राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 422 to 430
श्लोक ( Shlok ) 422
रुचिः प्रवर्तते यस्य जैनशासनभासने । हस्ते तस्य स्थिता मुक्तिरिति सूत्रे निगद्यते ॥ ४२२ ॥
जैन-शासनकी प्रभावना करनेमें जिसकी रुचि प्रवर्तमान है मानो मुक्ति उसके हाथमें ही स्थित है ऐसा जिनागममें कहा जाता है ॥ ४२२ ।।
“It is declared in the sacred Jain scriptures (Jinagama) that for one whose inner inclination is actively dedicated to glorifying the path of the Jinas (Jina-Shasana), liberation (Moksha) is as good as secured in the very palm of their hand. ॥ 422 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 423
स शाब्दः स हि तर्कज्ञः स सैद्धान्तः स सत्तपाः । यः शासनसमुद्भासी न चेत्कि तैरनर्थकैः ॥ ४२३ ॥
जो जिन-शासनकी प्रभावना करनेवाला है वही वैयाकारण है, वही नैयायिक है, वही सिद्धान्तका ज्ञाता है और वही उत्तम तपस्वी है। यदि वह जिन-शासनकी प्रभावना नहीं करता है तो इन व्यर्थकी उपाधियोंसे क्या लाभ है ? ॥ ४२३ ॥
“He alone is a true grammarian (Vaiyakarna), he alone is a true logician (Naiyayika), he alone is a true Knower of the Doctrines (Siddhanta-jnata), and he alone is a supreme ascetic (Tapasvi)—who glorifies the path of the Jinas (Jina-Shasana). If one does not glorify the path of the Jinas, then what is the use of these futile titles? ॥ 423 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 424
भास्वतेव जगधेन भासते जैनशासनम् । तस्य पादाम्बुजद्वन्द्वं ‘प्रियते मूध्नि धार्मिकैः ॥ ४२४ ॥
जिस प्रकार सूर्यके द्वारा जगत् प्रकाशमान हो उठता है उसी प्रकार जिसके द्वारा जैन शासन प्रकाशमान हो उठता है उसके दोनों चरणकमलोंको धर्मात्मा अपने मस्तक पर धारण करते हैं ।॥ ४२४ ॥
“Just as the entire universe is illuminated by the sun, in the very same manner, the right-faithful souls (Dharmatma) hold upon their heads the twin lotus feet of that person by whom the glorious path of the Jinas (Jina-Shasana) is illuminated. ॥ 424 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 425
उदन्वानिव रत्नस्य मलयश्चन्दनस्य वा । धर्मस्य प्रभवः श्रीमान् पुमान् शासनभासनः ॥ ४२५ ॥
जिस प्रकार समुद्र रत्नोंकी उत्पत्तिका कारण है और मलय-गिरि चन्दनकी उत्पत्तिका स्थान है उसी प्रकार जिन-शासनकी प्रभावना करनेवाला श्रीमान् पुरुष धर्मकी उत्पत्तिका कारण है ॥ ४२५ ॥
“Just as the ocean is the source of precious gems and the Malaya Mountain is the birthplace of fragrant sandalwood, in the very same manner, a magnificent person who glorifies the path of the Jinas (Jina-Shasana) is the source from which righteousness (Dharma) arises. ॥ 425 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 426
कण्टकानिव राज्यस्य नेता धर्मस्य कण्टकान् । सदोद्धरतिसोद्योगो यः स लक्ष्मीधरो भवेत् ॥ ४२६ ॥
जिस प्रकार राजा राज्यके कंटकोंको उखाड़ फेंकता है उसी प्रकार जो सदा धर्मके कंटकोंको उखाड़ फेंकता है और सदा ऐसा ही उद्योग करता है वह लक्ष्मीका धारक होता है ॥ ४२६ ॥
“Just as a king completely roots out and throws away the thorns (enemies or disruptors) of his kingdom, in the very same manner, one who constantly roots out the thorns of righteousness (Dharma) and always strives toward this very effort, becomes the true possessor of prosperity (Lakshmi). ॥ 426 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 427
प्रमदप्रसवाकीर्णे मनोरङ्गे महानटः । नटताज्जैनसद्धर्मभासनाभिनयो मम ॥ ४२७ ॥
आचार्य गुणभद्र कहते हैं कि हर्ष-रूपी फूलोंसे व्याप्त मेरे मन-रूपी रङ्गभूभिमें जिनेन्द्र प्रणीत समीचीन धर्मकी प्रभावनाका अभिनय रूपी महानट सदा नृत्य करता रहे ॥ ४२७ ।।
“Acharya Gunabhadra says, ‘May the great actor—in the form of the glorification of the flawless righteousness (Dharma) proclaimed by the Lord of the Jinas—forever dance upon the stage of my mind, which is completely covered with the flowers of joy.’ ॥ 427 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 428 – 430
तनूजः कल्किराजस्य बुद्धिमानजितञ्जयः । पल्ल्या वालनया सार्धं यात्येनं शरणं सुरम् ॥ ४२८ ॥सम्यग्दर्शनरणञ्च महार्घ स्वीकरिष्यति । जिनेन्द्रधर्ममाहात्म्यं दृष्ट्वा सुरविनिर्मितम् ॥ ४२९ ॥तदा प्रभृति दुर्दर्पस्त्याज्यः पाषण्डिपापिभिः । कञ्चित्कालं जिनेन्द्रोक्तधर्मो वर्तिष्यतेतराम् ॥ ४३० ॥
तदनन्तर उस कल्किका अजितंजय नामका बुद्धिमान् पुत्र, अपनी बालना नामकी पत्नी के साथ उस देवकी शरण लेगा तथा महामूल्य सम्यग्दर्शन रूपीरत्न स्वीकृत करेगा । देवके द्वारा किया हुआ जिनधर्मका माहात्म्य देखकर पापी पाखण्डी लोग उस समयसे मिथ्या अभिमान छोड़ देंगे और जिनेन्द्रदेवके द्वारा कहा हुआ धर्म कुछ काल तक अच्छी तरह फिरसे प्रवर्तमान होगा ॥४२८-४३० ।।
“Immediately following that, the wise son of that Kalki, named Ajitanjaya, along with his wife named Balana, will seek refuge in that celestial being (Deva) and will accept the invaluable jewel of right conviction (Samyagdarshana). Witnessing the supreme majesty of the Jain faith demonstrated by the celestial being, the sinful and deceitful heretics will renounce their false pride from that moment onward, and the righteousness (Dharma) proclaimed by the Lord of the Jinas will once again flourish beautifully for some time. ॥ 428-430 ॥”
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111
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