नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 72 – श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102 – 103
तदैव तं समुत्साह्य विहर्तुं ते वनं गताः । अग्निकुण्डं प्रदर्यास्य पतन्त्यस्मिन्नभीरवः ॥ १०२॥इत्याहुः सोऽपि तच्छ्रुत्वा न्यपततत्र निर्भयः । विचारयति धीमाँश्च न कार्य दैवचोदितः ॥ १०३ ॥
अथानन्तर- वे विद्युदंष्ट्र आदि पाँच सौ राजकुमार प्रद्युम्नको उत्साहित कर उसी समय विहार करनेके लिए बनकी ओर चल दिये। वहाँ जाकर उन्होंने प्रद्यम्नके लिए अग्निकुण्ड दिखाकर कहा कि जो इसमें कूदते हैं वे निर्भय कहलाते हैं। उनकी बात सुनकर प्रद्युम्न निर्भय हो उस अग्नि-कुण्ड में कूद पड़ा। सो ठीक ही है क्योंकि भाग्यसे प्रेरित हुआ बुद्धिमान् मनुष्य किसी कार्यका विचार नहीं करता ।। १०२-१०३ ॥
Thereafter, those five hundred princes, including Vidyuddanshtra, encouraged and egged Pradyumna on, setting out towards the forest at that very moment under the pretext of an excursion. Having arrived there, they pointed out a pit of fire to Pradyumna and said, “Those who leap into this are called truly fearless.” Hearing their words, Pradyumna became completely fearless and leapt into that pit of fire. And that is only fitting, for a wise man impelled by destiny does not hesitate or deliberate over any action. ॥ 102-103 ॥
श्लोक ( Shlok ) 104
देव्यैषोऽत्र निवासिन्या प्रतिगृह्याभिपूजितः । कनकाम्बरभूषादिदानेनास्माद्विनिर्ययौ ॥ १०४ ॥
उस कुण्डमें कूदते ही वहाँकी रहनेवाली देवीने उसकी अगवानी की तथा सुवर्णमय वस्त्र और आभूषणादि देकर उसकी पूजा की। इस तरह देवीके द्वारा पूजित होकर प्रद्युम्न उस कुंडसे बाहर निकल आया ॥ १०४॥
The moment he leapt into that pit, the resident goddess of the place welcomed him and worshipped him by presenting golden garments and ornaments. Thus honored and revered by the goddess, Pradyumna emerged safely from the pit. ॥ 104 ॥
श्लोक ( Shlok ) 105
तस्माद्विस्मयमापन्ना गत्वा तेऽन्यत्र तं पुनः । प्रोत्साह्य मेषभूभोर्मध्यं प्रावेशयन्खलाः ॥ १०५ ॥
इस घटनासे उन सबको आश्चर्य हुआ तदनन्तर वे दुष्ट उसे उत्साहितकर फिरके चले और मेष के आकार के दो पर्वतों के बीचमें उसे घुसा दिया ॥ १०५ ॥
Everyone was astonished by this incident. Thereafter, those wicked princes egged him on further and led him along, ultimately pushing him between two mountains shaped like rams. ॥ 105 ॥
श्लोक ( Shlok ) 106 – 110
पर्वतौ मेषरूपेण पतन्तौ भुजशालिनम् । तन्निरुध्य स्थितं दृष्ट्वा तुष्टा तद्गतदेवता ॥ १०६ ॥तस्मै दिव्ये ददौ रत्नकुण्डले मकराङ्किते । ततो निर्गतवान्भूयस्तन्निर्देशाद्विशन् बिलम् ॥ १०७ ॥ वराहाद्रेरसावुग्रमापतन्तं वराहकम् । करेणैकेन दंष्ट्रायां धृत्वान्येनास्य मस्तकम् ॥ १०८ ॥ प्रहृत्य हेलया तस्थौ तस्यासाधारणेहितम् । समीक्ष्य देवतात्रस्था रुग्मिणीप्रियसूनवे ॥ १०९ ॥ शङ्ख विजयघोषाख्यं महाजालमपि द्वयम् । ददाति स्म सपुण्यानां क वा लाभो न जायते ॥ ११० ॥
वहाँ दो पर्वत मेषका आकार रख दोनों ओर से उस पर गिरने लगे तब भुजाओंसे सुशोभित प्रद्युम्न्न उन दोनों पर्वतोंको रोककर खड़ा हो गया। यह देख वहाँ रहनेवाली देवीने संतुष्ट होकर उसे मकरके चिह्नसे चिह्नित रत्नमयी दो दिव्य कुण्डल दिये। वहांसे निकलकर प्रद्युम्न, भाइयोंके आदेशानुसार बराह पर्वतकी गुफामें घुसा। वहाँ एक वराह नामका भयंकर देव आया तो प्रद्युम्नने एक हाथसे उसकी दाढ़ पकड़ ली और दूसरे हाथसे उसका मस्तक ठोकना शुरू किया इस तरह वह दोनों जबड़ोंके बीचमें लीलापूर्वक खड़ा हो गया। रुक्मिणीके पुत्र प्रद्युम्नकी चेष्टा देखकर वहां रहनेवाली देवीने उसे विजयघोष नामका शङ्ख और महाजालमें दो वस्तुएँ दी। सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यात्मा जीवोंको कहाँ लाभ नहीं होता है ? ।। १०६-११० ।।
There, the two mountains, taking the shape of rams, began to crash down upon him from both sides. Then Pradyumna, adorned with powerful arms, stood firm and held both mountains back. Seeing this, the resident goddess of that place was pleased and gifted him two divine, gem-studded earrings marked with the symbol of a crocodile (makara).
Emerging from there, Pradyumna, following the instructions of his brothers, entered the cave of the Varaha Mountain. There, a fearsome deity named Varaha appeared; Pradyumna seized his tusk with one hand and began to strike his head with the other. In this manner, he stood playfully right between the two jaws.
Beholding this feat of Rukmini’s son, Pradyumna, the resident goddess of that place presented him with a conch named Vijayaghosha and two valuable objects wrapped in a great net. And that is only fitting, for where do meritorious and virtuous souls not find success and gain? ॥ 106-110 ॥
श्लोक ( Shlok ) 111
तथा कालगुहायाञ्च महाकालाख्यराक्षसात् । वृषभाख्यं रथं रत्नकवर्च चाप निर्जितात् ॥ १११ ॥
इसी तरह उसने काल नामक गुहामें जाकर महाकाल नामक राक्षसको जीता और उससे वृषभ नामका रथ तथा रत्नमय कवच प्राप्त किया ।॥ १११ ॥
In the same manner, he entered the cave named Kala, conquered the demon named Mahakala, and obtained from him a chariot named Vrishabha along with gem-studded armor. ॥ 111 ॥
श्लोक 112 से 123
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नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
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