आदिपुराण पर्व 9 सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 9 by Acharya Jinasena
पर्व 9 में ज्रजंघ का भोगमय जीवन, मृत्यु, भोगभूमि, सम्यग्दर्शन और स्वर्ग तक की यात्रा का वर्णन हैं।
संक्षिप्त सारांश (श्लोक 1 से 195)
वज्रजंघ ने श्रीमती के साथ धर्म, अर्थ और काम के संयोग से राज्य करते हुए छहों ऋतुओं में भोगों का आनंद लिया। शरद् में वह तालाबों और वनों में, हेमंत में सुगंधित शयनागार में, शिशिर में श्रीमती को आलिंगन देकर, वसंत में आम्रवनों में, ग्रीष्म में जलक्रीडा करते हुए और वर्षा में मेघों के बीच क्रीडा करता रहा। एक रात शयनागार में धूप के धुएं से दोनों की मृत्यु हो गई। पुण्य के प्रभाव से वे उत्तरकुरु भोगभूमि में जन्मे, जहाँ दस प्रकार के कल्पवृक्ष भोग प्रदान करते हैं। वहाँ तीन पल्य की आयु तक उन्होंने सुख भोगा।
उत्तरकुरु में जन्मे जीव सात सप्ताह में परिपक्व होकर भोग भोगते हैं। वहाँ न दुःख है, न रोग, न ऋतु परिवर्तन। वज्रजंघ और श्रीमती ने वहाँ सुखमय जीवन जिया। मतिवर आदि चार मंत्रियों ने उनकी मृत्यु पर दीक्षा ली और स्वर्ग में अहमिंद्र बने। एक दिन वज्रजंघ को सूर्यप्रभ देव के विमान को देखकर जातिस्मरण हुआ। तभी दो चारण मुनि आए, जिनमें से एक स्वयंबुद्ध मंत्री का जीव था। उन्होंने वज्रजंघ और श्रीमती को सम्यग्दर्शन का उपदेश दिया, जिसे दोनों ने ग्रहण किया। नकुल आदि चार जीवों ने भी सम्यग्दर्शन प्राप्त किया।
मुनियों के जाने के बाद वज्रजंघ ने उनके गुणों का चिंतन किया और सम्यक्त्व में दृढ़ हुआ। तीन पल्य की आयु पूर्ण कर दोनों ऐशान स्वर्ग पहुँचे—वज्रजंघ श्रीधर देव और श्रीमती स्वयंप्रभा देव के रूप में। नकुल आदि चार जीव भी वहाँ देव बने। श्रीधर देव ने देवांगनाओं के साथ भोग भोगते हुए सुखमय जीवन जिया, जो भविष्य में तीर्थंकर बनने का संकेत था।
श्लोक 1 से 11 ऋतुओं में भोग
वज्रजंघ ने श्रीमती के साथ छह ऋतुओं में भोग भोगा। शरद में तालाबों और वनों में क्रीड़ा की, हेमंत में धूप-सुगंधित शयनागार में सुख पाया, शिशिर में आलिंगन से प्रसन्न रहा, वसंत में आम्रवनों में रमण किया, ग्रीष्म में जलक्रीड़ा और चंदन से शीतलता पाई।
श्लोक 12 से 20 वर्षा और भोग का वर्णन
ग्रीष्म में श्रीमती को शिरीष फूलों से सजाया। वर्षा में बिजली से भयभीत श्रीमती ने आलिंगन किया। मेघ, वीरबहूटी, और मयूरों ने मन मोहा। कदंब सुगंध और महल में रमण किया। नदियों के पूर से संतोष मिला।
श्लोक 21 से 31 शयनागार और मृत्यु
वज्रजंघ सुगंधित, रत्नमय शयनागार में श्रीमती के साथ शयन करता था। धूप से सुगंध बढ़ी, पर झरोखा बंद रहने से दोनों मूर्च्छित हो मृत्यु को प्राप्त हुए। शरीर निष्प्रभ हो गए। भोग ही मृत्यु का कारण बने।
श्लोक 32 से 41 उत्तरकुरु और कल्पवृक्ष
पात्रदान के पुण्य से दोनों उत्तरकुरु भोगभूमि में जन्मे। वहाँ दस कल्पवृक्ष (मद्यांग, वादित्रांग आदि) हैं, जो मधु, वाद्य, आभूषण आदि देते हैं। मद्य रस है, नशा नहीं करता।
श्लोक 42 से 51 कल्पवृक्षों का विस्तार
मालांग से मालाएँ, दीपांग से दीपक, गृहांग से भवन, भोजनांग से चार आहार और छह रस, भाजनांग से बर्तन, वस्त्रांग से वस्त्र मिलते हैं। ये वृक्ष अनादि, स्वाभाविक फलदायी हैं।
श्लोक 52 से 61 उत्तरकुरु की शोभा
उत्तरकुरु में रत्नमयी भूमि, चार अंगुल घास, कमल तालाब, कोमल वायु, और पुष्पपराग से शोभा है। न गरमी, न वर्षा, न दुष्ट जंतु हैं। सुख सदा एकरूप रहता है।
श्लोक 62 से 71 जीवन चक्र
वहाँ आर्य जन्म लेते हैं। सात दिन शय्या पर, फिर घुटनों पर चलते, तीसरे सप्ताह बोलते, सातवें में भोग भोगते हैं। गर्भ सुखद, माता-पिता की मृत्यु जन्म के साथ होती। छींक-जँभाई से मृत्यु होती है।
श्लोक 72 से 81 सुख और समानता
आयु तीन पल्य, आहार तीन दिन में। न रोग, न शोक, न कामज्वर। सभी समान सुखी, वज्रवृषभनाराच संहनन वाले, दीर्घायु, और कांतिमान हैं।
श्लोक 82 से 91 भोगभूमि और अन्य जीव
कलाओं में कुशल, मधुर कंठ वाले जीव क्रीड़ा करते हैं। पात्रदान से मनुष्य, अपात्र दान से तिर्यंच जन्म लेते। नकुल आदि वहाँ आर्य बने। मतिवर आदि ने दीक्षा ली।
श्लोक 92 से 101 जातिस्मरण और मुनि दर्शन
मतिवर आदि स्वर्ग गए। वज्रजंघ ने कल्पवृक्ष देखते हुए सूर्यप्रभ विमान देखा, जातिस्मरण पाया। चारण मुनियों को देख प्रणाम किया, अश्रुओं से चरण धोए, प्रश्न पूछने लगा
श्लोक 102 से 111 वज्रजंघ का प्रश्न और मुनि का परिचय
वज्रजंघ ने मुनियों से उनका परिचय, आगमन का कारण पूछा, उन्हें मित्र-बंधु माना। ज्येष्ठ मुनि प्रीतिंकर ने बताया कि वह स्वयंबुद्ध मंत्री था, जिसने महाबल भव में वज्रजंघ को ज्ञान दिया। स्वयं दीक्षा ली, स्वर्ग में मणिचूल बना, फिर पुंडरीकिणी में प्रीतिंकर हुआ। छोटा भाई प्रीतिदेव संग दीक्षा ली, चारण ऋद्धि पाई। वज्रजंघ को समझाने आए।
श्लोक 112 से 121 सम्यग्दर्शन का उपदेश
मुनि ने कहा कि वज्रजंघ पात्रदान से यहाँ जन्मा, पर सम्यग्दर्शन नहीं पाया। अब उसे देने आए हैं। समय उपयुक्त है। मिथ्यात्व दूर कर सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है। यह ज्ञान-चारित्र का मूल है।
श्लोक 122 से 132 सम्यग्दर्शन के गुण और अंग
सम्यग्दर्शन सात तत्त्वों में श्रद्धा है। इसके चार गुण (प्रशम आदि) और आठ अंग (निःशंकित आदि) हैं। यह संसार का सर्वस्व, मोक्ष की सीढ़ी, और दुर्गति रोकने वाला है।
श्लोक 133 से 141 सम्यग्दर्शन की महिमा
यह रत्नहार समान है, संसार को सांत करता है। इसे ग्रहण करने वाला उत्तम जन्म पाता, नरक-तिर्यंच से मुक्त होता। यह मोक्ष का प्रधान अंग है। वज्रजंघ को इसे स्वीकारने का उपदेश दिया।
श्लोक 142 से 151 श्रीमती को उपदेश और स्वीकृति
मुनि ने श्रीमती को सम्यग्दर्शन ग्रहण करने, स्त्री पर्याय छोड़ने को कहा। वज्रजंघ और श्रीमती ने इसे स्वीकारा, संतुष्ट हुए। सम्यग्दर्शन मोक्ष का युवराज पद देता है।
श्लोक 152 से 161 अन्य जीव और मुनियों का प्रस्थान
सिंह आदि चार जीवों ने भी सम्यग्दर्शन पाया। मुनियों ने स्पर्श कर आशीर्वाद दिया। वज्रजंघ ने प्रणाम कर विदा की। मुनि गगनगामी हो गए। वज्रजंघ उत्कंठित हुआ, मुनियों के गुणों का चिंतन किया।
श्लोक 162 से 171 साधुओं की महिमा
वज्रजंघ ने सोचा कि साधु समागम पाप नष्ट करता, कल्याण बढ़ाता है। वे परोपकारी, निःस्वार्थ, और यति हैं। प्रीतिंकर ने अपार प्रीति दिखाई।
श्लोक 172 से 181 गुरु की महत्ता
प्रीतिंकर महाबल में स्वयंबुद्ध, अब गुरु बने। गुरु बिना गुण नहीं, संसार नहीं तिरता। वज्रजंघ की सम्यक्त्व भावना दृढ़ हुई। श्रीमती की भी। तीन पल्य काल बीता।
श्लोक 182 से 191 स्वर्ग में जन्म
दोनों ऐशान स्वर्ग गए। वज्रजंघ श्रीधर, श्रीमती स्वयंप्रभ बने। सिंह चित्रांगद, शूकर मणिकुंडली, वानर मनोहर, नकुल मनोरथ बने। पुण्य से स्वर्ग मिला।
श्लोक 192 से 195 स्वर्गीय भोग
छहों जीव ललितांगदेव समान भोग भोगते हैं। श्रीधर को देवांगनाएँ चरण दबातीं, कटाक्ष बाण चलातीं। वह संतुष्ट रहता था।
पर्व 10
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