती हैं, और जो देवोंके द्वारा सेवन करने योग्य हैं ऐसी ये यहांकी किनारेकी भूमियां विरल विरल रूपसे उछलती हुई लहरोंसे अत्यन्त सुशोभित हो रही हैं ।। १९१।।
श्लोक 192 से 201 : समुद्र की गतिविधियाँ और रत्नों की महिमा
स्वर्गके उपवनकी शोभाकी ओर हंसनेवाले तथा फूलोंसे भरे हुए इस वनमें मन्दार वृक्षोंके वनके मध्य भागसे यह वायु धीरे धीरे चल रहा है और इसी समय जिन्होंने कुछ कुछ गाना प्रारम्भ किया है ऐसी ये धीरे धीरे चलनेवाली विद्याधरियां इस समुद्र के किनारेके प्रदेशोंपर लीलापूर्वक पैर रखती उठाती हुई टहल रही हैं ।॥ १९२॥ इधर, इस जलमें उत्पन्न हुए अन्य अनेक मच्छोंको तिरस्कार कर उनके मारनेकी इच्छा करता हुआ यह इसी जलमें उत्पन्न हुआ बड़ा मच्छ बहुत शीघ्र दूरसे उनके सन्मुख आ रहा है और पर्वतके समान बड़े बड़े मच्छोंको निगलता हुआ यह दूसरा बड़ा मच्छ उस पहले बड़ मच्छके साथ युद्ध करनेकी इच्छा करता हुआ खड़ा है ।।१९३॥ इधर, यह अजगर जलमेंसे किसी बड़े मच्छको अपनी ओर खींच रहा है और मजबूतीसे पकड़ने- वाला यह दुष्ट मच्छ भी लड़नेकी इच्छासे उसे जमीनपरसे अपनी ओर खींच रहा है तथापि एक समान बल रखनेवाले इन दोनोंमें परस्पर किसीकी जीत नहीं हो रही है सो ठीक हो है क्योंकि इस संसारमें जो समान शक्तिवाले हैं उनमें परस्पर जय और पराजयका निर्णय नहीं होता है ।। १९४।। जंगली हाथियोंके द्वारा अतिशय ताड़न किया हुआ यह समुद्रका जल, जिसमें जंगली हाथी स्पष्ट रूपसे गर्जना कर रहे हैं ऐसे किसी वनके समान तथा मृदंग बजनेकी शोभाको धारण करता हुआ और दिशाओंमें उछलता हुआ किनारेको बहुत शीघ्र शुद्ध कर रहा है ।।१९५॥ जिसमें अनेक मछलियोंके शरीर तैर रहे हैं, जो खुली हुई सीपोंके टुकड़ोंसे व्याप्त है, जिसमें कठोर शब्द हो रहे हैं, जिसने अपने रन्ध्रोंमें पातालको भी धारण कर रखा है, और जो तैरते हुए सांपोंसे छूटी हुई कांचलियोंसे लोगोंको ऐसा संदेह उत्पन्न करता है मानो लहरों के समूहसे ही व्याप्त हो ऐसा यह समुद्रका जल इधर बहुत भयानक हो रहा है ॥१९६॥ इधर, वनको हिलाता हुआ, शीतल जलकी बूंदोंको बरसाता हुआ और वृक्षों के सुगन्धित फूलों की सुगन्धिका हरण करता हुआ वायु धीरे धीरे किनारेकी ओर बह रहा है और इधर बड़े बड़े मच्छोंके शरीरको कंपाता हुआ तथा हिलती हुई लहोंके शब्दोंसे भयंकर यह प्रचण्ड वायु बह रहा है ।।१९७।। जो बड़ी बड़ी लहरोंसे उछलते हुए मोतियोंसे व्याप्त होकर फूलोंके उपहारसे उत्पन्न हुई अतिशय शोभाकों धारण करती हैं, किनारेके वनके छायादार वृक्षोंके नीचे बैठे हुए देव लोग हर्षित होकर अपनी अपनी देवांगनाओंके साथ जिनकी सेवा करते हैं और इसीलिये जो दूसरे स्वर्ग लोककी शोभा बढ़ाती हैं ऐसी ये इस समुद्रके किनारेकी भूमियां अत्यन्त सुशोभित हो रही हैं ।॥१९८॥ ये मगरमच्छ आदि जलचर जीव, जिसके पास अनन्त धन है ऐसे इस समुद्रको अपने उदरका पालन-पोषण करनेवाला पिता समझकर सगे पुत्रोंके समान उसका धन बांटकर अपने भाग (हिस्से) को अधिक रूपसे लेनेकी इच्छासे, गजेनाके शब्दोंके बहाने चिल्लाते हुए पिताके सामने ही इकट्ठे होकर क्रोधित होते हुए परस्परमें लड़ रहे हैं, हाय ! ऐसे धनको धिक्कार हो । १९९।।बड़वानलोंके द्वारा वार बार ह्रास होनेपर भी जिनका कभी क्षय नहीं हो पाता है, जो लोगोंको आनन्द देनेवाले हैं, प्रमाण-रहित हैं, अनेक प्रकारके हैं, सर्पोंके फणाओंपर आरूढ़ हैं, अत्यन्त पवित्र हैं, और संतापको नष्ट करनेवाले हैं ऐसे रत्नों तथा जलके समूहोंकी अपेक्षा इस समुद्रका जब तक संसार है तब तक कभी भो नाश नहीं होता। भावार्थ यद्यपि इस समुद्रके अनेक रत्न इसके विवरों-बिलोंमें घुसकर नष्ट हो जाते हैं और जलके समूह बड़वानलमें जलकर कम हो जाते हैं तथापि इसके रत्न और जलके समूह कभी भी विनाशको प्राप्त नहीं हो पाते क्योंकि जितने नष्ट होते हैं उससे कहीं अधिक उत्पन्न हो जाते हैं ।॥ २००॥ बहुत बड़े पाताल रूपी छिद्रोंके द्वारा ऊपरकी ओर बढ़ते हुए वायुके जोरसे जो चारों ओर घूम रहा है और जिसमें जलके अनेक बबूले उठ रहे हैं ऐसा यह समुद्रका उदर अर्थात् मध्यभाग वजूकी कड़ाहीमें खौलता हुआ सा जान पड़ता है अथवा लोग इसके जहां तहां फैले हुए अनेक रत्न ले जाते हैं इसलिये मानो यह भीतर ही भीतर संतप्त हो रहा है सो ठीक ही है क्योंकि धनका वियोग प्रायः करके बड़े बड़े पुरुषोंके हृदयमें भी भयंकर दाह उत्पन्न कर देता है ।।२०१।।
श्लोक 202 से 211 : समुद्र और भरत की समानता, छावनी में वापसी
हे आयुष्मन्, जिस प्रकार आप अनेक आश्चर्योंसे भरे हुए हैं उसी प्रकार यह समुद्र भी अनेक आश्चर्योंसे भरा हुआ है, जिस प्रकार आपके पास अच्छे अच्छे रत्न हैं उसी प्रकार इस समुद्रके पास भी अच्छे अच्छे रत्न हैं, जिस प्रकार संसारके समस्त प्राणी आपके उपजीव्य हैं अर्थात् आपकी सहायतासे ही जीवित रहते हैं उसी प्रकार इस समुद्रके भी उपजीव्य हैं अर्थात् समुद्रमें उत्पन्न हुए रत्न मोती तथा जल आदिसे अपनी आजीविका करते हैं, जिस प्रकार आप गंभीर प्रकृतिवाले हैं उसी प्रकार यह समुद्र भी गंभीर (गहरी) प्रकृतिवाला है और जिस प्रकार आप अनल्पसत्त्व योग अर्थात् अनन्त शक्तिको धारण करनेवाले हैं उसी प्रकार यह समुद्र भी अनल्पसत्त्व योग अर्थात् बड़े बड़े जलचर जीवोंसे सहित है अथवा जिस प्रकार आप अनालसत्व योग अर्थात् आलस्यके सम्बन्धसे रहित हैं उसी प्रकार यह समुद्र भी अनालसत्व योग अर्थात् नाल (नरा) रहित जीवोंके सम्बन्धसे सहित हैं इस प्रकार यह समुद्र ठीक आपका अनुकरण कर रहा है। यदि अन्तर है तो केवल इतना ही है कि यह जलकी ऋद्धिसे सहित है और आप जल अर्थात् मूर्ख (जड़) मनुष्योंकी ऋद्धिसे रहित हैं ।॥ २०२॥ इस प्रकार जब सारथिने समुद्रकी उत्कृष्ट शोभाका वर्णन किया तब सम्राट् भरत बहुत ही अधिक आनन्दको प्राप्त हुए तथा शीघ्र ही अपनी छावनीमें जानेके लिये उद्यत हुए ॥२०३।।
मुंह खोलकर पड़े हुए अनेक पातालों अर्थात् विवरों और अथानन्तर -जब सारथिने बड़ी कठिनाईसे रथ लौटाने के लिये विपम रूपसे घूमने-के कारण गलेको कुछ टेढ़ा कर घोड़ोंको हांका, मन्द मन्द वायु बहने लगा और लहरोंका वेग शान्त हो गया तब निधियोंके स्वामी भरतने छावनीकी ओर प्रस्थान किया ।॥२०४।। पानीसे रुके हुए रथके पहियोंको किसी तरह बाहर निकालकर और बार बार हांकने अथवा बोझ धारण करनेके कारण कुपित हुए घोड़ोंको प्रसन्न कर सारथि समुद्रमें जलके भीतर ही रथ चला रहा था, और वह समुद्र भी उस रथके पीछे पीछे जाने के लिये ही मानो उछल रहा था ।।२०५।। अरे, यह समुद्रकी बड़ी भारी लहर रथकी छतरीको अवश्य ही ढक लेगी और इधर रथके वेग से समुद्रकी लहरें भी फट गई हैं इस प्रकार किनारे पर खड़े हुए लोग जिसके विषयमें अनेक प्रकारके तर्क-वितर्क कर रहे हैं ऐसा वह वेगशाली घोड़ोंसे खींचा हुआ रथ समुद्रके किनारेपर आ पहुंचा ।।२०६।। जिसके समस्त अंगोंकी रचना एक समान सुन्दर है ऐसा यह रथ लहरों को उल्लंघन करता हुआ कुशलतापूर्वक किनारे तक आ गया है, चक्ररत्नको धारण करनेवाले चक्रवर्ती भरत भी सकुशल आ गये हैं और समुद्रके जलसे जिनके समस्त अंग धुल गये हैं तथा जिनके खुर भी नहीं घिसे हैं ऐसे घोड़े भी राजी-खुशी आ पहुंचे हैं। अहा! विजयी चक्रवर्तीका बड़ा भारी पुण्य है, इस प्रकार किनारे पर खड़े हुए लोग परस्परमें वार्तालाप कर रहे थे ।। ॥२०७॥ जो वेदीके नीचे गङ्गाद्वारपर नियुक्त किये गये हैं, जिन्होंने नवाये हुए मणिमय मुकुटों पर अपने अपने हाथ जोड़कर रखे हैं और जो जय जय शब्दका उच्चारण कर रहे हैं ऐसे राजा लोग, तथा दरवाजेके बाहर एक साथ बार बार जयघोष करनेवाले सैनिक लोग जिसे देख रहे हैं ऐसा वह भरत अपनी छावनीके बाहरवाली तोरणभूमिपर आ पहुंचा ॥२०८।। वहां पर जय जय इस प्रकार मंगलशब्द करते हुए बन्दीजन जिन्हें आनन्दित कर रहे हैं ऐसे वे महाराज भरत छावनीके भीतर जाकर राजभवनके बड़े द्वारपर जा पहुंचे वहां परिवारके लोगों तथा वेश्याओंने उन्हें मंगलाक्षत तथा आशीर्वाद दिये। इस प्रकार निधियोंके स्वामी भरतने जिसपर वायुके द्वारा ध्वजाएं फहरा रही हैं ऐसे अपने तम्बमें प्रवेश किया ।।२०९।। जिन्होंने शरीर में कुछ चोट लगे बिना ही समुद्रको जीत लिया है ऐसे ये भरत महाराज आ गये हैं, इसलिये तुम मंगलाक्षत सहित सिद्ध तथा शेषाक्षत लाओ, तुम आशीर्वाद दो और तुम बहुत शीघ्र सामने जाकर खड़े होओ इस प्रकार उस समय सेनामें बड़ा भारी कोलाहल उठ रहा था ॥२१०।। हे देव, आप चिरकाल तक जीवित रहें, समृद्धिमान् हों, सदा बढ़ते रहें, आप शत्रुओंको जीतिये, पृथिवीको जीतिये, आप चिरायु रहिये और समस्त मनोरथोंको प्राप्त कीजिये-आपकी सब इच्छाएं पूर्ण हों इस प्रकार उस समय वृद्ध मनुष्योंने भरत महाराजके लिये सैकड़ों पवित्र आशीर्वाद प्राप्त कराये थे ।। २११॥
श्लोक 212 से 221 : भरत की विजय और पुण्य की महिमा
यद्यपि भरतेश्वर शत्रुओंको पहले ही जीत चुके थे तथापि उस समय उन्हें आशीर्वाद दिया गया था कि देव, आप शत्रुओंको जीतिये, यद्यपि उन्होंने चौदह रत्नोंको पहले ही प्राप्त कर लिया था तथापि उन्हें आशीर्वाद मिला था कि हे देव ! आप पृथिवीका शासन कीजिये, और इसी प्रकार वे पहले हीसे चिरायु थे तथापि आशीर्वाद में उनसे कहा गया था कि हे देव, आप चिरकाल तक जीवित रहें-चिरायु हों । इस प्रकार मंगल समझकर लोगोंने उन्हें पुनरुक्त (कार्य हो चुकनेपर उसी अर्थको सूचित करनेके लिये फिरसे कहे हुए,) वचनोंसे युक्त किया था ॥२१२॥ एक पुण्य ही जिनका सहायक है ऐसे महा-राज भरत अगाध और पाररहित समुद्रको उलंघनकर तथा योग्य उपायसे विजय प्राप्त कर बिना किसी विघ्न-बाधाके यहां वापिस आ गये हैं सो ठीक ही है क्योंकि निर्मल पुण्यके रहते हुए मनुष्योंको क्या अलंघनीय (प्राप्त न होने योग्य) रह जाता है ? अर्थात् कुछ भी नहीं ॥२१३॥ सबको जीतनेकी इच्छा करनेवाले भरत चक्रवर्तीने पुण्यके प्रभावसे, जिसमें ज्वार-भाटा उठ रहे हैं और जिसमें लहरोंके समूह वायुसे ताड़ित हो रहे हैं ऐसे समुद्रको उल्लंघन कर शीघ्र ही मागध देवको जीत लिया सो ठीक ही है क्योंकि अतिशय बलवान् पुण्यके रहते हुए संसारमें अजय्य अर्थात् जीतने के अयोग्य क्या रह जाता है ? अर्थात् कुछ भी नहीं ।॥२१४।। बहुत भारी लक्ष्मीको धारण करनेवाले चक्रवर्ती भरतने पुण्यकर्मके उदयसे ही बिना किसी उपद्रवके उल्लंघन करनेके अयोग्य समुद्रको उल्लंघन कर समुद्रका जल ही जिसकी सीमा है ऐसी पृथिवीको अपने आधीन कर लिया, सो ठीक ही है क्योंकि इष्ट पदार्थोकी सिद्धिके लिये पुण्यसे बढ़कर और कोई साधन नहीं है ।।२१५।। शत्रुओंके समूहके लिये जिनकी सम्पत्ति बहुत ही भयंकर है ऐसे चक्रवर्ती भरतने अत्यन्त भयंकर मगर-मच्छोंके समूहसे भरे हुए समुद्र को उल्लंघन कर अन्य किसीके वश न होने योग्य मागध देवको निश्चित रूपसे वश कर लिया, सो ठीक ही है क्योंकि लोकमें पुण्यसे बढ़कर और कोई वशीकरण (वश करनेवाला) नहीं है ॥२१६।। पुण्य ही मनुष्योंको जलमें स्थलके समान हो जाता है, पुण्य ही स्थलमें जलके समान होकर शीघ्र ही समस्त संतापको नष्ट कर देता है और पुण्य ही जल तथा स्थल दोनों जगहके भयमें एक तीसरा पदार्थ होकर शरण होता है, इसलिये हे भव्य जनो, तुम लोग जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा कहे हुए पुण्यकर्म करो ॥ २१७।। पुण्य ही आपत्तिके समय किसीके द्वारा उल्लंघन न करनेके योग्य उत्कृष्ट शरण है, पुण्य ही दरिद्र मनुष्योंके लिये धन देनेवाला है और पुण्य ही सुखकी इच्छा करनेवाले लोगोंके लिये सुख देनेवाला है, इसलिये हे सज्जन पुरुषों ! तुम लोग जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहे हुए इस पुण्यरूपी रत्नका संचय करो ।।।। २१८।। जिनेन्द्र भगवान् की पूजा करनेसे उत्पन्न होनेवाला पहला पुण्य है, सुपात्रको दान देनेसे उत्पन्न हुआ, दूसरा पुण्य है व्रत पालन करनेसे उत्पन्न हुआ, तीसरा पुण्य है और उपवास करनेसे उत्पन्न हुआ, चौथा पुण्य है इस प्रकार पुण्यकी इच्छा करनेवाले पुरुषोंको ऊपर लिखे हुए चार प्रकारके पुण्योंकासंचय करना चाहिये ।। २१९।। इस प्रकार जिसने लोगोंके समूहसे पुण्यकी घोषणा सुनी है ऐसे चक्रवर्ती भरत, अपने पुण्यकर्मके उदयसे प्राप्त हुए इष्ट वस्तुओंके लाभकी प्रशंसा करते हुए सभा-भवनमें पहुंचे और वहां राजाओंके समूहके मध्यमें इन्द्रके समान बड़े भारी राज-सिहासन पर आरूढ़ हुए ॥ २२० ।। जिस समय किनारेके वनको हिलानेवाला, रक्त अशोक वृक्षकी कोंपलोंके संपुटको भेदन करनेवाला और लहरोंको भिन्न भिन्न करनेवाला वायु धीरे धीरे बह रहा था उस समय समुद्रको जीतनेकी प्रशंसा और आशीर्वादके साथ साथ जिनेन्द्र भगवान्का स्मरण करते हुए भरतने गङ्गा नदीके किनारे किनारे ठहरी हुई सेनाके साथ सुख से निवास किया था ।। २२१।।
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहके भाषानुवादमें पूर्वसमुद्रके द्वारको विजय करनेका वर्णन करनेवाला अट्ठाईसवां पर्व समाप्त हुआ ।
पर्व 29
हिन्दी-भाषानुवाद
आदिपुराण सारांश
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena