राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाका पुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 201 to 213
श्लोक ( Shlok ) 201 – 206
दीक्षां गृहीतुमुद्युक्तो मात्रा पित्रा च वारितः । प्रविश्य नगरं जातसंविदप्रासुकाशनम् ॥ २०१ ॥नाहमाहारयामीति कुमारोऽकृत निश्चितिम् । तद्वार्ताश्रवणाद्भूयो यः कश्चिद्भोजयत्यमुम् ॥ २०२ ॥तस्मै ‘सम्प्रार्थितं दास्यामीति संसद्यघोषयत् । तद्ज्ञात्वा दृढवर्माख्यः सप्तस्थानसमाश्रयः ॥ २०३ ॥श्रावकः समुपेत्यैनं कुमार, ज्ञातिशत्रवः । तवैते स्वपरध्वंसकोविदाः पापहेतवः ॥ २०४ ॥भावसंयमविध्वस्तिमकृत्वा प्रासुकाशनैः । करिष्ये भद्र पर्युष्टिमविमुक्तस्य बन्धुभिः ॥ २०५ ॥दुर्लभा संयमे वृत्तिरित्यवोचद्धितं वचः । सोऽपि मत्वा तदाचाम्लनिर्विकृत्य रसाशनः ॥ २०६ ॥
वह दीक्षा लेनेके लिए तैयार हुआ परन्तु माता-पिताने उसे रोक दिया। जिसे आत्म-ज्ञान प्रकट हुआ है ऐसा वह कुमार यद्यपि नगरमें गया तो भी उसने निश्चय कर लिया कि मैं अप्रासुक आहार नहीं ग्रहण करूँगा। यह बात सुनकर राजाने सभामें घोषणा कर दी कि जो कोई कुमारको भोजन करा देगा मैं उसे इच्छानुसार धन दूँगा। राजाकी यह घोषणा जानकर सात धर्मक्षेत्रोंका आश्रयभूत दृढवर्मा नामक श्रावक कुमारके पास आकर कहने लगा कि है कुमार ! अपने और दूसरेके आत्माको नष्ट करनेमें पण्डित तथा पापके कारण ये कुटुम्बी लोग तेरे शत्रु हैं इसलिए हे भद्र ! भाव-संयमका नाश नहीं कर प्रासुक भोजनके द्वारा मैं तेरी सेवा करूँगा। जो परिवारके लोगोंसे विमुक्त नहीं हुआ है अर्थात् उनके अनुरागमें फँसा हुआ है उसकी संयममें प्रवृत्ति होना दुर्लभ है, इस प्रकार हितकारी वचन कहे। कुमारने भी उसकी बात मानकर निर्विकार आचाम्ल रसका आहार किया ।। २०१-२०६ ।।
“He prepared himself to take initiation (Diksha), but his parents restrained him. Although the prince, in whom self-knowledge had awakened, returned to the city, he firmly resolved, ‘I shall not consume any impure or unhallowed (Apra-suk) food.’ Upon hearing this, the king made a proclamation in the royal court: ‘Whosoever manages to feed the prince, I shall bestow upon them wealth according to their heart’s desire.’
Aware of the king’s proclamation, a devout householder (Shravak) named Dridhavarma—who was a sanctuary for the seven fields of righteousness (Dharma-kshetra)—approached the prince and spoke these beneficial words: ‘O Prince! These family members are actually your enemies, for they are expert only in destroying their own souls as well as those of others, and serve as causes for sin. Therefore, O noble one, without letting your internal self-restraint (Bhava-sanyam) be destroyed, I shall serve you by providing pure, hallowed (Prasuk) food. For one who has not freed themselves from family members—that is, one who remains entangled in attachment to them—it is exceedingly difficult to progress in self-restraint.’
Accepting his words, the prince partook of the simple, unblemished food consisting of pure sour gruel (Achamla-rasa). || 201-206 ||”
श्लोक ( Shlok ) 207 – 213
दिव्यस्रीसन्निधौ स्थित्वा सदाविकृतचेतसा । तृणाय मन्यमानस्तास्तपो द्वादशवत्सरान् ॥ २०७ ॥चरनिव निशातासिधारायां सम्प्रवर्तयन् । सन्न्यस्य जीवितप्रान्ते कल्पे ‘ब्रह्मेन्द्रनामनि ॥ २०८ ॥विद्युन्माल्येष देवोऽभूद्देहदीप्त्याप्तदिक्तटः । इत्यथ श्रेणिकप्रश्नादिदं वोवाच गौतमः ॥ २०९॥विद्युन्मालिन एवामूर्देग्योऽत्रैत्येभ्यपुत्रिकाः । जम्बूनाम्नश्चतस्त्रोऽपि भार्यास्तेनाप्य संयमम् ॥ २१० ॥सहान्त्यकल्पे भूत्वेह यास्यन्ति परमं पदम् । गत्वा सागरदत्ताख्यो दिवमत्रैत्य निर्वृतिम् ॥ २११ ॥जम्बूनान्नो गृहत्यागसमये यास्यतीत्यपि । सर्वमेतद्गुणाधीशनायकव्याहृतं मुदा ॥ २१२ ॥निशम्य मगधाधीशो जिनं तं चान्ववन्दत । मानयन्ति न के सन्तः श्रेयो मार्गोपदेशिनम् ॥ २१३ ॥
वह यद्यपि सुन्दर स्त्रियोंके समीप रहता था तो भी उसका चित्त कभी विकृत नहीं होता था वह उन्हें तृणके समान तुच्छ मानता था। इस तरह उसने बारह वर्ष तक तीक्ष्ण तलवारकी धारापर चलते हुएके समान कठिन तप धारणकर आयुके अन्त समयमें संन्यास धारंण किया जिसके प्रभावले ब्रह्मस्वर्गमें यह अपने शरीरकी कान्तिसे दिशाओंको व्याप्त करता हुआ विद्युन्माली देव हुआ है। यह कथा कहनेके बाद राजा श्रेणिकके पूछनेपर गौतम गणधर फिर कहने लगे कि इस विद्युन्माली देवकी जो स्त्रियाँ हैं वे सेठोंकी पुत्रियाँ होकर जम्बू-कुमारकी चार स्त्रियाँ होंगी और उसीके साथ संयम धारण कर अन्तिम स्वर्गमें उत्पन्न होंगी तथा वहाँ से आकर मोक्ष प्राप्त करेंगी। सागरदत्तका जीव स्वर्ग जावेगा, फिर वहाँ से आकर जम्बूकुमार-की दीक्षा लेनेके समय मुक्त होगा। इस प्रकार गणधरोंमें प्रधान गौतम स्वामीके द्वारा कही हुई यह सब कथा सुनकर मगधदेशका स्वामी राजा श्रेणिक बहुत ही प्रसन्न हुआ। अन्तमें उसने वर्धमान स्वामी और गौतम गणधर दोनोंको नमस्कार किया सो ठीक ही है क्योंकि ऐसे कौन सज्जन हैं जो कि कल्याण मार्गका उपदेश देने वालेको नहीं मानते हों-उसकी विनय नहीं करते हों।। २०७-२१३।।
“Although he lived in the close presence of beautiful women, his mind was never corrupted; he considered them as insignificant as a blade of grass. In this manner, having practiced rigorous austerities for twelve years—akin to walking on the sharp edge of a sword—he embraced the vow of ritual renunciation (Sannyasa) at the end of his lifespan. By the virtue of this, he has now become the deity Vidyunmali in the Brahma heaven, illuminating all directions with the radiance of his body.
After narrating this story, upon being questioned by King Shrenika, the chief disciple Gautama Ganadhara continued speaking: ‘The celestial consorts of this deity Vidyunmali will be reborn as the daughters of wealthy merchants, becoming the four wives of Jambukumar. Embracing self-restraint (Sanyam) along with him, they will be reborn in the highest heaven, and returning from there, they will ultimately attain liberation (Moksha). The soul of Sagardatta will also ascend to heaven, and returning from there, will attain liberation at the time of Jambukumar’s initiation.’
Hearing all this history expounded by Gautama Swami, the foremost among the Ganadharas, King Shrenika, the ruler of the Magadha kingdom, was filled with profound joy. At last, he bowed in reverence to both Lord Vardhamana and Gautama Ganadhara. And this is only fitting, for what noble being is there who would not revere and pay homage to those who bestow instructions on the path of ultimate well-being? || 207-213 ||”
श्लोक 214 से 221
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
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