अनन्तनाथ तीर्थंकर, सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायणके पुराणका वर्णन पर्व 60 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
English translation of Uttar Puran parv 60- shlok 22 to 32
श्लोक ( Shlok ) 22
तदागत्य मरुन्मुख्या मेरुशैलेऽभिषिच्य तम् । अनन्तजिनमन्वर्थनामानं विदधुर्मुदा ॥ २२ ॥
उसी समय इन्द्रोंने आकर उस पुत्रका मेरु पर्वत पर अभिषेक किया और बड़े हर्षसे अनन्तजित् यह सार्थक नाम रखा ॥ २२ ॥
“At that very moment, the Indras (Celestial Lords) arrived and performed the ritual consecration (Abhishek) of the infant on the summit of Mount Meru; and with great joy, they bestowed upon Him the meaningful name ‘Anantajit‘.”22
श्लोक ( Shlok ) 23
नवाब्ध्युपमसन्ताने पल्यपादत्रये स्थिते । धर्मेऽतीतार्हतो ध्वस्ते तदभ्यन्तरजीवितः ॥ २३ ॥
श्रीविमल-नाथ भगवान्के बाद नौ सागर और पौन पल्य बीत जाने पर तथा अन्तिम समय धर्मका विच्छेद हो जाने पर भगवान् अनन्त जिनेन्द्र उत्पन्न हुए थे, उनकी आयु भी इसी अन्तरालमें शामिल थी ॥२३॥
“Lord Ananta Jinendra was born after a duration of nine Sagara and three-quarters of a Palya had elapsed following the time of Lord Vimalanatha. During the final portion of this interval, the continuity of the Dharma (the spiritual path) had become interrupted; the Lord’s own lifespan was also included within this vast period.”23
श्लोक ( Shlok ) 24
त्रिंशलक्षसमात्मायुः पञ्चाशच्चापसम्मितः । कनत्कनकसङ्काशः सर्वलक्षणलक्षितः ॥ २४ ॥
उनकी आयु तीन लाख वर्षकी थी, शरीर पचास धनुष ऊँचा था, देदीप्यमान सुवर्णके समान रङ्ग था और वे सब लक्षणोंसे सहित थे ॥ २४ ॥
“His lifespan was three hundred thousand years; his body stood fifty Dhanush in height; his complexion was of a radiant, glowing gold; and he was endowed with all the auspicious marks of greatness.”24
श्लोक ( Shlok ) 25
खचतुष्केन्द्रियद्धर्थब्देष्वतीतेष्वभिषेचनम् । राज्यस्यालभताभ्यर्च्यस्स नृखेशमरुद्धरैः ॥ २५ ॥
मनुष्य, विद्याधर और देवोंके द्वारा पूजनीय भगवान् अनन्तनाथने सात लाख पचास हजार वर्ष बीत जाने पर राज्याभिषेक प्राप्त किया था ॥ २५ ॥
“Lord Anantanatha, who is worthy of worship by humans, Vidyadharas (celestial beings with supernatural powers), and the gods, accepted his royal coronation (Rajyabhisheka) after seven hundred and fifty thousand years had passed.”25
श्लोक ( Shlok ) 26
खपञ्चकेन्द्रियैकोक्तवर्षे राज्यव्यतिक्रमे । कदाचिदुल्का पतनहेतुनोत्पन्नबोधिकः ॥ २६ ॥
और जब राज्य करते हुए उन्हें पन्द्रह लाख वर्ष बीत गये तब किसी एक दिन उल्कापात देखकर उन्हें यथार्थ ज्ञान उत्पन्न हो गया ॥ २६ ॥
“When fifteen lakh (1.5 million) years of his reign had passed, he happened to witness a falling star (meteorite) one day; through this, the realization of the ultimate truth dawned upon him.”26
श्लोक ( Shlok ) 27– 29
अज्ञानबीजसंरूढामसंयममहीधताम् । प्रमादवारिसंसिक्तां कषायस्कन्धयष्टिकाम् ॥ २७ ॥योगालम्बनसंवृद्धां तिर्यग्गतिपृथक्कृताम् । जराकुसुमसंछन्नां बद्धामयपलाशिकाम् ॥ २८ ॥दुःखदुः फलसन्नन्स्रां दुष्कर्मविष्ष्वल्लरीम् । शुक्लध्यानासिनामूलं चिच्छित्सुः स्वात्मसिद्धये ॥ २९ ॥
वे सोचने लगे कि यह दुष्कर्मरूपी बेल अज्ञानरूपी बीजसे उत्पन्न हुई है, असंयमरूपी पृथिवीके द्वारा धारण की हुई है, प्रमादरूपी जलसे सींची गई है, कषाय ही इसकी स्कन्धयष्टि है- बड़ी मोटी शाखा है, योगके आलम्बनसे बढ़ी हुई है, तिर्यञ्च गतिके द्वारा फैली हुई है, वृद्धावस्थारूपी फूलोंसे ढकी हुई है, अनेक रोग ही इसके पत्ते हैं, और दुःखरूपी दुष्ट फलोंसे झुक रही है। मैं इस दुष्ट कर्मरूपी बेलको शुक्ल ध्यानरूपी तलवारके द्वारा आत्म-कल्याणके लिए जड़-मूलसे काटना चाहता हूँ ।। २७-२९ ॥
“He began to reflect: ‘This vine of wicked karma has sprouted from the seed of ignorance; it is anchored in the soil of lack of self-restraint and nourished by the water of negligence. Its thick, central trunk is formed of passions (Kashayas), and it has grown tall by leaning on the support of thought, speech, and body (Yogas). It has spread far through the animal realm and is covered with the blossoms of old age. Its leaves are manifold diseases, and it sags under the weight of the vile fruits of suffering. For the sake of my soul’s ultimate welfare, I desire to sever this wicked vine of karma at its very root with the sword of pure meditation (Shukla-dhyana).'”27– 29
श्लोक ( Shlok ) 30 – 32
लौकान्तिकैः समभ्येत्य प्रस्तुवद्भिः प्रपूजितः । अनन्तविजये राज्यं नियोज्य विजयी तुजि ॥ ३० ॥सुरैस्तृतीयकल्याणपूजां प्राप्याधिरूढवान् । यानं सागरदत्ताख्यं सहेतुकवनान्तरे ॥ ३१ ॥ज्येष्ठे षष्ठोपवासेन रेवत्यां द्वादशीदिने । सहस्त्रेणासिते राज्ञामदीक्षिष्टापराह्णके ॥ ३२ ॥
ऐसा विचार करते ही स्तुति करते हुए लौकान्तिक देव आ पहुँचे। उन्होंने उनकी पूजा की, विजयी भगवान्ने अपने अनन्तविजय पुत्रके लिए राज्य दिया; देवोंने तृतीय-दीक्षा-कल्याणककी पूजा की, भगवान् सागरदत्त नामक पालकी पर सवार होकर सहेतुक वनमें गये और वहाँ वेलाका नियम लेकर ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशीके दिन सायंकालके समय एक हजार राजाओंके साथ दीक्षित हो गये ॥ ३०-३२ ॥
“As soon as these thoughts arose, the Laukantika gods arrived, offering hymns of praise. They worshipped Him, and the victorious Lord then handed over the kingdom to His son, Anantavijaya. The gods performed the rites for the third auspicious event—the Diksha Kalyanaka. Mounted upon a palanquin named Sagaradatta, the Lord proceeded to the Sahetuka Forest. There, after taking a vow of two days’ fasting (Bela), He was initiated into monkhood on the evening of the twelfth day of the dark fortnight of Jyeshtha, accompanied by one thousand kings.”30 – 32
श्लोक 33 से 42
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