आलोचना पाठ – छंद 5 से 7 : अर्थ एवं व्याख्या
छंद 5
शत आठ जु इमि भेदनतै, अघ कीने परिछेदन तै
तिनकी कहुं कोलो कहानी, तुम जानत केवलज्ञानी ॥5॥
शब्दार्थ
- शत आठ — 108
- भेदनतै — विभिन्न भेदों/प्रकारों के कारण
- अघ — पाप, दोष
- परिछेदन — प्रकारों या विभाजनों के अनुसार
- कहूँ कोलो कहानी — मैं उनकी कितनी-कितनी कहानी कहूँ?
- केवलज्ञानी — जिसे समस्त पदार्थों का पूर्ण ज्ञान है; जिनराज
हे प्रभु! इन १०८ भेदों के माध्यम से मैंने दूसरों को दुःख पहुँचाकर अनगिनत पाप (अघ) अर्जित किए हैं। अब वे स्वीकार करते हैं कि इन विभिन्न प्रकारों और भेदों के कारण उनसे असंख्य प्रकार के दोष हुए हैं। ‘१०८’ का उल्लेख यहाँ दोषों की व्यापकता और विविधता को व्यक्त करता है। कवि प्रत्येक पाप का अलग-अलग विवरण देने में असमर्थता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि हे केवलज्ञानी! आप तो मेरे प्रत्येक भाव और कर्म को जानते हैं,मैं अपने इन पापों की कहानी कहाँ तक कहूँ? आप तो ‘केवलज्ञानी’ हैं, सब कुछ प्रत्यक्ष जानते हैं। फिर भी अपने भावों की विशुद्धि के लिए आपके समक्ष अपने दोषों को स्वीकार करते हुए मैं आपकी शरण में आलोचना करता हूँ।
यहाँ एक अत्यंत गहरा आत्मावलोकन दिखाई देता है। मनुष्य अपने सभी दोषों को स्वयं पूरी तरह पहचान भी नहीं पाता। कई दोष जानबूझकर, कई अज्ञानवश, और कई असावधानी या कषायों के प्रभाव में हो जाते हैं। इसलिए आलोचना में केवल याद आने वाले अपराधों को नहीं, बल्कि ज्ञात-अज्ञात सभी दोषों के प्रति पश्चात्ताप और शुद्धि की भावना रखी जाती है।
छंद 6
विपरीत एकान्त विनय के, संशय अज्ञान कुनय के
वश होय घोर अघ कीने, वचतै नहि जाय कहीने ॥6॥
शब्दार्थ
- विपरीत — गलत, विपरीत।
- एकान्त — किसी विषय के केवल एक पक्ष को ही पूर्ण सत्य मानना।
- विनय — श्रद्धा/आदर; यहाँ अनुचित व्यक्ति या मत के प्रति अंधी श्रद्धा का भाव।
- संशय — संदेह, दुविधा।
- अज्ञान — सही ज्ञान का अभाव।
- कुनय — गलत नय या गलत दृष्टिकोण।
- घोर अघ — अत्यंत गंभीर पाप।
- वचतै नहि जाय कहीने — जिसे शब्दों में पूरा कहा नहीं जा सकता।
जीव अनादि काल से अज्ञान और पाप कर्मों के वशीभूत होकर ५ प्रकार के मिथ्यात्व का सेवन करता आया है। मिथ्यात्व ही समस्त दुखों और संसार-परिभ्रमण की मूल जड़ है।
1. विपरीत मिथ्यात्व
वस्तु के सच्चे स्वरूप को न मानकर उससे बिल्कुल उल्टा (विपरीत) मानना।
- उदाहरण: जीव स्वयं शाश्वत, ज्ञान-स्वरूप और चैतन्य आत्मा है, किंतु वह स्वयं को शरीर, पुरुष, स्त्री, पिता, पुत्र आदि रूप मानने लगता है। यह चमड़ा (शरीर) तो एक दिन नष्ट होकर खाक हो जाने वाला है, किंतु आत्मा अजर-अमर है। देह को ही अपनी आत्मा मान लेना अनादि काल से चला आ रहा सबसे बड़ा ‘विपरीत मिथ्यात्व’ है।
2. एकांत मिथ्यात्व
वस्तु अनेक धर्मात्मक (अनेकांत स्वरूप) होती है, किंतु उसके केवल एक ही पक्ष को पकड़कर उसी को सर्वथा सत्य मान लेना और अन्य पक्षों को नकार देना।
- उदाहरण: केवल बाह्य क्रियाकांड को ही धर्म मान लेना और सोचना कि बिना आत्म-ज्ञान के केवल क्रियाओं से मोक्ष मिल जाएगा। अथवा इसके विपरीत, केवल कोरे ज्ञान की बातें करना और राग-द्वेष, कषायों को दूर करने का कोई आचरण (साधन) न करना—ये दोनों एकांतवादी दृष्टिकोण ‘एकांत मिथ्यात्व’ हैं।
- द्रव्य दृष्टि से देखें तो प्रत्येक वस्तु स्थिर है, नित्य है; और पर्याय दृष्टि से अनित्य है। लेकिन कोई सर्वथा माने कि नहीं, वस्तु तो सर्वथा नित्य ही है, अथवा कहे अनित्य ही है—ऐसा मानना एकांत मिथ्यात्व है।
3. विनय मिथ्यात्व
सच्चे और झूठे में बिना विवेक किए सभी को एक समान मानकर सम्मान और वंदन करना।
- उदाहरण: सच्चे देव-शास्त्र-गुरु (जो वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी हैं) के साथ-साथ कुदेव, कुशास्त्र और कुगुरुओं (जो रागी-द्वेषी हैं) को भी अपने स्वार्थ या काम निकालने के लिए नमस्कार करना। तो विनय माने इधर भी सिर पटक देना, उधर भी पटक देना—उससे क्या है? “सब भगवान एक हैं, सबका मालिक एक है। तेरे नाम अनेक, तू एक ही है।” भगवान के नाम अनेक-अनेक हैं—ईश्वर, अल्लाह, वाहेगुरु… और ये सब कहते हैं ना, प्रार्थना लोग गाते हैं स्कूलों में! वहाँ पढ़ाते हैं कि ऐसे हैं, सब एक हैं। “तेरे नाम अनेक, तू एक ही है।” वहाँ कहते हैं नाम अनेक हैं—चाहे उसको ईश्वर कहो, चाहे अल्लाह कहो, चाहे वाहेगुरु कहो—लेकिन वह सब एक ही है। ऐसा पढ़ाते हैं।
रत्नकरंड श्रावकाचार के अनुसार: जो दोषों से रहित, सर्वज्ञ और हितोपदेशी आप्त हैं, वही सच्चे देव हैं। सर्वथा कुगुरुओं और कुदेवों का वंदन करना ‘विनय मिथ्यात्व’ है।
4. संशय मिथ्यात्व
तत्त्व ज्ञान और जिनवाणी के सत्य स्वरूप में निरंतर शंका या संशय बनाए रखना।
- उदाहरण: यह सोचना कि “पता नहीं जैन धर्म में धर्म है या किसी अन्य मार्ग में? हिंसा में धर्म है या अहिंसा में?” वस्तु स्वरूप की सत्य परीक्षा न करके “यहाँ भी धर्म हो सकता है, वहाँ भी हो सकता है” ऐसा ढुलमुल विचार रखना और संशय में ही बने रहना ‘संशय मिथ्यात्व’ है।
- संशय मिथ्यात्व माने—भगवान के द्वारा जो भी वस्तु का स्वरूप कहा गया है, उसमें संदेह रखना (डौट)। संसार और मोक्ष की चर्चा की है, तो उसमें भी संदेह बने रहना—”यह बात कही तो है, क्या पता सही है कि नहीं, सही है कि नहीं? संसार में दुख है कि सुख है? मोक्ष में सुख है भी कि नहीं है? होगा भी कि नहीं?” यानी इस तरह से संशय बने रहना, डाउट बने रहना… उसको कहते हैं संशय मिथ्यात्व।
5. अज्ञान मिथ्यात्व
हित और अहित का कोई विवेक न रखना तथा सत्य ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास ही न करना।
- उदाहरण: यह सोचकर जिनवाणी न पढ़ना या तत्त्व-अभ्यास न करना कि “पढ़ने से नियम-संयम लेने पड़ेंगे, इसलिए जैसा मन में आए वैसा करो।” अपने भले-बुरे का विचार किए बिना केवल विषय-भोगों और अज्ञानजन्य क्रियाओं में लगे रहना ‘अज्ञान मिथ्यात्व’ है।
- अज्ञान माने—कोई जानकारी ही नहीं है, कुछ पता ही नहीं है! यह और खतरनाक मिथ्यात्व है। अन्य में तो कुछ पता भी था, तो सुधारने की संभावना थी; यहाँ तो कुछ पता ही नहीं है! जानकारी ही नहीं है और जानने की इच्छा भी नहीं है, ऐसा! इसको कहते हैं अज्ञान मिथ्यात्व।
“बस होय घोर अघ कीने”—माने इन मिथ्यात्व के पाँचों भेद जो हैं, इन भेदों के वश होकर—इनके वश होकर, इन मिथ्यात्व के पाँचों भेद उनके वश होकर, “घोर अघ कीने”… घोर माने बहुत ज़्यादा, अघ माने पाप, कीने माने किए हैं!
जिनको “बचते नहिं जाय कहीने”—बचते माने वचनों से, नहीं जाय कहीने… कहा नहीं जा सकता! जिनको वचनों से कहा नहीं जा सकता है, ऐसे घोर पाप किए हैं। वह मैंने ही किए हैं और मैं यह सब आपके सामने कह रहा हूँ
छंद 7
कुगुरुन की सेवा किनी, केवल अदया करि भीनी
या विधि मिथ्यात भ्रमायो, चहुँ गति मधि दोष उपायों ॥७॥
शब्दार्थ
- कुगुरु — जो स्वयं सम्यक् मार्ग पर स्थित न हो और दूसरों को भी सही मार्ग न दिखाए।
- सेवा किनी — सेवा की, अनुसरण किया।
- अदया — दया का अभाव।
- मिथ्यात — मिथ्यात्व, गलत श्रद्धा/विपरीत विश्वास।
- भ्रमायो — भ्रमित हुआ।
- चहुँ गति — चार गतियाँ—मनुष्य, देव, तिर्यंच और नरक।
- दोष उपायों — दोष उत्पन्न किए/बाँधे।
क्या बोल रहे हैं? कुगुरुओं की सेवा की। … क्या किया? यह हमने सब ऐसे ही किया है, माने अपनी-अपनी बता रहे हैं। “कुगुरुन की सेवा कीनी”—कि कुगुरुओं की सेवा की। कुगुरु कौन होते हैं?
धारैं कुलिंग लहि महत भाव, ते कुगुरु जन्मजल उपलनाव —अपन ने ‘छहढाला’ (दूसरी ढाल, छंद १०) में सबने पढ़ लिया है। ऐसे कुगुरु जो पत्थर की नौका के समान हैं, राग-द्वेष से युक्त हैं, अनेक प्रकार के वेश बनाकर घूमते हैं; जिनको न अपनी खबर है, न दूसरे की खबर है। बस वस्त्र अनेक प्रकार के पहन लिए और अपने आप को साधु-संत मानने… मानकर बैठ गए! ऐसे वे सब कुगुरु कहलाते हैं। जिनके अंदर-अंदर भी राग-द्वेष भरा पड़ा है, अंदर भी कषायें पल रही हैं और बाहर में भी परिग्रह… अनाप-शनाप खूब परिग्रह इकट्ठा कर रखा है, खाने-पीने का कोई ठिकाना नहीं है—ऐसे सब कोई गुरु नहीं हो सकते हैं, ये सब कुगुरु हैं।
तो क्या किया मैंने? “कुगुरुन की सेवा कीनी“—ऐसे कुगुरुओं की सेवा की। और “केवल अदया करि भीनी”—केवल माने मात्र। इनकी सेवा कैसे की? “अदया करि“… दया माने तो दया तो जानते ही हैं सब—कृपा; और ‘अदया करि’ माने उसका उल्टा कर दें—क्रूरता कहें अथवा अदया माने हिंसा करें, उससे ‘भीनी’ माने भरी हुई, उससे युक्त! माने क्रूरता से युक्त होकर… यह क्रूरता से युक्त होकर क्यों? क्योंकि कुगुरुओं की सेवा ऐसी तो है, वही तो बताते हैं—हिंसा में धर्म है, यज्ञ करो, यह जलाओ, वह जलाओ, बलि चढ़ाओ… यह सारे काम करते हैं और उनकी सेवा की, तो ऐसे ही क्रूरता से युक्त हमने भी परिणाम ऐसे ही किए!
और उससे क्या हुआ? “या विधि मिथ्यात बढ़ायाो“—या विधि माने इस विधि से, कुगुरुओं की सेवा करके इस विधि से मिथ्यात्व को बढ़ाया। मिथ्यात्व को बढ़ाया मतलब एक तरह से गृहीत मिथ्यात्व का ही पोषण किया। अनादि का अगृहीत तो था ही और मिथ्यात्व बढ़ाया—इसका मतलब मिथ्यात्व को, गृहीत मिथ्यात्व का ही सेवन करते रहे।
और “चौगति मधि दोष उपायो”—चारों गतियों के… ‘चौगति मधि’… देखिए मराठी में भी ‘मधि’ ही आता है, इधर भी ‘मधि’ है। मधि मतलब ‘में’। चारों गतियों में ‘दोष उपायो’—दोषों को उत्पन्न किया। ऐसा करते रहे और इस तरह से संसार में ही मिथ्यात्व को बढ़ाते रहे। मैंने जो है चारों गतियों में इस तरह से दोष को बढ़ाता गया हूँ और एक्यूमुलेट (accumulate) करता गया हूँ, और मिथ्यात्व को बढ़ाते-बढ़ाते साथ में और क्या-क्या गलत काम किया? पाँचों पाप किए! कौन-कौन से पाप किए? आठवें छंद से कहते हैं।
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