आलोचना पाठ – छंद 20 व 21 : अर्थ एवं व्याख्या
हा हा ! मैं अदयाचारी, बहु हरित काय जु विदारी
तामधि जीवन के खंदा, हम खाए धरी आनंदा ॥20॥
शब्दार्थ
- हा हा! — गहरा पश्चात्ताप।
- अदयाचारी — दया रहित आचरण करने वाला।
- हरित काय — हरी वनस्पति-काय।
- विदारी — तोड़ी, फाड़ी, नष्ट की।
- तामधि — उनमें।
- जीवन के खंदा — जीवों के समूह/समुदाय।
- आनंदा — प्रसन्न होकर।
हाय! हाय! मैं दया से रहित आचरण करने वाला हूँ। मैंने बहुत-सी हरी वनस्पतियों को तोड़ा और नष्ट किया, मैंने बहुत वनस्पति कायिक जीवों की भी हिंसा की है। या मधि जीवन के खंदा, मैंने ऐसे जहाँ पर कि जीवों के समूह रहते हैं, ऐसी-ऐसी वनस्पतियों को मैंने आनंदपूर्वक खाया और उपयोग किया। जैसे हम जो आलू खाते हैं या और भी वनस्पति जिसमें कि बहुत जीवों की हिंसा होती है, तो मैंने उनको भी बहुत हर्षित होकर खाया है।
यहाँ वनस्पति के प्रति अपनी असावधानी की आलोचना करते हैं। हरित काय अर्थात् हरी वनस्पति को जैन दर्शन में जीवधारी माना गया है। कहते हैं कि अनेक हरी वनस्पतियों को मैंने
- तोड़ा,
- काटा,
- नष्ट किया,
- और फिर उनसे प्राप्त पदार्थों को आनंदपूर्वक ग्रहण किया।
इसमें अपने भीतर का विरोधाभास दिखाई देता है एक ओर जीवों के प्रति करुणा की कमी, दूसरी ओर उन्हीं जीवों से प्राप्त पदार्थों का आनंदपूर्वक उपयोग। इसलिए स्वयं को “अदयाचारी” कहते हैं।
यह पद केवल वनस्पति न तोड़ने की बात नहीं करता, बल्कि उपभोग के पीछे छिपी जीव-दृष्टि को सामने लाता है। मनुष्य जब किसी वस्तु को केवल “सामान” समझकर उपयोग करता है, तो उसके पीछे मौजूद जीवन और प्रकृति को भूल सकता है। इसी भूल के लिए आत्मालोचना करते हैं।
छंद 21
हा हा ! परमाद बसाई, बिन देखे अगनि जलाई
तामध्य जीव जे आये, ते हू परलोक सिधाये ॥21॥
शब्दार्थ
- हा हा! — गहरा पश्चात्ताप।
- परमाद/प्रमाद — असावधानी, जागरूकता का अभाव।
- बिन देखे — बिना जाँच-पड़ताल किए।
- अगनि — अग्नि।
- तामध्य — उसके भीतर।
- जीव जे आये — जो जीव उसमें आ गए।
- परलोक सिधाये — मृत्यु को प्राप्त हुए।
हाय! हाय! प्रमाद बसाई, मैंने प्रमाद के वश होकर के ‘बिन देखे अग्नि जलाई‘, मैंने बिना देखे-शोधे अग्नि को जलाया। यानी कि जब हम गैस आदि जलाते हैं, तो हमें पहले उसको शोधन करना चाहिए कि कहीं पर कोई जीव आदि तो नहीं है। तो मैंने वह सब शोधन नहीं किया और बिन देखे मैंने अग्नि को जला दिया। ता मध्य जीव जे आये, उसके मध्य में जितने जीव आये, ते हू परलोक सिधाये, वह सब परलोक को सिधाये, यानी उनकी हिंसा हुई। तो इस तरह से अग्निकायिक जीवों की भी मैंने बहुत हिंसा की है।
इस पद में अग्नि के उपयोग में सावधानी के अभाव को अपनी आलोचना का विषय बनाते हैं। जैन दर्शन में अग्नि को भी जीवों से संबंधित माना गया है। इसलिए अग्नि का उपयोग करते समय अनावश्यक हिंसा से बचने के लिए जागरूकता अपेक्षित है।
“बिन देखे अगनि जलाई” का मुख्य भाव है कि पहले यह विचार नहीं किया कि अग्नि जलाने से किसी जीव को नुकसान तो नहीं होगा।यहाँ “प्रमाद” विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। कवि यह नहीं कहते कि मैंने जानबूझकर जीवों को मारने के लिए आग लगाई; बल्कि वे स्वीकार करते हैं कि असावधानी के कारण भी हिंसा हुई। अहिंसा के लिए केवल हिंसा न करने की इच्छा पर्याप्त नहीं है। जागरूकता और सावधानी भी अहिंसा का आवश्यक अंग है।
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