आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
श्लोक 42 से 51 गणग्रह और पूजाराध्य क्रिया
चौथी ‘गणग्रह’ क्रिया में भव्य मिथ्यादेवताओं का विसर्जन कर अपने मत के शांत देवताओं की पूजा करता है। पांचवीं ‘पूजाराध्य’ क्रिया में वह जिनपूजन, उपवास, और द्वादशांग के अर्थ सुनता है। छठी ‘पुण्ययज्ञा’ क्रिया में वह साधर्मी पुरुषों के साथ चौदह पूर्वविद्याओं के अर्थ सुनता है। सातवीं ‘दृढ़चर्या’ क्रिया में वह अपने मत के शास्त्रों को समझकर अन्य मतों के ग्रंथों का अध्ययन करता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 39- Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
पञ्चमुष्टिविधानेन स्पृष्ट् वैनमधिमस्तकम् । पूतोऽसि दीक्षयेत्युक्त्वा सिद्धशेषा च लम्भयेत् ॥४२॥
पञ्चमुष्टिकी रीतिसे उसके मस्तकका स्पर्श करे तथा ‘तू इस दीक्षासे पवित्र हुआ’ इस प्रकार कहकर उससे पूजाके बचे हुए शेषाक्षत ग्रहण करावे ॥४२।।
With the rite of the Pañcamuṣṭi—the sacred fivefold touch—the Guru shall anoint his head, and declaring, “By this initiation, thou art made pure,” he shall bid the aspirant to receive the remaining Śeṣākṣata—the untouched, sanctified grains left from the worship.42
श्लोक ( Shlok ) 43
ततः पञ्चनमस्कारपदान्यस्मा उपादिशेत्। मन्त्रोऽयमखिलात् “पापात्त्वां पुनीता दितीरयन् ॥४३॥
तत्पश्चात् ‘यह मन्त्र तुझे समस्त पापोंसे पवित्र करे’ इस प्रकार कहता हुआ उसे पञ्च नमस्कार मन्त्रका उपदेश करे ॥४३॥
Thereafter, proclaiming, “May this mantra cleanse thee of all sins,” the Guru imparts unto him the sacred Pañca Namaskāra Mantra, the invocation of fivefold reverence. 43
श्लोक ( Shlok ) 44
कृत्वाविधिमिमं पश्चात् पारणाय विसर्जयेत् । गुरोरनुग्रहात् सोऽपि सम्प्रीतः स्वगृहं व्रजेत् ॥४४॥ इति स्थानलाभः
यह विधि करके आचार्य उसे पारणाके लिये विदा करे और वह भव्य भी गुरुके अनुग्रहसे संतुष्ट होता हुआ अपने घर जावे ॥४४।। यह तीसरी स्थानलाभ क्रिया है।
Having performed this rite, the Āchārya dismisses him with benediction for breaking the fast, and the noble soul, content with the Guru’s gracious favor, returns home.44
Thus is completed the third act of Sthāna-lābha, the attainment of the sacred seat.
श्लोक ( Shlok ) 45
निर्दिष्टस्थानलाभस्य पुनरस्य गणग्रहः । स्यान्मिथ्यादेवताः स्वस्माद् विनिःसारयतो गृहात् ॥४५॥
जिसके लिये स्थानलाभकी क्रियाका वर्णन ऊपर किया जा चुका है ऐसा भव्य पुरुष जब मिथ्यादेवताओंको अपने घरसे बाहर निकालता है तब उसके गणग्रह नामकी क्रिया होती है ।॥४५॥
When that noble soul—of whom the rite of Sthāna-lābha has just been described—removes from his home the images of false deities, then unfolds the rite known as Gaṇagraha, the sacred renunciation of unworthy allegiances.45
श्लोक ( Shlok ) 46 – 47
इयन्तं कालमज्ञानात् पूजिताः स्थ कृतादरम् । पूज्यास्त्विदानीमस्माभिर स्मत्समयदेवताः ॥४६।। ततोऽपमृषितेनालमन्यत्र स्वैरमास्यताम् । इति “प्रकाशमेवैतान् नीत्वाऽन्यत्र क्वचित्त्यजेत् ॥४७॥
उस समय वह उन देवताओंसे कहता है कि ‘मैंने अपने अज्ञानसे इतने दिनतक आदरके साथ आपकी पूजा की परन्तु अब अपने ही मतके देवताओंकी पूजा करूंगा इसलिये क्रोध करना व्यर्थ है। आप अपनी इच्छानुसार किसी दूसरी जगह रहिये।’ इस प्रकार प्रकट रूपसे उन देवताओंको ले जाकर किसी अन्य स्थानपर छोड़ दे ।।४६-४७।।
At that time, he addresses those deities thus: “Out of ignorance, I have worshipped you with reverence for many days. But now, I shall offer my devotion solely to the true deities of my own faith; therefore, let there be no wrath. Go hence, and dwell wherever you will.”Having spoken thus openly, he respectfully removes those images and installs them in another place.46 – 47
श्लोक ( Shlok ) 48
गणग्रहः स एष स्यात् प्राक्तनं देवताङ्गणम् । विसृज्यार्चयतः शान्ता देवताः ‘समयोचिताः ॥४८॥इति ग्रहणक्रिया ।
इस प्रकार पहले देवताओंका विसर्जन कर अपने मतके शान्त देवताओं की पूजा करते हुए उस भव्यके यह गणग्रह नामकी चौथी क्रिया होती है ॥४८।। यह चौथी गणग्रह क्रिया है।
Thus, having first relinquished the former deities, and now offering worship to the serene and rightful deities of his own faith, the noble soul performs the fourth rite, known as Gaṇagraha.48
This, indeed, is the fourth sacred act—the rite of Gaṇagraha.
श्लोक ( Shlok ) 49
पूजाराध्याख्यया ख्याता क्रियाऽस्य स्यादतः परा । पूजोपवाससम्पत्त्या श्रृण्वतोऽङ्गार्थ सङ्ग्रहम् ॥४९॥इति पूजाराध्यक्रिया ।
तदनन्तर पूजा और उपवासरूप सम्पत्तिके साथ साथ अंगोंके अर्थसमूहको सुननेवाले उस भव्य के पूजाराध्या नामकी प्रसिद्ध क्रिया होती है। भावार्थ जिनेन्द्रदेवकी पूजन तथा उपवास आदि करते हुए द्वादशाङ्गका अर्थ सुनना पूजाराध्य क्रिया कहलाती है ।॥४९॥ यह पांचवीं पूजाराध्य क्रिया है ।
Thereafter, adorned with the twin virtues of worship and fasting, and listening to the sacred meanings of the Aṅgas—the canonical limbs of scripture—the noble soul performs the renowned rite known as Pūjārādhya.
That is, engaging in the veneration of the Jina and undertaking fasts while absorbing the import of the Dvādaśāṅga (the twelvefold canon) is called the rite of Pūjārādhya.49
This is the fifth sacred act—Pūjārādhya.
श्लोक ( Shlok ) 50
ततोऽन्या पुण्ययज्ञाख्या क्रिया पुण्यानुबन्धिनी । शृण्वतः पूर्व विद्यानामर्थ सब्रह्मचारिणः ॥५०॥इति पुण्ययज्ञक्रिया ।
तदनन्तर साधर्मी पुरुषोंके साथ साथ चौदह पूर्वविद्याओंका अर्थ सुननेवाले उस भव्य के पुण्यको बढ़ानेवाली पुण्ययज्ञा नामकी भिन्न क्रिया होती है ।।५०।। यह छठवीं पुण्ययज्ञा क्रिया है।
Thereafter, in the noble company of fellow seekers, as he listens to the profound meanings of the Fourteen Pūrvas—the ancient scriptural traditions—there arises in that worthy soul a distinct rite known as Puṇyayajñā, which greatly augments his store of merit.50
This is the sixth sacred act—the rite of Puṇyayajñā.
श्लोक ( Shlok ) 51
तथाऽस्य दृढचर्या स्यात् क्रिया स्वसमयश्रुतम् । निष्ठाप्य श्रृण्वतो ग्रन्थान् बाह्यानन्यांश्च कांश्चन ॥५१॥इति दृढचर्याक्रिया ।
इस प्रकार अपने मतके शास्त्र समाप्त कर अन्य मतके ग्रन्थों अथवा अन्य किन्हीं दूसरे विषयोंको सुननेवाले उस भव्य के दृढ़चर्या नामकी क्रिया होती है ।॥५१॥ यह दृढ़चर्या नामकी सातवीं क्रिया है।
Thus, when that noble soul ceases to engage with the scriptures of his own faith and turns instead to the texts of other creeds or to worldly matters, he enters into a state known as Dṛḍhācaryā—the deviation from steadfast conduct.51
This is the seventh rite—Dṛḍhācaryā.
श्लोक 52 से 61
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
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