आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281
श्लोक 282 से 291 श्रीमंडप की शोभा
श्रीमंडप में फूल तारों-से लगते थे। मालाएँ कभी मुरझाती नहीं थीं। भ्रमर गुंजार से प्रकट होते थे। हंस शब्दों से पहचाने जाते थे। दीवालों में प्रतिबिंब चित्र-से थे। पहली वैडूर्य पीठिका थी।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 282 to 291
श्लोक ( Shlok ) 282
यो बभावम्बरस्यान्त बिंम्बितान्या म्बरोपमः । त्रिजगज्जनता स्थानसंग्रहावाप्त वैभवः ॥२८२॥
तीनों लोकों के समस्त जीवों को स्थान दे सकने के कारण जिसे बड़ा भारी वैभव प्राप्त हुआ है ऐसा वह श्रीमंडप आकाश के अंतभाग में ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो प्रतिबिंबित हुआ दूसरा आकाश ही हो । भावार्थ―उस श्रीमंडप का ऐसा अतिशय था कि उसमें एक साथ तीनों लोकों के समस्त जीवों को स्थान मिल सकता था, और वह अतिशय ऊँचा तथा स्वच्छ था ।।282।।
“That Shri Mandap, endowed with immense grandeur capable of accommodating all beings of the three worlds, shone resplendently at the edge of the sky. It appeared as if it were a reflection of another vast and infinite sky.
Meaning – The magnificence of that Shri Mandap was such that it could accommodate all beings of the three worlds at once. It was exceptionally lofty and crystal-clear in appearance.”282
श्लोक ( Shlok ) 283
यस्योपरितले मुक्ता गुह्यकैः कुसुमोत्कराः । विदधुस्तारकाशंकामधोभाजां नृणां हृदि ॥२८३॥
उस श्रीमंडप के ऊपर यक्षदेवों के द्वारा छोड़े हुए फूलों के समूह नीचे बैठे हुए मनुष्य के हृदय में ताराओं की शंका कर रहे थे ।।283।।
“Above that Shri Mandap, clusters of flowers scattered by the Yaksha deities created an illusion for the humans seated below, making them wonder if they were seeing stars in the sky.” 283
श्लोक ( Shlok ) 284
यत्र मतरु वद् भृंगसंसूच्याः कुसुमस्त्रजः । न म्लानिमीयुजैनांघ्रिच्छायाशैत्याश्रयादिव ॥२८४॥
उस श्रीमंडप में मदोन्मत्त शब्द करते हुए भ्रमरों के द्वारा सूचित होने वाली फूलों की मालाएँ मानो जिनेंद्रदेव के चरण-कमलों की छाया की शीतलता के आश्रय से ही कभी म्लानता को प्राप्त नहीं होती थीं―कभी नहीं मुरझाती थीं । भावार्थ―उस श्रीमंडप में स्फटिकमणि की दीवालों पर जो सफेद फूलों की मालाएँ लटक रही थीं वे रंग की समानता के कारण अलग से पहचान में नहीं आती थीं परंतु उन पर शब्द करते हुए जो काले-काले मदोन्मत्त भ्रमर बैठे हुए थे उनसे ही उनकी पहचान होती थी । वे मालाएँ सदा हरी-भरी रहती थीं कभी मुरझाती नहीं थीं जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो भगवान् के चरण-कमलों की शीतल छाया का आश्रय पाकर ही नहीं मुरझाती हों ।।284।।
“In that Shri Mandap, the garlands of flowers, indicated by the buzzing of intoxicated bees, seemed to never wither, as if they were eternally nourished by the cool shade of Lord Jinedra’s lotus feet.
Meaning – The white flower garlands hanging on the crystal-clear walls of the Shri Mandap blended with the background due to their color, making them indistinguishable. However, their presence was revealed by the buzzing of the dark, intoxicated bees perched upon them. These garlands remained ever fresh and never wilted, as if they were sustained by the cooling and divine shade of the Lord’s lotus feet.” 284
श्लोक ( Shlok ) 285
नीलोत्पलोपहारेषु निलीना भ्रमरावलिः । विरुतै रगमद् व्यक्तिं यत्र साम्यादलक्षिता ॥२८५॥
उस श्रीमंडप में नीलकमलों के उपहारों पर बैठी हुई भ्रमरों की पंक्ति रंग की सदृशता के कारण अलग से दिखाई नहीं देती थी केवल गुंजार शब्दों से प्रकट हो रही थी ।।285।।
“In that Shri Mandap, the rows of bees sitting on the offerings of blue lotuses were indistinguishable due to their similar color, revealing their presence only through their humming sounds.”285
श्लोक ( Shlok ) 286
योजनप्रमिते यस्मिन् सम्ममुर्नुसुरासुराः । स्थिताः सुखमसंबाधमहो माहात्म्यमीशितुः ॥२८६॥
अहा, जिनेंद्र भगवान् का यह कैसा अद्भुत माहात्म्य था कि केवल एक योजन लंबे-चौड़े उस श्रीमंडप में समस्त मनुष्य, सुर और असुर एक-दूसरे को बाधा न देते हुए सुख से बैठ सकते थे ।।286।।
“Ah! How wondrous was the majesty of Lord Jinedra that in that Shri Mandap, merely one yojana in length and breadth, all humans, gods, and demons could sit comfortably together without obstructing one another.”286
श्लोक ( Shlok ) 287
यस्मिन् शुचिमणिप्रान्तमुपेता हंससन्ततिः । गुणसादृश्य योगेऽपि व्यज्यते स्म विकूजितैः ॥२८७॥
उस श्रीमंडप में स्वच्छ मणियों के समीप आया हुआ हंसों का समूह यद्यपि उन मणियों के समान रंग वाला ही था―उन्हीं के प्रकाश में छिप गया था तथापि वह अपने मधुर शब्दों से प्रकट हो रहा था ।।287।।
“In that Shri Mandap, the flock of swans that had gathered near the radiant gems, though similar in color and seemingly hidden within their glow, revealed their presence through their sweet melodious sounds.” 287
श्लोक ( Shlok ) 288
यद्भितयः स्वसंक्रान्तजगत्त्रितयबिम्बिकाः । चित्रिता इव संरेजुर्जगच्छ्रीदर्पणश्रियः ॥२८८॥
जिनकी शोभा जगत् की लक्ष्मी के दर्पण के समान है ऐसी श्रीमंडप की उन दीवालों में तीनों लोकों के समस्त पदार्थों के प्रतिबिंब पड़ रहे थे और उन प्रतिबिंबों से वे दीवालें ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो उनमें अनेक प्रकार के चित्र ही खींचे गये हों ।।288।।
“The walls of the Shri Mandap, whose splendor was like the mirror of the world’s prosperity, reflected all the objects of the three worlds. These reflections adorned the walls so beautifully that they appeared as if they were intricately painted with various artistic depictions.”288
श्लोक ( Shlok ) 289
“यदुत्सर्पत्प्रभाजालजलस्नपितमूर्तयः । तीर्थावगाहनं चक्रुरिव देवाः सदानवाः ॥२८९॥
उस श्रीमंडप की फैलती हुई कांति के समुदायरूपी जल से जिनके शरीर नहलाये जा रहे हैं ऐसे देव और दानव ऐसे जान पड़ते थे मानो किसी तीर्थ में स्नान ही कर रहे हों ।।289।।
“The gods and demons, whose bodies were bathed in the radiance emanating from the Shri Mandap, appeared as if they were taking a sacred bath in a holy pilgrimage site.”289
श्लोक ( Shlok ) 290
तद्रुद्धक्षेत्र मध्यस्था प्रथमा पीठिका बभौ । बैडूर्यरत्ननिर्माणा कुलाद्रिशिखरायिता ॥२९०॥
उसी श्रीमंडप से घिरे क्षेत्र के मध्यभाग में स्थित पहली पीठिका सुशोभित हो रही थी, वह पीठिका वैडूर्यमणि की बनी हुई थी और ऐसी जान पड़ती थी मानो कुलाचल का शिखर ही हो ।।290।।
“In the center of the region surrounded by that Shri Mandap, the first pedestal (Peethika) shone magnificently. Made of Vaidoorya gems, it appeared as if it were the very peak of Mount Kulachal.” 290
श्लोक ( Shlok ) 291
तत्र षोडशसोपानमार्गाः स्युः षोडशान्तराः । महादिक्षु सभाकोष्ठप्रवेशेषु च विस्तृताः ॥२९१॥
उस पीठिका पर सोलह जगह अंतर देकर सोलह जगह ही बड़ी-बड़ी सीढ़ियाँ बनी हुई थीं । चार जगह तो चार महादिशाओं अर्थात् पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में चार महावीथियों के सामने थीं और बारह जगह सभा के कोठों के प्रत्येक प्रवेशद्वार पर थीं ।।291।।
“On that Peethika, sixteen grand staircases were constructed at equal intervals. Four of them were positioned in the four cardinal directions—east, west, north, and south—facing the four Mahavithis (grand avenues), while the remaining twelve were placed at the entrances of the assembly halls.”291
श्लोक 292 से 301
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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