राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 552 से 560 | श्लोक 561 से 575 | श्लोक 576 से 585 | श्लोक 586 से 594 | श्लोक 595 से 604 | श्लोक 605 से 622
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 623 to 631
श्लोक ( Shlok ) 623
तदा रामेण संग्रामे परिभूतं दशाननम् । अवलोक्येन्द्रजिन्मध्यं प्राविशद्वास्य जीवितम् ॥ ६२३ ॥
उस समय इन्द्रजीतने देखा कि रामचन्द्रजी युद्धमें रावणको दबाये जा रहे हैं- उसका तिरस्कार कर रहे हैं तब वह रावणके प्राणोंके समान वीचमें आ घुसा ।। ६२३ ।।
“At that moment, seeing that Ramachandra was overwhelming and overpowering Ravana in battle, Indrajit rushed into the fray to intervene, acting as shield for Ravana as if he were his very life-force.” || 623 ||
श्लोक ( Shlok ) 624
तं अशक्त्यापातयद्रामस्तं निरीक्ष्य खगाधिपः । कुपित्वाऽधावदुद्दिश्य सशस्त्रं लक्ष्मणाग्रजम् ॥ ६२४ ॥
परन्तु रामचन्द्रजीने उसे शक्तिकी चोटसे गिरा दिया। यह देख रावण कुपित होकर शस्त्रोंसे सुशोभित रामचन्द्रजीकी ओर दौड़ा ॥ ६२४ ॥
“However, Ramachandra struck Indrajit with the force of his Shakti weapon, bringing him crashing down. Beholding this, Ravana flew into a rage and rushed furiously toward the heavily armed Ramachandra.” || 624 ||
श्लोक ( Shlok ) 625
तन्मध्ये लक्ष्मणस्तूर्णमभूत्तं दशकन्धरः । मायागजं समारुह्य व्यधान्नाराचपअरे ॥ ६२५ ॥
इसी बीच में लक्ष्मण बड़ी शीघ्रतासे उन दोनां के बीचमें आ गया और रावणने मायामयी हाथीपर सवार होकर उने नाराच-पञ्जरमें घेर लिया । अर्थात् लगातार वाण वर्षा कर उसे ढँक लिया ।। ६२५ ।।
“In the meantime, Lakshmana swiftly moved between the two of them, whereupon Ravana—mounted upon an illusionary elephant—trapped him within a Naracha-Panjar; that is to say, he completely enclosed Lakshmana under a relentless downpour of arrows.” || 625 ||
श्लोक ( Shlok ) 626
प्रहारावरणेनापि प्रतापी गरुडध्वजः । सिंहपोत इव दृप्तो दुर्निवारोऽरिवारणैः ॥६२६॥
परन्तु गरुड़की ध्वजा फहरानेवाला लक्ष्मण प्रहरणावरण नामकी विद्या से बड़ा प्रतापी था। वह सिंहके बच्चे के समान दृप्त बना रहा और शत्रुरूपी हाथी उसे रोक नहीं सके ।। ६२६ ॥
“However, Lakshmana—whose banner bore the emblem of Garuda—was exceedingly majestic, possessing the mystical shield-science known as Praharanavarana. He remained as fierce and unyielding as a lion’s cub, and the elephant-like enemy could not hold him back.” || 626 ||
श्लोक ( Shlok ) 627
विभिद्यासौ निर्ययौ निजविद्यया । दृष्ट्वा तद्रावणः क्रुद्ध्वा प्रतीतं चक्रमादिशत् ॥ ६२७ ॥
वह अपनी विद्यासे नाराच-पञ्जरको तोड़कर बाहुर् निकल आया। यह देख रावण बहुत कुपित हुआ और उसने क्रोधित होकर विश्वासपात्र चक्र रत्न के लिए आदेश दिया ॥ ६२७ ॥
“Breaking through that cage of iron arrows with the power of his mystical science (Vidya), Lakshmana emerged unscathed. Seeing this, Ravana flew into a massive rage and, filled with fury, commanded his ever-faithful, jewel-like discus (Chakra-Ratna).” || 627 ||
श्लोक ( Shlok ) 628 – 629
सिंहनादं तदा कुर्वन् गगने नारदादयः । बाहौ प्रदक्षिणीकृत्य दक्षिणे स्वस्य तिष्ठता ॥ ६२८ ॥चक्रेण विक्रमेणेव मूर्तीभूतेन चक्रिणा । तेन तेन शिरोऽग्राहि त्रिखण्डं वा खगेशितुः ॥ ६२९ ॥
उसी समय नारद आदि आकाशमें सिंहनाद करने लगे । वह चक्ररत्न मूर्तिधारी पराक्रमके समान प्रदक्षिणा देकर लक्ष्मणके दाहिने हाथ पर आकर ठहर गया। तदनन्तर चक्ररत्नको धारण करनेवाले लक्ष्मणने उसी चक्ररत्नसे तीन खण्डके समान रावणका शिर काटकर अपने आधीन कर लिया ।। ६२८-६२९ ॥
“At that very moment, Narada and others in the heavens began to roar with a thunderous battle-cry (Simhanada). That Chakra-Ratna (divine discus), resembling valor incarnate, circumambulated Lakshmana and came to rest upon his right hand. Subsequently, Lakshmana, wielding that supreme discus, severed the head of Ravana—the lord of three realms—and brought him under subjection.” || 628-629 ||
श्लोक ( Shlok ) 630
सोऽपि प्रागेव बद्धायुर्दुराचारादधोगतिम् । प्रापदापत्करी घोरां पापिनां का परागतिः ॥ ६३०॥
रावण, अपने दुराचारके कारण पहले ही नरकायुका बन्ध कर चुका था। अतः, दुःख देनेवाली भयंकर (अधोगति) नरक गतिको प्राप्त हुआ सो ठीक ही है; क्योंकि, पापी मनुष्योंकी और क्या गति हो सकती है ? ॥ ६३० ॥
“Because of his own wicked deeds, Ravana had already bound his karma to a lifespan in hell (Narakayu). Hence, it is only fitting that he attained a lower, terrifying state of existence (Adhogati) full of suffering—for what other destiny can there be for sinful men?” || 630 ||
श्लोक ( Shlok ) 631
विजयाब्जं समापूर्य केशवो विश्वविद्विषाम् । अभयं घोषयामास स धर्मो जितभूभुजाम् ॥ ६३१ ॥
तदनन्तर लक्ष्मणने विजय-शङ्ख बजाकर समस्त शत्रुओंको अभयदानकी घोषणा की सो ठीक ही है। क्यांकि, राजाओंको जीतनेवाले विजयी राजाओंका यही धर्म है ।। ६३१ ॥
“Subsequently, Lakshmana sounded his conch of victory and proclaimed amnesty (Abhayadan) to all the remaining enemies. And this was truly fitting, for such is the supreme duty (Dharma) of victorious monarchs who conquer other kings.” || 631 ||
श्लोक 632 से 641
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