आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
श्लोक 192 से 201
समुद्र की गतिविधियाँ और रत्नों की महिमा
समुद्र के किनारे मन्दार वृक्षों में विद्याधरियाँ टहलती हैं। मछलियाँ और अजगर परस्पर युद्धरत हैं, पर समान बल के कारण विजय नहीं होती। जंगली हाथी समुद्र को ताड़न करते हैं, जो मृदंग-सा बजता है। जल मछलियों, सीपों, और सर्पों की कांचलियों से भयानक है। वायु किनारे की सुगंध और लहरों को हिलाता है। समुद्र की भूमियाँ मोतियों और देवों की सेवा से शोभित हैं। जलचर जीव समुद्र को पिता मानकर इसके धन के लिए लड़ते हैं। समुद्र के रत्न और जल बड़वानल के बावजूद अक्षय हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 28 – Shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192
स्वर्गोद्यानश्रियमिव हसत्युत्प्रप्सूने वनेऽस्मिन् मन्दाराणां सरति पवने मन्दमन्दं वनान्तात् । मन्दाक्रान्ताः सललितपदं किञ्चिदारब्धगानाः चङ्कम्यन्ते खगयुवतयस्तीरदेशेष्वमुष्य ॥१९२॥
स्वर्ग के उपवन की शोभा की ओर हंसनेवाले तथा फूलोंसे भरे हुए इस वनमें मन्दार वृक्षोंके वनके मध्य भागसे यह वायु धीरे धीरे चल रहा है और इसी समय जिन्होंने कुछ कुछ गाना प्रारम्भ किया है ऐसी ये धीरे धीरे चलनेवाली विद्याधरियां इस समुद्र के किनारेके प्रदेशोंपर लीलापूर्वक पैर रखती उठाती हुई टहल रही हैं ।॥ १९२॥
In this forest, filled with flowers and laughing toward the splendor of the heavenly gardens, a gentle breeze moves softly through the heart of the grove of Mandara trees. At the same time, celestial maidens — who have just begun to sing sweetly — stroll playfully along the shores of the ocean, gracefully lifting and placing their feet as they wander.॥ 192॥
श्लोक ( Shlok ) 193
अप्सव्य स्तिमिरयमाजिघां सुरारादभ्येति द्रुतमभिभावुकोप्सुयोनिम्” । शैलोच्चानपि निगिलंस्तिमीनितोऽन्यो व्यत्यास्ते समममुना युयुत्समानः ।।१९३।।
इधर, इस जलमें उत्पन्न हुए अन्य अनेक मच्छोंको तिरस्कार कर उनके मारनेकी इच्छा करता हुआ यह इसी जलमें उत्पन्न हुआ बड़ा मच्छ बहुत शीघ्र दूरसे उनके सन्मुख आ रहा है और पर्वतके समान बड़े बड़े मच्छोंको निगलता हुआ यह दूसरा बड़ा मच्छ उस पहले बड़ मच्छके साथ युद्ध करनेकी इच्छा करता हुआ खड़ा है ।।193॥
Here, a great fish born in these waters, scorning the many other fish also born here and desiring to slay them, is swiftly advancing toward them from afar. Meanwhile, another mighty fish, as huge as a mountain, stands ready, eager to engage in battle with the first great fish, even as it swallows other enormous fish along the way.।।193॥
श्लोक ( Shlok ) 194
जलादजगरस्तिर्मि शयुमपि स्थलादप्सुजो” विकर्षति युयुत्सया कृतदृढग्रहो दुर्ग्रहः । तथापि न जयो मिथोऽस्ति समकक्ष्ययोरेनयोर्ध्रुवं न समकक्ष्य योरिह जयेतरप्रक्रमः ॥१९४।॥
इधर, यह अजगर जलमेंसे किसी बड़े मच्छको अपनी ओर खींच रहा है और मजबूतीसे पकड़ने- वाला यह दुष्ट मच्छ भी लड़नेकी इच्छासे उसे जमीनपरसे अपनी ओर खींच रहा है तथापि एक समान बल रखनेवाले इन दोनोंमें परस्पर किसीकी जीत नहीं हो रही है सो ठीक हो है क्योंकि इस संसारमें जो समान शक्तिवाले हैं उनमें परस्पर जय और पराजयका निर्णय नहीं होता है ।। १९४।।
Here, a great serpent is pulling a large fish toward itself from the water, while the wicked fish, firmly gripping the serpent, is trying to drag it toward the land, eager to fight. Yet, despite their fierce struggle, neither, possessing equal strength, is able to overcome the other — and rightly so, for in this world, when two opponents are evenly matched in power, victory and defeat remain undecided between them.194
श्लोक ( Shlok ) 195
वनं’ वनगजैरिदं जलनिधेः समास्फालितं वनं बनगजैरिव स्फुटविमुक्तसांराविणम् । मृदङ्गपरिवादन श्रियमुपादधद्दिक्तटे तनोति तटमुच्चलत्सपदि दत्तसम्मार्जनम् ॥१९५॥
जंगली हाथियोंके द्वारा अतिशय ताड़न किया हुआ यह समुद्रका जल, जिसमें जंगली हाथी स्पष्ट रूपसे गर्जना कर रहे हैं ऐसे किसी वनके समान तथा मृदंग बजनेकी शोभाको धारण करता हुआ और दिशाओंमें उछलता हुआ किनारेको बहुत शीघ्र शुद्ध कर रहा है ।।१९५॥
Beaten fiercely by the wild elephants, this water of the ocean — where the elephants are clearly roaring like in a wild forest — surges about like the beating of drums, leaping in all directions and swiftly cleansing the shore.195
श्लोक ( Shlok ) 196
तरत्तिमिकलेवरं स्फुटितशुक्तिशल्का चितं स्फुरत्त्परुषनिःस्वनं विवृतरन्ध्रपातालकम् । भयानकमितो जलं जलनिधेर्ल सत्पन्नगप्रमुक्ततनु कृत्तिसंशयित वीचिमालाकुलम् ।।१९६॥
जिसमें अनेक मछलियोंके शरीर तैर रहे हैं, जो खुली हुई सीपोंके टुकड़ोंसे व्याप्त है, जिसमें कठोर शब्द हो रहे हैं, जिसने अपने रन्ध्रोंमें पातालको भी धारण कर रखा है, और जो तैरते हुए सांपोंसे छूटी हुई कांचलियोंसे लोगोंको ऐसा संदेह उत्पन्न करता है मानो लहरों के समूहसे ही व्याप्त हो ऐसा यह समुद्रका जल इधर बहुत भयानक हो रहा है ॥१९६॥
Here, the ocean’s water has become very terrifying — filled with the bodies of countless fish, strewn with fragments of open shells, resounding with harsh noises, and holding even the netherworld within its depths. The sloughed-off skins of swimming serpents float upon it, creating the illusion for onlookers that the waters themselves are teeming with waves. 196
श्लोक ( Shlok ) 197
इतो धुतवनोऽनिलः शिशिरशीकरानाकिरन्नुपैति शनकैस्तटद्रु मसुगन्धिपुष्पाहरः । इतश्च परुषोऽनिलः स्फुरति धूतकल्लोलसात् कृतस्वनभयानकस्तिमिकलेवरानाधुनन् ॥१९७।।
इधर, वनको हिलाता हुआ, शीतल जलकी बूंदोंको बरसाता हुआ और वृक्षों के सुगन्धित फूलों की सुगन्धिका हरण करता हुआ वायु धीरे धीरे किनारेकी ओर बह रहा है और इधर बड़े बड़े मच्छोंके शरीरको कंपाता हुआ तथा हिलती हुई लहरों के शब्दों से भयंकर यह प्रचण्ड वायु बह रहा है ।।१९७।।
Here, the wind moves gently toward the shore, shaking the forest, scattering cool droplets of water, and carrying away the fragrance of the trees’ scented blossoms. Meanwhile, another fierce wind blows violently — shaking the bodies of the great fish and roaring terribly with the sound of the surging waves.197
श्लोक ( Shlok ) 198
अस्योपान्तभुवश्चकासति तरां वेलोच्चलन्मौक्तिकैराकीर्णाः कुसुमोपहारजनितां लक्ष्मीं दघाना भृशम् । सेवन्ते सह सुन्दरीभिरमरा याः स्वर्गलोकान्तरम् मन्वाना धृतसम्मदा स्तटवनच्छायातरून्संश्रिताः ॥१९८।।
जो बड़ी बड़ी लहरोंसे उछलते हुए मोतियोंसे व्याप्त होकर फूलोंके उपहारसे उत्पन्न हुई अतिशय शोभाकों धारण करती हैं, किनारेके वनके छायादार वृक्षोंके नीचे बैठे हुए देव लोग हर्षित होकर अपनी अपनी देवांगनाओंके साथ जिनकी सेवा करते हैं और इसीलिये जो दूसरे स्वर्ग लोककी शोभा बढ़ाती हैं ऐसी ये इस समुद्रके किनारेकी भूमियां अत्यन्त सुशोभित हो रही हैं ।॥१९८॥
These shores of the ocean are becoming exceedingly beautiful — adorned with the brilliance of pearls leaping from the great waves, and bearing the splendid beauty created by the offerings of flowers. Beneath the shady trees of the coastal forests, the gods, filled with joy, attend to their celestial maidens, and thus these shores seem to enhance the very splendor of another heavenly world.
श्लोक ( Shlok ) 199
एते ते मकरादयो जलचरा मत्वेव कुक्षिम्भरिं वारां राशिमनन्तरायमधिकं पुत्रा इवास्यौरसाः । भागस्य प्रतिलिप्सया नु ‘जनकस्याक्रोशतोप्यग्रतो युध्यन्ते मिलिताः परस्परमहो बद्धक्रुधो धिग्धनम् । १९९ l
ये मगरमच्छ आदि जलचर जीव, जिसके पास अनन्त धन है ऐसे इस समुद्रको अपने उदरका पालन-पोषण करनेवाला पिता समझकर सगे पुत्रोंके समान उसका धन बांटकर अपने भाग (हिस्से) को अधिक रूपसे लेनेकी इच्छासे, गजेनाके शब्दोंके बहाने चिल्लाते हुए पिताके सामने ही इकट्ठे होकर क्रोधित होते हुए परस्परमें लड़ रहे हैं, हाय ! ऐसे धनको धिक्कार हो । १९९।।
These crocodiles and other aquatic creatures, regarding the ocean — endowed with infinite wealth — as a father who nourishes and sustains them, gather before him like true sons, dividing his riches among themselves. Driven by the desire to seize a greater share, they howl under the pretext of the roar of the elephant, and, filled with anger, fight among themselves. Alas! Such greed for wealth is truly to be condemned.199
श्लोक ( Shlok ) 200
लोकानन्दिभिरप्रमा ” परिगतै रुच्चावचैर्भोगिना मारूढैरधिमस्तकं शुचितमैः सन्तापविच्छेदिभिः । पातालैविवृताननै र्मुहुरपि प्राप्तव्ययैरक्षयैरा संसारममुष्य नास्ति विगमो रत्नैर्जलौघैरपि ॥२००॥
बड़वानलोंके द्वारा वार बार ह्रास होनेपर भी जिनका कभी क्षय नहीं हो पाता है, जो लोगोंको आनन्द देनेवाले हैं, प्रमाण-रहित हैं, अनेक प्रकारके हैं, सर्पोंके फणाओंपर आरूढ़ हैं, अत्यन्त पवित्र हैं, और संतापको नष्ट करनेवाले हैं ऐसे रत्नों तथा जलके समूहोंकी अपेक्षा इस समुद्रका जब तक संसार है तब तक कभी भो नाश नहीं होता। भावार्थ यद्यपि इस समुद्रके अनेक रत्न इसके विवरों-बिलोंमें घुसकर नष्ट हो जाते हैं और जलके समूह बड़वानलमें जलकर कम हो जाते हैं तथापि इसके रत्न और जलके समूह कभी भी विनाशको प्राप्त नहीं हो पाते क्योंकि जितने नष्ट होते हैं उससे कहीं अधिक उत्पन्न हो जाते हैं ।॥ २००॥
Though repeatedly diminished by the submarine fire, this ocean — filled with jewels and waters — never truly faces destruction for as long as the world exists. Its treasures are countless, joy-giving, beyond measure, of many kinds, mounted upon the hoods of serpents, supremely pure, and destroyers of suffering. Although many of its jewels slip away into its crevices and much of its water is consumed by the submarine fire, the ocean’s wealth is never lost, for whatever is lost is constantly replenished, even in greater abundance.200
श्लोक ( Shlok ) 201
वज्रद्रोण्याममुष्य क्वथदिव जठरं व्यक्तमुद्बुद्बुदाम्बु स्फूर्जत्पातालरन्ध्रोच्छ्वसदनिलबलाद्विष्वगावर्तमानम् ।
प्रस्तीर्णाने करत्नान्यपहरति जने नूनमुत्तप्तमन्तः प्रायो रायां वियोगो जनयति महतोऽप्युग्रमन्त र्विदाहम् । २०१।
बहुत बड़े पाताल रूपी छिद्रोंके द्वारा ऊपरकी ओर बढ़ते हुए वायुके जोरसे जो चारों ओर घूम रहा है और जिसमें जल के अनेक बबूले उठ रहे हैं ऐसा यह समुद्रका उदर अर्थात् मध्यभाग वजूकी कड़ाहीमें खौलता हुआ सा जान पड़ता है अथवा लोग इसके जहां तहां फैले हुए अनेक रत्न ले जाते हैं इसलिये मानो यह भीतर ही भीतर संतप्त हो रहा है सो ठीक ही है क्योंकि धनका वियोग प्रायः करके बड़े बड़े पुरुषोंके हृदयमें भी भयंकर दाह उत्पन्न कर देता है ।।२०१।।
Stirred violently by the force of the air rushing upward through the vast cavities of the netherworld, and with countless bubbles rising in its waters, the midsection — the belly — of the ocean appears as though it is boiling in a giant cauldron of air. Or perhaps, because people carry away its scattered jewels from here and there, the ocean seems to burn inwardly with pain. And rightly so, for the loss of wealth often ignites a fierce anguish even in the hearts of the greatest of men.201
श्लोक 202 से 211
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191