पहली ढाल छंद 3 – ग्रन्थ की प्रामाणिकता और निगोद के दुःख
तास भ्रमण की है बहु कथा, पै कछु कहूँ कही मुनि यथा।
काल अनन्त निगोद मँझार, बीत्यो एकेन्द्री-तन धार ॥3 ॥
अन्वयार्थ (तास) उस संसार में, (भ्रमण की) भटकने की (कथा) कहानी (बहु) बड़ी (है) है (पै) तो भी (यथा) जैसी (मुनि) पूर्वाचार्यों ने (कही) कही है “तथा” उसी प्रकार “मैं भी” (कछु) थोड़ी-सी (कहूँ) कहता हूँ [कि इस प्राणी का] (निगोद मँझार) निगोद में (एकेन्द्री) एकेन्द्रिय जीव का (तन) शरीर (धार) धारण करके (अनन्त) अनन्त (काल) काल (बीत्यो) पूर्ण हुआ है।
अर्थ –
“तास” यानी उस, “भ्रमण” यानी संसार के भ्रमण की। “है बहु कथा” — कथा यानी कहानी, जो कि बहुत बड़ी है। इस जीव के संसार में भटकने की बहुत लम्बी कहानी है। उस संसार भ्रमण की कथा बहुत विस्तृत है। अनादि काल से यह जीव भ्रमण कर रहा है, कहाँ तक बताएँ? फिर भी “कछु कहूं” — कुछ कहता हूँ। पंडित दौलत राम जी कह रहे हैं कि उस संसार भ्रमण की कथा तो बहुत है, “पे” यानी फिर भी, “कछु कहूं” — कुछ कहता हूँ। “कही मुनि यथा” — जिस प्रकार मुनियों के द्वारा कही गई है, वैसी ही मैं कुछ कहता हूँ।
पुनः देखें — “तास” यानी उस संसार भ्रमण की कथा बहुत है। अनादि काल से इस जीव ने भ्रमण किया है; कहाँ-कहाँ भ्रमण किया, कैसे-कैसे दुख पाए, कहाँ तक कहा जाए? अगर कहेंगे तो कोई भी पूरा कहने में समर्थ नहीं है। इसलिए उस संसार भ्रमण की कथा बहुत है, फिर भी मैं उसमें से थोड़ी सी बात कहता हूँ — जैसी आचार्यों और मुनि महाराजों ने कही है, अपनी मनमर्जी से नहीं। अगर दौलत राम जी मनमर्जी से लिखते, तो हम उसे प्रमाण नहीं मानते। हमारे लिए प्रमाण कौन हैं? सर्वज्ञ देव। उनकी आज्ञा, उनकी वाणी और उनकी दिव्य-ध्वनि के अनुसार लिखने वाले आचार्य तथा उन आचार्यों की परंपरा के अनुसार लिखने वाले आचार्य ही प्रमाण हैं। इसीलिए दौलत राम जी लिख रहे हैं कि जैसी आचार्यों ने कही है, वैसी ही कहता हूँ। तो भी कुछ (थोड़ी सी) जैसी पूर्व में मुनिजनों ने कही है वैसी ही मैं (कवि) कहता हूँ। इस जीव ने निगोद में एक इन्द्रिय का शरीर धारण करके अनन्तकाल बिताया है।
अब हमारे संसार भ्रमण की कथा शुरू होती है — “काल अनंत निगोद मझार”। इस जीव ने अनंत काल तो निगोद में बिताया है। “मझार” यानी में। कैसे बिताया है? एकेंद्रिय का शरीर धारण करके।
अगर हम यह कहें कि हमारा मुख्य स्थान (हेड ऑफिस) कौन सा है, तो हम कहेंगे — एकेंद्रिय, और उसमें भी निगोद। क्यों? क्योंकि हर आत्मा ने — केवल मैंने या आपने ही नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव ने — सबसे अधिक समय कहाँ गुजारा है? निगोद में। कितना समय गुजारा? अनंत काल। अन्य गतियों या पर्यायों में अनंत काल का निरंतर समय नहीं बनता; वहाँ अलग-अलग समय-सीमा दी गई है कि इतने समय के बाद वह पर्याय छोड़नी पड़ेगी। परंतु निगोद में अनंत काल तक रहा जा सकता है। तो क्या कह रहे हैं? इस जीव ने एकेंद्रिय का शरीर धारण करके अनंत काल निगोद में ही बिताया है।
हमारी शुरुआत कहाँ से हुई? हम अनंत काल तक निगोद में रहे और वहीं से हमारा संसार भ्रमण प्रारंभ हुआ।
निगोद किसे कहते हैं?
‘निगोद’ शब्द को देखिए — ‘नि’ और ‘गोद’। ‘नि’ यानी निरे, अर्थात बहुत सारे जीव जहाँ एक ही गोद में रहते हों। शरीर एक हो और उसमें जहाँ अनंतानंत आत्माएँ रहती हों, उन्हें हम निगोद कहते हैं। निगोद का सीधा अर्थ है — जहाँ एक शरीर में अनंत जीव जन्म लेते हैं, अनंत जीव श्वासोच्छवास (साँस) लेते हैं और अनंत जीव मरण करते हैं, उन्हें हम निगोदिया जीव कहते हैं।
छंद 4 – निगोद के दुःख और वहाँ से निकलने का क्रम
एक श्वास में अठदस बार, जन्म्यो मरयो भरयो दुखभार।
निकसि भूमि जल पावकभयो, पवन प्रत्येक वनस्पति थयो ॥ 4 ॥
अन्वयार्थ “निगोद में यह जीव” (एक श्वास में) एक श्वास में (अठदसबार) अठारह बार (जन्म्यो) पैदा हुआ (मरयो) मरा और (दुख भार) दुःखों का समूह (भरयो) सहा [और वहाँ से] (निकसि) निकल कर (भूमि) पृथ्वीकायिक जीव (जल) जलकायिक जीव (पावक) अग्निकायिक जीव (पवन) वायुकायिक जीव और (प्रत्येक वनस्पति) प्रत्येक वनस्पतिकायिक जीव (थयो) हुआ।
अर्थ – आइए देखें — “एक स्वास में” — यहाँ ‘स्वास’ (साँस) का अर्थ नाड़ी (नाड़ी-स्पंदन/धड़कन) से है। जब तक नाड़ी एक बार धड़कती है, उसे एक ‘साँस’ कहा जाता है। इसे सामान्य श्वास-उच्छ्वास मत मानिएगा। “अठ-दस” यानी अठारह (१८) बार। नाड़ी की एक धड़कन में १८ बार जब यह जीव निगोद अवस्था में था, तब इसने वहाँ जन्म लिया और मरण किया। और क्या किया? “भर्यो” यानी सहा, “दुख भार” यानी दुखों के बहुत बड़े बोझे को, कष्टों को सहा। निगोद में इस जीव ने एक श्वास मात्र (एक मुहूर्त जो दो घड़ी अर्थात् 48 मिनिट का होता है और जिसके 3773 श्वास होते हैं उनमें यह जीव 66336 बार जन्म-मरण करता है) एक श्वास में अठारह बार जन्म और मरण करता हुआ, दुःख के बोझ को सहता हुआ,
“निकसी” यानी जब निगोद पर्याय से बाहर निकला, तो किसमें गया? “भूमि” यानी पृथ्वीकाय बना, “जल” यानी जलकाय बना, “पावक” यानी अग्निकाय बना, “भयो” यानी हुआ, “पवन” यानी वायुकाय हुआ, और “प्रत्येक वनस्पति थयो” यानी प्रत्येक वनस्पति के रूप में उत्पन्न हुआ।
निगोद से निकलकर यह जीव पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय और प्रत्येक वनस्पति में पैदा हुआ। यह क्या चल रहा है? यह हमारे और आपके संसार-भ्रमण की कथा है। हम कहाँ-कहाँ भटके, कैसे-कैसे भटके — यह उसी की कहानी है। शास्त्र पढ़ना है और उसका चिंतन स्वयं पर करना है कि “हे आत्मन्! तुम कहाँ-कहाँ भटके हो?”
देखिए, पहली चौपाई में जो हमने पढ़ा, उसमें था कि जीव निगोद में पैदा हुआ। निगोद में उसने क्या किया? नाड़ी की एक धड़कन (एक साँस) में १८ बार जन्म लिया और १८ बार मरण किया तथा दुखों के भार को सहा। जन्म लेने और मरने में कितना दुख होता होगा, यह तो निगोदिया जीव ही जाने। यदि हम गणना (कैलकुलेशन) करते हैं, तो पता चलता है कि एक निगोदिया जीव को एक बार जन्म लेने और मरण करने में १/२४ (एक बटा चौबीस) सेकंड लगता है। अर्थात आपकी घड़ी जब तक एक सेकंड में एक बार ‘टिक’ करती है, तब तक उसके २४ जन्म और २४ मरण हो चुके होते हैं। सोचिए तो सही, कितना अल्प समय है! परंतु निगोदिया जीवों का जन्म-मरण ऐसे ही होता है।
छंद 5 व 6
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