मेरी भावना – छंद 2: व्याख्या और अर्थ
विषयों की आशा नहीं जिनके, साम्य भाव धन रखते हैं, निज-पर के हित साधन में जो निशदिन तत्पर रहते हैं ।
स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं, ऐसे ज्ञानी साधु जगत के दुख-समूह को हरते हैं ॥2॥
कविवर पंडित जुगलकिशोर जी मुख्तार इस पंक्ति में एक आदर्श साधक और विशेष रूप से वीतराग दिगम्बर मुनिराज के प्रथम लक्षण का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि सच्चे साधु वे हैं जिनके मन में विषयों की आशा, अर्थात् पाँचों इन्द्रियों के सुखों की कोई इच्छा शेष नहीं रहती।
विषयों की आशा क्या है?
‘विषय’ का अर्थ है वे सभी भोग, जिन्हें हमारी पाँच इन्द्रियाँ अनुभव करती हैं। मनुष्य का अधिकांश जीवन इन्हीं पाँच इन्द्रियों के सुख-दुःख में उलझा रहता है।
पाँच इन्द्रियाँ हैं—
- स्पर्शन (त्वचा) – स्पर्श का अनुभव करना।
- रसना (जिह्वा) – स्वाद का अनुभव करना।
- घ्राण (नाक) – सुगंध और दुर्गंध का अनुभव करना।
- चक्षु (आँख) – रूप और रंग को देखना।
- कर्ण (कान) – शब्दों को सुनना।
इन पाँचों इन्द्रियों के अपने-अपने विषय हैं।
स्पर्शन इन्द्रिय को ठंडा-गरम, कोमल-कठोर, चिकना-रूखा, हल्का-भारी जैसे स्पर्श चाहिए। हमारा मन इन्हीं अनुभवों में उलझा रहता है।
रसना इन्द्रिय स्वाद के पीछे दौड़ती रहती है। अनेक बार मनुष्य केवल स्वाद की आसक्ति के कारण अपने स्वास्थ्य तक को बिगाड़ लेता है। मिठाइयाँ, चाट, पकौड़ी या अन्य स्वादिष्ट पदार्थों के प्रति आकर्षण इसी रसना की अधीनता का परिणाम है।
घ्राण इन्द्रिय सुगंध की ओर आकर्षित होती है और दुर्गंध से दूर भागती है।
चक्षु इन्द्रिय सुंदर दृश्य देखना चाहती है, जबकि कर्ण इन्द्रिय मधुर और मनभावन शब्द सुनना चाहती है।
जैन दर्शन में पाँचों इन्द्रियों के 27 विषय बताए गए हैं। जब इनके साथ मन को भी जोड़ दिया जाता है, तब कुल 28 प्रकार के विषय हो जाते हैं। सामान्य मनुष्य का जीवन इन्हीं अट्ठाईस विषयों की इच्छाओं, अपेक्षाओं और आसक्तियों के इर्द-गिर्द घूमता रहता है।
किन्तु वीतराग मुनिराज इन सभी विषयों की कामना से पूर्णतः रहित होते हैं। उन्हें न ठंड की चाह है, न गर्मी का भय। न स्वाद का आकर्षण है, न दुर्गंध से घृणा। न सुंदर दृश्य का मोह है, न मधुर शब्दों की लालसा। पाँचों इन्द्रियों के विषय उनके लिए समान हो जाते हैं। यही उनके वीतराग जीवन का प्रथम लक्षण है।
साम्य भाव ही उनका वास्तविक धन है
कविवर आगे कहते हैं—
“साम्य भाव धन रखते हैं।”
संसार में धन का अर्थ होता है रुपया, संपत्ति, वैभव और अधिकार। परन्तु मुनिराज के पास इनमें से कुछ भी नहीं होता। उनका एकमात्र धन है—साम्य भाव।
साम्य भाव अर्थात् समता, समदृष्टि और सबके प्रति समान परिणाम।
ऐसे महापुरुष के लिए न कोई ऊँचा है, न कोई नीचा। न मिट्टी और सोने में कोई विशेष अंतर है, न सुंदर और असुंदर में। न अमीर और गरीब में भेद है, न महलों और श्मशान में। जहाँ समता आ जाती है, वहाँ सभी प्रकार के भेद स्वतः समाप्त हो जाते हैं। उनकी दृष्टि में प्रत्येक जीव आत्मा है और प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की समान क्षमता विद्यमान है। कोई आत्मा साधना में आगे है, कोई पीछे; परन्तु आत्मस्वरूप की दृष्टि से सभी समान हैं। प्रत्येक जीव में ज्ञान, दर्शन और वीर्य की अनन्त शक्ति विद्यमान है। यही समदृष्टि साम्य भाव कहलाती है।
समता का अद्भुत उदाहरण
जैन साहित्य में समता का एक अत्यन्त प्रेरणादायक प्रसंग आता है। एक ओर राजा श्रेणिक के सैनिक ने यशोधर मुनिराज के गले में सर्प डालकर उपसर्ग किया। दूसरी ओर महारानी चेलना ने वही सर्प हटाकर उनकी रक्षा की। एक ने कष्ट पहुँचाया और दूसरे ने कष्ट दूर किया। किन्तु जब दोनों मुनिराज के सामने पहुँचे, तब मुनिराज ने दोनों को समान भाव से आशीर्वाद दिया। उनके मन में न उपसर्ग करने वाले के प्रति क्रोध था और न उपसर्ग हटाने वाले के प्रति विशेष अनुराग।
यही साम्य भाव है।
राजा श्रेणिक यह दृश्य देखकर भीतर तक द्रवित हो गए। उन्होंने विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया कि उन्हें अपनी भूल का वास्तविक अनुभव आज हुआ है। मुनिराज की समता ने उनके हृदय को बदल दिया। सच्ची समता वही है, जो मित्र और शत्रु, सम्मान और अपमान, लाभ और हानि, सुख और दुःख—सभी परिस्थितियों में समान बनी रहे।
साधना का संदेश
यह पंक्ति हमें आत्मचिन्तन का अवसर देती है। हमें स्वयं से पूछना चाहिए—
- क्या मैं स्वाद का दास हूँ?
- क्या मैं केवल प्रशंसा सुनना चाहता हूँ?
- क्या मैं सुंदर वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आकर्षित हूँ?
- क्या मेरे भीतर व्यक्ति, धन या पद के आधार पर भेदभाव है?
जब इन्द्रियों की इच्छाएँ कम होने लगती हैं और सबके प्रति समभाव विकसित होने लगता है, तभी वास्तविक साधना प्रारम्भ होती है। इसीलिए कविवर कहते हैं कि सच्चे साधु का वास्तविक वैभव न धन है, न प्रतिष्ठा और न बाहरी ऐश्वर्य। उनका सबसे बड़ा खजाना केवल साम्य भाव है। यही समता उन्हें वीतरागता की ओर ले जाती है और यही प्रत्येक साधक के लिए जीवन का सर्वोच्च आदर्श है।
“निज पर के हित साधन में जो, निशि दिन तत्पर रहते हैं”
कविवर इस पंक्ति में वीतराग मुनिराज के एक और महान गुण का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि सच्चे साधु वे हैं जो स्वयं के और दूसरों के कल्याण में दिन-रात निरंतर लगे रहते हैं।
‘निज’ और ‘पर’ का अर्थ
इस पंक्ति में ‘निज’ का अर्थ है – स्वयं, और ‘पर’ का अर्थ है – दूसरे सभी जीव।
अर्थात् जो महापुरुष केवल अपने आत्मकल्याण तक सीमित नहीं रहते, बल्कि प्रत्येक जीव के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने में निरंतर तत्पर रहते हैं, वही इस पंक्ति के वास्तविक पात्र हैं।
“निशि दिन” का अर्थ है – रात-दिन, अर्थात् प्रत्येक क्षण।
उनके जीवन का केवल एक ही उद्देश्य होता है—आत्मा का कल्याण।
अपनी आत्मा का भी और संसार के प्रत्येक जीव की आत्मा का भी।
उनका परोपकार कैसा होता है?
यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न उठ सकता है—
क्या मुनिराज समाज के लिए अस्पताल बनाते हैं?
क्या वे विद्यालय खोलते हैं?
क्या वे धन-संपत्ति बाँटते हैं?
यदि नहीं, तो फिर उन्हें “परहितकारी” क्यों कहा गया है?
इस प्रश्न का उत्तर जैन दर्शन अत्यन्त गहन रूप में देता है। मुनिराज का परोपकार केवल भौतिक नहीं होता, बल्कि उससे कहीं अधिक व्यापक और स्थायी होता है। वे प्रत्येक जीव को भयमुक्त जीवन और मोक्षमार्ग का ज्ञान प्रदान करते हैं। उनके वचन, उनका आचरण, उनका तप, उनकी साधना और उनकी पवित्र आध्यात्मिक तरंगें (वर्गणाएँ) अनगिनत जीवों के कल्याण का कारण बनती हैं।
जो भी उनके संपर्क में आता है, उन्हें सुनता है या उनके जीवन से प्रेरणा लेता है, उसके जीवन की दिशा बदल सकती है।
पाँच महाव्रत – समस्त जीवों के लिए अभयदान
मुनिराज जब पाँच महाव्रत धारण करते हैं, तभी से उनका जीवन समस्त प्राणियों के लिए सुरक्षा और करुणा का संदेश बन जाता है।
1. अहिंसा महाव्रत – प्रत्येक जीव को जीवनदान
जब मुनिराज संकल्प लेते हैं—
“मैं किसी भी जीव की हिंसा नहीं करूँगा।”
तब तीनों लोकों के असंख्य जीव उनके कारण निर्भय हो जाते हैं। वे किसी चींटी, पक्षी, पशु या मनुष्य को जानबूझकर कष्ट नहीं पहुँचाते। उनके इस संकल्प से प्रत्येक जीव को मानो जीवनदान मिल जाता है। यही वास्तविक अभयदान है।
2. सत्य महाव्रत – छल और कपट से मुक्ति
जब वे प्रतिज्ञा करते हैं—
“मैं कभी असत्य नहीं बोलूँगा।”
तब संसार का कोई भी व्यक्ति उनसे ठगे जाने का भय नहीं रखता। वे किसी को धोखा नहीं देते, किसी का विश्वास नहीं तोड़ते और किसी के साथ छल-कपट नहीं करते। उनके वचन सदैव सत्य और हितकारी होते हैं।
3. अचौर्य महाव्रत – किसी की वस्तु पर अधिकार नहीं
मुनिराज यह नियम लेते हैं—
“मैं जीवनभर किसी की वस्तु ग्रहण नहीं करूँगा।”
अब संसार का कोई भी जीव उनसे भयभीत नहीं रहता कि वे उसकी संपत्ति छीन लेंगे। वे दूसरों के धन, वस्तु या अधिकार पर कभी बुरी दृष्टि नहीं डालते। इस प्रकार वे प्रत्येक जीव को सुरक्षा का अनुभव कराते हैं।
4. ब्रह्मचर्य महाव्रत – पूर्ण पवित्रता
जब मुनिराज पूर्ण ब्रह्मचर्य धारण करते हैं, तब समस्त स्त्री, पुरुष, नपुंसक, पशु-पक्षी और सभी जीव उनके प्रति पूर्णतः निर्भय हो जाते हैं। उनकी दृष्टि में किसी के प्रति वासना, आकर्षण या बुरा भाव नहीं रहता। वे प्रत्येक जीव को केवल आत्मा के रूप में देखते हैं। उनकी दृष्टि निर्मल, निष्पक्ष और पवित्र होती है।
5. अपरिग्रह महाव्रत – संघर्ष का अंत
परिग्रह ही संसार के अधिकांश विवादों का मूल कारण है।
धन, संपत्ति, पद और अधिकार के कारण भाई-भाई के शत्रु बन जाते हैं, परिवार टूट जाते हैं और समाज में संघर्ष उत्पन्न होता है।किन्तु मुनिराज जब पूर्ण अपरिग्रह धारण करते हैं, तब उनके जीवन से स्वामित्व, संग्रह और अधिकार की भावना समाप्त हो जाती है। जहाँ परिग्रह नहीं, वहाँ विवाद भी नहीं।
यही है वास्तविक स्व-परहित
इसीलिए कविवर कहते हैं—
“निज पर के हित साधन में जो, निशि दिन तत्पर रहते हैं।”
उनका प्रत्येक क्षण आत्मकल्याण और लोककल्याण के लिए समर्पित होता है।
उनके कारण एक छोटी-सी चींटी भी निर्भय होकर चल सकती है, क्योंकि उसे विश्वास है कि यह महापुरुष उसे कष्ट नहीं पहुँचाएँगे।
यही वास्तविक स्वतंत्रता है।
मुनिराज मानो प्रत्येक जीव से कहते हैं—
“मैं भी जीता हूँ और तुम्हें भी जीने का पूर्ण अधिकार है।”
यही अहिंसा का सर्वोच्च स्वरूप है। यही अभयदान है। यही स्व-परहित है।
हमारे जीवन के लिए प्रेरणा
यह पंक्ति हमें आत्मचिन्तन के लिए प्रेरित करती है।
हमें स्वयं से पूछना चाहिए—
- क्या मेरे कारण किसी जीव को भय होता है?
- क्या मेरे शब्द किसी को दुःख पहुँचाते हैं?
- क्या मैं किसी का अधिकार छीनता हूँ?
- क्या मेरा जीवन केवल अपने सुख तक सीमित है, या दूसरों के कल्याण का भी माध्यम बन रहा है?
जब हमारा जीवन किसी भी जीव को भय नहीं देता, जब हमारे विचार, वचन और व्यवहार दूसरों के कल्याण का कारण बनते हैं, तभी हम इस पंक्ति के वास्तविक संदेश को अपने जीवन में उतारना प्रारम्भ करते हैं।
यही कारण है कि वीतराग मुनिराज को जगत का सच्चा हितैषी कहा गया है। वे केवल उपदेश नहीं देते, बल्कि अपने संपूर्ण जीवन द्वारा यह सिद्ध करते हैं कि सच्चा परोपकार किसी का जीवन छीनना नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव को निर्भय होकर जीने का अधिकार देना है।
“स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं”
कविवर आगे आदर्श साधु के एक और विलक्षण गुण का वर्णन करते हैं— यहाँ स्वार्थ का अर्थ है—अपने शरीर, अपनी सुविधा, अपनी इच्छाओं और अपने सुख के लिए कुछ भी चाहना। जो महापुरुष अपने व्यक्तिगत सुखों का पूर्ण त्याग कर केवल आत्मकल्याण और लोककल्याण के लिए जीवन समर्पित कर देते हैं, वही वास्तविक अर्थ में स्वार्थ का त्याग करते हैं।
किन्तु कविवर केवल त्याग की बात नहीं करते। वे कहते हैं कि वे कठिन तपस्या करते हैं, और वह भी बिना किसी खेद के।
अर्थात् उन्हें अपने त्याग का दुःख नहीं होता, अपनी तपस्या का बोझ नहीं लगता, न कभी शिकायत होती है और न ही थकान का अनुभव। वे प्रसन्नचित्त होकर, आनंदपूर्वक, निरंतर साधना करते रहते हैं।
कठिन तपस्या वास्तव में क्या है?
सामान्यतः लोग कठिन तपस्या का अर्थ केवल उपवास, धूप में खड़े रहना, वर्षा में तप करना या जंगलों में वर्षों तक साधना करना समझते हैं। निःसंदेह ये भी तप के रूप हैं, किन्तु जैन दर्शन की दृष्टि में सबसे कठिन तपस्या इससे भी कहीं अधिक गहरी है।
पहली कठिनतम साधना – निर्विकार दिगम्बर मुद्रा
तीनों लोकों में, तीनों कालों में, सभी प्रकार के लोगों के बीच—चाहे वे स्त्री हों, पुरुष हों, नपुंसक हों, जैन हों या अजैन, श्रद्धालु हों या विरोधी, प्रशंसक हों या आलोचक—सभी के प्रति समान, निर्विकार और पूर्ण वीतराग भाव बनाए रखना अत्यन्त दुर्लभ साधना है।
दिगम्बर मुनिराज बाहरी नग्नता मात्र धारण नहीं करते, बल्कि वे अहंकार, संकोच, आकर्षण, भय और विकार से भी पूर्णतः नग्न हो जाते हैं। उनके परिणामों में किसी प्रकार का उतार-चढ़ाव नहीं आता। उनकी दृष्टि बालक के समान निर्मल, निष्कपट और यथाजात पवित्र होती है।
ऐसी निर्विकार अवस्था संसार की सबसे कठिन साधनाओं में से एक है।
दूसरी कठिनतम साधना – केशलोंचन
दूसरी महान साधना है—अपने हाथों से केशों का लोंचन करना।
यह केवल शरीर को कष्ट देना नहीं है, बल्कि यह देह के प्रति पूर्ण वैराग्य की घोषणा है। यह बताता है कि साधक का लक्ष्य शरीर की सजावट नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि है।
इस साधना में असहनीय शारीरिक पीड़ा होती है, किन्तु मुनिराज उसे भी समभाव से सहन करते हैं। यही उनका अद्भुत वैराग्य है।
तपस्या का एक प्रेरणादायक चित्र
आचार्य पूज्यपाद देव ने मुनिराज की तपस्या का अत्यन्त मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है। कल्पना कीजिए—15 जून का दिन है। भीषण गर्मी पड़ रही है।प्रातः छह बजे से ही सूर्य प्रचण्ड ताप बरसा रहा है। धरती तप रही है। चारों ओर गर्म हवाएँ चल रही हैं। मुनिराज पिछले चौबीस घंटे से अन्न और जल ग्रहण नहीं किए हुए हैं। पेट में भूख की अग्नि जल रही है। प्यास के कारण कण्ठ सूख चुका है। ऐसी अवस्था में वे गोचरी के लिए निकलते हैं। अनेक घरों में जाते हैं, किन्तु शास्त्रसम्मत विधि नहीं मिलती। इसलिए वे बिना आहार ग्रहण किए वापस लौट आते हैं। अब फिर वही तपती धरती, ऊपर प्रखर सूर्य, चारों ओर लू के थपेड़े, भीतर भूख की जठराग्नि और सूखे हुए कण्ठ की पीड़ा…
किन्तु आश्चर्य यह है कि— उनके चेहरे पर मुस्कान बनी रहती है।
न कोई शिकायत, न कोई निराशा, न कोई उदासी। वे उसी प्रसन्नता से ध्यान करते हैं, स्वाध्याय करते हैं और आत्मानन्द में स्थित रहते हैं। उनके अन्तःकरण का आनंद उनके मुखमण्डल से स्वतः प्रकट होता रहता है। यही है “स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं।”
न शिकायत, न तनाव, न विक्षेप
- हम सामान्य जीवन में छोटी-सी असुविधा से भी विचलित हो जाते हैं।
- रात को बिजली चली जाए तो अगले दिन मन अशांत हो जाता है।
- मनपसंद भोजन न मिले तो शिकायत होने लगती है।
- कोई हमारी आलोचना कर दे तो कई दिनों तक मन खिन्न रहता है।
किन्तु वीतराग मुनिराज का जीवन इससे बिल्कुल विपरीत होता है। वे कभी यह नहीं कहते—
- आज बहुत गर्मी है, इसलिए मैं परेशान हूँ।
- कई दिनों से मनपसंद आहार नहीं मिला।
- किसी ने मेरी निन्दा कर दी, इसलिए मेरा मन अशांत है।
- किसी ने मेरे बारे में गलत लिखा, इसलिए मैं क्रोधित हूँ।
ऐसी कोई भी परिस्थिति उनके चित्त की शांति को स्पर्श नहीं कर पाती। उनका चेहरा सदैव शांत, सौम्य और प्रसन्न रहता है। यही कारण है कि उन्हें “महासाधु” कहा गया है।
प्रशंसा और निन्दा में समान
- वीतराग साधु का एक अद्भुत गुण यह भी है कि वे न तो प्रशंसा से प्रसन्न होकर अहंकार में फूलते हैं और न निन्दा से दुःखी होकर क्रोधित होते हैं।
- यदि कोई उनके गुणों का गान करे, तब भी उनका चित्त समान रहता है।
- यदि कोई उनकी आलोचना करे, अपमान करे या विरोध करे, तब भी उनके मन में राग-द्वेष का एक भी कम्पन उत्पन्न नहीं होता।
- वे प्रशंसा में उछलते नहीं और निन्दा में टूटते नहीं।
उनका जीवन गीता के इस सिद्धान्त का सजीव स्वरूप बन जाता है—
“मान और अपमान, लाभ और हानि, सुख और दुःख—सबमें जो समभाव रखे, वही सच्चा साधक है।”
हमारे जीवन के लिए प्रेरणा
यह पंक्ति हमें केवल मुनिराज की महिमा बताने के लिए नहीं है, बल्कि स्वयं को परखने के लिए भी है।
हमें स्वयं से पूछना चाहिए—
- क्या मैं छोटी-सी असुविधा में भी विचलित हो जाता हूँ?
- क्या मेरी प्रसन्नता बाहरी सुविधाओं पर निर्भर है?
- क्या मैं आलोचना सहन कर सकता हूँ?
- क्या मैं प्रशंसा और निन्दा दोनों में समान रह सकता हूँ?
जब जीवन की कठिन परिस्थितियाँ भी हमारे भीतर के आनंद को समाप्त न कर सकें, जब त्याग बोझ न लगे और साधना आनंद बन जाए, तभी हम इस पंक्ति के वास्तविक अर्थ को समझना प्रारम्भ करते हैं।
यही वीतराग मुनियों की महानता है। उनका तप केवल शरीर का नहीं, बल्कि मन, वचन और भावों की ऐसी निर्मल साधना है, जिसमें स्वार्थ का पूर्ण त्याग, समता की अखण्ड धारा और आत्मानन्द का निरंतर प्रकाश विद्यमान रहता है।
“ऐसे ज्ञानी साधु जगत के दुःख-समूह को हरते हैं”
कविवर छंद के अंत में ऐसे वीतराग मुनिराजों की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं—यह कथन केवल उनकी प्रशंसा नहीं है, बल्कि उनके जीवन की वास्तविकता का परिचय है। ऐसे वीतराग महापुरुष अपने स्पर्श, वचन या चमत्कार से नहीं, बल्कि अपने आदर्श जीवन, अपने त्याग और अपने वीतराग चरित्र से संसार के दुःखों को दूर करते हैं।
उनका स्मरण, उनकी वंदना और उनके जीवन का चिंतन ही हमारे भीतर के मोह, राग, द्वेष और आसक्ति को कम करने लगता है। जब हम उनके जीवन की तुलना अपने जीवन से करते हैं, तब संसार के जिन सुखों को हम बहुत बड़ा समझते थे, वे स्वतः ही तुच्छ और फीके प्रतीत होने लगते हैं।
उनके त्याग का चिंतन ही वैराग्य जगाता है
कल्पना कीजिए—एक युवा, जिसकी आयु केवल 22 वर्ष है, वह दिगम्बर दीक्षा धारण कर लेता है। जिस आयु में सामान्य युवक संसार के आकर्षणों, सुविधाओं और इच्छाओं में डूबा रहता है, उसी आयु में कोई समस्त परिग्रह, सुविधाओं और भोगों का त्याग कर देता है। यह केवल एक निर्णय नहीं, बल्कि अद्भुत आत्मबल और वैराग्य का प्रमाण है।
आज हम कुछ मिनटों के लिए भी मोबाइल फ़ोन अपने से दूर नहीं रख पाते। मन बार-बार उसी की ओर दौड़ता है। ऐसे समय में यदि कोई व्यक्ति जीवनभर के लिए मोबाइल, तकनीकी सुविधाओं और समस्त सांसारिक साधनों का त्याग कर दे, तो उसके इस त्याग के प्रति हमारे हृदय में स्वाभाविक रूप से अनुमोदना का भाव उत्पन्न होना चाहिए।
जहाँ हमारी आवश्यकताएँ बढ़ती जा रही हैं…
हम दिनभर पानी पीते रहते हैं, फिर भी प्यास समाप्त नहीं होती। थोड़ी देर पानी न मिले तो बेचैनी होने लगती है।
किन्तु आज भी इस धरती पर ऐसे निर्ग्रन्थ दिगम्बर मुनिराज विद्यमान हैं, जो चौबीस घंटे में केवल एक बार जल ग्रहण करते हैं और पूर्ण संतोष तथा प्रसन्नता के साथ साधना में स्थित रहते हैं। हम पाँच मिनट बिना पंखे या वातानुकूलन के नहीं बैठ पाते, जबकि वे भीषण गर्मी में भी बिना पंखे, कूलर और ए.सी. के समभावपूर्वक विहार करते हैं। 46, 47, 48 और 49 डिग्री तापमान में भी उनका धैर्य और साधना विचलित नहीं होती। यह केवल शारीरिक सहनशक्ति नहीं, बल्कि आत्मबल की पराकाष्ठा है।
विकारों से भरे युग में निर्विकार जीवन
आज का युग आकर्षणों, उपभोग, प्रसिद्धि और भौतिक सुविधाओं का युग है। मनुष्य पद, प्रतिष्ठा, धन, ऐश्वर्य, लोभ और संग्रह की दौड़ में निरंतर भाग रहा है। ऐसे समय में यदि कोई महापुरुष पूर्णतः निर्विकार, वीतराग और निर्ग्रन्थ होकर संसार में विचरण करता है, तो यह अपने आप में एक महान आश्चर्य है।
- उनके पास न धन है, न बैंक खाता।
- न अपना घर है, न कोई स्थायी पता।
- न शरीर पर वस्त्र हैं, न सिर पर छाता।
- केवल एक पिच्छी, एक कमण्डलु और आत्मकल्याण की अखण्ड साधना।
यही उनका सम्पूर्ण वैभव है। यह दृश्य हमें बताता है कि मनुष्य का वास्तविक आधार बाहरी साधन नहीं, बल्कि भीतर की आत्मशक्ति है।
ऐसे महापुरुष ही हमारे आदर्श हैं
ऐसे निर्ग्रन्थ दिगम्बर मुनियों की वंदना करके हमें अपने जीवन को धन्य मानना चाहिए। वे केवल पूजनीय नहीं हैं, बल्कि हमारे जीवन के परम आदर्श हैं, क्योंकि उन्होंने उसी मार्ग को पूर्ण रूप से जीकर दिखाया है, जो मोक्ष तक पहुँचाता है। उनका जीवन हमें बताता है कि आत्मा की शुद्धि बाहरी संग्रह से नहीं, बल्कि त्याग, संयम और समता से होती है।
सच्चे गुरु कौन हैं?
आज संसार में अनेक विद्वान, वक्ता और शिक्षक हैं। वे हमें ज्ञान दे सकते हैं, शिक्षा दे सकते हैं और जीवन की अनेक उपयोगी बातें सिखा सकते हैं।
वे हमारे शिक्षा-गुरु या उपदेश-गुरु हो सकते हैं।
किन्तु जैन दर्शन की दृष्टि से सद्गुरु वही हैं, जिन्होंने स्वयं वीतराग मार्ग को अपने जीवन में पूर्ण रूप से धारण किया है।
ऐसे गुरु—
- राग और द्वेष से रहित हैं।
- दिगम्बर हैं—जिन्होंने दिशाओं को ही अपना अम्बर स्वीकार किया है।
- निर्ग्रन्थ हैं—जिनके हृदय में किसी भी प्रकार की आसक्ति, गाँठ या बन्धन शेष नहीं रहा।
- श्रमण हैं—जो निरंतर आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की साधना में रत रहते हैं तथा जिनके सांसारिक परिश्रम समाप्त होकर केवल आध्यात्मिक पुरुषार्थ शेष रह गया है।
यही कारण है कि वे हमारे जीवन के वास्तविक पथप्रदर्शक हैं।
हमारी मंगल भावना
- हमारी प्रार्थना है कि ऐसे वीतराग, निर्ग्रन्थ, दिगम्बर गुरुओं की पावन चरण-छाया सदा हम पर बनी रहे।
- उनका जीवन हमारे भीतर वैराग्य जगाए।
- उनका संयम हमें संयम की प्रेरणा दे।
- उनकी समता हमारे मन को स्थिर बनाए।
- उनका त्याग हमें संग्रह से मुक्त होने की शक्ति प्रदान करे।
और उनकी वीतरागता हमें उस परम लक्ष्य की ओर अग्रसर करे, जहाँ आत्मा अपने शुद्ध, निर्मल और अनन्त स्वरूप का अनुभव करती है।
यही “मेरी भावना” का सार है—ऐसे महापुरुषों की वंदना करना, उनके गुणों की अनुमोदना करना और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लेना।