आलोचना पाठ – छंद 24 व 25 : अर्थ एवं व्याख्या
जल मल मोरिन गिरवायो, क्रमि कुल बहु घात करायो
नदियन बिच चीर धुवाये, कोसन के जीव मराये ॥२४॥
शब्दार्थ
- जल-मल — गंदा जल और मल-मूत्र/अपशिष्ट।
- मोरिन — मोरी/नाली आदि में।
- गिरवायो — गिराया/बहाया।
- क्रमि कुल — कीट आदि जीवों के समूह।
- घात करायो — हिंसा कराई।
- नदियन बिच — नदियों के भीतर।
- चीर — वस्त्र।
- धुवाये — धोए।
- कोसन के जीव — जल में रहने वाले अनेक जीव।
इस पद में अपने दैनिक जीवन में किए गए ऐसे कार्यों की आलोचना करते हैं जिनसे जल और उसमें रहने वाले जीव प्रभावित होते हैं।
1. जल-मल का अनुचित विसर्जन
मैंने और क्या करा? जो जल था, उसको मैंने मोरियों (नालियों) में गिरवा दिया। हम क्या करते हैं? जब हम वॉशिंग मशीन चलाते हैं, तो जो साबुन का जल है, उसको हम नाली में बहा देते हैं। तो उसके वश क्या होता है? बहुत सारे जीवों की हिंसा होती है। तो ‘जल मल मोरिन गिरवायो, कृमिकुल बहु घात करायो’, तो मैंने जो है बहुत सारी लट आदि जितने भी सूक्ष्म जीव होते हैं, उनका मैंने बहुत घात कराया। मैंने गंदे जल और मल को नालियों आदि में बहाया, जिससे अनेक कीट-पतंगों और अन्य जीवों का घात हुआ। गंदे जल या अपशिष्ट को कहीं भी बहा देना केवल सफाई का विषय नहीं है। उससे अनेक सूक्ष्म जीवों का जीवन प्रभावित हो सकता है। स्वीकार करते हैं कि उन्होंने इस बात की पर्याप्त चिंता नहीं की कि उनके द्वारा छोड़ा गया अपशिष्ट किस प्रकार जीवों को प्रभावित करेगा।
2. नदी में वस्त्र धोना
‘नदियन बिच चीर धुवाये’, मैंने नदियों के वहाँ पर कपड़ों को धुलवाया, तो ‘कोसन के जीव मराये’, तो जो कोस तक के जीव हैं, उन सबकी विरादना हुई। मैंने नदियों में वस्त्र धोए और इस कारण नदी में रहने वाले असंख्य जलजीवों को कष्ट पहुँचाया या उनकी हिंसा की। आजकल तो हम तालाब आदि के वहाँ पर कपड़ों का धुलाना नहीं करते हैं, लेकिन जो वॉशिंग मशीन में जो हमारा साबुन नाली में जाता है, जो सर्फ आदि जाता है, उसकी वजह से बहुत सारे जीवों की हिंसा होती है और हम हमारी आत्मा को पतित करते हैं, हमारी आत्मा पतित होती है। नदी प्राकृतिक जलस्रोत है और उसमें अनेक प्रकार के जीव रहते हैं। उसमें वस्त्र धोने से—
- जल दूषित हो सकता है,
- साबुन/गंदगी जल में जा सकती है,
- जलजीवों को नुकसान हो सकता है।
इसलिए इसे भी अपनी आलोचना में सम्मिलित करते हैं।
आज के संदर्भ में यह पद जल संरक्षण और जल प्रदूषण की दृष्टि से अत्यंत प्रासंगिक है। नदियों में गंदा पानी, रसायन और ठोस अपशिष्ट डालना केवल पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुँचाता, बल्कि असंख्य जीवों के जीवन को भी प्रभावित करता है।
छंद 25
अन्नादिक शोध कराई, तातें जु जीव निसराई
तिनका नहिं जतन कराया, गलियारे धूप डराया ॥25॥
शब्दार्थ
- अन्नादिक — अन्न आदि खाद्य पदार्थ।
- शोध कराई — साफ/छानकर/जाँचकर तैयार किया।
- जीव निसराई — उसमें से जीव निकल आए।
- तिनका — उन जीवों का।
- जतन — सावधानीपूर्वक संरक्षण।
- गलियारे — रास्ते/गलियारे में।
- धूप डराया — धूप में डाल दिया/धूप के कारण कष्ट पहुँचाया।
हम और किस तरह से पाप कमाते हैं? हम जो अन्नादिक जो चीजें हैं, जो अन्न हैं, उनको जब हम बीनते हैं, तो उसके मध्य में जो जीव आते हैं, ‘तिनका नहीं जतन कराया’, मैंने उनका जतन नहीं किया और मैंने क्या करा? उनको बिना छाने ही उनको धूप लगा दिया। तो धूप लगाने के फलस्वरूप क्या हुआ? वे जीव सारे मरण को प्राप्त हो गए। तो इस तरह से मैंने बहुत जीवों का घात करके बहुत पाप कमाया है।
मैंने अन्न आदि को साफ और शोधित किया, जिससे उनमें छिपे जीव बाहर निकल आए। लेकिन उन जीवों की उचित देखभाल और सुरक्षा नहीं की तथा उन्हें गलियारे आदि में ऐसी जगह छोड़ दिया जहाँ उन्हें धूप से कष्ट हुआ। यह पद पिछले पदों में कही गई सावधानी की भावना को और सूक्ष्म बनाता है।
अन्न-शोधन और जीवों का यत्न: अनाज का शोधन करते समय या मटर जैसी सब्जियाँ छीलते समय जो छोटे-छोटे कीड़े (जीव) निकलते हैं, उन्हें संभालकर छांव वाले स्थान या पेड़-पौधों के पास मिट्टी पर रखना चाहिए। यदि उन्हें उठाकर धूप में या रास्ते (गलियारे) में फेंक दिया जाए, तो वे धूप या लोगों के पैरों तले आकर मर जाते हैं। लेकिन हम अपने आत्मनिरीक्षण यह पूछते है कि—
शोधन के बाद जो जीव बाहर निकले, उनके साथ मेरा व्यवहार कैसा था?
यदि उन्हें केवल “गंदगी” समझकर कहीं भी फेंक दिया गया, तो करुणा और सावधानी का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
“गलियारे धूप डराया” में इसी प्रकार की असावधानी का संकेत है—जीवों को ऐसे स्थान पर छोड़ देना जहाँ उन्हें तेज धूप से कष्ट हो।
यहाँ अहिंसा की भावना केवल जीवों को न मारने तक सीमित नहीं है। इसमें जीव के प्रति संवेदनशीलता भी आवश्यक है।
देखना → पहचानना → बचाना → सुरक्षित स्थान देना
यही करुणामय आचरण है।
छंद 26 व 27 – अर्थ
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