पहली ढाल छंद 11 – नरक में अन्य नारकियों, असुर कुमारों द्वारा उदीरित दुःख और प्यास के दुःख –
तिल-तिल करें देह के खण्ड, असुर भिडावै दुष्ट प्रचण्ड।
सिन्धु-नीरतें प्यास न जाय, तो पण एक न बूँद लहाय ।।11 ॥
अन्वयार्थ -” उन नरकों में नारकी एक दूसरे के” (देह के) शरीर के (तिल-तिल) तिल के दाने बराबर (खण्ड) टुकड़े (करें) कर देते हैं और (प्रचण्ड) अत्यन्त (दुष्ट) क्रूर (असुर) असुरकुमार जाति के देव “आपस में” (भिड़ावें) भिड़ा देते हैं-लड़ा देते हैं। तथा इतनी (प्यास) प्यास “लगती है, कि” (सिन्धुनीरतें) समुद्र भर का पानी पीने से भी (न जाय) नहीं मिट सकती है (तो पण) किन्तु (एक बूँद) एक बूँद भी (न लहाय) नहीं मिलती।
अर्थ – नरक गति में असुरकुमार जाति के दुष्ट और प्रचंड (शक्तिशाली) देव पहुँच जाते हैं। वे पूर्व भव के बैर याद दिला-दिलाकर नारकियों को आपस में भिड़ाते हैं और स्वयं भी उन्हें अत्यधिक कष्ट देते हैं। देवों के लिए शस्त्र आदि बनाना बहुत सहज होता है; वे तलवार आदि बनाकर नारकियों के शरीर के तिल-तिल के बराबर छोटे-छोटे टुकड़े कर डालते हैं। वे नारकियों को वैतरणी नदी में फेंक देते हैं और जब नारकी जीव जलन से छटपटाते हैं, तो ये असुरकुमार देव देखकर आनंदित होते हैं।
इसके अलावा, नरक में प्यास की पीड़ा इतनी तीव्र होती है कि यदि समुद्र (सिंधु) का सारा जल भी मिल जाए, तब भी तृप्ति न हो। इतनी भयंकर तृषा होने के बाद भी वहाँ पीने के लिए जल की एक बूंद भी प्राप्त नहीं होती। यदि नारकी जीव व्याकुल होकर वैतरणी नदी का जल पीने का प्रयास करते हैं, तो वह जल तेज़ाब की तरह उनके पूरे शरीर को छिन्न-भिन्न और दग्ध कर देता है।
नरक में जीव को शारीरिक पीड़ा के साथ-साथ मानसिक और भावनात्मक कष्ट भी सहने पड़ते हैं। वहाँ न तो आपसी प्रेम है, न शांति और न ही अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति।
प्रश्न: ये असुर कौन होते हैं और ये ऐसा लड़ाई-झगड़ा क्यों करवाते हैं?
उत्तर: भवनवासी देवों के 10 भेदों में पहला भेद ‘असुरकुमार’ है। इनमें अम्बरीष आदि जातियों के देव ऐसे होते हैं जिनके पूर्व भव के संस्कार अत्यंत क्रूर और मलीन होते हैं।
उदाहरण के लिए, यदि किसी कसाई ने जीवन भर हिंसा की हो और अंत समय में किसी दया कार्य (जैसे किसी निर्धन को औषधि हेतु दान) के कारण देवायु का बंध कर लिया हो, तो वह देव तो बन जाता है, किंतु उसके पूर्व संस्कार हिंसा और क्रूरता के ही रहते हैं। जैसे संसार में कुछ लोगों को कुश्ती, मुक्केबाजी (बॉक्सिंग) या पशुओं की लड़ाई देखकर आनंद मिलता है, वैसे ही इन असुरकुमार देवों को नारकियों को पीड़ा देने और आपस में लड़ाने में आनंद आता है।
प्रश्न: क्या असुरकुमार देव केवल नारकियों को आपस में भिड़ाते हैं या स्वयं भी कष्ट देते हैं?
उत्तर: वे दोनों कार्य करते हैं। वे नारकियों को पूर्व जन्म का वैर याद दिलाकर आपस में भी लड़ाते हैं और स्वयं भी आरी से काटने, छीलने, पीसने तथा वैतरणी नदी में फेंकने जैसे घोर कष्ट देते हैं।
प्रश्न: क्या असुरकुमार देव सातों नरकों में जाकर दुख देते हैं?
उत्तर: नहीं, असुरकुमार देव केवल प्रथम तीन नरकों तक ही जा सकते हैं। तीसरे नरक से आगे कोई भी देव नारकियों को दुख देने नहीं जाता। चतुर्थ से सप्तम नरक तक नारकी जीव स्वयं ही अपने परिणामों और परस्पर बैर के कारण परस्पर दुख भोगते हैं।
नरक गति संबंधी लेश्या एवं अवगाहना (विशेष तालिका)
सातों नरकों में उत्तरोत्तर अशुभ लेश्या, शारीरिक अवगाहना (ऊँचाई) और वेदना बढ़ती जाती है:
| नरक | लेश्या का स्तर | शरीर की अधिकतम अवगाहना |
| प्रथम (रत्नप्रभा) | जघन्य कापोत लेश्या | 7 धनुष, 3 हाथ, 6 अंगुल |
| द्वितीय (शर्कराप्रभा) | मध्यम कापोत लेश्या | 15 धनुष, 2 हाथ, 12 अंगुल |
| तृतीय (बालुकाप्रभा) | उत्कृष्ट कापोत / जघन्य नील | 31 धनुष, 1 हाथ |
| चतुर्थ (पंकप्रभा) | मध्यम नील लेश्या | 62 धनुष, 2 हाथ |
| पंचम (धूमप्रभा) | उत्कृष्ट नील / जघन्य कृष्ण | 125 धनुष |
| षष्ठ (तमःप्रभा) | मध्यम कृष्ण लेश्या | 250 धनुष |
| सप्तम (महातमःप्रभा) | उत्कृष्ट कृष्ण लेश्या | 500 धनुष |
छंद 12 – नरक में भूख, आयु और मनुष्य गति की प्राप्ति
तीन लोक को नाज जु खाय, मिटै न भूख कणा न लहाय।
ये दुख बहु सागरलौं सहै, करम जोगतैं नरगति लहै ॥ 12 ॥
अन्वयार्थ (उन नरकों में इतनी भूख लगती है कि) (तीन लोक को) तीनों लोकों का (नाज) अनाज (जु) भी (खाय) खा लेवे “तो भी” (भूख) भूख (न) नहीं (मिटै) मिट सकती है “किन्तु खाने को” (कणा) एक दाना भी (न लहाय) नहीं मिलता (ये) ऐसे (दुख) दुःख “नारकी” (बहुसागर लौ) बहुत सागरों तक (सहै) सहता है (करम जोगतैं) किसी विशेष शुभकर्म के उदय से (नरगति) मनुष्यगति (लहै) पाता है-प्राप्त करता है।
अर्थ – नरक में इतनी तेज भूख लगती है कि तीनों लोक का अनाज खा लेने पर भी भूख नहीं मिट सकती, लेकिन वहाँ अनाज का एक दाना भी खाने को नहीं मिलता।
नरक गति में भूख की वेदना इतनी प्रचंड होती है कि यदि नारकी जीव तीनों लोकों का संपूर्ण अनाज (अन्न) भी खा ले, तब भी उसकी भूख मिटने वाली नहीं है। इतनी तीव्र क्षुधा होने के बाद भी वहाँ उसे खाने के लिए अन्न का एक कण (‘कणा’) भी प्राप्त नहीं होता। वहाँ आहार सामग्री या अन्न का पूरी तरह अभाव रहता है।
नारकी जीव सर्दी, गर्मी, भूमि के स्पर्श, वैतरणी नदी, असिपत्र वृक्ष, आपस के लड़ाई-झगड़े तथा भूख-प्यास के इन भयानक दुखों को एक-दो वर्ष नहीं, बल्कि ‘बहु सागर’ (अनेक सागरों) तक निरंतर सहन करता है।इस प्रकार नरक के दुःख बहुत सागर तक इस जीव ने सहन किये हैं तत्पश्चात अपने शुभ कर्म का संयोग मिलने पर या योग-विपाक से जब उसकी नरकायु पूर्ण होती है, तब वह मनुष्य गति (नर-गति) या तिर्यंच गति को प्राप्त करता है।
प्रश्न: नरकों में अन्न तो मिलता नहीं, तो इतनी असहनीय भूख लगने पर नारकी जीव क्या करते हैं?
उत्तर: तीव्र भूख से व्याकुल होकर नारकी जीव वहाँ की अत्यंत गंदी और दुर्गंधित मिट्टी को चाटते हैं। आचार्यों ने लिखा है कि नरक की मिट्टी इतनी भयंकर दुर्गंध से युक्त होती है कि यदि उसके परमाणु इस लोक में आ जाएँ, तो उसकी गंध से ही कोसों दूर तक के जीव मर जाएँ।
- प्रथम नरक: मिट्टी की दुर्गंध से 1 कोस तक के जीवों का मरण हो सकता है।
- सप्तम नरक: मिट्टी की दुर्गंध से 4 कोस तक के जीव मरण को प्राप्त हो जाएँ।
नारकी जीव विवश होकर उस महादुर्गंधित मिट्टी को चाटते हैं, वमन (उल्टी) करते हैं और पुनः चाटते हैं, परंतु उससे उनकी भूख कभी तृप्त नहीं होती।
प्रश्न: एक ‘सागर’ में कितने वर्ष होते हैं?
उत्तर: एक सागरोपम काल असंख्यात (अनगिनत) वर्षों का होता है। यह मतिज्ञान और श्रुतज्ञान की गणना से परे है; इसे केवल अवधिज्ञानी या सर्वज्ञ देव ही जान सकते हैं। साधारण शब्दों में कहें तो शंखों-शंखों वर्ष का एक सागर होता है। इसलिए एक बार नरक गति में जाने पर जीव लंबे काल तक वहीं दुखों का भोग करता है।
प्रश्न: नारकी जीवों की आयु कितनी होती है?
उत्तर: तत्त्वार्थ सूत्र अध्याय 3 के अनुसार तेष्वेकत्रिसप्तदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपमासत्तवानांपरा स्थिति ॥6॥, सातों नरकों की जघन्य (न्यूनतम) एवं उत्कृष्ट (अधिकतम) आयु इस प्रकार है:
| नरक (पृथ्वी) | जघन्य आयु | उत्कृष्ट आयु |
| प्रथम (रत्नप्रभा) | 10,000 वर्ष | 1 सागर |
| द्वितीय (शर्कराप्रभा) | 1 सागर + 1 समय | 3 सागर |
| तृतीय (बालुकाप्रभा) | 3 सागर + 1 समय | 7 सागर |
| चतुर्थ (पंकप्रभा) | 7 सागर + 1 समय | 10 सागर |
| पंचम (धूमप्रभा) | 10 सागर + 1 समय | 17 सागर |
| षष्ठ (तमःप्रभा) | 17 सागर + 1 समय | 22 सागर |
| सप्तम (महातमःप्रभा) | 22 सागर + 1 समय | 33 सागर |
प्रश्न: नरक गति के इन भयानक दुखों से बचने का क्या उपाय है?
उत्तर: नरक गति से बचने के लिए उन कारणों और परिणामों का त्याग करना आवश्यक है जिनसे नरकायु का आस्रव होता है:
- बहुआरंभ और बहुपरिग्रह का त्याग: अत्यधिक हिंसात्मक व्यापारों (जैसे ईंट-भट्टे, फ्लोर मिल, चर्म उद्योग आदि) से बचना चाहिए तथा आवश्यकता से अधिक संपत्ति व साधनों का संग्रह नहीं करना चाहिए।
- सप्त व्यसनों एवं कषायों का त्याग: जुआ खेलना, शराब पीना, मांसाहार, परस्त्री सेवन, चोरी, शिकार आदि सप्त व्यसनों से दूर रहना चाहिए। क्रोध, मान, माया और लोभ रूप तीव्र कषायों को मंद कर चित्त में ‘प्रशम भाव’ (शांत भाव) धारण करना चाहिए।
- श्रावक के षट्कर्म एवं चारित्र का पालन: देव-पूजा, गुरु-उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान — इन षट्कर्मों में जीवन बिताना चाहिए। जीवन में व्रतों एवं प्रतिमाओं (कम से कम एक प्रतिमा) को धारण करने से नरक, तिर्यंच या कुमानुष आयु का आस्रव रुक जाता है और जीव नियमतः देवायु का ही बन्ध करता है।
इन दोनों छंदों में नरकगति की भयानक स्थिति का चित्रण करके यह समझाया गया है कि क्रोध, हिंसा, द्वेष और अशुभ कर्म जीव को अत्यन्त दुःखद गति में पहुँचा सकते हैं। वहाँ पहुँचकर जीव को ऐसी पीड़ाएँ सहनी पड़ती हैं जिनकी सामान्य मनुष्य कल्पना भी नहीं कर सकता।
छहढाला के पठन और श्रवण का वास्तविक लाभ तब ही संभव है जब हम नरक एवं तिर्यंच गति के कारणों को समझकर अपने जीवन में परिग्रह, कषाय और हिंसा का त्याग करें। अनावश्यक वस्तुओं (अत्यधिक जूते-चप्पल, विशाल भवन, व्यसन आदि) का परिसीमन कर जीवन को संयमित बनाना ही इन अशुभ गतियों से बचने का एकमात्र मार्ग है।
इसलिए मनुष्य जन्म अत्यन्त दुर्लभ और मूल्यवान है। जब जीव को मनुष्यगति प्राप्त हो जाए, तो उसे इसे केवल भोग-विलास में नहीं गंवाना चाहिए, बल्कि सदाचार, संयम, आत्मचिंतन और धर्म-साधना द्वारा अपने कर्मों का क्षय करने का प्रयास करना चाहिए।
छंद 13 व 14
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