राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 360 | श्लोक 361 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 391| श्लोक 392 से 401 | श्लोक 402 से 412
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 413 to 421
श्लोक ( Shlok ) 413
सोपि पापः स्वयं क्रोधादरुणीभूतवीक्षणः । उद्यमी पिण्डमाहतु प्रस्फुरद्दशनच्छदः ॥ ४१३ ॥
कर्मचारियोंकी बात सुनकर क्रोधसे राजाके नेत्र लाल हो जावेंगे और ओंठ फड़कने लगेगा। तदनन्तर वह स्वयं ही ग्रास छीननेका उद्यम करेगा ॥ ४१३ ॥
“Hearing the words of his employees, the king’s eyes will turn red with rage and his lips will tremble. Immediately after, he will set out himself to forcefully seize the morsel of food from the monks. ॥ 413 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 414
सोढुं तदक्षमः कश्चिदसुरः शुद्धदृक्तदा । हनिष्यति तमन्यायं शक्तः सन् सहते न हि ॥ ४१४ ॥
उस समय शुद्ध सम्यग्दर्शनका धारक कोई असुर यह सहन नहीं कर सकेगा इसलिए राजाको मार देगा सो ठीक ही है क्योंकि शक्तिशाली पुरुष अन्यायको सहन नहीं करता है ॥ ४१४ ।।
“At that moment, a certain Asura (celestial being) who possesses pure right conviction (Shuddha Samyagdarshana) will be unable to tolerate this atrocity and will slay the king. And this is only fitting, for a powerful being does not tolerate injustice. ॥ 414 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 415
सोऽपि रनप्रभां गत्वा सागरोपमजीवितः । चिरं चतुर्मुखो दुःखं लोभादनुभविष्यति ॥ ४१५ ॥
यह चतुर्मुख राजा मरकर रत्नप्रभा नामक पहली पृथिवीमें जावेगा, वहाँ एक सागर प्रमाण उसकी आयु होगी और लोभ-कषायके कारण चिरकाल तक दुःख भोगेगा ॥ ४१५ ॥
“Upon his death, this King Chaturmukha will descend into Ratnaprabha, the first hellish realm (earth). There, his lifespan will be the duration of one Sagara (an immense cosmic time unit), and due to his vice of intense greed, he will endure suffering for a very long time. ॥ 415 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 416
धर्मनिर्मूलविध्वंसं सहन्ते न प्रभावुकाः । नास्ति सावद्यलेशेन विना धर्मप्रभावना ॥ ४१६ ॥
प्रभावशाली मनुष्य धर्मका निर्मूल नाश कभी नहीं सहन कर सकते और कुछ सावद्य (हिंसापूर्ण) कार्यके बिना धर्म-प्रभावना हो नहीं सकती इसलिए सम्यग्दृष्टि असुर अन्यायीचतुर्मुख राजाको मारकर धर्मकी प्रभावना करेगा ॥ ४१६ ॥
“Influential people can never tolerate the absolute uprooting of righteousness (Dharma), and since the glorification of faith (Dharma-prabhavana) cannot occur without some forceful or violent (Savadhya) action in such circumstances, the right-faithful (Samyagdrishti) Asura will glorify the religion by slaying the unjust King Chaturmukha. ॥ 416 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 417
धर्मों माता पिता धर्मो धर्मख्खाताभिवर्धकः । धर्ता भवभृतां धर्मो निर्मले निश्चले पदे ॥ ४१७ ॥
इस संसारमें धर्म ही प्राणियोकी माता है, धर्म ही पिता है, धर्म ही रक्षक है, धर्म ही बढ़ानेवाला है, और धर्म ही उन्हें निर्मल तथा निश्चल मोक्ष पदमें धारण करनेवाला है ।। ४१७ ॥
“In this transmigratory world, Dharma (righteousness/the true religion) alone is the mother of all living beings, Dharma alone is the father, Dharma alone is the protector, Dharma alone is the nurturer, and Dharma alone is that which establishes them in the pure and unshakeable state of liberation (Moksha). ॥ 417 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 418
धर्मध्वंसे सतां ध्वंसस्तस्माद्धर्मद्रुहोऽधमान् । निवारयन्ति ये सन्तो रक्षितं तैः सतां जगत् ॥ ४१८॥
धर्मका नाश होनेसे सज्जनोंका नाश होता है इसलिए जो सज्जन पुरुष हैं वे धर्मका द्रोह करनेवाले नीच पुरुषोंका निवारण करते ही हैं और ऐसे ही सत्पुरुषोंसे सज्जन-जगत्की रक्षा होती है ॥ ४१८ ॥
“With the destruction of Dharma (righteousness), righteous people are also destroyed. Therefore, those who are truly noble individuals invariably restrain or eliminate the vile men who bear malice toward Dharma. It is indeed by such noble souls that the world of the righteous is protected. ॥ 418 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 419 – 420
निमित्तैरष्टधाप्रोक्तैस्तपोभिर्जनरञ्जनैः । धर्मोपदेशनैरन्यवादिदर्पातिशातनैः ॥ ४१९ ॥नृपचेतोहरैः श्रव्यैः काव्यैः शब्दार्थसुन्दरैः । सद्भिः शौर्येण वा कार्य शासनस्य प्रकाशनम् ॥ ४२० ॥
आठ प्रकारके निमित्तज्ञान, तपञ्चरण करना, मनुष्योंके मनको प्रसन्न करनेवाले धर्मोपदेश देना, अन्यवादियोंके अभिमानको चूर करना, राजाओंके चित्त-को हरण करनेवाले मनोहर तथा शब्द और अर्थसे सुन्दर काव्य बनाना, तथा शूरवीरता दिखाना-इन सब कार्योंके द्वारा सज्जन पुरुषोंको जिन-शासनकी प्रभावना करनी चाहिये ।। ४१९-४२० ।।
“Noble individuals ought to glorify the glorious path of the Jinas (Jina-Shasana) through all these deeds: demonstrating the eight types of prognostic knowledge (Nimitta-jnana), practicing rigorous austerities (Tapa), delivering spiritual discourses that delight the minds of humans, shattering the pride of opposing disputants, composing enchanting poetry rich in both sound and meaning that captivates the hearts of kings, and exhibiting true heroism. ॥ 419-420 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 421
चिन्तामणिसमाः केचित्प्रार्थितार्थप्रदायिनः । दुर्लभा धीमतां पूज्या धन्या धर्मप्रकाशकाः ॥ ४२१ ॥
चिन्तामणि रत्नके समान अभिलषित पदार्थोंको देकर धर्मकी प्रभावना करनेवाले, बुद्धिमानों के द्वारा पूज्य धन्य पुरुष इस संसारमें दुर्लभ हैं ।॥ ४२१ ॥
“Fortunate and noble souls who, like the wish-fulfilling Chintamani jewel, glorify the faith (Dharma) by granting all desired benefits, and who are worthy of worship by the wise, are exceedingly rare in this transmigratory world. ॥ 421 ॥”
श्लोक 422 से 430
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549 | चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 691
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 360 | श्लोक 361 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 391| श्लोक 392 से 401 | श्लोक 402 से 412
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