पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24 | श्लोक 25 से 32 | श्लोक 33 से 43 | श्लोक 44 से 53 | श्लोक 54 से 66 | श्लोक 67 से 79
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 73- shlok 80 to 92
श्लोक ( Shlok ) 80 – 87
श्रुत्वा तान् सावधिः सोऽपि फलान्येवं न्यवेदयत् । गजेन्द्रवीक्षणात्पुत्रो वृषभालोकनात्पतिः ॥ ८० ॥त्रिविष्टपस्य सिंहेन दृष्टेनानन्तवीर्यकः । मन्दराभिषवप्राप्तिः पद्माभिषवदर्शनात् ॥ ८१ ॥दामद्वयावलोकेन धर्मद्वितयतीर्थकृत् । शशाङ्कमण्डलालोकात् त्रैलोक्यकुमुदप्रियः ॥ ८२ ॥तेजस्वी भास्वतो मत्स्ययुगलेन सुखाविलः । निधीनामधिपः कुम्भवीक्षणात्सर्वलक्षणः ॥ ८३ ॥सरसः सागरात्सर्वज्ञाता सिंहासनेक्षणात् । सर्वलोकैकसम्मान्यः स्वर्गादद्यावतीर्णवान् ॥ ८४ ॥अवताराद्विमानस्य भवनात्पवनाशिनः । त्रिबोधदीधिती रत्नराशिनालिङ्गितो गुणैः ॥ ८५ ॥विधूमधूमकेतूपलक्षणाद्दाहकोंऽहसाम् । वक्त्राम्भोजे गजेन्द्रस्य प्रवेशात्ते कृशोदरि ॥ ८६ ॥अवस्थिति स सम्प्रापदुदरेऽमरपूजितः । इति श्रुत्वाऽतुषद्वाणीं पत्युरेणीविलोचना ॥ ८७ ॥
महाराज विश्वसेन अवधिज्ञानी थे ही, अतः स्वप्न सुनकर इस प्रकार उनका फल कहने लगे। वे बोले कि हाथीके स्वप्नसे पुत्र होगा, बैलके देखनेसे वह तीनों लोकोंका स्वामी होगा, सिंहके देखनेसे अनन्त वीर्यका धारक होगा, लक्ष्मीको अभिषेक देखनेसे उसे मेरु पर्वतपर अभिषेककी प्राप्ति होगी, दो मालाओंको देखनेसे वह गृहस्थ धर्म और मुनि धर्म-रूप तीर्थकी प्रवृत्ति करनेवाला होगा, चन्द्रमण्डलके देखनेसे वह तीन लोकका चन्द्रमा होगा, सूर्यके देखनेसे तेजस्वी होगा, मत्स्योंका जोड़ा देखनेसे सुखी होगा, कलश देखनेसे निधियोंका स्वामी होगा, सरोवरके देखनेसे समस्त लक्षणोंसे युक्त होगा, समुद्रके देखनेसे सर्वज्ञ होगा, सिंहासनके देखनेसे समस्त लोगोंके द्वारा पूजनीय होगा, विमान देखनेसे स्वर्गसे अवतार लेनेवाला होगा, नागेन्द्रका भवन देखनेसे तीन ज्ञानका धारक होगा, रत्नोंकी राशि देखनेसे गुणोंसे आलिङ्गित होगा, निधूम अग्निके देखनेसे पापोंको जलानेवाला होगा और हे कृशोदरि ! मुखकमलमें हाथीका प्रवेश देखनेसे सूचित होता है कि देवोंके द्वारा पूजित होनेवाला वह पुत्र आज तेरे उदरमें आकर विराज-मान हुआ है। इस प्रकार वह मृगनयनी पति से स्वप्नोंका फल सुनकर बहुत सन्तुष्ट हुई ।। ८०-८७ ।।
“King Vishvasena, who possessed clairvoyant knowledge (Avadhijnana), listened to the dreams and began to explain their meanings as follows.
He said, ‘The dream of the elephant indicates that a son will be born; seeing the bull signifies he will be the lord of all three worlds; seeing the lion indicates he will possess infinite prowess; seeing the goddess Lakshmi being anointed means he will receive an anointment (Abhisheka) on Mount Meru; seeing the two garlands means he will establish the dual paths of religion—the householder’s path and the ascetic’s path.
Seeing the lunar orb signifies he will be the moon of the three worlds; seeing the sun indicates he will be exceptionally radiant; seeing the pair of fish means he will be full of happiness; seeing the urn (Kalasha) signifies he will be the master of divine treasures (Nidhis); seeing the lake indicates he will be endowed with all auspicious bodily marks; seeing the ocean signifies he will be omniscient (Sarvajna).
Seeing the throne indicates he will be revered by all people; seeing the celestial chariot (Vimana) means he is a soul descending from heaven; seeing the abode of Nagendra indicates he will be born possessing three kinds of knowledge from birth; seeing the heap of gems means he will be embraced by countless virtues; and seeing the smokeless fire signifies he will burn away all sins.
And O slender-waisted queen! Seeing the elephant enter your lotus-like mouth indicates that this son, who is destined to be worshipped by the gods themselves, has descended into your womb today.’
Hearing the fruits of her dreams from her husband, that deer-eyed queen was profoundly satisfied.” (80-87)
श्लोक ( Shlok ) 88
तदाखिलामराधीशाः समागत्य व्यधुर्मुदा । स्वर्गावतरणे पित्रोः कल्याणाभिषवोत्सवम् ॥ ८८ ॥
उसी समय समस्त इन्द्रोंने आकर बड़े हर्षले स्वर्गावतरणकी वेलामें भगवान्के माता-पिताका कल्याणाभिषेक कर उत्सव किया ।॥ ८८ ॥
“At that very moment, filled with immense joy at the hour of the Lord’s descent from heaven, all the Indras (celestial rulers) arrived and celebrated the grand festival by performing the auspicious anointment ceremony (Kalyana-abhisheka) for the Lord’s mother and father.” (88)
श्लोक ( Shlok ) 89
स्वर्गलोकञ्च तद्नेहमतिशेते स्म सम्पदा । किं करोति न कल्याणं कृतपुण्यसमागमः ॥ ८९ ॥
उस समय महाराज विश्वसेनका राजमन्दिर अपनी सम्पदाके द्वारा स्वर्गलोकका भी उल्लङ्घन कर रहा था सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यात्मा जीवोंका समागम कौन-सा कल्याण नहीं करता है ? अर्थात् सभी कल्याण करता है ।। ८९ ।।
“At that time, King Vishvasena’s royal palace surpassed even the heavenly realm with its sheer opulence and grandeur—and rightly so, for what prosperity and auspiciousness does the arrival of a highly meritorious soul (punyatma) not bring? That is to say, it brings every possible blessing.” (89)
श्लोक ( Shlok ) 90
नवमे मासि सम्पूर्ण पौषे मास्यसिते सुतः । पक्षे योगेऽनिले प्रादुरासीदेकादशीतिथौ ॥ ९० ॥
नौ माह पूर्ण होनेपर पौषकृष्ण एकादशीके दिन अनिलयोगमें वह पुत्र उत्पन्न हुआ ।॥ ९० ॥
“Upon the completion of nine months, on the eleventh day of the dark fortnight of the month of Pausha (Pausha Krishna Ekadashi), under the Anil (Anuradha) constellation, that son was born.” (90)
श्लोक ( Shlok ) 91 – 92
तदा निजासनाकम्पाद् ज्ञात्वा तीर्थकरोदयम् । सौधर्मप्रमुखाः सर्वे मन्दराचलमस्तके ॥ ९१ ॥जन्माभिषेककल्याणपूजानिवृत्त्यनन्तरम् । पाश्र्धाभिधानं कृत्वास्य पितृभ्यां तं समर्पयन् ॥ ९२ ॥
उसी समय अपने आसनोंके कम्पाय-मान होनेसे सौधर्म आदि सभी इन्द्रोंने तीर्थंकर भगवान्के जन्मका समाचार जान लिया तथा सभीने आकर सुमेरु पर्वतके मस्तक पर उनके जन्मकल्याणककी पूजा की, पार्श्वनाथ नाम रक्खा और फिर उन्हें माता-पिताके लिए समर्पित कर दिया ।। ९१-९२ ॥
“At that very moment, sensing the trembling of their thrones, all the Indras—beginning with Saudharma Indra—learned the news of the Tirthankara Lord’s birth. They all arrived, performed the birth-consecration rituals (Janma-kalyanaka Puja) upon the summit of Mount Sumeru, named Him Parshvanatha, and then lovingly returned Him to His mother and father.” (91-92)
श्लोक 93 से 105
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पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24 | श्लोक 25 से 32 | श्लोक 33 से 43 | श्लोक 44 से 53 | श्लोक 54 से 66 | श्लोक 67 से 79
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