राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 509 to 522
श्लोक ( Shlok ) 509 – 512
क्रमात्पावापुरं प्राप्य मनोहरवनान्तरे । बहूनां सरसां मध्ये महामणिशिलातले ॥ ५०९ ॥स्थित्वा दिनद्वयं वीतविहारो वृद्धनिर्जरः । कृष्णकार्तिकपक्षस्य चतुर्दश्यां निशात्यये ॥ ५१० ॥ स्वातियोगे तृतीयेद्धशुकृध्यानपरायणः । कृतत्रियोगसंरोधः समुच्छिन्नक्रियं श्रितः ॥ ५११ ॥हताघातिचनुष्कः सन्नशरीरो गुणात्मकः । गन्ता मुनिसहस्त्रेण निर्वाणं सर्ववान्छितम् ॥ ५१२ ॥
अन्तमें वे पावापुर नगरमें पहुँचेंगे वहाँ के मनोहर नामके वनके भीतर अनेक सरोवरोंके बीचमें मणिमयी शिलापर विराजमान होंगे। विहार छोड़कर निर्जराको बढ़ाते हुए वे दो दिन तक वहाँ विराजमान रहेंगे और फिर कार्तिककृष्ण चतुर्दशीके दिन रात्रिके अन्तिम समय स्वातिनक्षत्रमें अतिशय देदीप्य-मान तीसरे शुक्लध्यानमें तत्पर होंगे । तदनन्तर तीनों योगोंका निरोधकर समुच्छिन्नक्रियाप्रति-पाती नामक चतुर्थ शुक्लध्यानको धारण कर चारों अघातिया कर्मोंका क्षय कर देंगे और शरीररहित केवलगुण रूप होकर एक हजार मुनियोंके साथ सबके द्वारा वान्छनीय मोक्षपद प्राप्त करेंगे ।। ५०९-५१२ ॥
At last, they will arrive in the city of Pawapur. There, within a beautiful forest named Manohar, they will seat themselves upon a gem-studded slab of stone amidst numerous lakes. Ceasing their wanderings and accelerating the shedding of past karmas (nirjara), they will remain seated there for two days. Subsequently, during the final hours of the night on the fourteenth day of the dark fortnight of the month of Kartik (Kartik Krishna Chaturdashi), under the Swati constellation (nakshatra), they will immerse themselves in the intensely brilliant third stage of pure meditation (shukla dhyana).
Thereafter, by restraining all three activities of mind, speech, and body (yogas), they will attain the fourth stage of pure meditation known as Samucchinnakriya-pratipati. Through this, they will destroy the four non-destructive (aghatiya) karmas, become completely liberated from the physical body to exist purely as infinite virtues, and finally attain the universally yearned-for state of liberation (moksha) along with one thousand sages. || 509-512 ||
श्लोक ( Shlok ) 513 – 522
तदेव पुरुषार्थस्य पर्यन्तोऽनन्तसौख्यकृत् । अथ सर्वेऽपि देवेन्द्रा वह्वीन्द्रमुकुटस्फुरत् ॥ ५१३ ॥हुताशनशिखान्यस्ततद्देहा मोहविद्विषम् । अभ्यर्च्य गन्धमाल्यादिद्रव्यैदिव्यैर्यथाविधि ॥ ५१४ ॥वन्दिष्यन्ते भवातीतमथ्यैर्वन्दारवः स्तवैः । वीरनिर्वृतिसम्प्राप्तदिन एवास्तघातिकः ॥ ५१५ ॥भविष्याम्यहमप्युद्यत्केवलज्ञानलोचनः । भव्यानां धर्मदेशेन विहृत्य विषयांस्ततः ॥ ५१६ ॥ गत्वा विपुलशब्दादिगिरौ प्राप्स्यामि निर्वृतिम् । मन्निर्वृतिदिने लब्धा सुधर्मः श्रुतपारगः ॥ ५१७ ॥लोकालोकावलोकैकालोकमन्त्यविलोचनम् । तन्निर्वाणक्षणे भावी जम्बूनामात्तकेवलः ॥ ५१८ ॥अन्त्यः केवलिनामस्मिन्भरते स प्ररूप्यते । नन्दी मुनिस्ततः श्रेष्ठो नन्दिमिन्त्रोऽपराजितः ॥ ५१९ ॥गोवर्धनश्चतुर्थोऽन्यो भद्रबाहुर्महातपाः । नानानयविचित्रार्थसमस्तश्रुतपूर्णताम् ॥ ५२० ॥ एते क्रमेण पञ्चापि प्राप्स्यन्त्याप्तविशुद्धयः । ततो भावी विशाखार्यः प्रोष्ठिलः क्षत्रियान्तकः ॥ ५२१ ॥जयनामानुनागाद्धः सिद्धार्थो धृतिषेणकः । विजयो बुद्धिलो गङ्गदेवश्च क्रमतो मताः ॥ ५२२ ॥
वही उनका, अनन्त सुखको करनेवाला सबसे बड़ा पुरुषार्थ होगा – उनके पुरुषार्थकी वही अन्तिम सीमा होगी । तदनन्तर इन्द्रादि सब देव आवेंगे और अग्नीन्द्रकुमारके मुकुटसे प्रज्वलित होनेवाली अग्निकी शिखा पर भगवान् महावीर स्वामीका शरीर रक्खेंगे। स्वर्गसे लाये हुए गन्ध, माला आदि उत्तमोत्तम पदार्थोंके द्वारा मोहके शत्रुभूत उन तीर्थंकर भगवान्की विधिपूर्वक पूजा करेंगे और फिर अनेक अर्थोंसे भरी हुई स्तुतियोंके द्वारा संसार-भ्रमणसे पार होनेवाले उन भगवान्की स्तुति करेंगे। जिस दिन भगवान् महावीर स्वामीको निर्वाण प्राप्त होगा उसी दिन मैं भी घातिया कर्मोंको नष्ट कर केवलज्ञान रूपी नेत्रको प्रकट करनेवाला होऊँगा और भव्य जीवोंको धर्मोपदेश देता हुआ अनेक देशोंमें विहार करूँगा । तदनन्तर विपुलाचल पर्वतपर जाकर निर्वाण प्राप्त करूँगा। मेरे निर्वाण जानेके दिन ही समस्त-श्रुतज्ञानके पारगामी सुधर्म गणधर भी लोक और अलोकको प्रकाशित करनेवाले केवलज्ञान रूपी अन्तिम लोचनको प्राप्त करेंगे और उनके मोक्ष जानेके समय ही जम्बू स्वामी केवलज्ञान प्राप्त करेंगे। वह जम्बू स्वामी भरत क्षेत्रमें अन्तिम केवली कहलायेंगे ।इनके बाद नन्दी मुनि, श्रेष्ठ नन्दीमित्र, अपराजित, गोवर्द्धन और महातपस्वी भद्रबाहु मुनि होंगे । ये पाँचो ही मुनि अतिशय विशुद्धिके धारक होकर अनुक्रमसे अनेक नयोंसे विचित्र अर्थोंका निरूपण करनेवाले पूर्ण श्रुतज्ञानको प्राप्त होंगे अर्थात् श्रुतकेवली होंगे। इनके बाद विशाखार्य, प्रोष्ठिल, क्षत्रिय, जय, नागसेन, सिद्धार्थ, धृतिषेण, विजय, बुद्धिल, गङ्गदेव और बुद्धिमान् धर्मसेन ये ग्यारह अनु-क्रमसे होंगे तथा द्वादशाङ्गका अर्थ कहने में कुशल और दश पूर्वके धारक होंगे ।। ५१३-५२२ ।।
That indeed will be their greatest spiritual effort (purushartha), yielding infinite bliss—the ultimate culmination of their endeavors. Thereafter, Indra and all the celestial deities will arrive, and they will place the sacred body of Lord Mahavira Swami upon the flame of fire ignited from the crown of Agnikumar. Using the finest fragrances, garlands, and other sublime offerings brought from heaven, they will ritually worship the Lord Tirthankara, who was the destroyer of delusion (moha). They will then praise the Lord, who had crossed the cycle of worldly existence (samsara), with hymns rich in profound meanings.
On the very day Lord Mahavira Swami attains liberation (nirvana), I too shall destroy my destructive (ghatiya) karmas, manifest the eye of absolute knowledge (kevalajnana), and wander through various lands preaching the Dharma to worthy souls (bhavya jivas). Subsequently, I shall ascend the Vipulachala mountain and attain liberation.
On the day of my liberation, the master of all scriptural knowledge, Sudharma Ganadhara, will also attain the final vision of absolute knowledge (kevalajnana), which illuminates both the universe (loka) and the beyond (aloka). At the time of his liberation, Jambu Swami will attain absolute knowledge; this Jambu Swami shall be known as the last Kevali (omniscient being) in the Bharata region.
After him, there will be Sage Nandi, the noble Nandimitra, Aparajita, Govardhana, and the deeply ascetic Sage Bhadrabahu. Possessing exceptional purity, these five sages will sequentially attain the complete scriptural knowledge (shrutajnana) that expounds diverse meanings through multiple viewpoints (nayas); that is, they will be Shrutakevalis.
Following them, there will be eleven teachers in succession: Vishakharya, Prosthila, Kshatriya, Jaya, Nagasena, Siddhartha, Dhritishena, Vijaya, Buddhila, Gangadeva, and the wise Dharmasena. They will be highly skilled in explaining the meaning of the twelve limbs of Jain scriptures (Dvadashanga) and will be the holders of the ten Purvas. || 513-522 ||
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549 | चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 691
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111
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