आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 |
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 31 – Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
गङ्गावर्णनयोपेतां फेनार्घां सम्मुखागताम् । तां पश्यन्नुत्तरामाशां जितां मेने निधीश्वरः ॥१२॥
जो गङ्गा नदीके समस्त वर्णनसे सहित है और फेनोंसे भरी हुई है ऐसी सामने आई हुई सिन्धु नदीको देखते हुए निधिपति-भरत उत्तर दिशाको जीती हुईके समान समझने लगे थे ॥१२॥
“As they beheld the Sindhu River, adorned with all the descriptions of the Ganga and brimming with frothy waves, Emperor Bharata, the lord of treasure, began to regard it as though he had already conquered the northern direction.”12
श्लोक ( Shlok ) 13
अनुसिन्धुतटं सैन्यैरुदीच्यान् साधयन्नृपान् । विजयार्द्धाचलोपान्तमाससाद शनैर्मनुः ॥१३॥
सिन्धु नदीके किनारे किनारे अपनी सेनाओंके द्वारा उत्तर दिशाके राजाओंको वश करते हुए कुलकर-भरत धीरे धीरे विजयार्थ पर्वतके समीप जा पहुंचे ॥१३॥
“Along the banks of the Sindhu River, as his armies subdued the kings of the northern regions, Emperor Bharata, ever steadfast in his quest for victory, gradually made his way toward the mountains.”13
श्लोक ( Shlok ) 14
स गिरिर्मणिनिर्माणनवकूटविशङ्कटः । ददृशे प्रभुणा दूराद् धृतार्घ इव राजतः ॥१४॥
जो मणियोंके बने हुए नौ शिखरोंसे बहुत विशाल मालूम होता था ऐसा वह चाँदीका विजयार्थ पर्वत भरतने दूरसे ऐसा देखा मानो शिखरोंके बहानेसे अर्घ ही धारण कर रहा हो ।।१४।।
“From afar, Emperor Bharata beheld the silver-hued Vijayartha Mountain, vast and majestic, adorned with nine peaks made of precious jewels, appearing as though it bore the semblance of an offering vessel, its summits rising like the sacred vessels of tribute.” 14
श्लोक ( Shlok ) 15
स शैलः पवनाधूतचलशाखाग्रबाहुभिः । दूरादभ्यागतं जिष्णुमाजुहावेव पादपैः ॥१५॥
जिनकी शाखाओंके अग्रभागरूपी भुजाएँ वायुसे हिल रही हैं ऐसे वृक्षोंसे वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो दूरसे सन्मुख आये हुए विजयी भरतको बुला ही रहा हो ।।१५।।
“The mountain appeared as though calling to the victorious Bharata, for its branches, swaying in the breeze, resembled outstretched arms, beckoning him from afar as if inviting him to come forth and claim triumph.”15
श्लोक ( Shlok ) 16
सोऽचलः शिखरोपान्तनिपतन्निर्झराम्बुभिः । प्रभोरुपागमे पाद्यं संविधित्सुरिवाचकात् ॥१६॥
शिखरोंके समीपसे ही पड़ते झरनोंके जलसे वह पर्वत ऐसा अच्छा सुशोभित हो रहा था मानो चक्रवर्ती भरतके आनेपर उनके लिये पाद्य अर्थात् पैर धोनेका जल ही देना चाहता हो ।।१६।।
“The mountain, adorned by the streams that cascaded near its peaks, seemed to glow with a beauty that suggested it was offering, upon the arrival of Emperor Bharata, the sacred water for his feet—an act of reverence and honor.”16
श्लोक ( Shlok ) 17
स नगो नागपुन्नागपूगाद्रिद्रुमसङ्कटै। रम्यैस्तटवनोद्देशैराह्वत् प्रभुमिवासितुम् ॥१७॥
वह पर्वत नाग, नाग केसर और सुपारी आदिके वृक्षोंसे भरे हुए तथा मनोहर अपने किनारे के वन के प्रदेशोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो विश्राम करनेके लिये स्वामी भरत को बुला ही रहा हो ॥१७॥
“The mountain, rich with trees of nag, nag-kesar, and areca nut, and adorned by the enchanting forests along its borders, seemed to beckon Emperor Bharata, as though inviting him to rest upon its tranquil slopes.” 17
श्लोक ( Shlok ) 18
रजो वितानयन् पौष्पं पवनैः परितो वनम् । सोऽभ्युत्तिष्ठन्निवास्यासीत् कूजत्कोकिलडिण्डिमः ॥१८॥
जो अपने वनके चारों ओर वायुसे उड़ते हुए फूलोंकी परागका चंदोवा तान रहा है और शब्द करते हुए कोकिल ही जिसके नगाड़े हैं ऐसा वह पर्वत भरतका सन्मान करनेके लिये सामने खड़े हुए के समान जान पड़ता था ।।१८।।
“The mountain, whose forests were veiled in the fragrant canopy of pollen carried by the wind, and whose echoes were like the resonant drums of the cuckoo’s song, seemed to stand before Emperor Bharata as though awaiting to honor him in reverence.”18
श्लोक ( Shlok ) 19
किमत्र बहुना सोऽद्रिर्विभुं दिग्विजयोद्यतम् । प्रत्यैच्छदिव संप्रीत्या सत्काराङ्गै रतिस्फुटैः ॥१९॥
इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ है ? इतना ही बहुत है कि वह पर्वत बड़े प्रेमसे प्रकट किये हुए सत्कारके सब साधनोंसे दिग्विजय करनेके लिये उद्यत हुए भरत का मानो सत्कार ही कर रहा था ।।१९।।
“What more need be said on this matter? It is enough to note that the mountain, with great affection, seemed to honor Emperor Bharata, as though offering him every means of reverence in his pursuit of universal conquest.”19
श्लोक ( Shlok ) 20
पिनद्ध “तोरणामुच्चै रतीत्य वनवेदिकाम् । नियन्त्रितं बलाध्यक्षैर्जगाहेऽन्तर्वणं बलम् ॥२०॥
जिसके चारों ओर तोरण बँधे हुए हैं ऐसी वनकी ऊंची बेदीको उल्लंघन कर सेनापतियोंके द्वारा नियन्त्रित की हुई (वश की हुई) सेनाने वनके भीतर प्रवेश किया ।।२०।।
“Surpassing the lofty woodland terrace, which appeared adorned with festoons on every side, the army—held in firm command by the generals—advanced and entered deep into the forest’s heart.”20
श्लोक ( Shlok ) 21
वनोपान्तभुवः सैन्यैरारुद्धा रुद्धदिङ्मुखैः । उड्डीनविहगप्राणा निरुच्छ्वासास्तदाभवन् ॥२१॥
समस्त दिशाओंमें फैलनेवाली सेनाओंसे उस वनके समीप की समस्त भूमियाँ भर गई थीं, उनके पक्षीरूपी प्राण उड़ गये थे और उस समय वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो श्वासोच्छ्वाससे रहित ही हो गई हों। अर्थात् सेनाओं के बोझसे दबकर मानो मर ही गई हों ।॥२१।।
“The lands surrounding the forest were filled with the armies spreading in all directions; their bird-like breath seemed to have fled, and they appeared, in that moment, as though bereft of life itself—stricken and still beneath the crushing weight of the advancing forces.”21
श्लोक 22 से 31
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 |