धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41
English translation of Uttar Puran parv 61- shlok 42 to 52
श्लोक ( Shlok ) 42 – 43
तथैकवर्षच्छद्मस्थकालेऽतीते पुरातने । वने सप्तच्छदस्याधः कृतषष्ठोपवासकः ॥ ४२ ॥पूर्णमास्यां च पुष्यर्थों सायाद्धे प्राप केवलम् । आससाद च सत्पूजां तुर्यकल्याणसूचिनीम् ॥ ४३ ॥
तदनन्तर छद्मस्थ अवस्थाका एक वर्ष बीत जाने पर उन्होंने उसी पुरातन वनमें सप्तच्छद वृक्षके नीचे दो दिनके उपवासका नियम लेकर योग धारण किया और पौषशुक्ल पूर्णिमाके दिन सायंकालके समय पुष्य नक्षत्रमें केवलज्ञान प्राप्त किया। देवोंने चतुर्थ कल्याणककी उत्तम पूजा की ॥४२-४३॥
“Thereafter, when one year of his un-enlightened ascetic state (Chhadmastha) had passed, he took a vow of a two-day fast under a Saptachchhada (Alstonia scholaris) tree in that same ancient forest and assumed the posture of deep meditation (Yoga). Then, in the evening of the full moon day of the bright half of the month of Pausha (Pausha Shukla Purnima), under the auspicious Pushya constellation, he attained Kevalajnana (infinite, supreme omniscience). The celestial deities then performed the grand, magnificent rituals for this fourth auspicious life event (Kevalajnana Kalyanaka).”42 – 43
श्लोक ( Shlok ) 44 – 49
अरिष्टसेनाद्यनलयुगमानगणाधिपः । शून्यद्वय नवप्रोक्तसर्वपूर्वधरावृतः ॥ ४४ ॥शून्यद्वयद्धिशून्याब्धिमितशिक्षकलक्षितः । षट्शतत्रिसहस्त्रोक्तत्रिविधावधिलोचनः ॥ ४५ ॥ शून्यद्वयेन्द्रियाम्भोधिप्रोक्तकेवलवीक्षणः । शून्यत्रिकमुनिज्ञातविक्रियद्धिविभूषितः ॥ ४६ ॥ केवलज्ञानिमानोक्तमनःपर्ययविद्युतः । खद्वयाष्टद्विविज्ञातवादिवृन्दाभिवन्दितः ॥ ४७ ॥ पिण्डीकृतचतुःषष्टिसहस्त्रमुनिसाधनः । खखाब्धिपक्षषट्प्रोक्तसुव्रताद्यायिकाचितः ॥ ४८ ॥ द्विलक्षश्रावकोपेतो द्विगुणश्राविकावृतः । पूर्वोक्तदेवसन्दोहतिर्यक्सङ्ख्यातसंश्रितः ॥ ४९ ॥
वे अरिष्टसेनको आदि लेकर तैंतालीस गणधरोंके स्वामी थे, नौ सौ ग्यारह पूर्वधारियोंसे आवृत थे, चालीस हजार सात सौ शिक्षकोंसे सहित थे, तीन हजार छह सौ तीन प्रकारके अवधिज्ञानियोंसे युक्त थे, चार हजार पाँच सौ केवलज्ञानी उनके साथ थे, सात हजार विक्रियाऋद्धिके धारक उनकी शोभा बढ़ा रहे थे, चार हजार पाँच सौ मनःपर्ययज्ञानी उन्हें घेरे रहते थे, दो हजार आठ सौ वादियोंके समूह उनकी वन्दना करते थे, इस तरह सब मिलाकर चौंसठ हजार मुनि उनके साथ रहते थे, सुव्रताको आदि लेकर बासठ हजार चार सौ आर्यिकाएँ उनकी पूजा करती थीं, वे दो लाख श्रावकोंसे सहित थे, चार लाख श्राविकाओंसे आवृत थे, असंख्यात देव-देवियों और संख्यात तिर्यञ्चोंसे सेवित थे ।।४४-४९ ।।
“He was the master of forty-three Ganadharas (chief disciples) headed by Arishtasena. He was surrounded by nine hundred and eleven Purvadharis (masters of the ancient scriptural texts) and accompanied by forty thousand seven hundred teachers (Shikshakas). He was endowed with three thousand six hundred Avadhijnanis (possessors of clairvoyant knowledge) of three distinct categories, and four thousand five hundred Kevalajnanis (omniscent saints) were with him.
Seven thousand possessors of Vikriya-riddhi (the miraculous power to transform physical forms) enhanced his splendor, while four thousand five hundred Manah-paryayajnanis (possessors of mind-reading knowledge) surrounded him, and a group of two thousand eight hundred formidable debaters (Vadis) offered their salutations to him. In this manner, a total of sixty-four thousand monks (Munis) resided with him.
Sixty-two thousand four hundred nun-ascetics (Aryikas) led by Suvrata revered him. Furthermore, he was accompanied by two hundred thousand laymen (Shravakas), surrounded by four hundred thousand laywomen (Shravikas), and served by countless (Asankhyata) celestial gods and goddesses, as well as a countable (Sankhyata) number of animals (Tiryanchas).”44 – 49
श्लोक ( Shlok ) 50
इति द्वादशभेदोक्तगणसम्पत्समर्चितः । धर्मो धर्ममुपादिक्षद्धर्मध्वजविराजितः ॥ ५० ॥
इस प्रकार बारह सभाओंकी सम्पत्तिसे सहित तथा धर्मकी ध्वजासे सुशोभित भगवान् ने धर्मका उपदेश दिया ॥ ५० ॥
“In this manner, endowed with the grandeur of the twelve assemblies (Sabhas) and beautifully adorned with the banner of righteousness (Dharma-dhvaja), the Supreme Lord delivered his divine sermon on Dharma.”50
श्लोक ( Shlok ) 51 – 52
विहारमन्ते संहृत्य सम्मेदे गिरिसत्तमे । मासमेकमयोगः सन्नवाष्टशतसंयतैः ॥ ५१ ॥शुचिशुक्लचतुर्थ्यन्त रात्रौ ध्यातिं पृथग्द्वयीम् । आपूर्य पुष्यनक्षत्रे मोक्षलक्ष्मीमुपागमत् ॥ ५२ ॥
अन्त में विहार बन्द कर वे पर्वतराज सम्मेदशिखर पर पहुँचे और एक माहका योग निरोध कर आठ सौ नौ मुनियोंके साथ ध्यानारूढ़ हुए । तथा ज्येष्ठशुक्ला चतुर्थीके दिन रात्रिके अन्त भागमें सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती और व्युपरतक्रियानिवर्ती नामक शुक्लध्यानको पूर्ण कर पुष्य नक्षत्रमें मोक्ष-लक्ष्मीको प्राप्त हुए ॥ ५१-५२ ॥
“In the end, halting his divine wanderings (Vihara), he arrived at the king of mountains, Mount Sammeda Shikhar. Having restrained all bodily, mental, and vocal activities (Yoga-nirodha) for a period of one month, he entered into deep meditation along with eight hundred and nine monks. 51 – 52
Then, in the final quarter of the night on the fourth day of the bright half of the month of Jyeshtha (Jyeshtha Shukla Chaturthi), under the auspicious Pushya constellation, he perfected the ultimate stages of pure white meditation known as Sukshma-kriya-pratipati and Vyuparatakriya-nivarti, and attained the eternal bliss of Liberation (Moksha-Lakshmi).”
श्लोक 53 से 61
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धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41
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