राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 502 to 515
श्लोक ( Shlok ) 502 – 505
लक्ष्मणप्रमुखान्मुख्यान् वेलालीलावहान् बहून् । प्रत्युद्गमय्य विस्त्रम्भ्य तमानीय परीक्षया ॥ ५०२ ॥सोऽपि ज्ञातानुभावत्वादेकीभावमुपागमत् । ततः कतिपयैरेव प्रयाणैर्गतवद्वलम् ॥ ५०३ ॥जलधेस्तटमाश्रित्य सन्निविष्टं समन्ततः । तदा तत्राणुमानित्थं रामं विज्ञापयन्मिथः ॥ ५०४ ॥देवादेशोऽस्ति चेद्गत्वा लक्ङ्कां शौर्योज्जिहीर्षया । वनभङ्गेन ते शत्रोर्मानभङ्ग करोम्यहम् ॥ ५०५ ॥
रामचन्द्रने तरङ्गोंकी लीला धारण करनेवाले लक्ष्मण आदि अनेक बड़े-बड़े योद्धाओं को विभीषणकी अगवानी करनेके लिए भेजा और वे सब परीक्षा कर तथा विश्वास प्राप्त कर उसे ले आये । विभीषण भी रामचन्द्रके प्रभावको समझता था अतः उनके साथ एकीभावको प्राप्त हो गया – हिलमिल गया। तदनन्तर कुछ ही पड़ाव चलकर रामचन्द्रकी सेना समुद्रके तटपर आ पहुंची और चारों ओर ठहर गई। उस समय अणुमान्ने परस्पर रामचन्द्रसे इस प्रकार कहा कि हे देव ! यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं अपनी शूर-वीरता प्रकट करनेकी इच्छासे लङ्कामें जाऊँ और वनका नाश कर आपके शत्रुका मान भङ्ग करूँ ।। ५०२-५०५ ।।
“Ramachandra dispatched many great warriors, including Lakshmana—who possessed the playful agility of surging waves—to receive Vibhishana; and they all, after testing him and gaining confidence in his intent, escorted him back. Vibhishana, too, understood the majesty of Ramachandra and thus achieved a deep sense of unity and harmony with them.
Thereafter, marching for just a few days’ halt, Ramachandra’s army arrived at the seashore and stationed themselves all around. At that time, Anuman (Hanuman) spoke to Ramachandra in private, saying, ‘O Lord! If it be your command, I wish to display my heroism by going to Lanka, destroying its groves, and shattering the pride of your enemy.'” [502-505]
श्लोक ( Shlok ) 506 – 515
लक्कादाहेन दाहं च देहस्या हितकारिणः । तथा सति स मानित्वादसौ चेदागमिष्यति ॥ ५०६ ॥स्थानभ्रंशात्सुखोच्छेद्यो नागच्छेतेजसः क्षतिः । इति श्रुत्यास्य विशति तदस्त्वित्यवदन्नपः ॥ ५०७ ॥सहायाँश्वादिशत्तस्य विथेशान् शौर्यशालिनः । लब्धाज्ञः सोऽपि सन्तुष्य सद्यो वानरविद्यया ॥ ५०८ ॥प्रादुर्भावितदुःमैक्ष्यनाना वानरसेनया । द्रुतं वाराशिमुल्लङ्घय विक्रमाद्वनपालकान् ॥ ५०९ ॥आग्रहं निग्रहं कृत्वा वनभङ्ग व्यधात् क्रुधा । ‘ऊद्धर्वीकृतकरा घोरं क्रोशन्तो वनपालकाः ॥ ५१० ॥प्राविशन्नगरी घोरां श्रावयन्तोऽश्रुतश्रुतिम् । तदा राक्षसविद्योद्यद्ध्वजमालोपलक्षिताः ॥ ५११ ॥अभियाता पुरारक्षा योद्धं पवननन्दनम् । अथानिलसुतादिष्ट वानरानीकनायकाः ॥ ५१२ ॥तानभञ्जन् समुद्धस्य प्रहृत्य वनपादपैः । ततः स्फुरन् महाज्वालविद्ययाऽसौ बहिः पुरम् ॥ ५१३ ॥निरधाक्षीदधिक्षिप्य रुक्षरक्षोबलं बलो । एवं रावणदुर्वारप्रतापप्रोद्यतद्रुमम् ॥ ५१४॥प्रोन्मूल्य वानरानीकनायको राममाययौ । सन्नाह्य राधयः स्थित्वा बलं संग्रामसम्मुखम् ॥ ५१५ ॥
साथ ही लङ्काको जलाकर शत्रुके शरीर में दाह उत्पन्न करूँ। ऐसा करने पर वह अहङ्कारी रावण अभिमानी होनेसे यहाँ आवेगा और उस दशामें स्थान-भ्रष्ट होनेके कारण वह सुखसे नष्ट किया जा सकेगा। यदि यहाँ नहीं भी आवेगा तो उसके प्रतापकी अति तो अवश्य होगी। अणुमान्की यह विज्ञप्ति सुनकर राजा रामचन्द्रने वैसा करने की अनुमति दे दी और शूर-वीरतासे सुशोभित अनेक विद्याधरोंको उसका सहायक बना दिया । रामचन्द्रकी आज्ञा पाकर अणुमान् बहुत सन्तुष्ट हुआ। उसने वानर-विद्याके द्वारा शीघ्र ही अनेक भयङ्कर वानरोंकी सेना बनाई और उसे साथ ले शीघ्र ही समुद्रका उल्लङ्घन किया। वहाँ वह अपने पराक्रमसे वन-पालकोंको पकड़ कर उनका निग्रह करने लगा और क्रोधसे उसने रावण का समस्त वन नष्ट कर डाला। तब वनके रक्षक लोग अपनी भुजाएँ ऊँची कर जोर-जोरसे चिल्लाते हुए नगरीमें गये और जो कभी नहीं सुने थे उन भयङ्कर शब्दोंको सुनाने लगे। उस समय राक्षस-विद्याकेप्रभावसे फहराती हुई ध्वजाओंके समूहसे उपलक्षित नगरके रक्षक लोग अणुमान्से युद्ध करनेवे लिए उसके सामने आये। यह देख अणुमान् ने भी वानर-सेनाके सेनापतियोंको आज्ञा दी और तदनुसार वे सेनापति लोग वनके वृक्ष उखाड़कर उन्हींसे प्रहार करते हुए उन्हें मारने लगे । तदनन्तर बलवान् अणुमान् ने नगरके बाहर स्थित राक्षसोंकी रूखी सेनाको अपनी देदीप्यमान महाज्वाल नामकी विद्यासे वहाँका वहीं भस्म कर दिया। इस प्रकार वानर सेनाका सेनापति अणुमान्, रावण के दुर्बार प्रताप रूपी ऊँचे वृक्षको उखाड़ कर रामचन्द्र के समीप वापिस आ गया। इधर रामचन्द्र तबतक सेनाको तैयार कर युद्धके सन्मुख खड़े हो गये ।। ५०६-५१५ ॥
“‘Furthermore, by setting Lanka ablaze, I shall ignite a burning torment within the enemy’s very body. Upon doing so, that arrogant Ravana, driven by his pride, will march out here, and in that state—having been dislodged from his stronghold—he can be easily destroyed. Even if he does not come here, his grandeur will certainly meet its end.’
Hearing this request from Anuman (Hanuman), King Ramachandra granted him permission to do so and appointed many warriors adorned with valor from among the Vidyadharas as his assistants. Receiving Ramachandra’s command, Anuman was highly pleased. Through his simian mystical lore (Vanara-vidya), he swiftly conjured an army of numerous terrifying monkeys and, taking them along, quickly crossed the ocean.
Upon reaching there, he began to capture and subdue the forest guardians through his prowess, and in his fury, he utterly destroyed Ravana’s entire forest grove. Then, the protectors of the forest fled into the city, raising their arms high and shouting loudly, delivering terrifying news that had never been heard before. At that time, marked by clusters of flags fluttering through the power of demoniac mysticism (Rakshasa-vidya), the guardians of the city came forward to wage war against Anuman.
Seeing this, Anuman also commanded the generals of the monkey army, and accordingly, those generals began to strike and slay them using uprooted forest trees as weapons. Thereafter, the mighty Anuman, using his radiant mystical lore known as Mahajvala, incinerated the harsh army of the demons stationed outside the city right then and there. In this manner, Anuman, the commander of the monkey army, having uprooted the tall tree of Ravana’s irresistible majesty, returned to the side of Ramachandra. Meanwhile, having readied his army by then, Ramachandra stood poised for battle.” [506-515]
श्लोक 516 से 531
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501
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