छहढाला – तीसरी ढाल छंद 5 – मध्यम, जघन्य अन्तरात्मा तथा सकल परमात्मा का स्वरूप
मध्यम अन्तर आतम हैं जे, देशव्रती अनगारी। जघन कहे अविरत समदृष्टी, तीनों शिवमगचारी ॥
सकल निकल परमातम द्वैविध, तिनमें घाति निवारी। श्री अरिहन्त सकल परमातम, लोकालोक-निहारी ॥5 ॥
अन्वयार्थ – (अनगारी) गृह आदि परिग्रह रहित छट्टे गुणस्थानवर्ती दिगम्बर मुनि और (देशव्रती) बारह व्रतों को धारण करने वाले श्रावक (मध्यम) मध्यम (अन्तर आतम) अन्तरात्मा (हैं) हैं और (अविरत) बारह व्रत रहित (समदृष्टि) सम्यग्दृष्टि जीव (जघन) जघन्य अन्तरात्मा (कहे) कहे गये हैं (तीनों) ये तीनों अन्तरात्मा (शिवमगचारी) मोक्षमार्ग पर चलने वाले हैं। (सकल निकल) सकल और निकल के भेद से (परमातम) परमात्मा (द्वैविध) दो प्रकार के हैं (तिनमें) उनमें (घाति) चार घातिया कर्मों के (निवारी) नाश करने वाले (लोकालोक) लोक और अलोक के (निहारी) जानने देखने वाले (श्री अरिहंत) अन्तरंग और बहिरंग लक्ष्मी सहित अरिहंत परमेष्ठी (सकल) सकल (परमातम) परमात्मा हैं।
अर्थ – यह इतना सुंदर वर्णन है, कि इसको अगर आप ऊंघते हुए भी सुन लो, तो इसके संस्कार आपको कभी-कभी लाभ पहुंचाएंगे। क्योंकि यह आत्मा-परमात्मा की चर्चा है। चौबीस घंटे में आत्मा-परमात्मा की चर्चा कितनी देर हो पाती है?
यह तो हम समझते हैं कि भाग्यशाली लोग हैं आप जो यहां पर इस चर्चा को सुन रहे हैं। एक तो बहिरात्मा की बात समझ में आ गई, फिर अंतरात्मा तीन प्रकार के हैं। तो जो देशव्रती हैं, यानी 11 प्रतिमाओं के धारी हैं और अनगार, अनगार यानी जो मुनि हैं, लेकिन शुद्धोपयोगी नहीं हैं, वो मध्यम अंतरात्मा हैं। यानी मध्यम अंतरात्मा होने के लिए कम से कम वृति होना अनिवार्य है, वो अनुव्रत हो या महाव्रत हो। लेकिन उत्तम अंतरात्मा के लिए शुद्धोपयोग अपेक्षित है। मध्यम अंतरात्मा किन्हें कहेंगे? मध्यम अंतरात्मा है जो देशव्रती हैं। देशव्रती का मतलब एक प्रतिमा, दो प्रतिमा, लेखे-लेखे छुल्लक महाराज, एलक महाराज, छुल्लिका और आर्यिका माताजी। इन सबके ये कहलाते हैं देशव्रती, ये हुए मध्यम अंतरात्मा।
फिर जगन कहे अविरत सम्यक दृष्टि। जघन्य जो है वो अविरत सम्यक दृष्टि। जो वृति नहीं है, लेकिन सम्यक दृष्टि है, वो जघन्य अंतरात्मा है। तीनों शिव मग चारी, ये तीनों ही मोक्ष मार्ग के चारी यानी उस पर विचरण करने वाले हैं। अब यहां पर नए दृष्टि को समझ लेना पड़ेगा। ग्रस्त मोक्ष मार्गस्थ।
क्या अविरति वास्तव में मोक्ष मार्गी होता है? निश्चय से विचार करना। तो उसका उत्तर है कि जब तक व्रत संयम नहीं है, तब तक वो देश चारित्र और सकल चारित्र से भी रहित होता है।और जब तक देश चारित्र या सकल चारित्र न हो, तब तक सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र इन तीन में से मात्र दो रहेंगे। और ये दो रहेंगे ऐसा हम कहां से कह रहे हैं, हम अपने मन से नहीं कह रहे हैं, ये तत्त्वार्थ राजवार्तिक में और धवल ग्रंथ में उल्लिखित है, कि जो अविरत सम्यक दृष्टि होता है, उसके पास दो रत्न होते हैं, तीन रत्न केवल कर्म भूमि मनुष्य वृति के पास होते हैं, और तिर्यञ्च (पशु-पक्षी) भी देशव्रती हो तो फिर उनके पास तीन रत्न होते हैं।
तो तीन रत्नों के जो धारी होते हैं, वही मोक्ष मार्गी माने जाते हैं क्योंकि तत्त्वार्थ सूत्र का पहला सूत्र है— सम्यक दर्शन ज्ञान चारित्राणी मोक्षमार्ग। लेकिन फिर भी जिसको मार्ग समझ में आ गया, अथवा मार्ग दिख गया है, तो फिर उसका हृदय कहता है कि अब मिल गया मार्ग। मिल गया तो शिव मार्ग चारी, ये उपचार कथन है।
जघन्य अंतरात्मा कौन है? जघन कहे अविरत सम्यक दृष्टि, जघन्य अंतरात्मा कहा गया है उनको, जो अविरत सम्यक दृष्टि हैं, अर्थात जिन्होंने कोई व्रत नहीं लिए हैं। व्रत ले लिए तो देशव्रती हो गए, मुनि बन गए तो मुनि हो गए, और मुनि और देशव्रती ये हो गए मध्यम अंतरात्मा। लेकिन सम्यक दर्शन तो हो गया और व्रतों को नहीं लिया, तो जघन्य अंतरात्मा कहे गए हैं। अर्थात ये तीनों मोक्ष मार्ग पर चलेंगे। अविरत सम्यक दृष्टि आगे चलेंगे, देशव्रती आगे बढ़ेंगे, मुनि महाराज ये तो है ही मोक्ष मार्ग में चलने वाले। मोक्ष मार्ग प्रारंभ कहां से होता है? नग्गो ही मोक्कमग्गो, आचार्य कुंदकुंद कहते हैं, नग्नता ही मोक्ष मार्ग है।
इसलिए मोक्ष मार्ग का प्रारंभ कहां से? छठे गुणस्थान मुनि महाराज से, उससे पहले वृत्ति और आर्यिका तक ये सब क्या है? मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ने वाली हैं, अभी चलने वाली नहीं। तीनों ही इस तरह मोक्ष मार्ग पर चलने वाले हैं।
आपने भी मुनिराज को उत्तम अंतरात्मा और मध्यम अंतरात्मा ऐसा क्यों? मतलब दोनों में क्यों लिया? देखो, मुनि महाराज का जो उपयोग होता है, वो शुभोपयोग और कभी शुद्धोपयोग। जब मुनि महाराज प्रवृत्ति में हैं, प्रवचन दे रहे हैं, चर्चा कर रहे हैं, आहार विहार में हैं, तब प्रवृत्ति में हैं, गुणस्थान छठा और सातवां। और जब वो निवृत्ति में शुद्धोपयोग में हैं, तब सातवां। तो जो मुनि महाराज प्रवृत्ति में हैं, अभी कुछ भी कर रहे हैं, चाहे सामायिक करें या कुछ भी करें या भक्ति में लगे हैं, तब गुणस्थान छठा सातवां लेकिन शुभोपयोगी मध्यम अंतरात्मा।
और जब वे अपने आत्मा में लीन हैं, शुद्धोपयोगी हैं, तब उत्तम अंतरात्मा। उत्तम अपने आत्मा से हटे, तो फिर मध्यम अंतरात्मा हो गए, फिर अपनी आत्मा में पहुंचे, तो उत्तम अंतरात्मा हो गए।
माने सप्त व्यसन का त्याग किया है, तथा अष्टमूल गुण धारण किए हैं, तो मैं कौन सी अंतरात्मा हूं? आपने सप्त व्यसन त्याग किए, अष्टमूल गुण धारण किए, अभी आप पाक्षिक श्रावक हुए। आपको जैन धर्म का पक्ष है, अगर आप थोड़ा और आगे बढ़ जाएं और पहली प्रतिमा ले लें, तब तो कहलाएंगे मध्यम अंतरात्मा। और पहली प्रतिमा नहीं ली, तब तक जघन्य अंतरात्मा कहलाएंगे।
अगर सम्यक दर्शन नहीं हुआ, तो बहरात्मा कहलाएंगे। तो अगर सम्यक तो नहीं है तो बहरात्मा, अगर शरीर और आत्मा को एक मानते हैं, अगर आपने सप्तव्यसन का त्याग कर दिया हो, लेकिन प्रतिमा नहीं ली है एक, तो जघन्य अंतरात्मा। एक प्रतिमा भी ले ली, तो मध्यम अंतरात्मा।
अब देखते हैं परमात्मा। सकल और निकल परमातम द्वै विधि, परमात्मा दो प्रकार के हैं। एक सकल परमात्मा और एक निकल परमात्मा। एक शरीर सहित, एक शरीर से रहित। सकल का मतलब अरहंत भगवान, निकल का मतलब सिद्ध भगवान, दो परमात्मा हैं।
ज्ञान शरीरी। परमातम द्वैविध, परमातम दो प्रकार के हैं—परमात्मा। कौन से दो प्रकार के हैं? रागी और वीतरागी? क्योंकि परमात्मा रागी नहीं होते। जैन दर्शन में परमात्मा जो होते हैं, वो वीतराग ही होते हैं। तो वीतराग परमात्मा के दो भेद बताए। लेकिन मात्र वीतराग होते हैं, ऐसा नहीं है। वीतरागता के साथ और विशेषण भी है। वीतराग सर्वज्ञ नहीं होते, नियम से। हितोपदेशी का नियम नहीं है। परमात्मा वीतराग और सर्वज्ञ होते हैं, यह नियम है। याद रहेगा आपको? परमात्मा वीतराग सर्वज्ञ तो होते ही हैं। और अगर तीर्थंकर हुए, तो हितोपदेशी भी नियम से होंगे। बाकी केवलज्ञानी होंगे, तो वो परमात्मा तो अवश्य हैं, लेकिन उपदेशित है, ऐसा कोई नियम नहीं है। कई ऐसे केवलज्ञानी होते हैं, जिनका उपदेश कभी नहीं होता।
मोक्ष चले गए, तो फिर भगवान क्यों नहीं होंगे? मोक्ष जाने के पहले तो अरिहंत होना पड़ता है। पहले अरिहंत होते हैं, फिर सिद्ध होते हैं। ये क्रम है। जो अरिहंत हुए हैं, वो अवश्य सिद्ध होंगे और जो सिद्ध हुए हैं, वो अवश्य अरिहंत हुए थे। जो सिद्ध होंगे, वो पहले अरिहंत नियम से बनेंगे। और जो अरिहंत है, वो आगे सिद्ध नियम से बनेंगे, ऐसा है।
तो दो प्रकार के परमात्मा हो गए—अरिहंत और सिद्ध। तो अरिहंत जो हैं, सकल, निकल ऐसे दो भेद किए ना?
सकल का अर्थ होता है शरीर। कल यानी शरीर। कलेवर भी शब्द होता है एक। इंग्लिश में उसको कैडेवर (Cadaver) बोलते हैं। कुछ इंग्लिश के शब्द जो हैं, वो यहां संस्कृत से निकले हुए हैं। द्वार को डोर बोलते हैं इंग्लिश में। द्वार है ना संस्कृत में? तो द्वार और Door डोर में ज्यादा फर्क थोड़ी है। द्वार को डोर बोलते हैं। ऐसे कई शब्द हैं। स्मिथ, स्मिथ यानी मुस्कुराना, हंसना। उसी को इंग्लिश में स्माइल Smile बोलते हैं।
तो सकल और निकल दो प्रकार के परमात्मा हैं। तो इनमें घाती निवारी, घाती कर्म का निवारण करने वाले, कौन से घाती कर्म?
तिनमें, उन दोनों में घाती निवारी, घातिया कर्मों को जिन्होंने दूर कर दिया है, अर्थात चार घातिया कर्मों से रहित ऐसे श्री अरहंत भगवान जीव हैं, वे सकल परमात्मा हैं।
ये कैसे होते हैं अरहंत भगवान? केवलज्ञानी और ये लोक और अलोक को निहारी, जानने वाले होते हैं। लोकालोक से क्या लेना? लोक का मतलब जितने आकाश के अंदर अन्य सब द्रव्य पाए जाए वो लोक। आकाश कितना है? अनंत। और उसके थोड़े से हिस्से में, जितना हिस्सा जो नक्शे में बना हुआ मिलता है ना, ऐसा, उसमें सब द्रव्य पाए जाते हैं। तो आकाश के जितने हिस्से में अन्य द्रव्य पाए जाए वो लोक या लोकाकाश, और उसके अलावा शेष आकाश जहां आकाश ही आकाश है और कुछ नहीं, अलोकाकाश। जो केवली भगवान होते हैं, वो अपने ज्ञान में लोक को भी जानते हैं और अलोक को भी जानते हैं, उनके ज्ञान से कुछ भी बचा हुआ नहीं।
अब निकल परमात्मा की परिभाषा
छंद 6 – निकल परमात्मा का स्वरूप और उसके ध्यान का उपदेश
ज्ञानशरीरी त्रिविध कर्ममल वर्जित, सिद्ध महन्ता। ते हैं निकल अमल परमातम, भोगैं शर्म अनन्ता ॥
बहिरातमता हेय जानि तजि, अन्तर आतम हुजै । परमातम को ध्याय निरन्तर, जो नित आनन्द पूजै ॥6॥
अन्वयार्थ (ज्ञान शरीरी) ज्ञान ही है शरीर जिनका ऐसे (त्रिविध कर्म) तीन प्रकार के ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म, रागादि भावकर्म और शरीरादि नोकर्म रूप (मल) मैल से (वर्जित) रहित (अमल) निर्मल (महंत) पूज्य (सिद्ध) सिद्ध परमेष्ठी (निकल) निकल (परमातम) परमात्मा हैं, वे (अनन्ता) अनन्त अर्थात् अपरिमित (शर्म) सुख को (भोगैं) भोगते हैं। इन तीनों में (बहिरातमता) बहिरात्मापन को (हेय) छोड़ने योग्य (जानि) जानकर (तजि) छोड़कर (अन्तर आतम) अन्तरात्मा (हुजै) होना चाहिए और (निरन्तर) सदा (परमातम को) परमात्मा का (ध्यान) ध्यान करना चाहिए (जो) परमात्मा का ध्यान (नित) नित्य अर्थात् अनन्त (आनंद) सुख (पूजै) प्राप्त कराता है।
अर्थ – निकल परमात्मा की परिभाषा— ज्ञान शरीरी, जिनका ज्ञान ही शरीर है, त्रिविध, तीन प्रकार के कर्म रूपी मल से जो रहित हैं, ऐसे सिद्ध भगवान, महंता जो महान हैं, वे निकल परमात्मा हैं।
जिनका ज्ञान ही शरीर है, जिन्होंने यह औदारिक शरीर छोड़ दिया है, केवली भगवान के शरीर होता है, सिद्ध भगवान के नहीं होता। तो जिनके ज्ञान ही शरीर है, और तीन प्रकार के कर्म रूपी मल से जो रहित हैं, तीन प्रकार का कर्म रूपी मल— द्रव्य कर्म, भाव कर्म और नोकर्म। द्रव्य कर्म, आत्मा के साथ लगे हुए जो कर्म रूपी मैल है ना, वो द्रव्य कर्म, पुद्गल। भाव कर्म, कर्म के उदय में आत्मा के राग-द्वेष रूप परिणाम भाव कर्म, वो भी सिद्धों में नहीं होते। नो-कर्म माने शरीर, सिद्धों के वो भी नहीं होता।
त्रिविध कर्म मल वर्जित। त्रिविध, त्रिविध का अर्थ क्या है? तीन, तीन प्रकार के। कर्म मल, कर्म रूपी मल से जो वर्जित है, वर्जित है यानी परे हैं, रहित हैं। तीन प्रकार के कर्म कौन से हैं? ये तीनों याद रखने की चीज है।
देखो, तीन की संख्या बहुत बार आती है जैन शास्त्रों में। तो ये भी तीन की संख्या आप लोगों को याद रखने योग्य है। एक तो तीन क्या है? रत्नत्रय है। सबको मालूम है। तीन लोक है। तीन दोष हैं। कौन से तीन दोष हैं? राग, द्वेष, मोह। फिर तीन दंड हैं। तीन दंड किसको कहते हैं? मन, वचन और काय। इसी प्रकार ये तीन प्रकार के कर्म कौन से हैं? एक नौकर्म, नौकर्म, दूसरा द्रव्य कर्म और तीसरा भाव कर्म। कहीं है? ठीक है
हमारे पास तीनों मैल हैं— हमारी आत्मा कर्म मैल से मैली है, द्रव्य कर्म लगे हैं, भाव कर्म हमारी आत्मा में राग-द्वेष रूप परिणाम होते हैं। और नो-कर्म अर्थात शरीर, शरीर हमारा है। तो नौकर्म किसको कहते हैं? जो कर्म के फल को प्राप्त करने में सहायक होता है, उसको नौकर्म कहते हैं।सिद्ध भगवान के ना कर्म है, ना राग-द्वेष है, ना शरीर है।
तो क्या कहा? तीनों प्रकार के कर्म रूपी मल से जो रहित हैं, ऐसे सिद्ध महंता, सिद्ध भगवान हैं। ते हैं निकल, वे निकल परमात्मा हैं, अमल, समस्त मलों से रहित हो गए हैं, ऐसे परमात्मा हैं। क्या करते हैं वे? भोगते हैं अनंत सुख को। अब कहां पर हैं? ऊपर सिद्धालय में विराजमान, क्या कर रहे हैं? कर्म नष्ट हो जाने के कारण अनंत सुख को भोग रहे हैं, एकदम आकुलता से रहित मोक्ष की उनको प्राप्ति हो गई है।
हमें फिर क्या करना? जीव के भेद, बहरात्मा, अंतरात्मा, परमात्मा हमने समझ लिए। अब हमें करना क्या है? बहरातम ता, मतलब बहरात्मा पना हेय, माने त्यागने योग्य जानकर, तजी, माने छोड़ दो। बहरात्मा की क्या परिभाषा थी? जो शरीर और आत्मा को एक मानता है, देह-जीव को एक गिने। हमें क्या करना चाहिए? शरीर अलग, आत्मा अलग। मैं आत्मा हूं, शरीर नहीं, शरीर तो मुझे मिला है कर्म दे के कारण, पर मेरा स्वरूप नहीं।अगर ऐसा करेंगे ना, तो बहरात्मा पना छूट जाएगा। तो बहरात्मा पना तो त्यागने योग्य जानकर छोड़ दो।
फिर क्या करें? अंतर आतम हूजे, अंतरात्मा हो जाइए। बहरात्मा छोड़ो, अंतरात्मा बनो। अंतरात्मा के बाद परमात्मा की बात करो। और क्या करें फिर? और हमें क्या करना? परमातम को ध्याय निरन्तर, और निरंतर परमात्मा का ध्यान करें। जो नित आनंद पूजे, कैसे परमात्मा हैं? जो अनंत सुख में डूबे हुए हैं। ऐसे अरहंत और सिद्ध भगवान का हमें ध्यान करें।
इस सबके समझने से हमें क्या फायदा हुआ? नीचे की दो पंक्तियों में लिखा— शरीर और आत्मा को अगर तुम एक जानते हो, तो बहरात्मा हो। क्या करूं? बहरात्मा पना छोड़ दो। अर्थात शरीर को अलग और आत्मा को अलग जानो। मैं आत्मा हूं, मैं शरीर नहीं हूं।
और क्या करें? और आगे सम्यक दर्शन प्राप्त करके पहले जघन्य अंतरात्मा बनो। उसके बाद व्रतों को धारण करके मध्यम अंतरात्मा बनो। और जो पुरुष हैं, वे मुनि महाराज बनके, शुद्धोपयोगी मुनि बनके उत्तम अंतरात्मा बनें।
यहां तक इस पंचम काल में हो सकता है। परमात्मा बनने की बात इस पंचम काल में संभव नहीं। तो क्या करें परमात्मा के लिए? परमात्मा का निरंतर ध्यान करें। ये सर्वोत्कृष्ट आत्माएं हैं, मुझको ऐसा बनना है। ऐसा दिन कब आएगा? जब मैं अरहंत पद प्राप्त करूं और सिद्ध बन जाऊंगा।
कैसे हैं परमात्मा? जो नित, माने हमेशा रहने वाले आनंद में पूजे, डूबे रहते हैं, उस रूप जो हो गए हैं, वे।
सिद्ध भगवान कहां पर विराजते हैं? इस लोक में सबसे ऊपर सिद्धशिला है। सिद्धशिला के ऊपर तीन वातवलय हैं। उनमें सबसे ऊपर के वातवलय में, सबसे लास्ट में एंड जाकर सिद्ध भगवान विराजते हैं। वो ऊपर भी जा सकते हैं, लेकिन ऊपर धर्मास्तिकाय, धर्मद्रव्य नहीं है, इसलिए बस वहीं जाकर रुक जाते हैं।
वहां क्या है? उसे कहते हैं हम सिद्धालय। उसमें सारी सिद्ध आत्माएं विराजमान रहती हैं।
क्या भगवान का कोई आकार भी होता है? हां, क्यों नहीं? देखो, जब तक यहां संसार में थे, तब तक उनकी आत्मा शरीर प्रमाण थी। जैसे मान लो भगवान महावीर, उनकी आत्मा सात हाथ। जैसे बाहुबली स्वामी 525 धनुष। जितना बड़ा शरीर, उससे कुछ कम आत्मा का आकार होता है। और उतने आकार होता है आत्मा का। हाथी की आत्मा का आकार हाथी जैसा, छोटे पुरुष का छोटा जैसा, बड़े पुरुष का बड़ा जैसा। आकार होता है।
अच्छा, तेरहवें गुणस्थान का जब अंत होता है, अरहंत परमेष्ठी भगवान के, तब वे आत्मप्रदेश अंतिम शरीर से कुछ कम हो जाते हैं। और शरीर नाम कर्म का उदय समाप्त हो जाता है। तो उसके बाद में चौदहवां गुणस्थान हुआ और जब सिद्ध बनते हैं, तब उसी आकार से वो आत्मप्रदेश वहां विराजमान रहते हैं।
मान लो, किन्हीं भगवान ने खड्गासन से और अंतिम मुक्ति पाई, तो उनके आत्मप्रदेश ऊपर खड्गासन से वैसे ही विराजमान होंगे। किसी ने पद्मासन से पाई, उनके पद्मासन से विराजमान होंगे। अंतिम शरीर जैसा होता है, आत्मप्रदेश उसी आकार से सिद्ध अवस्था में जाकर विराजमान रहते हैं।
अब सिद्ध भगवान संसार में दोबारा फिर कब लौटेंगे? क्यों लौटेंगे? संसार में जन्म-मरण तो कर्मों के कारण होता है। जब कर्म ही समाप्त हो गए, जब आयुकर्मी नहीं, जब और कर्म नहीं, तो जन्म-मरण का क्या काम? अब कभी भी नहीं लौटेंगे। और ये सिद्ध भगवान अनंतानंत काल तक ऐसे रहेंगे। इनके आत्मप्रदेशों में रंच मात्र भी हिलना-डुलना नहीं होता। ये निकल परमात्मा बन गए, अब बस अनंत काल तक बिल्कुल हिलन-डुलन नहीं, इनके आत्मप्रदेश ऐसे ही बैठे रहेंगे। कहां? ऊपर सिद्धालय में।
जो मान लो धातकीखंड द्वीप से मुक्त हुए हैं, वो उसके ऊपर विराजमान। जो भरत क्षेत्र जंबू द्वीप से हुए हैं, वो उसके ऊपर विराजमान। 45 लाख योजन विस्तार वाला जो मनुष्य लोक है, 45 लाख योजन विस्तार वाला सिद्ध लोक है। पूरा सिद्ध लोक अनंतानंत सिद्धों से भरा हुआ है, वे सब निकल परमात्मा हैं।
हमने क्या समझा? आत्मा तीन प्रकार की, जो जीव और शरीर को एक मानते हैं, मिथ्यादृष्टि हैं, बहरात्मा। जिनको सम्यक दर्शन हो गया, व्रत नहीं लिए, जघन्य अंतरात्मा। जिन्होंने प्रतिमा ले ली, छुल्लक, एलक, आर्यिका अवस्था हो गई, मध्यम अंतरात्मा। मुनि बन गए, शुभोपयोगी मध्यम अंतरात्मा। शुद्धोपयोग में मुनि महाराज आ गए, उत्तम अंतरात्मा।
अब चार घातिया कर्मों को नष्ट कर दिया, सकल परमात्मा। और आठों कर्मों को नष्ट कर दिया, तो निकल परमात्मा होते हैं। इस प्रकार जीव तत्व के बारे में सारा परिचय हमें यहां दौलत राम जी ने करा दिया। अब रहे शेष तत्व, उनकी चर्चा अब आगे होगी।
जिनवाणी पुत्र क्षुल्लक श्री ध्यानसागर जी महाराजजी और पंडित श्री रतन लाल जी बैनाडा के प्रवचन पर आधारित स्वाध्याय
छंद 7 व 8
छहढाला पहली ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 व 12 | छंद 13 व 14 | छंद 15 व 16 |
दूसरी ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 से 13 | छंद 14 व 15 |
तीसरी ढाल छंद 1 व 2 |