आलोचना पाठ – छंद 32 व 33 : अर्थ एवं व्याख्या
मेरे अवगुन न चितारो, प्रभु अपनों विरद सम्हारो
सब दोष रहित करि स्वामी, दुःख मेटहु अंतरजामी ॥32॥
शब्दार्थ
- अवगुण — दोष, कमियाँ।
- न चितारो — ध्यान में न लाओ/उन पर केंद्रित न हो।
- विरद — महान गुण, यश, महिमा।
- सम्हारो — बनाए रखो/स्मरण करो।
- दोष रहित — दोषों से मुक्त।
- अंतरजामी — अंतर के भावों को जानने वाले।
मेरे अवगुणों को मत देखो, मेरे दोषों को मत देखिए हे प्रभु! मेरे दोषों को ध्यान में रखकर मुझे तुच्छ न समझें। हे जिनवर! ‘प्रभु अपनो विरद निहारो’, आप तो अपनी ओर देखिए, आप तो अपनी जो आपकी यश-कीर्ति फैली हुई है, आप उसको देखिए। अपने महान वीतराग स्वरूप और करुणामय उपदेश को स्मरण रखते हुए मेरी सहायता करें। ‘सब दोष रहित कर स्वामी’, हे स्वामी! आप मुझे सभी दोषों से रहित करिए और ‘दुख मेटो अंतरयामी’, हे केवलज्ञानी! मेरे दुःखों को दूर करिए।मुझे दोषों से मुक्त होने का मार्ग दिखाएँ और मेरे दुःखों को दूर करने में सहायक बनें।
यहाँ दीनता और आत्मस्वीकृति चरम पर दिखाई देती है। हम यह नहीं कह रहे कि “मेरे दोष हैं ही नहीं।” इसके विपरीत, पिछले सभी पदों में हमने अपने दोषों को विस्तार से स्वीकार किया है। इसलिए “मेरे अवगुन न चितारो” का भाव यह है कि मेरे दोषों के कारण मुझे आत्मकल्याण के योग्य समझना बंद न करें।
“अपनों विरद सम्हारो” का आशय है—हे प्रभु! आप तो वीतरागता, करुणा, समता और आत्मकल्याण के मार्ग के उपदेशक हैं; अपने उसी महान स्वरूप के अनुरूप मुझे भी शुद्धि के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिले। यहाँ दो भाव साथ-साथ हैं— दोष की स्वीकृति + आत्मसुधार की आशा।
सच्चा पश्चात्ताप व्यक्ति को निराश नहीं करता; वह उसे परिवर्तन की दिशा में प्रेरित करता है।
इन्द्रादिक पद नहिं चाहूँ, विषयनि में नाहिं लुभाऊँ
रागादिक दोष हरिजे, परमातम निज पद दीजे ॥33॥
शब्दार्थ
- इन्द्रादिक पद — इंद्र आदि के उच्च सांसारिक/दैवी पद।
- विषयनि — इंद्रिय-विषय।
- लुभाऊँ — उनमें आकर्षित/आसक्त होऊँ।
- रागादिक — राग, द्वेष, मोह आदि दोष।
- हरिजे — दूर किए जाएँ।
- परमात्म निज पद — आत्मा का परम शुद्ध स्वरूप/मोक्षपद।
‘इंद्रादिक पद नहीं चाहूँ’, हे जिनेंद्र भगवान! मैं इंद्र आदि जो पद हैं, श्रेष्ठ पद हैं, सुख के पद हैं, मैं उनको नहीं चाहता हूँ।मुझे इंद्र आदि के बड़े-बड़े पद भी नहीं चाहिए ‘विषयन में नाहि लुभाऊँ’, हे भगवन्! मुझे तो यह आशीर्वाद दीजिए कि मैं इन विषय-भोगों में नहीं उलझूँ, यह मुझे लुभा न सकें , न ही मैं इंद्रिय-विषयों में आसक्त होना चाहता हूँ। ‘रागादिक दोष हरीजे’, हे जिनेंद्र भगवान! जैसे आप वीतरागी हैं, आपने राग-द्वेष आदि जो दोष हैं, उनको दूर कर दिया है, तो ऐसे ही मेरे भी राग-द्वेष आदि दोषों को दूर करिए। ‘परमातम निज पद दीजे’, और आपके समान जो परमात्म पद है, वह मुझे भी प्राप्त हो, मैं तो यही चाहता हूँ। मेरे भीतर से राग आदि समस्त दोष दूर हों और मुझे अपने शुद्ध आत्मस्वरूप अर्थात् परमात्म-पद की प्राप्ति हो।
यह पद पूरे आलोचना-पाठ की साधना का अंतिम लक्ष्य स्पष्ट करता है। अब हम संसार की किसी उपलब्धि की इच्छा नहीं करते। कहते हैं—
मुझे पद नहीं चाहिए।
मुझे विषय-सुख नहीं चाहिए।
मुझे ऐश्वर्य नहीं चाहिए।
मुझे चाहिए तो केवल— रागादिक दोषों का क्षय और अपने शुद्ध आत्मस्वरूप की प्राप्ति।
यहाँ “परमात्म निज पद” अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैन दर्शन में प्रत्येक जीव की आत्मा में अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत शक्ति की संभावना मानी जाती है। कर्मों और कषायों के कारण आत्मा का यह शुद्ध स्वरूप आवृत है। जब कर्मों का क्षय होता है, तब आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त करती है। इसलिए यहाँ माँगी गई सबसे बड़ी उपलब्धि मोक्ष है, न कि स्वर्ग, इंद्रपद या सांसारिक सुख।
दोहा
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