राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 383 to 401
श्लोक ( Shlok ) 383 – 386
ताभ्यां समप्राक्षीन्मन्त्रिणं कृत्य निर्णयम् । तत्रैवमङ्गदोऽवोचद्देव श्रेधा महीभुजः ॥ ३८३ ॥ लोभधर्मासुराद्धादिविजयान्ताभिधानकाः । प्रथमे दानमन्यस्मिन् सामान्त्ये भेददण्डने ॥ ३८४ ॥ नयज्ञैः कार्यसिद्धयर्थमित्युपायः प्रयुज्यते । अन्तिमो रावणस्तेषु नीचत्वात्क्रूरकर्मकृत् ॥ ३८५ ॥ भेददण्डौ प्रयोक्तव्यौ तत्चस्मिन्नीतिवेदिभिः । क्रमस्तथापि नोल्लङ्घयः साम तावत्प्रयुज्यताम् ॥ ३८६॥
तदनन्तर उन्होंने उन दोनोंके साथ-साथ मन्त्रीसे करने योग्य कार्यका निर्णय पूछा। उत्तर में अङ्गदने कहा कि हे स्वामिन् ! राजा तीन प्रकारके होते हैं- १ लोभ-विजय, २ धर्म-विजय और ३ असुर-विजय । नीतिके जानने-वाले विद्वान् अपना कार्य सिद्ध करनेके लिए, पहलेके लिए दान देना, दूसरेके साथ शान्तिका व्यवहार करना और तीसरेके लिए भेद तथा दण्डका प्रयोग करना यही ठीक उपाय बतलाते हैं। इन तीन प्रकारके राजाओंमें रावण अन्तिम असुरविजय राजा है। वह नीच होनेसे क्रूर कार्य करने-ब्राला है इसलिए नीतिज्ञ मनुष्योंको उसके साथ भेद और दण्ड उपायका ही यद्यपि प्रयोग करना चाहिये तो भी क्रमका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिए। सर्व प्रथम उसके साथ सामका ही प्रयोग करना चाहिए ।। ३८३-३८६ ।।
Thereafter, alongside both of them, he sought counsel regarding the course of action to be taken by the minister. In response, Angada said, “O Lord! Kings are of three distinct types:
- Lobha-vijaya (Those who conquer out of greed),
- Dharma-vijaya (Those who conquer through righteousness), and
- Asura-vijaya (Those who conquer through demonic cruelty).
Scholars well-versed in statecraft prescribe that to accomplish one’s objective, the appropriate means are: offering gifts (dana) for the first category, employing peaceful diplomacy (shanti) with the second, and deploying dissension (bheda) and punishment (danda) against the third. Among these three classes of rulers, Ravana belongs to the final category—the Asura-vijaya king. Being base by nature, he is prone to committing cruel deeds. Therefore, although men adept in diplomacy ought to employ only the strategies of dissension and punishment against him, the proper order of statecraft should not be bypassed. First and foremost, peaceful conciliation (sama) alone must be tried with him.” || 383-386 ||
श्लोक ( Shlok ) 387 – 388
कः सामवित्प्रयोक्तव्य इत्यस्मिन् सम्प्रधारणे । दक्षतादिगुणोपेता बहवः सन्ति भूचराः ॥ ३८७ ॥किन्तु नाकाशगामित्वसामर्थ्य तेषु विद्यते । तस्मात्सेनापतिः प्रेष्यस्त्वयायं नूतनः कृतः ॥ ३८८ ॥
यदि आप इसका निश्चय करना चाहते हैं कि ऐसा सामका जानने वाला कौन है जिसे वहाँ भेजा जावे ? तो उसका उत्तर यह है कि यद्यपि दक्षता – चतुरता आदि गुणोंसे सहित अनेक भूमिगोचरी राजा हैं परन्तु उनमें आकाशमें चलनेकी सामर्थ्य नहीं है इसलिए आपने जो यह नया सेनापति बनाया है इसे ही भेजना चाहिए ॥ ३८७-३८८ ॥
“If you wish to determine who possesses such mastery over the art of conciliation (sama) that he ought to be dispatched there, the answer is this: although there are many earth-bound kings endowed with competence, cleverness, and other virtues, they lack the capacity to traverse the skies. Therefore, you should send only this newly appointed commander of the army.” || 387-388 ||
श्लोक ( Shlok ) 389
दृष्टमार्गः पराधृष्यः सिद्धकार्यः श्रुतागमः । जात्यादिविद्यासम्पन्नः स्यादस्मात्कार्यनिर्णयः ॥ ३८९ ॥
इस अणुमान्ने मार्ग देखा है, इसे दूसरे दबा नहीं सकते, एक बार यह कार्य सिद्ध कर आया है, अनेक शास्त्रोंका जान-कार है तथा जाति आदि विद्याओंसे सहित है, इसलिए इससे कार्यका निर्णय अवश्य ही हो जावेगा ॥३८९॥
“This Hanuman has seen the path, cannot be subdued by others, has already successfully accomplished this task once before, is well-versed in numerous scriptures, and is endowed with the knowledge of lineages and other sciences; therefore, a successful resolution of the mission will most certainly be achieved through him.” || 389 ||
श्लोक ( Shlok ) 390 – 396
इत्येतदुपदेशेन मनोवेगाभिधानकम् । विजयं कुमुदाख्यानं ख्यातं रविगतिं हितम् ॥ ३९० ॥सहायीकृत्य सम्पूज्य कुमार भवतोऽपरः । कार्यवित्कार्यकृच्चास्ति नात्रेति श्लाघयनृपः ॥ ३९१॥पवमानात्मजं वाच्यस्त्वयैवं स विभीषणः । अत्र त्वमेव धर्मज्ञः प्राज्ञः कार्यविपाकवित् ॥ ३९२ ॥हितो लङ्केश्वरायास्मै सूर्यवंशाग्रिमाय च । सीताहरणमन्याय्यमाकल्पमयशस्करम् ॥ ३९३ ॥अपथ्यमिति संश्राव्य रावणं रतिमोहितम् । मोचनीया त्वया सीता तथा सति भवत्कुलम् ॥ ३९४ ॥त्वयैव रक्षितं पापादपायादपवादतः । इति सामोक्तिभिस्तस्मिन् स्वीकृते स्वीकृता द्विषः ॥ ३९५ ॥गोमिन्या सह सीतापि वेत्सि दूतोत्तमापरम् । त्वमेव कृत्यं निर्णीय द्विड्द्धृत्तं शीघ्रमेहि माम् ॥ ३९६॥
अङ्गदके इस उपदेशसे रामचन्द्रने मनोवेग, विजय, कुमुद और हितकारी रविगतिको सहायक बनाकर अणुमान् का आदर-सत्कार कर उनकी प्रशंसा करते हुए कहा कि हे कुमार ! यहाँ आपके सिवाय कार्यको जाननेवाला तथा कायको करनेवाला दूसरा नहीं है। राजा रामचन्द्रने अणुमान् से यह भी कहा कि तुम सर्वप्रथम विभीषणसे कहना कि इस लङ्का द्वीपमें आपही धर्मके जानकार हैं, विद्वान हैं और कार्यके परिपाक-फलको जाननेवाले हैं। लङ्काके ईश्वर रावण और सूर्यवंशके प्रधान रामचन्द्र दोनोंका हित करनेवाले हैं, इसलिए आप रावणसे कहिए- जो तू सीताको हरकर लाया है सो तेरा यह कार्य अन्यायपूर्ण है, कल्पान्तकाल तक अपयश करनेवाला है, तथा अहितकारी है। इस प्रकार रतिसे मोहित रावणको सुनाकर आप सीताको छुड़ा दीजिये । ऐसा करने पर आप अपने कुलकी पापसे, विनाशसे तथा अपवादसे स्वयं ही रक्षा कर लेंगे। इस प्रकारकी सामोक्तियोंसे यदि विभीषण वशमें हो गया तो शत्रु अपने वशमें ही समझिये । हे दूतोत्तम ! इतना ही नहीं, लक्ष्मीके साथ-साथ सीता भी आई हुई ही समझिए। इसके सिवाय और जो कुछ करने योग्य कार्य हों उनका तथा शत्रुके समाचारोंका निर्णय कर शीघ्र ही मेरे पास वापिस आओ ॥ ३९०-३९६ ॥
Upon hearing this counsel from Angada, Ramachandra appointed Manovega, Vijaya, Kumuda, and the benevolent Ravigati as assistants, and while honoring and praising Hanuman, he said, “O Prince! In this assembly, there is none other than you who understands the true nature of the mission and possesses the capability to execute it.”
King Ramachandra further instructed Hanuman, saying, “First and foremost, you must convey this to Vibhishana: ‘In this island of Lanka, you alone are the knower of righteousness, the learned one, and the one who understands the ultimate consequences and fruits of actions. You are the well-wisher of both Ravana, the lord of Lanka, and Ramachandra, the foremost of the Solar Dynasty. Therefore, you must tell Ravana that this act of his—the abduction of Sita—is utterly unjust, a source of infamy until the end of the eon (kalpa), and deeply ruinous. By conveying this to Ravana, who is utterly deluded by lust, you must secure the release of Sita. By doing so, you will, of your own accord, protect your lineage from sin, destruction, and dishonor.’
If Vibhishana is won over by such conciliation (samokti), then consider the enemy to be completely subdued. O exemplary messenger! Not only that, consider Sita, along with the goddess of prosperity (Lakshmi), to have already arrived. Furthermore, having ascertained whatever other actions need to be taken and having gathered intelligence regarding the enemy, return to me swiftly.” || 390-396 ||
श्लोक ( Shlok ) 397– 398
इत्यमुञ्चत्सहायैस्तै स कुमारः प्रणम्य तम् । गत्वाप्य सहसा लङ्कां ज्ञातो वीक्ष्य विभीषणम् ॥ ३९७ ॥रामभट्टारकेणाहं प्रेषितो भवदन्तिकम् । इति सप्रश्रयं सर्व तदुक्तं तमजीगमत् ॥ ३९८ ॥
इस प्रकार कह-कर रामचन्द्रने अणुमान्को सहायकोंके साथ बिदा किया। कुमार अणुमान् भी रामचन्द्रको नमस्कार कर गया और शीघ्र ही लङ्का पहुँच गया। वहाँ उसने सब समाचार जानकर विभीषणके दर्शन किये और विनयपूर्वक कहा कि ‘मैं राजा रामचन्द्रके द्वारा आपके पास भेजा गया हूँ’ ऐसा कहकर उसने, रामचन्द्रने जो कुछ कहा था वह सब बड़ी विनयके साथ विभीषणसे निवेदन कर दिया ॥३९७-३९८।।
Having spoken thus, Ramachandra took leave of Hanuman along with his assistants. Prince Hanuman, too, paid his obeisances to Ramachandra, departed, and swiftly reached Lanka. Having gathered all the necessary intelligence there, he obtained an audience with Vibhishana and humbly addressed him, saying, “I have been dispatched to you by King Ramachandra.” Having said this, he recounted to Vibhishana, with great humility, everything that Ramachandra had instructed him to convey. || 397-398 ||
श्लोक ( Shlok ) 399 – 400
इदं च स्वयमाहासौ स्वामिसन्देशहारिणम् । प्रापय त्वं खगाधीश मां तस्मै हितकारिणम् ॥ ३९९॥रामाभिप्रेतकार्यस्य त्वया सिद्धिस्तथासति । कार्यमेतत्तु मद्द्वारा विधातुं भवतो भवेत् ॥ ४०० ॥
साथ ही उसने अपनी ओरसे यह बात भी कही कि हे विद्याधरोंके ईश ! आप स्वामीका सन्देश लानेवाले तथा हित करनेवाले मुझको रावणके पास तक भेज दीजिये । आपसे रामचन्द्रके इष्ट-कार्यकी सिद्धि अवश्य हो जावेगी और ऐसा हो जानेपर यह कार्य मेरे द्वारा आपसे ही सिद्ध हुआ सीताको नहीं छोड़ता कहलावेगा ।। ३९९-४०० ॥
“Furthermore, speaking on his own behalf, he added, ‘O Lord of the Vidyadharas! Pray send me to Ravana, as I am the bearer of our Master’s message and a well-wisher. Through your intervention, the desired mission of Ramachandra will most certainly be accomplished; and when this is achieved, it will be proclaimed that this great task was accomplished by me through you alone.’ ” || 399-400 ||
श्लोक ( Shlok ) 401
त्वयोक्तोऽपि न चेत्सीतां विमुञ्चति स मन्दधीः । नापराधस्तवापुण्यः स्वयमेव विनंक्ष्यति ॥ ४०१ ॥
आपके द्वारा ऐसा कहे जानेपर भी वह मूर्ख यदिहै तो इसमें आपका अपराध नहीं है वह पापी अपने आप ही नष्ट होगा ॥ ४०१ ॥
“Even after you have spoken thus, if that foolish one still does not release Sita, then no blame whatsoever shall attach to you; that sinful soul will bring about his own destruction by his own actions.” || 401 ||
श्लोक 402 से 412
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