Hindi Translation of Uttar puran Parv 70
उत्तरपुराण पर्व 70 सारांश
श्लोक 1 से 11 अपराजित का जन्म और बाल्यकाल
अथानन्तर- सज्जन लोग जिन्हें उत्तम क्षमा आदि दश धर्म रूपी अरोंका अवलम्बन बतलाते हैं और जो समीचीन धर्मरूपी चक्रकी हाल हैं ऐसे श्री नेमिनाथ स्वामी हम लोगोंको शान्ति करने-वाले हों ।। १ ।। जिनेन्द्र भगवान् नारायण और बलभद्रका पुण्यवर्धक पुराण संसारसे भय उत्पन्न करनेवाला है इसलिए इस श्रुतज्ञानको मन-वचन कायकी शुद्धिके लिए बन्दना करता हूं ।। २ ।। मङ्गलाचरण रूपी सत्क्रिया करके मैं हरिवंश नामक पुराण कहूँगा और वह भी पूर्वाचार्यों के अनुसार जैसा हुआ है अथवा जैसा सुना है वैसा ही कहूंगा ॥ ३ ॥ इसी जम्बूद्वीपके पश्चिम विदेह क्षेत्रमें सीतोदा नदीके उत्तर तट पर सुगन्धिला नामके देशमें एक सिंहपुर नामका नगर है उसमें अर्हद्दास नामका राजा राज्य करता था। उसकी स्त्रीका नाम जिनदत्ता था। दोनों ही पूर्वभवमें संचित पुण्य-कर्मके उदयसे उत्पन्न हुए कामभोगोंसे संतुष्ट रहते थे। इस प्रकार दोनोंका सुखसे समय बीत रहा था। किसी एक दिन रानी जिनदत्ताने श्री जिनेन्द्र भगवान्की अष्टाह्निका सम्बन्धी महापूजा करनेके बाद आशा प्रकट की कि मैं कुलके तिलकभूत पुत्रको प्राप्त करूँ’ । ऐसी आशा कर वह बड़ी प्रसन्नतासे रात्रिमें सुखसे सोई। उसी रात्रिको अच्छे व्रत धारण करनेवाली रानीने सिंह, हाथी, सूर्य, चन्द्रमा और लक्ष्मीका अभिषेक इस प्रकार पाँच स्वप्न देखे । स्वप्न देखनेके बाद ही कोई पुण्यात्मा उसके गर्भमें अवतीर्ण हुआ और नौ माह बीत जानेपर रानीने बलवान् पुत्र उत्पन्न किया। उस पुत्रके जन्म समयसे लेकर उसका पिता शत्रुओं द्वारा अजय हो गया था इसलिए भाई-बान्धवोंने उसका नाम अपराजित रक्खा ॥ ४-१० ॥ वह रूप आदि गुणरूपी सम्पत्तिके साथ साथ यौवन अवस्था तक बढ़ता गया इसलिए देवोंमें इन्द्रके समान सुन्दर दिखने लगा ।। ११ ।।
श्लोक 12 से 21 विमलवाहन तीर्थंकर के प्रति भक्ति
तदनन्तर किसी एक दिन राजाने वनपालके मुखसे सुना कि मनोहर नामके उद्यानमें विमलवाहन नामक तीर्थकर पधारे हुए हैं। सुनते ही वह भक्तिसे प्रेरित हो अपनी रानियों तथा परिवारके लोगोंके साथ वहाँ गया। वहाँ जाकर उसने बारबार प्रदक्षिणाएँ दीं, हाथ जोड़े, प्रणाम किया, गन्ध, पुष्प अक्षत आदिके द्वारा अच्छी तरह पूजा की तथा धर्मरूपी अमृतका पान किवा । यह सब करते ही अकस्मात् उसकी भोगोंकी इच्छा शान्त हो गई जिससे उसने अपराजित नामक पुत्रके लिए सप्त प्रकारकी विभूति प्रदान कर पाँच सौ राजाओंके साथ ज्येष्ठ तप धारण कर लिया ॥२१-१५।। कुमार अपराजितने भी शुद्ध सम्यग्दृष्टि होकर अणुव्रत आदि श्रावकके व्रत ग्रहण किये और फिर जिस तरह इन्द्र अमरावतीमें प्रवेश करता है उसी तरह लक्ष्मीप्ते युक्त हो अपनी राजधानीमें प्रवेश किया ।। १६ ।। उसने स्वराष्ट्र तथा परराष्ट्र सम्बन्धी चिन्ता तो अपने मन्त्रियोंपर छोड़ दी और स्वयं शास्त्रोक्त मार्गसे धर्म तथा काममें लीन हो गया ॥ १७ ।।
किसी एक समय उसने सुना कि हमारे पिताके साथ श्री विमलवाहन भगवान् गन्धमादन पर्वतपर मोक्षको प्राप्त हो चुके हैं। यह सुनते ही उसने प्रतिज्ञा की कि ‘मैं श्री विमलवाहन भगवान्के दर्शन किये बिना भोजन नहीं करूँगा । इस प्रतिज्ञासे उसे आठ दिनका उपवास हो गया ।॥१८-१९॥ तदनन्तर इन्द्रकी आज्ञासे यक्षपतिने उस राजाको महान् शुभ रूप श्री विमलवाहन भगवान्का साक्षात्कार कराकर दर्शन कराया। राजा अपराजितने जिन मन्दिर में उन विमलवाहन भगवान्की पूजा वन्दना करनेके बाद भोजन किया सो ठीक ही है क्योंकि जिनका चित्त स्नेह तथा शोकसे पीड़ित हो रहा है उन्हें तत्वका विचार कैसे हो सकता है ? ॥ २०-२१ ॥
श्लोक 22 से 31 चारण ऋद्धिधारी मुनियों का आगमन और पूर्वजन्म का परिचय
किसी एक दिन वसन्त ऋतुकी आष्टाह्निकाके समय बुद्धिमान् राजा अपराजित जिन-प्रतिमाओंकी पूजाकर उनकी स्तुति कर वहीं पर बैठा हुआ था और धर्मोपदेश कर रहा था कि उसी समय आकाशते दो चारणऋद्धि धारी मुनिराज आकर वहीं पर विराजमान हो गये । जिनेन्द्र भगवान्की स्तुतिके समाप्त होने पर राजाने बड़ी विनयके साथ उनके सन्मुख जाकर उनके चरणोंमें नमस्कार किया, धर्मोपदेश सुना और तदनन्तर कहा कि हे पूज्य ! हे भगवन्! मैंने पहले कभी आपको देखा है। उन दोनों मुनियों-में जो ज्येष्ठ मुनि थे वे कहने लगे कि हाँ राजन् ! ठीक कहते हो, हम दोनोंको आपने देखा है ।। २२-२५ ।। परन्तु कहाँ देखा है ? वह स्थान मैं कहता हूं सुनो। पुष्करार्ध द्वीपके पश्चिम सुमेरु की पश्चिम दिशामें जो महानदी है उसके उत्तर तट पर एक गन्धिल नामका महादेश है। उसके विजयार्ध पर्वतकी उत्तर श्रेणीमें सूर्यप्रभ नगरका स्वामी राजा सूर्यप्रभ राज्य करता था। उसकी स्त्री का नाम धारिणी था । उन दोनोंके बड़ा पुत्र चिन्तागति दूसरा मनोगति और तीसरा चपलगति इस प्रकार तीन पुत्र हुए थे। धर्म, अर्थ और कामके समान इन तीनों पुत्रोंसे वे दोनों माता-पिता सदा प्रसन्न रहते थे सो ठीक ही है क्योंकि उत्तम पुत्रोंसे कौन नहीं सन्तुष्ट होते हैं ? ॥। २६-२९ ।। उसी विजयार्ध पर्वतकी उत्तर श्रेणीमें अरिन्दमपुर नगरके राजा अरिञ्जय रहते थे उनकी अजितसेना नामकी रानी थी और दोनोंके प्रीतिमती नामकी सती पुत्री हुई थी। उसने अपनी विद्यासे चिन्ता-गतिको छोड़कर समस्त विद्याधरोंको मेरु पर्वतकी तीन प्रदक्षिणा देनेमें जीत लिया था ।।३०-३१।।
श्लोक 32 से 43 वैराग्य, दीक्षा और पुनर्जन्म का वृत्तांत
तत्पश्चात् चिन्तागति उसे अपने वेगसे जीतकर कहने लगा कि तू रत्नोंकी मालासे मेरे छोटे भाईको स्वीकार कर । चिन्तागतिके वचन सुनकर प्रीतिमतीने कहा कि जिसने मुझे जीता है उसके सिवाय दूसरेके गलेमें मैं यह माला नहीं डालूँगी। इसके उत्तर में चिन्तागतिने कहा कि चूँकि तूने पहले उन्हें प्राप्त करनेके इच्छासे ही मेरे छोटे भाइयोंके साथ गतियुद्ध किया था अतः तू मेरे लिए त्याज्य है। चिन्तागतिके यह वचन सुनते ही वह संसारसे विरक्त हो गई और और उसने विवृत्ता नामकी आर्यिकाके पास जाकर उत्कृष्ट तप धारण कर लिया। यह देख वहाँ बहुतसे लोगोंने विरक्त होकर दीक्षा धारण कर ली ॥ ३२-३५ ॥ कन्याका यह साहस देख जिसे वैराग्य उत्पन्न हो गया है ऐसे चिन्तागतिने भी अपने दोनों छोटे भाइयोंके साथ दमवर नामक गुरुके पास जाकर संयम धारण कर लिया और आठों शुद्धियोंको पाकर तीनों भाई चौथे स्वर्गमें सामाजिक जातिके देव हुए ॥ ३६-३७ ।। वहाँ सात सागरकी उत्कृष्ट आयु पर्यन्त अनेक भोगोंका अनुभव कर च्युत हुए और दोनों छोटे भाइयोंके जीव जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्र सम्बन्धी पुष्कला देशमें जो विजयार्ध पर्वत है उसकी उत्तर श्रेणीमें गगनवल्लभ नगरके राजा गगनचन्द्र और उनकी रानी गगनसुन्दरीके हम दोनों अमितमति तथा अमिततेज नामके पुत्र उत्पन्न हुए हैं। हम दोनों ही तीनों प्रकारकी विद्याओं से युक्त थे ॥ ३८-४० ॥ किसी दूसरे दिन हम दोनों पुण्डरीकिणी नगरी गये। वहाँ श्री स्वयंप्रभ तीर्थ-करसे हम दोनोंने अपने पिछले तीन जन्मोंका वृत्तान्त पूछा। तब स्वयंप्रभ भगवान्ने सब वृत्तान्त ज्योंका त्यों कहा । तदनन्तर हम दोनोंने पूछा कि हमारा बड़ा भाई इस समय कहाँ उत्पन्न हुआ है ? इसके उत्तरमें भगवान्ने कहा कि वह सिंहपुर नगर में उत्पन्न हुआ है, अपराजित उसका नाम है, और स्वयं राज्य करता हुआ शोभायमान है ॥ ४१-४३ ॥
श्लोक 44 से 52 अपराजित का संन्यास और स्वर्गगमन
यह सुनकर हम दोनोंने उन्हीं स्वयं-प्रभ भगवान्के समीप संयम धारण कर लिया और तुम्हें देखनेके लिए तुम्हारे जन्मान्तरके ल्नेहसे हम दोनों यहाँ आये हैं ।॥ ४४ ॥ हे भाई ! अब तव तू पुण्यकर्मके उदयसे प्राप्त हुए समस्त भोगोंका उपभोग कर चुका है। अब तेरी आयु केवल एक माहकी शेष रह गई है इसलिए शीघ्र ही आत्म-कल्याणका विचार कर ॥ ४५ ॥ और इसी जम्बूद्वीपके राजा अपराजितने यह बात सुनकर दोनों मुनिराजोंकी बन्दना की और कहा कि आप यद्यपि निर्ग्रन्थ अवस्थाको प्राप्त हुए हैं तो भी जन्मान्तरके स्नेहसे आपने मेरा बड़ा उपकार किया है। यथार्थमें आप ही मेरे तिच्छु हैं। तदनन्तर उधर उक्त दोनों मुनिराज प्रसन्न होते हुए अपने स्थान पर गये इधर राजा अपराजितने अपना राज्य विधिपूर्वक प्रीतिङ्कर कुमारके लिए दिया, आष्टाहिक पूजा की, भाइयोंको विदा किया और स्वयं प्रायोपगमन नामका उत्कृष्ट संन्यास धारण कर लिया। संन्यासके प्रभावसे वह सोलहवें स्वर्गके सातङ्कर नामक विम्प्रनमें वाईस सागरकी आयुवाला बड़ी-बड़ी ऋद्धियोंका धारक अच्युतेन्द्र हुआ। वह पुण्यात्मा वहाँ के दिव्य भोगोंका चिरकाल तक उपभोग कर वहाँ से च्युत हुआ ।। ४६-५० ॥ भरतक्षेत्र सम्बन्धी कुरुजाङ्गल देशमें हस्तिनापुरके राजा श्रीचन्द्रकी श्रीमती नामकी रानीसे सुप्रतिष्ट नामका यशस्वी पुत्र हुआ। जब यह पूर्ण युवा हुआ तब सुनन्दा नामकी इसकी सुख देनेवाली स्त्री हुई ।। ५१-५२ ।।
श्लोक 53 से 61 सुप्रतिष्ठ का वैराग्य और तीर्थंकर नामकर्म का बंध
श्रीचन्द्र राजाने पुत्रको अत्यन्त योग्य समझ कर उसके लिए राज्य दे दिया और स्वयं सुमन्दर नामक मुनिराजके पास जाकर दीक्षा धारण कर ली ।॥ ५३ ॥ सुप्रतिष्ठ भी निष्कण्टक राज्यमें अच्छी तरह प्रतिष्ठाको प्राप्त हुआ। एक दिन उसने यशोधर मुनिके लिए आहार दान दिया था जिससे उसे पञ्चाञ्चर्यकी प्राप्ति हुई थी ।॥ ५४ ॥ किसी दूसरे दिन वह राजा चन्द्रमाकी किरणों के समाने निर्मल सुन्दर राजमहलके ऊपर अन्तःपुरके साथ बैठा हुआ दिशाओंको देख रहा था कि अकस्मात् उसकी दृष्टि उल्कापात पर पड़ी। उसे देखते ही वह संसारको नश्वर समझने लगा । तदनन्तर उसने सुदृष्टि नामक ज्येष्ठ पुत्रका राज्याभिषेक किया और आत्मज्ञान प्राप्त कर सुमन्दर नामक जिनेन्द्रके समीप दीक्षा धारण कर ली। अनुक्रमसे उसने ग्यारह अङ्गोंका अभ्यास किया और दर्शनविशुद्धि आदि सोलह कारण भावनाओंका चिन्तवन कर तीर्थङ्कर नामक निर्मल नामकर्मका बन्ध किया। जब आयुका अन्त आया तब समाधि धारण कर एक महीनेका संन्यास लिया जिसके प्रभावसे जयन्त नामक अनुत्तर विमानमें अहमिन्द्र पदको प्राप्त किया। वहाँ उसकी तैंतीस सागरकी आयु थी, एक हाथ ऊँचा शरीर था, वह साढ़े सोलह माहके अन्त में एक बार श्वास ग्रहण करता था, बिना किसी आकुलता के जब तेतीस हजार वर्ष बीत जाते थे तब एक बार आहार ग्रहण करता था, उसका सुख प्रवीचार-मैथुनसे रहित था, लोक-नाड़ीके अन्त तक उसके अवधिज्ञानका विषय था, वहीं तक उसके बल, कान्ति तथा विक्रिया आदि गुण भी थे ॥ ५५-६१ ॥
श्लोक 62 से 71 वीरदत्त का वैराग्य
इस प्रकार वह देव-गतिमें दिव्य सुखका अनुभव करता था, सुख रूपी महासागरसे सदा सन्तुष्ट रहता था और सुख-दायी लम्बी आयु तक वहीं विद्यमान रहा था ।। ६२ ।। अब इसके आगे वह जिस वंशमें उत्पन्न होगा उस वंशका वर्णन किया जाता है । जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्रमें एक वत्स नामका देश है। उसकी कौशाम्बी नगरीमें अतिशय प्रसिद्ध राजा मघवा राज्य करता था । उसकी महादेवीका नाम वीतशोका था। कालक्रमप्ते उन दोनोंके रघु नामका पुत्र हुआ ॥ ६३-६४ ।। उसी नगर में एक सुमुख नामका बहुत धनी सेठ रहता था। किसी एक समय कलिङ्ग देशके दन्तपुर नामक नगर में बीरदत्त नामका वैश्य पुत्र, व्याधोंके डरके कारण अपने साथियों तथा वनमाला नामकी स्त्रीके साथ कौशाम्बी नगरीमें आया और वहाँ सुमुख सेठके आश्रयसे रहने लगा । किसी दिन सुमुख सेठ वनमें घूम रहा था कि उसकी दृष्टि वनमाला पर पड़ी। उसे देखते ही काम-देवने उसे अपने वाणोंका मानो तरकश बना लिया – वह कामदेवके वाणोंसे घायल हो गया। तदनन्तर मायाचारी पापी सेठने वीरदत्तको तो बहुत भारी आजीविका देकर बारह वर्ष के लिए व्यापारके हेतु बाहर भेज दिया और स्वयं लुभाई हुई बनमालाको अपकीर्तिके साथ स्वीकृत कर लिया-अपनी स्त्री बना लिया ।। ६५-६९ ।। बारह वर्ष विता कर जब वीरदत्त वापिस आया तब वनमालाके विकारको सुन संसारकी दुःखमय स्थितिका विचार करने लगा। अन्त में शोकसे आकुल, पुण्यहीन, आश्रयरहित, वीरदत्तने विरक्त होकर प्रोष्ठिल मुनिके पास जिन-दीक्षा धारण कर ली ॥ ७०-७१ ॥
श्लोक 72 से 83 चित्रांगद देव और सिंहकेतु–विद्युन्माला की रक्षा
आयुके अन्तमें संन्यास मरण कर वह प्रथम सौधर्म स्वर्ग में प्रवीचारकी खान स्वरूप चित्राङ्गद नामका देव हुआ ।। ७२ ।। इधर सुमुख सेठ और वनमालाने भी किसी दिन धर्मसिंह नामक मुनिराजके लिए प्रासुक आहार देकर अपने पापकी निन्दा की ॥ ७३ ॥ दूसरे ही दिन वज्रके गिरनेसे उन दोनोंकी साथ ही साथ मृत्यु हो गई। उनमेंसे सुमुखका जीव तो भरत क्षेत्रके हरिवर्ष नामक देशमें भोगपुर नगरके स्वामी हरिवंशीय राजा प्रभञ्जनकी मृकण्ड नामकी रानीसे सिंहवे नामका पुत्र हुआ और वनमालाका जीव उसी हरिवर्ष देशमें वस्वालय नगरके स्वामी राजा वज्रच की सुभा नामकी रानीसे बिजलीकी कान्तिको तिरस्कृत करनेवाली विद्युन्माला नामकी पुत्री हुई सिंहकेतुके पूर्ण यौवन होनेपर उसकी स्त्री हुई ।। ७४-७७ ॥ किसी दिन वन-विहार करते सः चित्राङ्गन्द देवने उन दोनों दम्पतियोंको देखा और ‘मैं इन्हें मारूँगा’ ऐसे विचारसे वह उन्हें उठा जाने लगा ।। ७८ ।। पहले जन्ममें सेठ सुमुखका प्रियमित्र राजा रघु अणुव्रतोंके फलसे सौधर्म स्वग् सूर्यप्रभ नामका श्रेष्ठ देव हुआ था। वह उस समय चित्राङ्गदको देखकर कहने लगा कि ‘हे.भ. मेरे वचन सुन, इन दोनोंके मर जानेसे तुझे क्या फल मिलेगा ? यह काम पापका बन्ध करनेवा है, युक्तिपूर्वक काम करनेवालोंके अयोग्य है, संसार रूप वृक्षके दुःखरूपी दुष्ट फलका देनेवाला इसलिए तू यह जोड़ा छोड़ दे’ इस प्रकार उसने बार बार कहा। उसे सुनकर चित्राङ्गदको भी द आ गई और उसने उन दोनोंको छोड़ दिया। तदनन्तर सूर्यप्रभ देवने उन दोनों दम्पतियोंको संबं कर आश्वासन दिया और आगे होनेवाले सुखकी प्राप्तिका विचार कर उन्हें चम्पापुरके वनमें छं दिया ।। ७९-८३ ॥
श्लोक 84 से 94 माकण्डेय का राज्यारोहण और हरिवंश की परंपरा
दैव योगसे उसी समय चम्पापुरका राजा चन्द्रकीर्ति विना पुत्रके मर गया इसलिए राज्यकी परम्परा ठीक ठीक चलानेके लिए सुयोग्य मन्त्रियोंने किसी योग्य पुण्यात्मा पुरुष ढूँढ़नेके अर्थ किसी शुभ लक्षणवाले हाथीको गन्ध आदिसे पूजा कर छोड़ा था ॥ ८४-८५ ॥ दिव्य हाथी भी वनमें गया और पुण्योदयसे उन दोनों- सिंहकेतु और विद्युन्मालाको अपने व पर बैठा कर नगरमें वापिस आ गया ।॥ ८६ ॥ प्रसन्नतासे भरे हुए मन्त्री आदिने सिंहकेतु अभिषेक किया, राज्यासन पर बैठाया और पट्ट बाँधा ।। ८७ ।। तदनन्तर उन लोगोंने पूछा आप किसके पुत्र हैं और यहाँ कहाँ से आये हैं? उत्तरमें सिंहकेतुने कहा कि ‘मेरे पिताका न प्रभञ्जन है और माताका नाम गुणोंसे मण्डित मृकण्डू है। मैं हरिवंश रूपी निर्मल आकाश चन्द्रमा हूं, कोई एक देव मुझे पत्नी सहित लाकर यहाँ वनमें छोड़ गया है, मैं अब तक वनमें स्थित था’ ।। ८८-८९ ॥ सिंहकेतुके वचन सुनकर लोग चूंकि यह मृकण्डका पुत्र है इसलिए उस् माकण्डेय नाम रखकर उसी नामसे उसे पुकारने लगे ॥ ९० ॥ इस प्रकार वह माकण्डेय, दैवयोःप्राप्त हुए राज्यका चिरकाल तक उपभोग करता रहा। उसीके सन्तानमें हरिगिरि, हिमगिरि तथा वसुगिरि आदि अनेक राजा हुए। उन्हीं में कुशार्थ देशके शौर्यपुर नगरका स्वामी राजा शूरसेन हुआ जो कि हरिवंश रूपी आकाशका सूर्य था और अपनी शूरवीरतासे जिसने समस्त शत्रुओंको जीत लिया था। राजा शूरसेनके वीर नामका एक पुत्र था उसकी स्त्रीका नाम धारिणी था। इन दोनोंके अन्धकवृष्टि और नरवृष्टि नामके दो पुत्र हुए ॥ ९१-९४ ॥
श्लोक 95 से 111 यदुवंश, कौरव वंश और कर्ण का जन्म
अन्धकवृष्टिकी रानीका नाम सुभद्रा था । उन दोनों के धर्मके समान गम्भीर समुद्रविजय १, स्तिमितसागर २, हिमवान् ३, विजय ४, विद्वान् अचल ५, धारण ६, पूरण ७, पुरितार्थीच्छ ८, अभिनन्दन १ और वसुदेव १० ये चन्द्रमाके समान कान्तिवाले दश पुत्र हुए तथा चन्द्रिकाके समान कान्तिवाली कुन्ती और माद्री नामकी दो पुत्रियाँ हुईं ॥ ९५-९७ ॥ समुद्रविजय आदि पहलेके नौ पुत्रोंके क्रमसे संभोग सुखको प्रदान करनेवाली शिवदेवी, धृतीश्वरा, स्वयंप्रभा, सुनीता, सीता, प्रियावाक्, प्रभावती, कालिङ्गी और सुप्रभा नामकी संसारमें सबसे उत्तम स्त्रियाँ थीं ।॥ ९८-९९॥ राजा शूरवीरके द्वितीय पुत्र नरवृष्टिकी रानीका नाम पद्मावती था और उससे उनके उग्रसेन, देवसेन तथा महासेन नामके तीन गुणी पुत्र उत्पन्न हुए ।। १०० ।। इनके सिवाय एक गन्धारी नामकी पुत्री भी हुई। ये सब पुत्र-पुत्रियाँ अत्यन्त सुख देने-वाले थे । इधर हस्तिनापुर नगर में कौरव वंशी राजा शक्ति राज्य करता था। उसकी शतकी नामकी रानीसे पराशर नामका पुत्र हुआ। उस पराशरके मत्स्य कुलमें उत्पन्न राजपुत्री रानी सत्यवतीसे बुद्धिमान् व्यास नामका पुत्र हुआ। व्यासकी स्त्रीका नाम सुभद्रा था इसलिए तदनन्तर उन दोनोंके धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर ये तीन पुत्र हुए ।। १०१-१०३ ।।
अथानन्तर- किसी एक समय वज्रमाली नामका विद्याधर क्रीड़ा करनेके लिए हस्तिनापुरके वनमें आया था। वह वहाँ अपने हाथकी अंगूठी भूलकर चला गया। इधर राजा पाण्डु भी उसी वनमें घूम रहे थे। इन्हें वह अंगूठी दिखी तो इन्होंने उठा ली। जब उस विद्याधरको अंगूठीका स्मरण आया तब वह लौटकर उसी वनमें आया तथा यहाँ वहाँ उसकी खोज करने लगा। उसे ऐसा करते देख पाण्डुने कहा कि आप क्या खोज रहे हैं ? पाण्डुके वचन सुनकर विद्याधरने कहा कि मेरीअंगूठी गिर गई है। इसके उत्तरमें पाण्डुने उसे अंगूठी दिखा दी। पश्चात् पाण्डुने उस विद्याधरसे पूछा कि इससे क्या काम होता है ? उत्तर में विद्याधरने कहा कि हे भद्र ! यह अंगूठी इच्छानुसार रूप बनानेवाली है। यह सुन कर पाण्डुने प्रार्थना की कि हे भाई ! यदि ऐसा है तो यह अंगूठी कुछ दिन तक मेरे हाथमें रहने दो, मैं इसका प्रभाव देखूँगा । पाण्डुकी इस प्रार्थना पर उस विद्याधरने वह अंगठी उन्हें दे दी। पाण्डुने उस अंगूठीके द्वारा किये अपने अदृश्य रूपसे कुन्तीके साथ समागम किया जिससे उसके कर्ण नामका पुत्र उत्पन्न हुआ। कुन्तीके परिजनोंने दूसरोंको विदित न होने पावे इस तरह छिपा कर उस बालकको एक संदूकचीमें रक्खा, उसे कुण्डल तथा रत्नोंका कवच पहिनाया और एक परिचायक पत्र साथ रखकर यमुना नदीके प्रवाहमें छोड़ दिया ।। १०४-१११ ।।
श्लोक 112 से 124 पाण्डवों का जन्म और सुप्रतिष्ठ का केवलज्ञान
चम्पापुरके राजा आदित्यने बहती हुई सन्दूकचीको मँगाकर जब खोला तो उसके भीतर स्थित बालसूर्यके समान बालकको देखकर वह विस्मयमें पड़ गया। उसने सोचा कि यह पुत्र अपनी रानी राधाके लिए हो जायगा। यह विचार कर उसने वह पुत्र राधाके लिए दे दिया। राधाने जब उस पुत्रको देखा तब वह अपने कर्ण- क्रानका स्पर्श कर रहा था इसलिए उसने बड़े आदरसे उसका कर्ण नाम रख दिया । यह सब होनेके बाद राजा पाण्डुका कुन्ती और माद्रीके साथ पाणिग्रहणपूर्वक प्राजापत्य विवाहसे सम्बन्ध हो गया । कुन्तीके धर्मपुत्र-युधिष्ठिर नामका धर्मात्मा राजा उत्पन्न हुआ फिर क्रमसे भीमसेन और अर्जुन उत्पन्न हुए। उसके ये तीनों पुत्र धर्म अर्थ काम रूप त्रिवर्गके समान जान पड़ते थे। इसी प्रकार माद्रीके ज्येष्ठ पुत्र सहदेव और उसके बाद नकुल उत्पन्न हुआ था ।। ११२-११६ ।। धृतराष्ट्रके लिए गान्धारी दी गई थी अतः उन दोनोंके सर्व प्रथम दुर्योधन उत्पन्न हुआ । उसके पश्चात् दुःशासन, दुर्धर्षण तथा दुर्मर्षण आदि उत्पन्न हुए। ये सब महाप्रतापी सौ भाई थे। इस तरह सबका काल लीला पूर्वक सुखसे व्यतीत हो रहा था ।। ११७-११८ ॥ किसी दूसरे दिन गन्धमादन नामक पर्वत पर श्री सुप्रतिष्ठ नामक मुनिराज आकर विराजमान हुए। राजा शूरवीर अपने पुत्र पौत्र आदि के साथ उनकी वन्दनाके लिए गया। वहाँ जाकर उसने उनकी पूजा की, स्तुति की और उनके द्वारा कहा हुआ धर्मका उपदेश सुना । उपदेश सुननेसे उसका चित्त संसारसे भयभीत हो गया अतः उसने अभिषेक कर अन्धकवृष्टिके लिए राज्य दे दिया और ‘यह योग्य है’ ऐसा समझकर छोटे पुत्र नर-वृष्टिके लिए युवराज पद दे दिया। तदनन्तर वह स्वयं संयम धारण कर उत्कृष्ट तपश्चरण करने लगा । अनुक्रमसे बारह वर्ष बीत जानेपर वही सुप्रतिष्ठ मुनिराज उसी गन्धमादन पर्वत पर प्रतिमा योग धारण कर पुनः विराजमान हुए। उस समय सुदर्शन नामके देवने क्रोधवश कुछ उपसर्ग किया परन्तु वे इसके द्वारा किये हुए समस्त उपसर्गको जीतकर तथा समस्त परिषहोंको सह कर ध्यानके द्वारा घातिया कर्मोंका क्षय करते हुए केवलज्ञानी हो गये ॥ ११९-१२४ ॥
श्लोक 125 से 131 सूरदत्त और सुदत्त की लोभजनित भूल
उस समय सब देवोंके साथ-साथ अन्धकवृष्टि भी उनकी पूजाके लिए गया था। वहाँ उसने आश्चर्यसे पूछा कि हे देव ! इस देवने पूजनीय आपके ऊपर यह महान् उपसर्ग किस कारण किया है ? अन्धकवृष्टिके ऐसा कह बुकने पर जिनेन्द्र भगवान् सुप्रतिष्ठ केवली इस प्रकार कहने लगे –
इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्र सम्बन्धी कलिङ्ग देशके काञ्चीपुर नगरमें सूरदत्त और सुदत्त नामके दो वैश्य पुत्र रहते थे ।। १२५-१२७ ॥ उन दोनोंने लङ्का आदि द्वीपों में जाकर इच्छानुसार बहुत-सा धन कमाया और लौटकर जब नगरमें प्रवेश करने लगे तब उन्हें इस बातका भय लगा कि इस धन पर टैक्स देना पड़ेगा। इस भयसे उन्होंने वह धन नगरके बाहर ही किसी झाड़ीके नीचे गाड़ दिया और कुछ पहिचानके लिए चिह्न भी कर दिये। दूसरे दिन कोई एक मनुष्य मदिरा बनानेके लिए उसके योग्य वृक्षोंकी जड़ खोदता हुआ वहाँ पहुँचा। खोदते समय उसे वह भारी धन मिल गया । धन देखकर उसने विचार किया कि जिससे थोड़ा ही लाभ होता है ऐसे इन वृक्षोंकी जड़ोंके उखाड़नेसे क्या लाभ है ? मुझे अब बहुत भारी धन मिल गया है यह मेरी सब दरिद्रताको दूर भगा देगा। मैं मरण पर्यन्त इस धनसे भोगोंका सेवन करूँगा, ऐसा विचार वह सब धन लेकर चला गया ।। १२८-१३१ ।।
श्लोक 132 से 144 वैर के दुष्परिणाम और सुप्रतिष्ठ का पूर्वभव
दूसरे दिन जब वैश्यपुत्र उस स्थान पर आये तो अपना धन नहीं देखकर परस्पर एक दूसरे पर धन लेनेका विश्वास करते हुए लड़ने लगे और परस्पर एक दूसरेको मारते हुए मर गये। वे क्रोध और लोभके कारण नरकायुका बन्धकर पहले नरकमें जा पहुँचे । चिरकाल तक वहाँ के दुःख भोगनेके बाद वहाँ से निकले और विन्ध्याचलकी गुफामें मेढ़ा हुए। वहाँ भी परस्पर एक दूसरेका वध कर वे गङ्गा नदीके किनारे बसनेवाले गोकुलमें बैल हुए। वहाँ भी जन्मान्तरके द्व`षके कारण दोनों युद्ध कर मरे और सम्मेदपर्वत पर बुद्धिसे मनुष्योंकी समानता करनेवाले वानर हुए ॥ १३२-१३५ ।। वहाँ पर भी पत्थरसे निकलनेवाले पानी के कारण दोनों कलह करने लगे । उनमेंसे एक तो शीघ्र ही मर गया और दूसरा कण्ठगत प्राण हो गया। उसी समय वहाँ सुरगुरु और देवगुरु नामके दो चारण ऋद्धिधारी मुनिराज आ पहुँचे। उन्होंने उसे पश्च नमस्कार मन्त्र सुनाया, जिसे उसने बड़ी उत्सुकतासे सुना और धर्मश्रवणके साथ-साथ मरकर सौधर्म स्वर्गमेंचित्राङ्गद नामका देव हुआ। वहाँ से निकल कर वह उसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रके मध्यमें स्थित पोदनपुर नगरके स्वामी राजा सुस्थितकी सुलक्षणा नामकी रानीसे उत्कृष्ट बुद्धिका धारक सुप्रतिष्ठ नामका पुत्र हुआ ॥ १३६-१३९ ॥ किसी एक समय वर्षा ऋतुके प्रारम्भमें उसने असित नामके पर्वत पर दो वानरोंका युद्ध देखा। जिससे उसे अपने पूर्व जन्मकी समस्त चेष्टाओंका स्मरण हो गया ।॥ १४० ॥ उसी समय उसने सुधर्माचार्यके पास जाकर दीक्षा ले ली। वही सूरदत्तका जीव मैं यह सुप्रतिष्ठ हुआ हूँ। मेरा छोटा भाई सुदत्त संसारमें भ्रमण करता हुआ अन्तमें सिन्धु नदीके किनारे रहनेवाले मृगायण नामक तपस्वीकी विशाला नामकी स्त्रीसे गोतम नामका पुत्र हुआ । मिध्यादर्शनके प्रभावसे वह पञ्चाग्नियों के मध्यमें तपश्चरण कर सुदर्शन नामका ज्यौतिष्क देव हुआ–है। पूर्व भवके वैरके कारण ही इसने मुझ पर यह उपसर्ग किया है। सुदर्शन देवने उन सुप्रतिष्ठ केवलीके वचन बड़े आदरसे सुने और सब वैर छोड़कर समीचीन धर्म स्वीकृत किया ।। १४१-१४४ ।।
श्लोक 145 से 153 धर्मशील सेठ और विश्वासघाती मित्र
तदनन्तर राजा अन्धकवृष्टिने यह सब सुननेके बाद हाथ जोड़कर उन्हीं सुप्रतिष्ठ जिनेन्द्रसे अपने पूर्व भवका सम्बन्ध पूछा ॥ १४५ ॥ शिष्ट वचन बोलना ही जिनकी वाणीका विशेष गुण है ऐसे वीतराग सुप्रतिष्ठ भगवान् कहने लगे सो ठीक ही है क्योंकि बिना किसी निमित्तके हितकी बात कहना उन जैसोंका स्वाभाविक गुण है ॥ १४६ ।।
वे कहने लगे कि इसी जम्बूद्वीपकी अयोध्या नगरीमें अनन्तवीर्य नामका राजा रहता था । उसी नगरीमें कुबेरके समान सुरेन्द्रदत्त नामका सेठ रहता था। वह सेठ प्रतिदिन दश दीनारोंसे, अष्टमीको सोलह दीनारोंसे, अमावसको चालीस दीनारोंसे और चतुर्दशीको अस्सी दीनारों से अर्हन्त भगवान्की पूजा करता था। वह इस तरह खर्च करता था, पात्र दान देता था, शील पालन करता था और उपवास करता था। इन्हीं सब कारणोंमे पापरहित उस सेठने ‘धर्मशील’ इस तरहकी प्रसिद्धि प्राप्त की थी। किसी एक दिन उस सेठने जलमार्गसे जाकर धन कमानेकी इच्छा की। उसने बारह वर्ष तक लौट आनेका विचार किया था इसलिए बारह वर्ष तक भगवान्की पूजा करनेके लिए जितना धन आवश्यक था उतना धन उसने अपने मित्र रुद्रदत्त ब्राह्मणके हाथमें सौंप दिया और कह दिया कि इससे तुम जिनपूजा आदि कार्य करते रहना क्योंकि आप मेरे ही समान हैं ।॥१४७-१५२।। सेठके चले जाने पर रुद्रदत्त ब्राह्मणने वह समस्त धन परस्त्रीसेवन तथा जुआ आदि व्यसनोंके द्वारा कुछ ही दिनों में खर्च कर डाला ॥ १५३ ।।
श्लोक 154 से 164 रुद्रदत्त का पतन और दुःखद पुनर्जन्म
तदनन्तर वह चोरी आदिमें आसक्त हो गया । श्येनक नामक कोतवालने उसे चोरी करते हुए एक रातमें देख लिया। देखकर कोतवालने कहा कि चूँकि तू ब्राह्मण नामको धारण करता है अतः मैं तुझे मारता नहीं हूं, तू इस नगरसे चला जा, यदि अब फिर कभी ऐसा दुष्कर्म करता हुआ दिखेगा तो अवश्य ही मेरे द्वारा यमराजके मुखमें भेज दिया जायगा – मारा जायगा ।। १५४-१५५ ।। यह कहकर कोतवालने उसे डाँटा । रुद्रदत्त भी, वहाँ से निकल कर उल्कामुखी पर रहनेवाले भीलोंके स्वामी पापी कालकसे जा मिला ॥ १५६ ॥ वह रुद्रदत्त किसी समय अयोध्या नगरीमें गायोंके समूहका अपहरण करनेके लिए आया था उसी समय श्येनक कोतवालके द्वारा मारा जाकर वह महापापके कारण अधोगतिमें गया ।। १५७ ।। वहाँ से निकल कर महामच्छ हुआ फिर नरक गया, वहाँ से आकर सिंह हुआ, फिर नरक गया, वहाँ से आकर दृष्टिविष नामका सर्प हुआ फिर नरक गया, वहाँ से आकर शार्दूल हुआ फिर नरक गया, वहाँ से आकर गरुड़ हुआ फिर नरक गया, वहाँ से आकर सर्प हुआ फिर नरक गया और वहाँ से आकर भील हुआ। इस प्रकार समस्त नरकों में जाकर वहाँ से बड़े कष्टप्ले निकला और त्रस स्थावर योनियोंमें चिरकाल तक भ्रमण करता रहा ॥ १५८-१५९ ॥ अन्तमें इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्र सम्बन्धी कुरुजांगल देशके हस्तिनापुर नगरमें जब राजा धनञ्जय राज्य करते थे तब गोतम गोत्री कपिष्टल नामक ब्राह्मणकी अनुन्धरी नामकी स्त्रीसे वह रुद्रदत्तका जीव गोतम नामका महादरिद्र पुत्र हुआ । उत्पन्न होते ही उसका समस्त कुल नष्ट हो गया। उसे खानेके लिए अन्न नहीं मिलता था, उसका पेट सूख गया था, हड्डियाँ निकल आई थीं, नसोंसे लिपटा हुआ उसका शरीर बहुत बुरा मालूम होता था, उसके बाल जुओंसे भरे थे, वह जहाँ कहीं सोता था वहीं लोग उसे फटकार बतलाते थे, वह अपने शरीरकी स्थितिके लिए कभी अलग नहीं होनेवाले श्रेष्ठ मित्रके समान अपने हाथके अग्रभागमें खप्पर लिये रहता था ।। १६०-१६४ ॥
श्लोक 165 से 181 गौतम का उद्धार और अन्धकवृष्टि का पूर्वभव
वाच्छित रसके समान वह सदा ‘देओ देओ’ ऐसे शब्दोंसे केवल भिक्षाके द्वारा सन्तोष प्राप्त करनेका लोलुप रहता था परन्तु इतना अभागा था कि भिक्षासे कभी उसका पेट नहीं भरता था। जिस प्रकार पर्वके दिनोंमें कौआ बलिको ढूँढ़नेके लिए इधर-उधर फिरा करता है इसी प्रकार वह भी भिक्षाके लिए इधर-उधर भटकता रहता था। वह मुनियोंके समान शीत, उष्ण तथा वायुकी बाधाको बार-बार सहता था, वह सदा मलिन रहता था, केवल जिह्वा इन्द्रियके विषयकी ही इच्छा रखता था, अन्य सब इन्द्रियोके विषय उसके छूट गये थे । जिस प्रकार राजा सदा दण्डधारी रहता है- अन्यथा प्रवृत्ति करनेवालोंको दण्ड देता है उसी प्रकार वह भी सदा दण्डधारी रहता था- हाथमें लाठी लिये रहता था ।। १६५-१६७ ।। ‘सातवें नरकमें उत्पन्न हुए नारकियोंका रूप ऐसा होता है’ यहाँ के लोगोंको यह बतलानेके लिए ही मानो विधाताने उसकी सृष्टि की थी। वह उड़द अथवा स्याही जैसा रङ्ग धारण करता था। अथवा ऐसा जान पड़ता था कि सूर्यके भयसे मानो अन्धकारका समूह मनुष्यका रूप रखकर चल रहा हो। वह अत्यन्त घृणित था, पापी था, यदि उसे कहीं कण्ठपर्यन्त पूर्ण आहार भी मिल जाता था तो नेत्रोंसे वह अतृप्त जैसा ही मालूम होता, वह जीर्ण शीर्ण तथा छेवाले अशुभ वस्त्र अपनी कमरसे लपेटे रहता था, उसके शरीर पर बहुतसे घाव हो गये थे, उनकी बड़ी दुर्गन्ध आती थी तथा भिनभिनाती हुई अनेक मक्खियाँ उसे सदा घेरे रहती थीं, कभी हटती नहीं थीं, उन मक्खियोंसे उसे क्रोध भी बहुत पैदा होता था । नगरके बालकोंके समूह सदा उसके पीछे लगे रहते थे और पत्थर आदिके प्रहारसे उसे पीड़ा पहुँचाते थे, वह कुँझला कर उन बालकोंका पीछा भी करता था परन्तु बीचमें ही गिर पड़ता था । इस प्रकार बड़े कष्टसे समय बिता रहा था। किसी एक समय कालादि लब्धियोंकी अनुकूल प्राप्तिसे वह आहारके लिए नगरमें भ्रमण करनेवाले समुद्रसेन नामके मुनिराजके पीछे लग गया । वैश्रवण सेठके यहाँ मुनिराजका आहार हुआ। सेठने उस गोतम ब्राह्मणको भी कण्ठ पर्यन्त पूर्ण भोजन करा दिया । भोजन करनेके बाद भी वह मुनिराजके आश्रम में जा पहुँचा और कहने लगा कि आप मुझे भी अपने जैसा बना लीजिये। मुनिराजने उसके वचन सुनकर पहले तो यह निश्चय किया यह वास्तवमें भव्य है फिर उसे कुछ दिन तक अपने पास रखकर उसके हृदयकी परख की। तदन-न्तर उन्होंने उसे शान्तिका साधन भूत संयम ग्रहण करा दिया ॥ १६८-१७६ ॥ बुद्धि आदिक ऋद्धियाँ भी उसे एक वर्षके बाद ही प्राप्त हो गई। अब वह गोतम नामके साथ ही साथ गुरुके स्थानको प्राप्त हो गया – उनके समान बन गया ।। १७७ ॥ आयुके अन्तमें उसके गुरु मध्यममैवेयक के सुबिशाल नामके उपरितन विमानमें अहमिन्द्र हुए और श्री गोतम मुनिराज भी आयुके अन्तमें विधिपूर्वक आराधनाओंकी आराधनासे अच्छी तरह समाधिमरण कर उसी मध्यम मैवेयकके सुविशाल विमानमें अहमिन्द्र पदको प्राप्त हुए ॥ १७८-१७९ ॥ वहाँ के दिव्य सुखका उपभोग कर वह ब्राह्मण मुनिका जीव अट्ठाईस सागरकी आयु पूर्ण होने पर वहाँ से च्युत हुआ और तू अन्धक-वृष्टि नामका राजा हुआ है। इस प्रकार अपने भवोंका अनुभव करता हुआ बुद्धिमान् अन्धकवृष्टि फिर भगवान्से अपने पुत्रोंके भवोंका सम्बन्ध पूछने लगा ।। १८०-१८१ ।।
श्लोक 182 से 202 अन्धकवृष्टि के पुत्रों और पुत्रियों का पूर्वजन्म
वे भगवान् भी सर्वभाषा रूप परिणमन करनेवाली अपनी दिव्य ध्वनिसे इस प्रकार कहने लगे – जम्बूद्वीपके मङ्गला देशमें एक भद्रिलपुर नामका नगर है। उसमें मेघरथ नामका राजा राज्य करता था। उसकी देवीका नाम सुभद्रा था। उन दोनोंके दृढ़रथ नामका पुत्र हुआ। अपने पुण्योदयसे उसने यौवराज्यका पट्ट धारण किया था। उसी भद्रिलपुर नगर में एक धनदत्त नामका सेठ रहता था, उसकी स्त्रीका नाम नन्दयशा था। उन दोनोंके धनपाल, देवपाल, जिनदेव, जिनपाल, अर्हद्दत्त, अर्हद्दास, सातवाँ जिनदत्त, आठवाँ प्रियमित्र और नौवाँ धर्मरुचि ये नौ पुत्र हुए थे। इनके सिवाय प्रियदर्शना और ज्येष्ठा ये दो पुत्रियाँ भी हुई थीं ।। १८२-१८६ ।। किसी एक समय सुदर्शन नामके बनमें मन्दिर-स्थविर नामके मुनिराज पधारे। राजा मेघरथ और सेठ धनदत्त दोनों ही अपने पुत्र-पौत्रादिसे परिवृत होकर उनके पास गये। राजा मेघरथ क्रिया सहित धर्मका स्वरूप सुनकर विरक्त हो गया अतः अभिषेक पूर्वक दृढरथ नामक पुत्रके लिए अपना पद देकर उसने संयम धारण कर लिया । तदनन्तर धनदत्त सेठने भी अपने नौ पुत्रोंके साथ संयम ग्रहण कर लिया। नन्दद्ययशा सेठानी भी अपनी दोनों पुत्रियोंके साथ सुदर्शना नामकी आर्यिकाके पास गई और शीघ्र ही संसारके स्वरूपका निर्णय कर उसने भी तप धारण कर लिया – क्रम क्रमसे विहार करते हुए वे सब बनारस पहुँचे और वहाँ बाहर अत्यन्त सुन्दर वृक्षोंसे युक्त प्रियंगुखण्ड नामके वनमें जा विराजमान हुए। वहाँ सबके गुरु मन्दिरस्थविर, मेघरथ राजा और धनदत्त सेठ तीनों ही मुनि ध्यान कर केवलज्ञानी हो गये । तदनन्तर निरन्तर धर्मामृतकी वर्षा करते हुए वे तीनों, तीनों लोकोंके इन्द्रोंके द्वारा पूज्य होकर आयु के अन्तमें राजगृह नगरके समीप सिद्ध शिलासे सिद्ध अवस्थाको प्राप्त हुए। किसी दूसरे दिन धन-देव आदि नौ भाई, दोनों बहिनों और नन्दद्यशाने उसी शिलातलपर विधिपूर्वक संन्यास धारण किया । पुत्र-पुत्रियोंसे युक्त नन्दयशाने उन्हें देखकर निदान किया कि ‘जिस प्रकार ये सब इस जन्ममें मेरे पुत्र-पुत्रियाँ हुई हैं उसी प्रकार परजन्ममें भी मेरे ही पुत्र-पुत्रियाँ हों और इन सबके साथ मेरा सम्बन्ध इस जन्मकी तरह पर-जन्ममें भी बना रहें। ऐसा निदान कर उसने स्वयंसंन्यास धारण कर लिया और मर कर उन सबके साथ आनत स्वर्ग के शातङ्कर नामक विमानमें उत्पन्न हो वहाँ के भोग भोगने लगी। वहाँ उसकी बीस सागरकी आयु थी। आयुपूर्ण होनेपर वहाँ से च्युत होकर वह तुम्हारी सुभद्रा नामकी रानी हुई है, धनदेव आदि प्रसिद्ध पौरुषके धारक समुद्र-विजय आदि पुत्र हुए हैं तथा प्रियदर्शना और ज्येष्ठा नामक पुत्रियोंके जीव अतिशय प्रसिद्ध कुन्ती माद्री हुए हैं। यह सत्र सुननेके बाद राजा अन्धकवृष्टिने अब सुप्रतिष्ठ जिनेन्द्रसे वसुदेवकी भवावली पूछी ।। १८७-१९८ ॥ जिनराज भी वसुदेवकी शुभ भवावली अपनी गम्भीर भाषा द्वारा इस प्रकार कहने लगे सो ठीक ही है क्योंकि उनका स्वभाव ही ऐसा है कि जिससे भव्य जीवोंका सदा अनुग्रह होता है ॥ १९९ ॥
वे कहने लगे कि कुरुदेशके पलाशकूट नामक गाँवमें एक सोमशर्मा नामका ब्राह्मण रहता था । वह जन्मसे ही दरिद्र था। उसके नन्दी नामका एक लड़का था। नन्दीके मामाका नाम देवशर्मा था। उसके सात पुत्रियाँ थीं। नन्दी अपने मामाकी पुत्रियाँ प्राप्त करना चाहता था इसलिए सुझ उसके साथ लगा रहता था परन्तु पुण्यहीन होनेके कारण देवशर्माने वे पुत्रियाँ उसके लिए न देकर किसी दूसरेके लिए दे दीं। पुत्रियोंके न मिलनेसे नन्दी बहुत दुःखी हुआ ।। २००-२०२ ।।
श्लोक 203 से 211 वसुदेव का पूर्वभव और महान भविष्य
तदनन्तर किसी दूसरे दिन वह कौतुकवश नटोंका खेल देखनेके लिए गया। वहाँ बड़े-बड़े बलवान् योद्धाओंकी भीड़ थी जिसे वह सहन नहीं कर सका किन्तु उसके विपरीत गिर पड़ा। उसे गिरा हुआ देख दूसरे लोग परस्पर ताली पीट कर उसकी हँसी करने लगे। इस घटनासे उसे बहुत ही लज्जा हुई और वह किसी पर्वतकी शिखरसे नीचे गिरनेका उद्यम करने लगा ।। २०३-२०४ ॥ पर्वतकी शिखर पर चढ़कर वह टाँकीसे कटी हुई एक शिला पर खड़ा हो गया और गिरनेका विचार करने लगा परन्तु भयके कारण गिर नहीं सका, वह बार-बार गिरनेके लिए तैयार होता और बार-बार पीछे हट जाता था ॥२०५।। उसी पर्वतके नीचे पृथिवी तल पर द्रुमषेण नामके मुनिराज विराजमान थे वे मति, श्रुत अवधि इन तीन ज्ञानोंसे सहित थे, शङ्ख और निर्नामिक नामके दो मुनि उनके पास ही बैठे हुए थे उन्होंने द्रुमषेण मुनिराजसे आदर के साथ पूछा कि यह छाया किसकी है? उन्होंने उत्तर दिया कि जिसकी यह छाया है वह इससे तीसरे भवमें तुम दोनोंका पिता होगा ।। २०६-२०७ ।। गुरुकी बात सुनकर उसके दोनों होनहार पुत्र नन्दीके पास जाकर पूछने लगे कि’ हे भाई ! तुझे यह मरणका आग्रह क्यों हो रहा है ? यदि तू इस मरणसे भाग्य तथा सौभाग्य आदि चाहता है तो यह सब तुझे तपकी सिद्धिसे प्राप्त हो जावेगा’ इस प्रकार समझा कर उन्होंने उसे तप ग्रहण करा दिया ॥ २०८-२०९ ॥ वह नन्दी भी चिरकाल तक तपश्चरण कर महाशुक्र स्वर्ग में देव हुआ; वहाँ सोलह सागरकी आयु प्रमाण मनोवांछित सुखका उपभोग करता रहा। तदनन्तर वहाँ से च्युत होकर पृथिवीको वश करनेके लिए वसुदेव हुआ है। बलभद्र और नारायणकी उत्पत्ति इसीसे होगी ॥ २१०-२११ ॥
श्लोक 212 से 222 अन्धकवृष्टि का मोक्ष और वसुदेव का यौवन वैभव
महाराज अन्धकवृष्टि यह सब सुनकर संसारसे भयभीत हो उठे। वे विद्याधर तो थे ही, अतः परम पद – मोक्षपद प्राप्त करनेकी इच्छासे उन्होंने अभिषेकपूर्वक समुद्रविजयके लिए राज्य दे दिया और स्वयं समस्त परिग्रह छोड़कर शान्तचित्त हो उन्हीं सुप्रतिष्ठित जिनेन्द्रके समीप बहुतसे राजाओंके साथ तप धारण कर लिया। संयम धारण कर अन्तमें उन्होंने संन्यास धारण किया और कर्मोंको नष्ट कर मोक्ष प्राप्त कर लिया ॥ २१२-२१४ ॥ इधर समुद्रविजय पृथिवीका पालन करने लगे । उनके राज्यमें समस्त वर्णों और समस्त आश्रमोंके लोग, उत्तम धर्मके कार्योंमें इच्छानुसार सुखपूर्वक यथायोग्य प्रवृत्ति करते थे ॥ २१५ ॥ राजा समुद्रविजय राज्यका यथायोग्य विभाग कर दिक्पालोंके समान अपने आठों भाइयोंके साथ सर्व प्रकारका सुख देनेवाले राज्यका उपभोग करते थे ।। २१६ ।। इस प्रकार पुण्योदयसे उन सबका काल सुखसे बीत रहा था। इन सबमें वसुदेव सबसे अधिक युवा थे इसलिए वे अपनी लीला दिखानेकी उत्कण्ठासे प्रतिदिन स्वेच्छानुसार गन्धवारण नामक हाथीपर सवार होकर नगरके बाहर जाते थे। उस समय चतुरङ्ग सेना उनके साथ रहती थी, चमरोंके समूह उनके आस-पास दुराये जाते थे, बजते हुए समस्त बाजोंका ऐसा जोरदार शब्द होता था जिससे कि दिशाओंके किनारे फटेसे जाते थे, वन्दी, मागध तथा सूत आदि लोग उनकी विरुदावलीका वर्णन करते जाते थे, अनेक प्रकारके आभरणोंकी कान्तिके समूहसे उनका शरीर देदीप्यमान रहता था जिससे ऐसा जान पड़ता था कि मानो अपने तेजसे सूर्यका निग्रह करनेके लिए ही उद्यत हो रहे हैं, अथवा भूषणाङ्ग जातिके कल्पवृक्षका तिरस्कार करनेके लिए ही तैयारी कर रहे हों। उस समय वे देवोंके कुमारके समान जान पड़ते थे इसलिए नगरकी स्त्रियाँ इन्हें देखकर अपना अपना कार्य भूल जाती थीं और अपनी मामी आदिके रोकनेमें निरादर हो जाती थीं-किसीके निषेध करने पर भी नहीं मानती थीं ।। २१७-२२२ ।।
श्लोक 223 से 243 वसुदेव का गृहत्याग
इस तरह कुमार वसुदेवके निकलनेसे नगरनिवासी लोग दुःखी होने लगे इसलिए एक दिन उन्होंने यह समाचार महाराज समुद्रविजयके पास जाकर निवेदन किया ॥ २२३ ॥ नगर-निवासियोंकी बात सुनकर भाईके स्नेहसे भरे हुए महाराज समुद्रविजयने विचार किया कि यदि इसे स्पष्ट ही मना किया जाता है तो संभव है यह विमुख हो जावेगा । इसलिए उन्होंने कुमार वसुदेवको एकान्तमें बुलाकर कहा कि ‘हे कुमार ! तुम्हारे शरीरकी कान्ति आज बदली-सी मालूम होती है इसलिए तुम्हें ठण्डी हवा आदिमें यह व्यर्थका भ्रमण छोड़ देना चाहिए । यदि भ्रमणकी इच्छा ही है तो राजभवनके चारों ओर धारागृह, मनोहर-वन, राज-मन्दिर, तथा कृत्रिम पर्वत आदि पर जहाँ इच्छा हो मन्त्रियों, सामन्तों, प्रधान योद्धाओं अथवा महामन्त्रियोंके पुत्रों आदिके साथ भ्रमण करो।’ महाराज वसुदेवकी बात सुनकर कुमार वसुदेव ऐसा ही करने लगे सो ठीक ही है क्योंकि शुद्ध बुद्धिवाले पुरुष आप्तजनोंके वचनोंको अमृत जैसा ग्रहण करते हैं ।। २२४-२२८ ।। कुमार इस प्रकार राजमन्दिरके आसपास ही भ्रमण करने लगे। एक दिन जिसे बहुत बोलनेकी आदत थी और जो स्वेच्छानुसार आचरण करनेमें उत्सुक रहता था ऐसा निपुणमति नामका सेवक कुमार वसुदेवसे कहने लगा कि इस उपायसे महाराजने आपको बाहर निकलनेसे रोका है। कुमारने भी उस सेवकसे पूछा कि महाराजने ऐसा क्यों किया है ? उत्तरमें वह कहने लगा कि जब आप बाहर निकलते हैं तब आपका सुन्दर रूप देखनेसे नगरकी स्त्रियोंका चारित्र शिथिल हो जाता है, वे कामसे आकुल हो जाती हैं, लज्जा छोड़ देती हैं, विपरीत चेष्टाएँ करने लगती हैं, कन्याएँ सधवाएँ और विधवाएँ सभी मदिरा पी हुईंके समान हो जाती हैं, कितनी ही स्त्रियोंका सब शरीर पसीनासे तरबतर हो जाता है; कितनी ही स्त्रियोंके नेत्र आधे खुले रह जाते हैं, कितनी ही स्त्रियाँ पहननेके वस्त्र छोड़ देती हैं, कितनी ही भोजन छोड़ देती हैं, कितनी ही गुरुजनोंका तिरस्कार कर बैठती हैं, कितनी ही रक्षकोंको ललकार देती हैं, कितनी ही अपने पतियोंकी उपेक्षा कर देती हैं, कितनी ही पुत्रोंकी परवाह नहीं करती हैं, कितनी ही पुत्रोंको बन्दर समझ कर दूर फेंक देती हैं, कितनी ही कम्बलको ही उत्तम वस्त्र समझकर पहिन लेती हैं, कितनी कीचड़को अङ्गराग समझकर शरीर पर लपेट लेती हैं और कितनी ही ललाटको नेत्र समझ कर उसीपर कज्जल लगा लेती हैं। अपनी-अपनी समस्त स्त्रियोंकी ऐसी विपरीत चेष्टा देख समस्त नगर-निवासी बड़े दुःखी हुए और उन्होंने शब्दों द्वारा महाराजसे इस बातका निवेदन किया। महाराजने भी इस उपायसे आपकी ऐसी व्यवस्था की है। निपुणमति सेवककी बात सुनकर उसकी परीक्षा करनेके लिए कुमार वसुदेव ज्यों ही राजमन्दिरसे बाहर जाने लगे त्यों ही द्वारपालोंने यह कहते हुए “मना कर दिया कि ‘देव ! हम लोगोंको आपके बड़े भाईकी ऐसी ही आज्ञा है कि कुमारको बाहर नहीं जाने दिया जावे ।’ द्वारपालोंकी उक्त बात सुनकर कुमार वसुदेव उस समय तो रुक गये परन्तु दूसरे ही दिन समुद्रविजय आदिसे कुछ कहे बिना ही अपयशके भयसे विद्या सिद्ध करनेके बहाने अकेले ही श्मशानमें गये और वहाँ जाकर माताके नाम एक पत्र लिखा कि ‘वसुदेव अकीर्तिके भयसे महाज्वालाओं वाली अग्निमें गिरकर मर गया है।’ यह पत्र लिखकर घोड़ेके गलेमें बाँध दिया, उसे वहीं छोड़ दिया और स्वयं जिसमें मुर्दा जल रहा था ऐसी अग्निकी प्रदक्षिणा देकर रात्रिमें ही बड़ी शीघ्रतासे किसी अलक्षित मार्गसे चले गये ॥ २२९-२४३ ॥
श्लोक 244 से 252 वसुदेव की खोज और श्यामला से विवाह
तदनन्तर सूर्योदय होनेपर जब उनके प्रधान प्रधान रक्षकोंने राजमन्दिरमें कुमार वसुदेवको नहीं देखा तो उन्होंने राजा समुद्र-विजयको खबर दी और उनकी आज्ञानुसार अनेक लोगोंके साथ उन्हें खोजनेके लिए वे रक्षक लोग इधर-उधर घूमने लगे। कुछ समय बाद उन्होंने श्मशानमें जला हुआ मुर्दा और उसीके आस पास घूमता हुआ कुमार वसुदेवका घोड़ा देखा ।। २४४-२४५ ।। घोड़ाके गलेमें जो पत्र बँधा था उसे लेकर उन्होंने राजा समुद्रविजयके लिए सौंप दिया । पत्रमें लिखा हुआ समाचार सुनकर समुद्रविजय आदि भाई तथा अन्य राजा लोग सभी शोकसे अत्यन्त दुःखी हुए परन्तु निमित्तज्ञानीने जब कुमार वसुदेवके योग्य और क्षेमका वर्णन किया तो उसे जानकर सब शान्त हो गये ॥ २४६-२४७ ॥ राजा समुद्रविजयने उसी समय स्नेह वश, बहुतसे हितैषी तथा चतुर सेवकोंको कुमार वसुदेवकी खोज करनेके लिए भेजा ।। २४८ ।।
इधर कुमार वसुदेव विजयपुर नामक गाँवमें पहुँचे और विश्राम करनेके लिए अशोक वृक्षके नीचे बैठ गये । कुमारके बैठनेसे उस वृक्षकी छाया स्थिर हो गई थी उसे देख कर वागवान्ने सोचा कि उस निमित्तज्ञानीके वचन सत्य निकले। ऐसा विचार कर उसने मगधदेशके राजाको इसकी खबर दी और राजाने भी अपनी श्यामला नामकी कन्या कुमार वसुदेवके लिए समर्पित की । कुमारने कुछ दिन तक तो वहाँ विश्राम किया, तदनन्तर वहाँ से आगे चल दिया। अब वे देवदारु वनमें पुष्परम्य नामक कमलोंके सरोवरके पास पहुँचे और वहाँ किसी जंगली हाथीके साथ क्रीड़ा कर बड़ी प्रसन्नतासे उसपर सवार हो गये ॥ २४९-२५२ ॥
श्लोक 253 से 273 विद्याधर प्रदेश की यात्रा और गन्धर्वदत्ता का स्वयंवर
उसी समय किसी विद्याधरने उनकी बड़ी प्रशंसा की और हाथीसे उठाकर उन पुण्यात्माको अकस्मात् ही विजयार्ध पर्वत पर पहुँचा दिया ॥ २५३ ॥ वहाँ किन्नरगीत नामके नगरमें राजा अशनिवेग रहता था उसकी शाल्मलिता नामकी एक पुत्री थी जो कि पवनवेगा स्त्रीसे उत्पन्न हुई थी और दूसरी रतिके समान जान पड़ती थी । अशनिवेगने वह कन्या कुमार वसुदेवके लिए समर्पित कर दी। कुमारने भी उसे विवाह कर उसके साथ स्मरणके भी अगोचर कामसुखका अनुभव किया और कुछ दिन तक वहीं विश्राम किया । तदनन्तर जब कुमारने वहाँ से जानेकी इच्छा की तब अशनिवेगका दायाद (उत्तराधिकारी) अंगारवेग उन्हें जानेके लिए उद्यत देख उठाकर आकाशमें ले गया। इधर शाल्मलिदत्ताको जब पता चला तो उससे नंगी तलवार हाथमें लेकर उसका पीछा किया। शाल्मलिदत्ताके भयसे अंगारवेग कुमारको छोड़कर भाग गया। कुमार नीचे गिरना ही चाहते थे कि उसकी प्रिया शाल्मलिदत्ताके द्वारा भेजी हुई पर्णलध्वी नामकी विद्याने उन्हें चम्पापुरके सरोवरके मध्यमें वर्तमान द्वीप पर धीरे-धीरे उतार दिया। वहाँ आकर कुमारने किनारे पर रहनेवाले लोगोंसे पूछा कि इस द्वीपसे बाहर निकलनेका मार्ग क्या है? आप लोग मुझे बतलाइए। तब लोगोंने कुमारसे कहा कि क्या आप आकाशसे पड़े हैं ? जिससे कि निकलनेका मार्ग नहीं जानते । कुमारने उत्तर दिया कि आप लोगोंने ठीक जाना है सचमुच ही मैं आकाशसे पड़ा हूँ। कुमारका उत्तर सुनकर सब लोग हँसने लगे और ‘इस मार्गके द्वारा आप जलसे बाहिर निकल आइए’ ऐसा कह कर उन्होंने मार्ग दिखा दिया। कुमार उसी मार्गसे निकल कर नगरमें प्रवृष्ट हुए और मनोहर नामक गन्धर्वविद्या के गुरुके पास जा बैठे । गन्धर्वताको स्वयंवर में जीतनेके लिए उनके पास बहुतसे शिष्य वीणा बजाना सीख रहे थे। उन्हें देख तथा अपने वीणाविषयक ज्ञानको छिपाकर कुमार मूर्खकी तरह बन गये और कहने लगे कि मैं भी इन लोगोंके साथ वीणा बजानेका अभ्यास करता हूं। ऐसा कह कर उन्होंने एक वीणा ले ली। पहले तो उसकी तन्त्री तोड़ डाली और फिर तूंबा फोड़ दिया। उनकी इस क्रियाको देख लोग अत्यधिक हँसने लगे और कहने लगे कि इसकी धृष्टताको तो देखो। कुमार वसुदेवसे भी उन्होंने कहा कि तुम ऐसे चतुर हो, जान पड़ता है कि गन्धर्वदत्ताके तुम्हीं पति होओगे और हम सबको गाने-बजानेकी कलामें हरा दोगे ।। २५४-२६६ ।।इस प्रकार कुमार वसुदेव वहाँ कुछ समय तक स्थित रहे। तदनन्तर गन्धर्वदत्ता के स्वयंवरमें उत्सुक हुए भूमिगोचरी और विद्याधर लोग एकत्रित होने लगे ॥ २६७ ॥ गाने बजानेकी कलाका रूप धारण करनेवाली गन्धर्वदत्ताने स्वयंवर शालामें आये हुए बहुत से लोगोंको अपने गाने-बजाने के द्वारा तत्काल जीत लिया ॥ २६८ ॥ वहाँ जो चारुदत्त आदि मुख्य मुख्य श्रोता बैठे थे वे सब उस गन्धर्वदत्ताकी प्रशंसा कर रहे थे और कह रहे थे कि उसका कला-कौशल बड़ा ही विलक्षण है -सबसे अद्भुत है ।। २६९ ।। तदनन्तर वसुदेव भी अपने गुरुसे पूछकर कन्याके पास गये और कहने लगे कि ऐसी वीणा लाओ जिसमें एक भी दोष नहीं हो ॥ २७० ॥ लोगोंने तीन चार वीणाएँ बसुदेवके हाथमें सौंप दीं। वसुदेवने उन्हें देखकर हँसते हुए कहा कि इन वीणाओंकी ताँत में लोसि नामका दोष है और तुम्बीफल तथा दण्डोंमें शल्क एवं पाषाण नामका दोष है। उन्होंने यह कहा ही नहीं किन्तु प्रकट करके दिखला भी दिया। यह देख कन्याने कहा कि तो फिर आप कैसी वीणा चाहते हैं ? इसके उत्तर में कुमारने कहा कि मुझे जो वीणा इष्ट है उसका समागम इस प्रकार हुआ था। ऐसा कहकर उन्होंने निम्नांकित कथा सुनाई ।। २७१-२७३ ।।
श्लोक 274 से 283 विष्णुकुमार और वलि मन्त्री की कथा का प्रारम्भ
हस्तिनापुरके राजा मेधरथके पद्मावती रानीसे विष्णु और पद्मरथ नामके दो पुत्र हुए थे ॥ २७४ ॥ कुछ समय बाद राजा मेघरथ तो विष्णुकुमार पुत्रके साथ तप करने लगे और पद्मरथ राज्य करने लगा। किसी अन्य समय समीपवर्ती किसी राजाने राज्य में क्षोभ उत्पन्न किया जिसे प्रधान मन्त्री वलिने साम आदि उपायोंसे शान्त कर दिया। राजा पद्मरथने वलिके कार्यसे सन्तुष्ट होकर कहा कि ‘तुझे क्या इष्ट है ? तू क्या चाहता है ?’ सो कह ! उत्तरमें वलिने कहा कि मैं सात दिन तक राज्य करना चाहता हूँ। राजाने भी वलिकी इस माँगको जीर्णतृणके समान तुच्छ समझ उसे सात दिनका राज्य देना स्वीकृत कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि जो किये हुए उपकारको जानते हैं अर्थात् कृतज्ञ हैं वे उपकार करनेवालेके लिए क्या नहीं देते हैं? ॥ २७५-२७८ ॥ उसी समय अकम्पन गुरु आदि मुनियोंके समूहने हस्तिनापुर आकर वहाँ के सौम्य पर्वत पर आतापन योग धारण कर लिया। पहले जब वलि मन्त्री उज्जयिनी नगरीमें रहता था तब उसे अकम्पन गुरुने शास्त्रार्थके समय विद्वानोंकी सभामें जीत लिया था इसलिए वह पापी क्रोधसे उनका घात करनाचाहता था ।। २७९-२८० ॥ पापी वलि मन्त्रीने यज्ञका बहाना कर उस सौम्य पर्वतके चारों ओर याचकोंको दान देने तथा देवताओंको सन्तुष्ट करनेके लिए पाक अर्थात् रसोई बनवाना शुरू किया जिससे धुआँ तथा ज्वालाओंका समूह चारों ओर फैलने लगा। जब मुनिराज विष्णुकुमारको इस उपसर्गका पता चला तो वे आकर राजा पद्मरथके पास गये और वीतराग आसन पर बैठ गये । राजा पद्मरथने उनकी बन्दना की, पूजा की तथा कहा कि मुझसे क्या कार्य है ? ॥ २८१-२८३ ॥
श्लोक 284 से 292 विष्णुकुमार द्वारा उपसर्ग का निवारण
मुनिराज विष्णुकुमारने राजा पद्मरथसे कहा कि तुम्हारे मन्त्रीने आतप योग धारण करनेवाले मुनियोंके लिए उपसर्ग कर रक्खा है उसे तुम शीघ्र ही दूर करो ।। २८४ ॥ उत्तरमें राजाने कहा कि मैं उसके लिए सात दिनका राज्य देना स्वीकृत कर चुका हूं अतः सत्यव्रतके खण्डित होनेके भयसे मैं उसे नहीं रोक सकता। हे पूज्य ! इस दुष्टका इस समय आप ही निवारण कीजिए। स्वच्छन्द रहनेवाले दुष्ट जन योग्य और अयोग्य चेष्टाओंको अच्छे-बुरे कार्योंको नहीं जानते हैं ।॥ २८५-२८६ ॥ राजा पद्मरथने ऐसा उत्तर दिया, उसे सुनकर मुनिराजने कहा कि तो मैं ही शीघ्र नष्ट होनेवाले इस पापीको मना करता हूं ।। २८७ ॥ इतना कहकर वे महामुनि वामन (बोंने) ब्राह्मणका रूप रखकर वलिके पास पहुँचे और आशीर्वाद देते हुए बोले कि हे महाभाग ! आज तू दाताओंमें मुख्य है इसलिए मैं तेरे पास आया हूं तू मुझे भी कुछ दे । उत्तरमें वलिने इष्ट वस्तु देना स्वीकृत कर लिया । तदनन्तर ब्राह्मण वेषधारी विष्णुकुमार मुनिने कहा कि हे राजन्, मैं अपने पैरसे तीन पैर पृथिवी चाहता हूं यही तू मुझे दे दे। ब्राह्मणकी बात सुनकर वलिने कहा कि ‘यह तो बहुत थोड़ा क्षेत्र है इतना ही क्यों माँगा ? ले लो’, इतना कहकर उसने ब्राह्मणके हाथमें जलधारा छोड़कर तीन पैर पृथिवी दे दी। फिर क्या था ? मुनिराजने विक्रियाऋद्धिसे फैला कर एक पैर तो मानुषोत्तर पर्वतकी ऊँची शिखर पर रक्खा और देदीप्यमान कान्तिका धारक दूसरा पैर सुमेरु पर्वतकी चूलिका पर रक्खा ।। २८८-२९२ ॥
श्लोक 293 से 301 वलि का पराभव और घोषवती वीणा का इतिहास
उस समय विद्याधर और भूमिगोचरी सभी स्तुति कर मुनिराजसे कहने लगे कि हे प्रभो ! अपने चरणोंको संकोच लीजिए, वृथा ही संसारका कारणभूत क्रोध नहीं कीजिए ॥ २९३ ॥ इस प्रकार सङ्गीत और वीणा आदिसे मुखर हुए भूमिगोचरियों और विद्याधरों ने शीघ्र ही उन मुनिराजको प्रसन्न कर लिया और उन्होंने भी अपने दोनों चरण संकोच लिये ॥ २९४॥ उस समय उनका लक्षणसहित सङ्गीत सुनकर देव लोग बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंनेअच्छे स्वर वाली घोषा, सुघोषा, महाघोषा और घोषवती नामकी चार वीणाएँ दीं। उन वीणाओं मेंसे देवोंने यथाक्रमसे दो वीणाएँ तो विद्याधरोंकी दी थीं और दो वीणाएँ भूमिगोचरियोंको दी थीं ।॥ २९५-२९६ ॥ तदनन्तर उन मुनिराजने वलिसे कहा कि मुझ ब्राह्मणने तुझसे व्यर्थ ही याचना की क्योंकि तीसरा चरण रखनेके लिए अवकाश ही नहीं है। यह कहकर बलवान् विष्णुकुमार मुनिराजने उस दुराचारी वलिको शीघ्र ही बाँध लिया और अकम्पन आदि मुनियोंके उस दुःसइ उपसर्गंको दूर कर दिया ॥ २९७-२९८ ॥ बँधे हुए वलिको मारनेके लिए राजा पद्मरथ उद्यत हुए परन्तु मुनिराजने उसे मना कर दिया और प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने वलिको समीचीन धर्म ग्रहण कराया। इस प्रकार धर्मकी प्रभावना करनेवाले बुद्धिमान् मुहामुनिकी राजा पद्मरथने पूजा की। तदनन्तर वे अपने स्थान पर चले गये ।। २९९-३०० ॥ यह सब कथा कहनेके बाद कुमार वसुदेवने गन्धर्व-दत्तासे कहा कि देवोंके द्वारा दी हुई चार वीणाओंमें से घोषवती नामकी वीणा आपके इस वंशमें समागमको प्राप्त हुई थी अतः आप वही शुभ वीणा मेरे लिए मँगाइए ॥ ३०१ ॥
श्लोक 302 से 311 गन्धर्वदत्ता और रोहिणी का वरण
इस प्रकार कहने वाले वसुदेवके लिए उन लोगोंने वही वीणा लाकर दी। वसुदेवने उसी वीणाके द्वारा गा बजाकर सब श्रोताओंका चित्त प्रसन्न कर दिया। गन्धर्वदत्ता वसुदेवकी वीणा बजानेमें बहुत भारी कुशलता देखकर प्रसन्न हुई और उसने अच्छे कण्ठबाले तथा समस्त राजाओंको कुण्ठित करनेवाले कुमार वसुदेवके गलेमें अपने आपकी तरह माला समर्पित कर दी सो ठीक ही है क्योंकि पूर्व पर्यायमें पुण्य करनेवाले लोगोंको बड़ी-बड़ी ऋद्धियाँ स्वयं आकर मिल जाती है ॥ ३०२-३०४ ॥ इसके बाद सबने हर्षित होकर वसुदेवका कल्याणाभिषेक किया। इसी तरह विद्याधरोंकी श्रेणियों अर्थात् विजयार्ध पर्वत पर जाकर विद्याधर राजाओंके द्वारा कन्यादान आदिसे सम्मानित वसुदेवने सात सौ कन्याएँ प्राप्त कीं । तदनन्तर – परम अभ्युदयको धारण करनेवाले कुमार वसुदेव विजयार्थ पर्वतसे लौटकर भूमि पर आ गये ॥ ३०५-३०६ ।। वहाँ अरिष्टपुर नगरके राजा हिरण्यवर्मा के पद्मावती रानीसे उत्पन्न हुई रोहिणी नामकी पुत्री थी जो सचमुच ही रोहिणी चन्द्रमाकी स्त्रीके समान जान पड़ती थी । उसके स्वयंवरके लिए अनेक कलाओं तथा गुणोंको धारण करनेवाले मुख्य शिक्षकों के समान अनेक राजा लोग आये थे परन्तु वसुदेव ‘हम सबके उपाध्याय हैं’ लोगोंको यह बतलानेके लिए ही मानो सबसे अलग बैठे थे। उस समय रोहिणीने उत्कण्ठासे कुण्ठित चित्त होकर अपनी भुजलता के समान रत्नोंकी मालासे वसुदेवके कण्ठका आलिङ्गन किया था ।। ३०७-३०९ ॥ यह देख, जिसप्रकार प्रलयकालमें समुद्र अपनी मर्यादा छोड़कर चुभित हो जाता है उसी प्रकार समुद्रविजय आदि सभी राजा मर्यादा छोड़कर चुभित हो उठे और जबर्दस्ती रोहिणीको हरनेका उद्यम करने लगे । यह देख, हिरण्यवर्मा भी अपने भाइयोंको साथ ले उन दुष्ट हृदय वाले राजाओंसे युद्ध करनेके लिए तैयार हो गया ।। ३१०-३११ ।।
श्लोक 312 से 321 वसुदेव का पुनर्मिलन और पद्म बलभद्र का जन्म
कुमार वसुदेवने भी अपने नामके अक्षरोंसे चिह्नित एक बाण शीघ्र ही समुद्रविजयकी ओर छोड़ा ॥ ३१२ ॥ वाण पर लिखे हुए नामाक्षरोंको बाँचकर समुद्र-विजय आश्चर्यसे चकित हो गये, वे कहने लगे – अहो पुण्योदयसे मुझे वसुदेव मिल गया। उन्होंने सन्तुष्ट होकर शीघ्र ही संग्राम बन्द कर दिया और अपने अन्य छोटे भाइयोंको साथ लेकर वे कामदेवको जीतनेवाले लघु भाई वसुदेवसे मिलनेके लिए गये ॥ ३१३-३१४ ॥ हाथ जोड़े हुए कुमार वसुदेवने महाराज समुद्रविजयको प्रणाम कर प्रसन्न किया। तत्रुनन्तर अपने अन्य बड़े भाइयोंको भी प्रणामके द्वारा प्रसन्न बनाया ।। ३१५ ।। कुमारके द्वारा पहले विवाही हुई अपनी-अपनी पुत्रियोंको भूमिगोचरी और विद्याधर राजा बड़े हर्षसे ले आये और उन्हें कुमारके साथ मिला दिया। समुद्रविजय आदिने कुमार वसुदेवको साथ लेकर उत्सवोंसे भरे हुए अपने नगरमें प्रवेश किया और वहाँ वे सब निरन्तर इच्छानुसार सुख भोगते हुए रहने लगे ।। ३१६-३१७ ॥ इस प्रकार इन सबका समय अविनाशी तथा प्रशंसनीय भोगोंके द्वारा सुखसे व्यतीत हो रहा था। कुछ समय बाद जिनका वर्णन पहले आ चुका है ऐसे शङ्खद्ध नामके मुनिराजका जीव महाशुक्र स्वर्गसे चय कर वसुदेवकी रोहिणी नामक स्त्रीके पद्म नामका पुण्यशाली पुत्र उत्पन्न हुआ। वह अपने भाइयोंमें आनन्दको बढ़ाता हुआ नौवाँ बलभद्र होगा ॥ ३१८-३१९ ॥ उसकी निर्मल बुद्धि सूर्यकी प्रभाके समान प्रताप युक्त थी। जिस प्रकार शरद् ऋतुका संस्कार पाकर सूर्यकी प्रभा पद्म अर्थात् कमलोंके विकासको बढ़ाने लगती है उसी प्रकार उसकी बुद्धि शास्त्रोंका संस्कार पाकर पद्मा अर्थात् लक्ष्मीकी उत्पत्तिको बढ़ाने लगी थी ।। ३२० ॥ उसका प्रताप दुर्वार था, दुष्टोंको नष्ट करनेवाला था और विशिष्ट-पुरुषोंका पालन करनेवाला था फिर भला वह सूर्यके सारभूत तेजका उल्लङ्घन क्यों नहीं करता ? ।। ३२१ ।।
श्लोक 322 से 331 वशिष्ठ तापस का अज्ञान दूर होना
अब इसीसे सम्बन्ध रखनेवाली दूसरी कथा कही जाती है जो इस प्रकार है। जहाँ गङ्गा और गन्धावती नदियाँ मिलती हैं वहाँ बहुतसे फले फूले वृक्ष थे। उन्हीं वृक्षोंके बीच में जठरकौशिक नामकी तपसियोंकी एक बस्ती थी। उस बस्तीका नायक वशिष्ठ तपसी था वह पञ्चाग्नि तप तपा करता था । एक दिन वहाँ गुणभद्र और वीरभद्र नामके दो चारण मुनि आये। उन्होंने उसके तपको- अज्ञान तप बताया। यह सुनकर वह दुर्बुद्धि तापस क्रोध करता हुआ उनके सामने खड़ा होकर पूछने लगा कि मेरा अज्ञान क्या है? उन दोनों मुनियोंमें जो प्रथम थे ऐसे गुणभद्र मुनि कहनेके लिए तत्पर हुए सो ठीक ही है क्योंकि सत्पुरुष हितका ही उपदेश देते हैं ।। ३२२-३२५ ।। उन्होंने जटाओंके समूहमें उत्पन्न होनेवाली लीखों तथा जुओंके सङ्घटनको; निरन्तर स्नानके समय लगकर जटाओंके भीतर मरी हुई छोटी छोटी मछलियोंको और जलते हुए इन्धनके भीतर रहकर छटपटाने वाले अनेक कीड़ोंको दिखाकर समझाया कि देखो यह तुम्हारा अज्ञान है ॥ ३२६-३२७ ।। काल-लब्धिका आश्रय मिलनेसे विशिष्ट बुद्धिका धारक वह वशिष्ठ तापस दीक्षा लेकर आतापन योगमें स्थित हो गया और उपवास सहित तप करने लगा ॥ ३२८ ॥ उसके तपके प्रभावसे सात व्यन्तर देवियाँ आयीं और आगे खडी होकर कहने लगीं हे मुनिराज ! अपना इष्ट सन्देश कहिये, हमलोग करनेके लिए तैयार हैं ।॥ ३२९ ॥ उन्हें देखकर वशिष्ठ मुनिने कहा कि मुझे आप लोगोंसे इस जन्ममें कुछ प्रयोजन नहीं है अन्य जन्ममें मेरे पास आना ॥ ३३० ॥ इस प्रकार तप करते हुए वे अनुक्रमसे मथुरापुरी आये वहाँ एक महीनेके उपवासका नियम लेकर उन्होंने आतापन योग धारण किया ।। ३३१ ।।
श्लोक 332 से 341 उग्रसेन के प्रति वैरभाव और कंस के रूप में जन्म
तदनन्तर दूसरे दिन मथुराके राजा उग्रसेनने बड़ी भक्तिसे उन मुनिके दर्शन किये और नगर में घोषणा करा दी कि यह मुनिराज हमारे ही घर भिक्षा ग्रहण करेंगे, अन्यत्र नहीं। इस घोषणासे उन्होंने अन्य सब लोगोंको आहार देनेका निषेध कर दिया। अपनी पारणाके दिन मुनि-राजने भिक्षाके लिए नगरीमें प्रवेश किया परन्तु उसी समय राजमन्दिर में अग्नि लग गई उसे देख मुनिराज निराहार ही लौटकर तपोवनमें चले गये ।। ३३२-३३४ ॥ मुनिराजने एक मासके उपवास का नियम फिरसे ले लिया। तदनन्तर एक माह बीत जानेपर क्षीण शरीरके धारक मुनिराजने जब आहारकी इच्छासे पुनः नगरीमें प्रवेश किया तब वहाँ पर हाथीका क्षोभ हो रहा था उसे देख वे शीघ्र ही नगरीसे वापिस लौट गये और एक माहका फिर उपवास लेकर तप करने लगे । एक माह समाप्त होनेपर जब वे फिर आहार के लिए राजमन्दिरकी ओर गये तब महाराज जरासन्धका भेजा हुआ पत्र सुनकर राजा उग्रसेनका चित्त व्याकुल हो रहा था अतः उसने मुनिकी ओर ध्यान नहीं दिया ।। ३३५-३३७ ॥ क्षीण शरीरके धारी वशिष्ठ मुनि जब वहाँ से लौट रहे थे तब उन्होंने लोगोंको यह कहते हुए सुना कि ‘राजा न तो स्वयं भिक्षा देता है और न दूसरोंको देने देता है। इसका क्याअभिप्राय है सो जान नहीं पड़ता।’ लोगोंका कहना सुनकर पाप कर्मसे उदयसे मुनिराजको क्रोध आ गया जिससे उनकी बुद्धि जाती रही। उसी समय उन्होंने निदान किया कि ‘मैंने जो उग्र तप किया है उसके फलसे मैं पुत्र होकर इस राजाका निग्रह करूँ तथा इसका राज छीन लूँ’ ।। ३३८-३४०।। इस प्रकारके खोटे परिणामोंसे मुनिराजकी मृत्यु हो गई और वे तीव्र वैरके कारण राजा उग्रप्तेनकी पद्मावती रानीके गर्भ में जा उत्पन्न हुए ॥३४१।।
श्लोक 342 से 351 कंस का परित्याग और प्रारम्भिक जीवन
उस रानी पद्मावतीको भी गर्भ के बालककी क्रूरतावश राजाके हृदयका मांस खानेकी इच्छा हुई और उससे वह दुःखी होने लगी। यह जानकर मन्त्रियोंने अपनी बुद्धिसे कोई बनावटी चीज देकर कहा कि ‘यह तुम्हारे पतिके हृदयका मांस है’ इस प्रकार उसका दोहला पूरा किया सो ठीक ही है क्योंकि बुद्धिमान् मनुष्य क्या नहीं करते हैं ? ॥ ३४२-३४३ ॥ जिसका दोहला पूरा हो गया है ऐसी रानी पद्मावतीने अनुक्रमसे वह पापी पुत्र प्राप्त किया, जिस समय वह उत्पन्न हुआ था उस समय अपने ओठ डस रहा था, उसकी दृष्टि क्रूर थी और भौंह टेढ़ी ।। ३४४ ॥ माता-पिताने उसे देखकर विचार किया कि इसका यहाँ पोषण करना योग्य नहीं है यही समझ कर उन्होंने उसे छोड़नेकी विधिका विचार किया और कांसोंकी एक सन्दूक बनवा कर उसमें उस पुत्रको पत्र सहित रख दिया तथा यमुना नदीके प्रवाहमें छोड़ दिया ।। ३४५-३४६ ।। कौशाम्बी नामकी नगरीमें एक मण्डोदरी नामकी कलारन रहती थी उसने प्रवाहमें बहती हुई सन्दूकके भीतर स्थित उस बालकको देखा। देखते ही वह उसे उठा लाई और हितैषिणी बन अपने पुत्रके समान उसका पालन करने लगी। सो ठीक ही है क्योंकि तपस्वियोंके हीन पुण्य भी क्या नहीं करते ? ॥ ३४७-३४८ ॥ कितने ही दिनोंमें वह सुदृढ़ अवस्था पाकर साथ खेलनेवाले समस्त बालकोंको चाँटा, मुट्ठी तथा डण्डा आदिसे पीड़ा पहुँचाने लगा। उसके इस दुराचारसे खिन्न होकर मण्डोदरीने उसे छोड़ दिया- घरसे निकाल दिया ॥ ३४९-३५० ॥ अब वह शौर्यपुरमें जाकर राजा वसुदेवका सेवक बन गया और सदा उनकी सेवामें तत्पर रहने लगा ।। ३५१ ।।
श्लोक 352 से 363 कंस की वास्तविक पहचान
अब इसीसे सम्बन्ध रखनेवाली एक अन्य कथा कहते हैं और वह इस प्रकार है- यद्यपि राजा जरासन्धने सब राजाओंको जीत लिया था तो भी किसी समय उसका कुछ कार्य बाकी रह गया था। उसकी पूतिके लिए जरासन्धने सब राजाओंके पास इस आशयके पत्र भेजे कि जो राजा सुरम्य देशके मध्यमें स्थित पोदनपुरके स्वामी हमारे शत्रु सिंहरथको युद्धमें अपने बलसे जीतकर तथा बाँधकर हमारे पास लावेगा उसे मैं आधा देश तथा कलिन्दसेना रानीसे उत्पन्न हुई जीवद्यशा नामकी अपनी पतिव्रता पुत्री दूंगा। प्रतापी राजा वसुदेवने जब यह पत्र पाया तो उन्होंने सिंहका मूत्र मॅगाकर घोड़ोंके शरीर पर लगवाया, उन्हें रथमें जोता और तदनन्तर ऐसे रथपर आरूढ़ होकर चल पड़े। वहाँ जाकर उन्होंने संमाममें उस भारी राजा सिंहरथको जीत लिया और अपने सेवक कंसके द्वारा उसे बँधवा कर स्वयं राजा जरासन्धको सौंप दिया। राजा जरासन्ध भी सन्तुष्ट होकर वसुदेवके लिए आधे देशके साथ अपनी पूर्व प्रतिज्ञात पुत्री देने लगा। उस समय वसुदेवने देखा कि उस पुत्रीके लक्षण अच्छे नहीं हैं अतः कह दिया कि सिंहरथको मैंने नहीं बाँधा है यह कार्य इस कंसने किया है इसलिए इसी आज्ञाकारीके लिए यह कन्या दी जावे । वसुदेवके वचन सुनकर राजा जरासन्धने कंसका कुल जाननेके लिए मण्डोदरीके पास अपना दूत भेजा ॥ ३५२-३६०।। दूतको देखकर मण्डोदरी डर गई और सोचने लगी कि क्या मेरे पुत्रने वहाँ भी अपराध किया है ? इसी भयसे वह सन्दूक साथ लेकर स्वयं राजा जरासन्धके पास गई। वहाँ जाकर उसने ‘यह सन्दूक ही इसकी माता है’ यह कहते हुए पहले वह कांसकी सन्दूक राजाके आगे जमीन पर रख दी। तदनन्तर नमस्कार कर कहने लगी कि ‘यह बालक कांसकी सन्दूकमें रखा हुआ यमुनाके जलमें बहा आ रहा था मैंने लेकर इसका पालन मात्र किया है ॥ ३६१-३६३ ॥
श्लोक 376 से 392 देवकी के पुत्रों का रहस्य और सातवें पुत्र की रक्षा
चूँकि यह कांसकी सन्दूक में आया था इसलिए गाँवके लोगोंने इसे कंस नामसे पुकारना शुरू कर दिया। यह स्वस्वभावसे ही अपनी शूर-वीरताका घमण्ड रखता है और बचपनसे ही स्वच्छन्द प्रकृतिका है’ ।। ३६४ ॥ मण्डो-दरीके ऐसे वचन सुनकर राजा जरासन्धने सन्दूकके भीतर रखा हुआ पत्र लेकर बचवाया । उसमें लिखा था कि यह राजा उग्रसेन और रानी पद्मावतीका पुत्र है। यह जानकर सन्तुष्ट हुए राजा जरा-सन्धने कंसके लिए जीवद्यशा पुत्री तथा आधा राज्य दे दिया ।। ३६५-३६६ ।। जब कंसने यह सुना कि उत्पन्न होते ही मुझे मेरे माता-पिताने नदीमें छोड़ दिया था तब वह बहुत ही कुपित हुआ, उसका पूव पर्यायका वैर वृद्धिंगत हो गया। उसी समय उसने मथुरापुरी जाकर माता-पिताको कैद कर लिया और दोनोंको गोपुर – नगरके प्रथम दरवाजेके ऊपर रख दिया सो ठीक ही है क्योंकिविचार रहित पापी मनुष्य कुपित होकर क्या क्या नहीं करते हैं ? ।। ३६७-३६८ ॥ तदनन्तर कंस राजा बसुदेवको अपने नगरमें ले आया और उन्हें उसने बड़ी विभूतिके साथ राजा देवसेनकी पुत्री तथा अपनी छोटी बहिन देवकी समर्पित कर दी। इस प्रकार कंसका समय सुखसे व्यतीत होने लगा। किसी दूसरे दिन अतिमुक्त मुनि भिक्षाके लिए राजभवनमें आये। उन्हें देख हँसीसे जीवद्यशा वड़े हर्षसे कहने लगी कि ‘हे मुने ! यह देवकीका ऋतुकालका वस्त्र है, यह आपकी छोटी बहिन इस वस्त्रके द्वारा अपनी चेष्टा आपके लिए दिखला रही है’। जीवद्यशाके उक्त वचन सुनकर मुनिका क्रोध भड़क उठा। वे वचनगुप्तिको भङ्ग करते हुए बोले कि इस देवकीका जो पुत्र होगा वह तेरे पतिको अवश्य ही मारेगा। यह सुनकर जीवद्यशाको भी क्रोध आ गया और उसने उस वस्त्रके दो टुकड़े कर दिये। तब मुनिने कहा कि वह न केवल तेरे पतिको मारेगा किन्तु तेरे पिताको भी मारेगा। यह सुनकर तो उसके क्रोधका पार ही नहीं रहा। अबकी बार उसने उस वस्त्रको पैरोंसे कुचल दिया। यह देख मुनिने कहा कि देवकीका पुत्र स्त्रीकी तरह समुद्रान्त पृथिवी रूपी स्त्रीका पालन करेगा ।। ३६९-३७५ ।। जीवयशा इन सुनी हुई बातोंका विचार कर कंसके पास गई और उसे परस्परमें सब समझा आई ॥ ३७६ ॥ ‘मुनि जो बात हँसीमें भी कह देते हैं वह सत्य निकलती है’ यह विचार कर कंस डर गया और राजा बसुदेवके पास जाकर बड़े स्नेहसे याचना करने लगा कि आपकी आज्ञासे प्रसूतिके समय देवकी हमारे ही घर आकर प्रसूतिकी पूरी विधि करे ।। ३७७ ।। कंसके अनुरोधसे वसुदेवने भी ‘ऐसा ही होगा’ यह कहकर उसकी बात मान ली सो ठीक ही है क्योंकि अवश्यम्भावी कार्योंमें मुनिराज भी भूल कर जाते हैं ।॥ ३७८-३७९ ।। किसी दिन वही अति-मुक्त मुनि भिक्षाके लिए देवकीके घर प्रविष्ट हुए तो देवकीने खड़े होकर यथोक्त विधिसे उनका पडिगाहन किया। आहार देनेके बाद देवकी और वसुदेवने उनसे पूछा कि क्या कभी हम दोनों भी दीक्षा ले सकेंगे ? मुनिराजने उनका अभिप्राय जानकर कहा कि इस तरह छलसे क्यों पूछते हो ? आप दोनों सात पुत्र प्राप्त करेंगे, उनमेंसे छह पुत्र तो अन्य स्थानमें बढ़कर निर्वाण प्राप्त करेंगे और सातवाँ पुत्र चक्रवर्ती होकर अपने छत्रकी छायासे चिरकाल तक समस्त पृथिवीका पालन करेगा ।। ३८०-३८३ ।। यह सुनकर देवकी बहुत हर्षित हुई। तदनन्तर उसने तीन बारमें दो-दो युगल पुत्र प्राप्त किये । इन्द्रको मालूम हुआ कि ये सब पुत्र चरमशरीरी हैं अतः उसने देवकीके गूढ़ कार्यको जाननेवाले नैगमर्ष नामके देवको प्रेरणा की। इन्द्रके द्वारा प्रेरित हुआ नैगमर्प देव देवकीके इन पुत्रोंको ले जाकर भद्रिलपुर नगरमें अलका नामकी वैश्य पुत्रीके आगे डाल आता था और उसके तत्काल उत्पन्न होकर मरे हुए तीन युगल पुत्रोंको देवकीके सामने डाल देता था ।। ३८४-३८६ ॥ कंसने उन मरे हुए पुत्रों को देखकर विचार किया कि इन निर्जीव पुत्रोंसे मेरी क्या हानि हो सकती है ? मुनि असत्यवादी भी तो हो सकते हैं। उसने ऐसा विचार किया सही परन्तु उसकी शङ्का नहीं गई इसलिए वह उन मृत पुत्रोंको शिलाके ऊपर पछाड़ता रहा। इसके बाद निर्नामक मुनिका जीव महाशुक्र स्वर्गसे च्युत होकर देवकीके गर्भमें आया। अबकी बार उसने अपने ही घर सातवें महीने में ही पुत्र उत्पन्न किया। नीतिविद्या में निपुण वसुदेव और बलभद्र पद्मने विचार किया कि कंसको बिना जताये ही इस पुत्रका नन्दगोपके घर सुखसे पालन-पोषण करावेंगे । पिता और भाईने अपने विचार देवकीको भी बतला दिये । बलभद्रने उस बालकको उठा लिया और पिताने उस पर छत्र लगा लिया उस समय घोर अन्धकार था अतः पुत्रके पुण्यसे नगरका देवता विक्रिया वश एक बैलका रूप बनाकर उनके आगे हो गया। उस बैलके दोनों पैने सींगों पर देदीप्यमान मणियोंके दीपक रखे हुए थे उनसे समस्त अन्धकार दूर होता जाता था ।। ३८७-३९२ ॥
श्लोक 393 से 402 यमुना पारगमन और नन्दगोप से भेंट
गोपुरके किवाड़ बन्द थे परन्तु पुत्रके चरणोंका स्पर्श होते ही खुल गये। यह देख बन्धनमें पड़े हुए उग्रसेनने बड़े क्षोभके साथ कहा कि इस समय किवाड़ कौन खोल रहा है? यह सुनकर बलभद्रने कहा कि आप चुप बैठिये यह बालक शीघ्र ही आपको बन्धनसे मुक्त करेगा। मथुराके राजा उग्रसेनने सन्तुष्ट होकर ‘ऐसा ही हो’ कहकर आशीर्वाद दिया। बलभद्र और वसुदेव बहाँ से निकल कर रात्रिमें ही यमुना नदीके किनारे पहुँचे। होनहार चक्रवर्तीके प्रभावसे यमुनाने भी दो भागोंमें विभक्त होकर उन्हें मार्ग दे दिया सो ठीक ही है क्योंकि ऐसा कौन आर्द्रात्मा (जल स्वरूप पक्ष में दयालु) होगा जो अपने समान वर्णवालेसे आश्रित होता हुआ भाईचारेको प्राप्त नहीं हो ॥ ३९३-३९७ ।। इधर बड़े आश्चर्यसे यमुनाको पार कर बलभद्र और बसुदेव नन्दगोपालके पास जा रहे थे इधर वह भी एक बालिकाको लेकर आ रहा था। बलदेव और वसुदेवने उसे देखते ही पूछा कि हे भद्र ! रात्रिकेसमय अकेले ही तुम्हारा आना क्यों हो रहा है? इस प्रकार पूछे जाने पर नन्दगोपने प्रणाम कर कहा कि ‘आपकी सेवा करनेवाली मेरी स्त्रीने पुत्र-प्राप्तिके लिए श्रद्धाके साथ किन्हीं भूत देवताओं की गन्ध आदिसे पूजाकर उनसे आशीर्वाद चाहा था। आज रात्रिको उसने यह कन्या रूप सन्तान पाई है। कन्या देखकर वह शोक करती हुई मुझसे कहने लगी कि ले जाओ यह कन्या उन्हीं भूत देवताओंको दे आओ-मुझे नहीं चाहिए। सो हे नाथ! मैं यह कन्या उन्हीं भूत देवताओंको देनेके लिए जा रहा हूं’ । उसकी बात सुनकर बलदेव और वसुदेवने कहा कि ‘हमारा मनोरथ सिद्ध हो गया’ ॥ ३९८-४०२ ॥
श्लोक 403 से 411 कृष्ण का नन्दगोप के यहाँ पालन और विन्ध्यवासिनी की कथा
इस प्रकार सन्तुष्ट होकर उन्होंने नन्द गोपके लिए सब समाचार सुना दिये, उसकी लड़की ले ली और अपना पुत्र उसे दे दिया। साथ ही यह भी कह दिया कि तुम इसे होनहार चक्रवर्ती समझो । यह सब काम कर वे दोनों किसी दूसरेको मालूम हुए बिना ही गुप्त रूपसे नगरमें वापिस आ गये ॥ ४०३-४०४ ।।
इधर नन्दगोप भी वह बालक लेकर घर आया और ‘लो, प्रसन्न होकर उन देवताओंने तुम्हारे लिए यह महापुण्यवान् पुत्र दिया है’ यह कहकर अपनी प्रियाके लिए उसने वह होनहार चक्रवर्ती सौंप दिया। यहाँ, कंसने जब सुना कि देवकीने कन्या पैदा की है तो वह सुनते ही उसके घर गया और जाते ही उसने पहले तो कन्याकी नाक चपटी कर दी और तदनन्तर उसे धाय के द्वारा एक तलघटमें रखकर बड़े प्रयत्नसे बढ़ाया ॥ ४०५-४०७ ॥ बड़ी होनेपर उसने अपनी विकृत आकृतिको देखकर शोकसे सुव्रता आर्यिका के पास दीक्षा धारण कर ली और विन्ध्याचल पर्वत पर रहने लगी ।॥ ४०८ ॥ एक दिन वनमें रहनेवाले भील लोग उसे देवता समझ उसकी पूजा करके कहीं गये थे कि इतनेमें व्याघ्रने उसे शीघ्र ही खा लिया। वह मरकर स्वर्ग चली गई। दूसरे दिन जब भील लोग वापिस आये तो उन्हें वहाँ उसकी सिर्फ तीन अङ्गुलियाँ दिखीं। वहाँ के रहनेवाले मूर्ख लोगोंने उन अँगुलियोंकी दूध तथा अङ्गराग आदिसे पूजा की। उसी समयसे ‘यह आर्या ही विन्ध्य-वासिनी देवी है’ ऐसा समझ कर लोग उसकी मान्यता करने लगे ।। ४०९-४११ ।।
श्लोक 412 से 421 पूतना और अन्य देवियों के असफल प्रयास
अथानन्तर- अकस्मात् ही मथुरा नगरीमें बड़े भारी उत्पात बढ़ने लगे। उन्हें देख, कंसने शीघ्र ही वरुण नामके निमित्तज्ञानीसे पूछा कि सच बतलाओ इन उत्पातोंका फल क्या है ? निमित्त-ज्ञानीने उत्तर दिया कि आपका बड़ा भारी शत्रु उत्पन्न हो चुका है ॥ ४१२-४१३ ॥ निमित्तज्ञानीकीबात सुनकर राजा कंस चिन्तामें पड़ गया। उसी समय उसके पूर्व भवमें सिद्ध हुए सात व्यन्तर देवता आकर कहने लगे कि हमलोगोंको क्या कार्य सौंपा जाता है ।। ४१४ ॥ कंसने कहा कि ‘कहीं हमारा शत्रु उत्पन्न हुआ है उस पापीको तुम लोग खोज कर मार डालो’ । ऐसा कहकर उसने उन सातों देवताओंको भेज दिया और वे देवता भी ‘तथास्तु’ कहकर चल पड़े ॥४१५।। उन देवताओं मेंसे पूतना नामकी देवताने अपने विभङ्गावधि ज्ञानसे कृष्णको जान लिया और उसकी माताका रूप रखकर मारनेके लिए उसके पास गई ॥ ४१६ ॥ वह पूतना अत्यन्त दुष्ट थी और विष भरे स्तनका दूध पिलाकर कृष्णको मारना चाहती थी। इधर पूतना कृष्णके मारनेका विचार कर रही थी उधर कोई दूसरी देवी जो बालक कृष्णकी रक्षा करनेमें सदा तत्पर रहती थी पूतनाकी दुष्टताको समझ गई । पूतना जिस समय कृष्णको दूध पिलानेके लिए तैयार हुई उसी समय उस दूसरी देवीने पूतनाके स्तनोंमें बहुत भारी पीड़ा उत्पन्न कर दी। पूतना उस पीड़ाको सहनेमें असमर्थ हो गई और चिल्ला कर भाग गई ॥ ४१७-४१८ ॥ तदनन्तर किसी दिन कोई देवी, गाड़ीका रूप रखकर बालक श्रीकृष्णके ऊपर दौड़ती हुई आई, उसे श्रीकृष्णने दोनों पैरोंसे तोड़ डाला ॥ ४१९ ॥ किसी एक दिन नन्दगोपकी स्त्री बालक श्रीकृष्णको एक बड़ी उलूखलसे बाँध कर पानी लेनेके लिए गई थी परन्तु श्रीकृष्ण उस उलूखलको अपनी कमरसे घटीसता हुआ उसके पीछे चला गया ॥ ४२० ॥ उसी समय दो देवियाँ अर्जुन वृक्षका रूप रखकर बालक श्रीकृष्णको पीड़ा पहुंचानेके लिए उनके पास आई परन्तु उसने उन दोनों वृक्षोंको जड़से उखाड़ डाला ॥ ४२१ ॥
श्लोक 422 से 431 बालक कृष्ण का अद्भुत पराक्रम
किसी दिन कोई एक देवी ताड़का वृक्ष बन गई । बालक श्रीकृष्ण चलते-चलते जब उसके नीचे पहुंचा तो दूसरी देवी उसके मस्तक पर फल गिरानेकी तैयारी करने लगी और कोई एक देवी गधीका रूप रखकर उप्ते काटनेके लिए उद्यत हुई । श्रीकृष्णने उस गधीके पैर पकड़ कर उसे ताड़ वृक्षसे दे मारा जिससे वे तीनों ही देवियाँ नष्ट हो गई ॥ ४२२-४२३ ॥ किसी दूसरे दिन कोई देवी घोड़ेका रूप बनाकर कृष्णको मारनेके लिए चली परन्तु कृष्णने क्रोधवश उसका मुँह ही तोड़ दिया। इस प्रकार सातों देवियों कंसके समीप जाकर बोलीं कि ‘हमलोग आपके शत्रुको मारने में असमर्थ हैं’ इतना कहकर वे बिजली के समान विलीन हो गई ॥४२४-४२५॥ अन्य लोगों पर अपना कार्य दिखानेवाले शस्त्र जिस प्रकार इन्द्रके वज्रायुध पर निःसार हो जाते हैं उसी प्रकार अन्यत्र अपना काम दिखानेवाली देवोंकी शक्तियाँ भी पुण्यात्मा पुरुषके विषयमें निःसार हो जाती हैं ।॥ ४२६ ॥ किसी एक दिन अरिष्ट नामका असुर श्रीकृष्णका बल देखनेके लिए काले बैलका रूप रखकर आया परन्तु श्रीकृष्ण उसकीगर्दन ही तोड़नेके लिए तैयार हो गया। अन्तमें माताने उसे ललकार कर और हे पुत्र ! दूसरे प्राणियोंको क्लेश पहुँचानेवाली इन व्यर्थकी चेष्टाओंसे दूर रह’ इत्यादि कहकर उसे रोका ॥ ४२७-४२८ ॥ यद्यपि माता यशोदा उसे इन कार्योंसे बार-बार रोकती थी पर तो भी मदसे उद्धत हुआ बालक कृष्ण इन कार्योंको करने लगता था सो ठीक ही है क्योंकि महाप्रतापी पुरुष साहसके कार्यमें रोके नहीं जा सकते ॥ ४२६ ॥ देवकी और वसुदेवने लोगोंके कहनेसे श्रीकृष्णके पराक्रमकी बात सुनी तो वे उसे देखनेके लिए उत्सुक हो उठे। निदान एक दिन वे गोमुखी नामक उपवासके बहाने बलभद्र तथा अन्य परिवारके लोगोंके साथ वैभव प्रदर्शन करते हुए व्रजके गोधा वनमें गये ॥ ४३०-४३१ ॥
श्लोक 432 से 441 देवकी का वात्सल्य और दिव्य रत्नों का प्रादुर्भाव
जब ये सब वहाँ पहुँचे थे तब महाबलवान् कृष्ण किसी अभिमानी बैलकी गर्दन झुकाकर उससे लटक रहे थे। देवकी तथा बलदेवने उसी समय कृष्णको देखकर गन्ध माला आदिसे उसका सन्मान किया और स्नेहसे आभूषण पहिनाये । देवकीने उसकी प्रदक्षिणा दी। प्रदक्षिणाके समय देवकीके सुवर्ण कलशके समान दोनों स्तनोंसे दूध झरकर कृष्णके मस्तक पर इस प्रकार पड़ने लगा मानो उसका अभिषेक ही कर रही हो। बुद्धिमान् बलदेवने जब यह देखा तब उन्होंने मन्त्रभेदके भयसे शीघ्र ही ‘यह उपवाससे थककर मूच्छित हो रही है’ यह कहते हुए दूधसे भरे कलशोंसे उसका खूब अभिषेक कर दिया । तदनन्तर देवकी तथा वसुदेव आदिने व्रजके अन्य अन्य प्रधान लोगोंका भी उनके योग्य पूजा-सत्कार किया, हर्षित होकर गोपाल बालकोंके साथ श्रीकृष्णको भोजन कराया, स्वयं भी भोजन किया और तदनन्तर लौटकर मथुरापुरी में वापिस आ गये ।। ४३२-४३७ ॥ किसी एक दिन व्रजमें बहुत वर्षा हुई तब श्रीकृष्णने गोवर्धन नामका पर्वत उठाकर उसके नीचे गायोंकी रक्षा की थी ॥ ४३८ ॥ इस कामसे चाँदनीके समान उनकी कीर्ति समस्त संसारमें फैल गई और वह शत्रुओंके मुखरूपी कमलसमूहको सङ्कुचित करने लगी ॥ ४३९ ॥ तदनन्तर जो जैन-मन्दिर मथुरापुरीकी स्थापनाका कारण भूत था उसके समीप ही पूर्व दिशाके दिक्पालके मन्दिर में श्रीकृष्ण के पुण्यकी अधिकतासे नागशय्या, धनुष और शङ्ख ये तीन रत्न उत्पन्न हुए। देवता उनकी रक्षा करते थे और वे श्रीकृष्णकी होनहार लक्ष्मीको सूचित करते थे ॥ ४४०-४४१ ॥
श्लोक 442 से 455 तीन दिव्य रत्नों की सिद्धि
मथुराका राजा कंस उन्हें देखकर डर गया और वरुण नामक निमित्तज्ञानीसे पूछने लगा कि इनकी उत्पत्तिका फल क्या है ? सो कहो ।। ४४२ ।। वरुणने कहा कि हे राजन् ! जो मनुष्य शास्त्रोक्त विधिसे इन्हें सिद्ध
“कर लेगा वह चक्ररत्नसे सुरक्षित राज्य प्राप्त करेगा ।। ४४३ ॥ कंसने वरुणके वचन सुनकर उन तीना रत्नोंको स्वयं सिद्ध करनेका प्रयत्न किया परन्तु वह असमर्थ रहा और बहुत भारी खिन्न होकर उनके सिद्ध करनेके प्रयत्नसे विरत हो गया- पीछे हट गया ॥ ४४४ ॥ ऐसा कौन बलवान् है जो इस कार्यको सिद्ध कर सकेगा इसकी जाँच करनेके लिए भयभीत कंसने नगरमें यह घोषणा करा दी कि जो भी नागशय्या पर चढ़कर एक हाथसे शङ्ख बजावेगा और दूसरे हाथसे धनुषको अनायास ही चढ़ा देगा उसे राजा अपनी पुत्री देगा ॥ ४४५-४४६ ॥ यह घोषणा सुनते ही अनेक राजा लोग मथुरापुरी आने लगे। राजगृहसे कंसका साला स्वर्भानु जो कि सूर्यके समान तेजस्वी था अपने भानु नामके पुत्रको साथ लेकर बड़े वैभवसे आ रहा था। वह मार्गमें गोधावनके उस सरोबरके किनारे जिसमें कि बड़े-चड़े सर्पोंका निवास था ठहरना चाहता था परन्तु जब उसे गोपाल बालकोंके कहनेसे मालूम हुआ कि इस सरोवरसे कृष्णके सिवाय किन्हीं अन्य लोगोंसे द्वारा पानी लिया जाना शक्य नहीं है तब उसने कृष्णको बुलाकर अपने पास रख लिया और सेनाको यथास्थान ठहरा दिया ।। ४४७-४५० ।। अवसर पाकर कृष्णने राजा स्वर्भानुसे पूछा कि हे राजन् ! आप कहाँ जा रहे हैं ? तब उसने मथुरा जानेका सब प्रयोजन कृष्णको बतला दिया। यह सुनकर कृष्णने फिर पूछा- क्या यह कार्य हमारे जैसे लोग भी कर सकते हैं ? कृष्णका प्रश्न सुनकर स्वर्भानुने सोचा कि यह केवल बालक ही नहीं है इसका पुण्य भी अधिक मालूम होता है। ऐसा विचार कर उसने कृष्णको उत्तर दिया कि यदि तू यह कार्य करनेमें समर्थ है तो हमारे साथ चल । इतना कह कर स्वर्भानुने कृष्णको अपने पुत्रके समान साथ ले लिया। मथुरा जाकर उन्होंने कंसके यथायोग्य दर्शन किये और तदनन्तर उन समस्त लोगोंको भी देखा कि नागशय्या आदिको वश करनेका प्रयत्न कर रहे थे परन्तु सफलता नहीं मिलनेसे जिनका मान भङ्ग हो गया था। श्रीकृष्णने भानुको अपने समीप ही खड़ा कर उक्त तीनों कार्य समाप्त कर दिये और उसके बाद स्वर्भानुका संकेत पाकर शीघ्र ही वह कुशलता पूर्वक ब्रजमें वापिस आ गया ।॥ ४५१-४५.५ ।।
श्लोक 456 से 471 सहस्रदल कमल और नागराज पर विजय
‘यह कार्य भानुने ही किया है’ ऐसा कुछ पहरेदारोंने कंसको बतलाया और कुछने यह बतलाया कि यह कार्य भानुने नहीं किन्तु किसी दूसरे कुमारने किया है ।॥ ४५६ ॥ यह सुन कर राजा कंसने कहा कि यदि ऐसा है तो उस अन्य कुमारकी खोज की जावे, वह किसका लड़का है ? उसका क्या कुल है? और कहाँ रहता है ? उसके लिए कन्या दी जावेगी ॥ ४५७ ॥ इधर नन्दगोपको जब अच्छी तरह निश्चय हो गया कि यह कार्य हमारे ही पुत्रके द्वारा हुआ है तब वह डर कर अपनी गायोंके साथ कहीं भाग गया ।। ४५८ ॥ किसी एक दिन वहाँ पत्थरका खंभा उखाड़नेके लिए बहुत से लोग गये परन्तु सब मिल कर भी उस खंभाको नहीं उखाड़ सके और श्रीकृष्णने अकेले ही उखाड़ दिया ।। ४५९ ॥ लोग इस कार्यसे बहुत प्रसन्न हुए और श्रीकृष्णके इस साहससे आश्चर्य में पड़ गये । अनन्तर सब लोगोंने श्रेष्ठ वस्त्र तथा आभूषण आदि देकर उनकी पूजा की ।॥ ४६० ॥ यह देख नन्दगोपने विचार किया कि मुझे इस पुत्रके प्रभावसे किसीसे भय नहीं हो सकता। ऐसा विचार कर वह अपने पहलेके ही स्थान पर ब्रजमें वापिस आ गया ॥ ४६१ ॥ खोज करनेके लिए गये हुए लोगोंने यद्यपि कंसको यह अच्छी तरह बतला दिया था कि जिसने उक्त तीन कार्य किये थे वह नन्दगोपका पुत्र है तथापि उसे निश्चय नहीं हो सका इसलिए उसने शत्रुकी जाँच करनेकी इच्छासे दूसरे दिन नन्दगोपके पास यह खबर भेजी थी कि नाग राजा जिसकी रक्षा करते हैं वह सहस्रदल कमल भेजो । राजाकी आज्ञा सुनकर नन्दगोप शोकसे आकुल होकर कहने लगा कि राजा लोग प्रजाकी रक्षा करनेवाले होते हैं परन्तु खेद है कि वे अब मारनेवाले हो गये ।। ४६२-४६४ ॥ इस तरह खिन्न होकर उसने कृष्णसे कहा कि हे प्रिय पुत्र ! मेरे लिए राजाकी ऐसी आज्ञा है अतः जा, भयंकर सर्प जिनकी रक्षा करते हैं ऐसे कमल राजाके लिए तू ही ला सकता है। पिता की बात सुनकर कृष्णने कहा कि ‘इसमें कठिन क्या है? मैं ले आऊँगा’ ऐसा कह कर वह शीघ्र ही महासर्पोंसे युक्त सरोवरकी ओर चल पड़ा ।। ४६५-६६६ ।। और बिना किसी शङ्काके उस सरोवरमें घुस गया। यह जान कर यमराजके समान आकारवाला नागराज उठ कर उसे निगलनेके लिए तैयार हो गया। उस समय वह नागराज क्रोधसे दीपित हो रहा था, अपनी श्वासोंसे उत्पन्न हुई देदीप्यमान अग्निकी ज्वालाओंके कण विखेर रहा था, चूड़ामणिकी प्रभासे देदीप्यमान फणाके आटोपसे भयङ्कर था, उसकी दोनों जिह्वाएँ लप-लप कर रही थीं और चमकीले नेत्रोंसे उसका देखना बड़ा भयंकर जान पड़ता था, श्रीकृष्णने भी विचार किया कि इसकी यह फणा हमारा वस्त्र धोनेके लिए शुद्ध शिला रूप हो। ऐसा विचार कर वे जलसे भीगा हुआ अपना पीताम्बर उसकी फणा पर इस प्रकार पछाड़ने लगे कि जिस प्रकार गरुड़ पक्षी अपना पंखा पछाड़ता है। वज्रपातके समान भारी दुःख देनेवाली उनके वस्त्रकी पछाड़से वह नाग-राज भयभीत हो गया और उनके पूर्व पुण्यके उदयसे अदृश्य हो गया ॥ ४६७-४७१ ॥
श्लोक 472 से 481 मथुरा प्रवेश और कंस-वध की तैयारी
तदनन्तरश्रीकृष्णने इच्छानुसार कमल तोड़ कर शत्रुके पास पहुँचा दिये उन्हें देखकर शत्रुने ऐसा समझा मानों मैंने शत्रुको ही देख लिया हो।।४७२।। इस घटना से राजा कंसको निश्चय होगया कि हमारा शत्रु नन्द गोप-के पास ही रहता है। एक दिन उसने नन्द गोपालको संदेश भेजा कि तुम अपने मल्लोंके साथ मल्लयुद्ध देखनेके लिए आओ। संदेश सुनकर नन्द गोप भी श्रीकृष्ण आदि मल्लोंके साथ मथुरा में प्रविष्ट हुए।।४७३-४७४।। नगर में घुसते ही श्रीकृष्णकी ओर एक मत्त हाथी दौड़ा। उस हाथीने अपना बन्धन तोड़ दिया था, वह यमराजके समान जान पड़ता था, मदकी गन्धसे खिंचे हुए अनेक भौंरे उसके गण्डस्थल पर लग कर शब्द कर रहे थे, वह विनय रहित किसी राजकुमारके समान निरङ्कश था, और अपने दाँतोंके आघातसे उसने बड़े-बड़े पक्के मकानोंकी दीवारें गिरा दी थीं। उस भयंकर हाथीको सामने दौड़ता आता देख श्रीकृष्णने निर्भय होकर उसका एक दाँत उखाड़ लिया और दाँतसे ही उसे खूब पीटा । अन्तमें वह हाथी भयभीत होकर दूर भाग गया। तदनन्तर ‘इस निमित्तसे आप लोगोंकी जीत स्पष्ट ही होगी’ संतुष्ट होकर यह कहते हुए श्रीकृष्णने साथके गोपालोंको पहले तो खूब उत्साहित किया और फिर कंसकी सभामें प्रवेश किया। कंसका अभिप्राय जाननेवाले राजा वसुदेव भी उस समय किसी उपायसे अपनी सेनाको तैयार किये हुए वहीं एक स्थान पर बैठे थे । बलदेवने उठकर अपनी भुजाओंके आस्फालनसे ताल ठोक कर शब्द किया और कृष्णके साथ रङ्गभूमिके चारों ओर चक्कर लगाया। उसी समय उन्होंने श्री कृष्णसे कह दिया कि ‘यह तुम्हारा कंसको मारनेका समय है’ इतना कह वे रङ्गभूमिसे बाहर निकल गये ॥ ४७५-४८१ ॥
श्लोक 482 से 491 रंगभूमि में कृष्ण का वीर रूप
इसके बाद कंसकी आज्ञासे कृष्ण के सेवक, अहंकारी तथा मल्लोंका वेष धारण करनेवाले अनेक गोपाल बालक अपनी भुजाओंको ठोकते हुए रङ्गभूमिमें उतरे । उस समय कानोंको आनन्दित करनेवाले बाजोंकी चञ्चल ध्वनि हो रही थी और उसीके अनुसार वे सब अपने पैर रखते उठाते थे, ऊँचे उठे हुए अपने दोनों कन्धोंसे वे कुछ गर्विष्ठ हो रहे थे, कभी दाहिनी भ्रुकुटि चलाते थे तो कभी बांई। बीच-बीचमें भयंकर गर्जना कर उठते थे, वे कभी आगे जाकर पीछे लौट जाते थे, कभी आगे चक्कर लगाते थे, कभी थिरकते हुए चलते थे, कभी उछल पड़ते थे और कभी एक ही स्थान पर निश्चल खड़े रह जाते थे। इस तरह साफ-साफ दिखनेवाले अनेक पैंतरोंसे नेत्रोंको अच्छे लगनेवाले वे मल्ल रङ्गभूभिको अलंकृत कर खड़े थे। उनके साथ ही रङ्गभूमिको घेर कर चाणूर आदि कंसके प्रमुख मल्ल भी खड़े हुए थे। कंसके वे मलअहंकारसे भरे हुए थे और ऐसे जान पड़ते थे मानो वीर रसके अवतार ही हों ।। ४८२-४८६ ॥ उस ” समय रङ्गभूमिमें खड़े हुए कृष्ण बहुत भले जान पड़ते थे, उनके चित्तका विस्तार अत्यन्त उदार था, त्रे बड़े-बड़े वीर पहलवानोंमें अग्रेसर थे, उनकी कान्ति ऐसी दमक रही थी मानो उन्होंने पहले ही प्रतिमल्लके युद्धमें विजय प्राप्त कर ली हो, उनका पराक्रम रूपी रस उत्तरोत्तर बढ़ रहा था और उन्हें ऐसा उत्साह था कि यदि इस समय मल्लका रूप धर कर सूर्य भी आकाशसे नीचे उतर आवे तो उसे भी जीत लूँगा ॥ ४८७ ॥ उस समय उनके वक्ष बहुत कड़े बँधे थे, बाल बँधे थे, ढाँढ़ी मूँछ थी ही नहीं, शरीर स्वभावसे ही चिकना था, वे गोप मल्लोंके साथ अमल्लोंकी तरह सदा युद्धका अभ्यास करते और पूर्ण विजय प्राप्त करते थे, और उनके पराक्रमकी सब सराहना करते थे ।। ४८८ ॥ उनके चरणोंका रखना स्थिर होता था, उनकी हड्डियोंका गठन वञ्जके सारके समान सुदृढ़ था, उनकी भुजाएँ अर्गलके समान लम्बी तथा मजबूत थीं, उनकी कमर मुट्ठीमें समानेके योग्य थी, वक्षःस्थल अत्यन्त कठोर तथा चौड़ा था, वे बड़े भारी नीलगिरिके समान थे, उनका शरीर सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणोंकी मानो मूर्ति था और गर्वके संचारसे कोई उनकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देख सकता था ।। ४८९ ।। उनके चमकीले नेत्र चञ्चल हो रहे थे, वे बड़ी मजबूत मुट्ठी बाँधे थे, उनकी इन्द्रियोंका समूह पूर्ण परिपक्क था, वे शीघ्र गमन करनेमें दक्ष थे, और वज्रके समान अत्यन्त उम्र थे, इस प्रकार युद्ध-भूमिमें खड़े हुए नन्द गोपके पुत्र श्रीकृष्ण यमराजके लिए भी असहनीय भारी भय उत्पन्न कर रहे थे ॥ ४९० ।। वे श्रीकृष्ण ऐसे जान पड़ते थे मानो समस्त शुरवीरता ही रूप धरकर आ गईथी, अथवा समस्त बल आकर इकट्ठा हुआ था, अथवा समस्त बल एकत्रित हो गया था, सिंह जैसी आकृतिको धारण करनेवाले उन्होंने सिंहनाद किया और रङ्गभूमिसे उछल कर आकाश रूपी आंगनको लाँघ दिया मानो घरका आंगन ही लाँघ दिया हो ॥ ४९१ ॥
श्लोक 492 से 497 चाणूर और कंस का वध तथा कृष्ण की विजय
फिर आकाशसे वज्रकी भाँति पृथिवी पर आये, उन्होंने अपने पैर पटकनेकी चोटसे पर्वतोंके सन्धि-बन्धनको शिथिल कर दिया, वे बराबर गर्जने लगे, इधर-उधर दौड़ने लगे और सिन्दूरसे रंगी अपनी दोनों भुजाओंको चलाने लगे ॥४९२।। उस समय वे अत्यन्त कुपित थे, उनकी कमरके दोनों ओर पीत वस्त्र बँधा हुआ था, और जिस प्रकार सिंह हाथीको मार कर सुशोभित होता है उसी प्रकार वे बाहु-युद्धमें कुशल, अतिशय दुष्ट और पहाड़की शिखरके समान ऊँचे प्रतिद्वन्दी चाणूर मल्लको सहसा मार कर सुशोभित हो रहे थे ॥४९३।। यह देख, खूनके निकलनेके-से जिसके नेत्र अत्यन्त भयंकर हो रहे हैं ऐसा कंस स्वयं जन्मान्तरके द्वेषके कारण मल्ल बन कर युद्धके लिए रंगभूमिमें आ कूदा, श्रीकृष्णने हाथसे उसके पैर पकड़ कर छोटेसे पक्षीकी तरह पहले तो उसे आकाश में घुमाया और फिर यमराजके पास भेजनेके लिए जमीन पर पछाड़ दिया ॥ ४९४ ॥ उसी समय आकाशसे फूल बरसने लगे, देवोंके नगाड़ोंने जोरदार शब्द किया, वसुदेवकी सेनामें क्षोभके कारण बहुत कलकल होने लगा, और वीर शिरोमणि बलदेव, पराक्रमसे सुशोभित, विजयी तथा शत्रु रहित छोटे भाई कृष्णको आगे कर विरुद्ध राजाओं पर आक्रमण करते हुए रङ्गभूभिमें जा डटे ॥ ४९५ ॥ जिनका बल अतुल्य है, जो अलङ्घनीय शत्रु रूपीमत्त हाथियोंके घातसे कुपित सिंहके समान हैं, जिनका पराक्रम माननीय है, बन्दीगण जिनकी स्तुति कर रहे हैं और जिन्होंने सब लोगोंको हर्ष उत्पन्न किया है ऐसे श्रीकृष्णके समीप वीरलक्ष्मी सहसा ही पहुँच गई ।॥ ४९६ ॥ मेरी दूतीके समान श्रेष्ठ वीरलक्ष्मी इनकी विजयी दाहिनी भुजाको प्राप्त कर चुकी है, इसलिए आधे भरत क्षेत्रकी लक्ष्मी भी चिरकालसे प्राप्त हुए उन श्रीकृष्ण रूपी पतिको रागके द्वारा चञ्चल कटाक्षोंसे देख रही थी ।। ४९७ ॥
इस प्रकार ऋषिप्रणीत भगवद्गुणभद्राचार्य प्रणीत, त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहके अन्तर्गत नेमिनाथ स्वामीके चरितमें श्रीकृष्णकी विजयका वर्णन करनेवाला सत्तरवाँ पर्व समाप्त हुआ ।। ७० ।।
उत्तरपुराण पर्व 70 सारांश
पर्व 71
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena