प्रभु पतित पावन – दर्शन स्तुति – अर्थ एवं व्याख्या
रचयिता – श्री बुधजन जी
दर्शन स्तुति में प्रत्येक छंद की पंक्तियों को पढ़ने के बाद उसके कठिन शब्दों का अर्थ समझाया जाता है। इसके पश्चात् प्रत्येक शब्द के अर्थ को समझते हुए पूरे छंद का भावार्थ ग्रहण किया जाता है। इस प्रकार स्तुति के केवल पाठ तक सीमित न रहकर उसके भाव को समझना और उसे जीवन में उतारना ही इसका उद्देश्य है।
छंद 1 व 2
प्रभु पतित पावन मैं अपावन, चरण आयो सरन जी |
यों विरद आप निहार स्वामी, मेट जामन मरन जी ||(1)
छंद 3 से 5
भव विकट वन में करम बैरी, ज्ञान धन मेरो हरयो |
तब इष्ट भूल्यो भ्रष्ट होए, अनिष्ट गति धरतो फिरयो ||(3)
धन घड़ी यो धन दिवस यो ही, धन जनम मेरो भयो |
अब भाग्य मेरो उदय आयो, दरश प्रभु जी को लख लयो ||(4)
छंद 6 से 8
मिट गयो तिमिर मिथ्यात मेरो, उदय रवि आतम भयो |
मो उर हरष ऐसो भयो, मनु रंक चिंतामणि लयो ||(6)
मैं हाथ जोड़ नवाय मस्तक, वीनऊँ तुव चरन जी |
सर्वोत्कृष्ट त्रिलोकपति जिन, सुनहु तारन तरन जी ||(7)
जाचूँ नहीं सुरवास पुनि, नर राज परिजन साथ जी |
‘बुध’ जाचहूँ तुव भक्ति भव भव, दीजिये शिवनाथ जी ||(8)