आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 पूजा और दत्ति के प्रकार
आष्टाह्निक यज्ञ सभी के लिए प्रसिद्ध है, और ऐन्द्रध्वज यज्ञ इंद्र द्वारा किया जाता है। पूजा में नैवेद्य, अभिषेक, और संध्या उपासना शामिल हैं। विशुद्ध आचरण से खेती करना वार्ता है, और दत्ति चार प्रकार की हैं: दयादत्ति (भय दूर करना), पात्रदत्ति (मुनियों को आहार देना), समदत्ति (समान गृहस्थ को दान), और सकलदत्ति (वंश की प्रतिष्ठा के लिए दान)। स्वाध्याय, तप, और संयम द्विजों की छह विशुद्ध वृत्तियां हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
आष्टाह्निको महः सार्वजनिको रूढ एव सः । महानैन्द्रध्वजोऽन्यस्तु सुरराजैः कृतो महः ॥३२॥
चौथा आष्टाह्निक यज्ञ है जिसे सब लोग करते हैं और जो जगत् में अत्यन्त प्रसिद्ध है। इनके सिवाय एक ऐन्द्रध्वज महायज्ञ भी है जिसे इन्द्र किया करता है ।।३२।।
The fourth is the Ashtāhnika Yajña, performed by all and renowned throughout the world.Apart from these, there is also a great sacrifice known as the Aindradhvaja Mahayajña, traditionally performed by Indra himself.32
श्लोक ( Shlok ) 33
बलिस्नपनमित्यन्यस्त्रिसन्ध्यासेवया समम् । उक्तेष्वेव विकल्पेषु ज्ञेयमन्यच्च तादृशम् ॥३३॥
बलि अर्थात् नैवेद्य चढ़ाना, अभिषेक करना, तीनों संध्याओंमें उपासना करना तथा इनके समान और भी जो पूजाके प्रकार हैं वे सब उन्हीं भेदों में अन्तर्भूत हैं ।॥ ३३।।
Offering bali—the sacred food offering—performing abhisheka (ritual anointing), worship at the three daily twilight hours, and other similar forms of devotion—all these fall within the same classifications of worship.Offering bali—the sacred food offering—performing abhisheka (ritual anointing), worship at the three daily twilight hours, and other similar forms of devotion—all these fall within the same classifications of worship.Offering bali—the sacred food offering—performing abhisheka (ritual anointing), worship at the three daily twilight hours, and other similar forms of devotion—all these fall within the same classifications of worship. 33
श्लोक ( Shlok ) 34
एवंविधविधानेन या महेज्या जिनेशिनाम् । विधिज्ञास्तामुशन्तीज्यां वृत्ति प्राथमकल्पिकीम् ।।३४।।
इस प्रकारकी विधिसे जो जिनेन्द्रदेवकी महापूजा की जाती है उसे विधिके जाननेवाले आचार्य इज्या नामकी प्रथम वृत्ति कहते हैं ॥ ३४।।
The grand worship of Lord Jinendra performed according to such prescribed rites is termed Ijya—the foremost discipline—by those learned in the sacred law.34
श्लोक ( Shlok ) 35
वार्ता विशुद्धवृत्त्या स्यात् कृष्यादीनामनुष्ठितिः । चतुर्धा वर्णिता दत्तिर्दया पात्रसमान्वये ॥३५।।
विशुद्ध आचरणपूर्वक खेती आदिका करना वार्ता कहलाती है तथा दयादत्ति, पात्रदत्ति, समदत्ति और अन्वयदत्ति ये चार प्रकारकी दत्ति कही गई हैं ।। ३५।।
Pure conduct in cultivation and related duties is called Vārttā,
and the four kinds of gifts known as Dayādatti (gifts of compassion), Pātradatti (gifts to worthy recipients), Samadatti (equal gifts), and Anvayadatti (consecutive gifts) are thus classified. 35
श्लोक ( Shlok ) 36
सानुकम्पमनुग्राह्ये प्राणिवृन्देऽभयप्रदा । त्रिशुद्ध्यनुगता सेयं दयादत्तिर्मता बुधैः ॥३६॥
अनुग्रह करने योग्य प्राणियोंके समूहपर दयापूर्वक मन वचन कायकी शुद्धिक साथ उनके भय दूर करनेको पण्डित लोग दयादत्ति मानते हैं ।। ३६।।
Scholars regard as Dayādatti the compassionate gift bestowed upon groups of sentient beings—offered with purity of mind, speech, and body—with the intention of alleviating their fears and suffering.36
श्लोक ( Shlok ) 37
महातपोधनायार्चाप्रतिग्रहपुरःसरम् । प्रदानमशनादीनां पात्रदानं तदिष्यते ॥३७॥
महातपस्वी मुनियोंके लिये सत्कारपूर्वक पड़गाह कर जो आहार आदि दिया जाता है उसे पात्रदान कहते हैं ।। ३७।।
The respectful hospitality extended to great ascetic sages—offering them food and other necessities—is called Pātradāna, the gift to worthy recipients.37
श्लोक ( Shlok ) 38 -39
समानायात्मनाऽन्यस्मै क्रियामन्त्रव्रतादिभिः । ‘निस्तारकोत्तमायेह भूहेमाद्यतिसर्जनम् ॥३८॥समानदत्तिरेषा स्यात् पात्रे मध्यमतामिते। समानप्रतिपत्त्यैव प्रवृत्ता’ श्रद्धयाऽन्विता ॥३९॥
क्रिया, मंत्र और व्रत आदिसे जो अपने समान है तथा जो संसारसमुद्रसे पार कर देनेवाला कोई अन्य उत्तम गृहस्थ है उसके लिये पृथिवी सुवर्ण आदि देना अथवा मध्यम पात्रके लिये समान बुद्धि-से श्रद्धाके साथ जो दान दिया जाता है वह समानदत्ति कहलाता है ॥ ३८-३९॥
Gifts bestowed in equal measure, akin to rites, mantras, and vows, and offerings given with sincere devotion—such as gold or other treasures to a noble householder who guides others across the ocean of worldly existence—are called Samadatti, the equal gift.38 -39
श्लोक ( Shlok ) 40 – 41
आत्मान्वयप्रतिष्ठार्थ सूनवे यदशेषतः । समं समयवित्ताभ्यां स्ववर्गस्यातिसर्जनम् ॥४०॥ सैषा सकलदत्तिः स्यात् स्वाध्यायः श्रुतभावना । तपोऽनशनवृत्त्यादि संयमो व्रतधारणम् ॥४१॥
अपने वंशकी प्रतिष्ठाके लिये पुत्रको समस्त कुलपद्धति तथा धनके साथ अपना कुटुम्ब समर्पण करनेको सकल-दत्ति कहते हैं। शास्त्रोंकी भावना (चिन्तवन) करना स्वाध्याय है, उपवास आदि करना तप है और व्रत धारण करना संयम है ॥४०-४१॥
The complete gift (Sakala-datti) is the dedication of one’s son—along with the entire family lineage, traditions, and wealth—for the perpetuation of the ancestral heritage.
Reflecting deeply upon the sacred scriptures is Svādhyāya (scriptural study); observing fasts and austerities is Tapas (ascetic discipline); and upholding vows is Samyama (self-restraint).40 – 41
श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
Download PDF