आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251
श्लोक 252 से 261 साम्राज्य क्रिया
साम्राज्य क्रिया में भगवान प्रातःकाल राजसिंहासन पर विराजमान होते हैं, चमर ढुलाए जाते हैं, और वे धृति, शांति आदि गुणों से युक्त होकर प्रजा का उपकार करते हैं। वे राजाओं को न्यायपूर्वक प्रजा पालन, दुष्टों का निग्रह, और शिष्टों के संरक्षण की शिक्षा देते हैं। दिव्य अस्त्रों की आराधना से युद्ध में विजय प्राप्त होती है। यह धर्मविजयी राजा यश, वैभव, और परलोक में स्वर्ग प्राप्त करता है। इस क्रिया से वह दोनों लोकों में समृद्धि पाता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 252 to 261
श्लोक ( Shlok ) 252
श्रीदेव्यश्च सरिद्देव्यो’ देव्यो विश्वेश्वरा अपि । समुपेत्य नियोगै स्वस्तदैनं पर्युपासते ॥२५२॥इति चक्राभिषेकः ।
श्री ह्री आदि देवियां, गङ्गा सिन्धु आदि देवियां तथा विश्वेश्वरा आदि देवियां अपने अपने नियोगोंके अनुसार आकर उस समय उनकी उपासना करती हैं ।॥ २५२ ।। यह चक्राभिषेक नामकी छियालीसवीं क्रिया है।
The goddesses Śrī, Hṛī, and others; the goddesses Ganga, Sindhu, and their ilk; as well as the goddesses Viśveśvarā and others, each according to their appointed roles, come forth at that time to worship Him.This is the forty-sixth act (kriyā), known as Chakrābhiṣeka—the Anointment of the Discus. 252
श्लोक ( Shlok ) 253
चक्राभिषेक इत्येकः समाख्यातः क्रियाविधिः । तदनन्तरमस्य स्यात् साम्राज्याख्यं क्रियान्तरम् ।।२५३॥
इस प्रकार उनकी यह एक चक्राभिषेक नामकी क्रिया कही। अब इसके बाद साम्राज्य नामकी दूसरी क्रिया कहते हैं ।॥ २५३।।
Thus, this solemn rite is called the Chakrābhiṣeka—the Anointment of the Discus. Now, next follows the second act, known as Sāmrājya—the Sovereignty.253
श्लोक ( Shlok ) 254 – 258
अपरेद्युर्दिनारम्भे धृतपुण्यप्रसाधनः । मध्ये महानृपसमं नृपासनमधिष्ठितः ।।२५४।।दीप्रैः प्रकीर्णकव्रातैः स्वर्धुनीसीकरोज्ज्वलैः । वारनारीकराधूतैर्बीज्यमानः समन्ततः ॥२५५।।सेवागतैः पृथिव्यादिदेवतांशै परिष्कृतः । धृतिप्रशान्तदीप्त्योजो निर्मलत्वोपमा दिभिः ॥२५६।।तान् प्रजानुग्रहे नित्यं समाधानेन योजयन् । सम्मानदानविश्रम्भै प्रकृतीरनुरञ्जयन् ॥२५७।। पार्थिवान् प्रणतान् यूयं न्यायैः पालयत प्रजाः । अन्यायेषु प्रवृत्ताश्चेद् वृत्तिलोपो ध्रुवं हि वः ॥२५८।।
दूसरे दिन प्रातःकालके समय जिन्होंने पवित्र आभूषण धारण किये हैं जो बड़े बड़े राजाओंकी सभाके बीचमें राजसिहासनपर विराजमान हैं, जिनपर देदीप्यमान, गङ्गा नदीके जलके छींटोंके समान उज्ज्वल और गणिकाओंके हाथसे हिलाये हुए चमर चारों ओरसे ढुलाये जा रहे हैं, जो धृति, शान्ति, दीप्ति, ओज और निर्मलताको उत्पन्न करनेवाले पृथिवी आदि देवताओं के अंशोंसे अर्थात् उनके वैक्रियिक शरीरोंसे हैं, जो उन देवताओंको समाधान-पूर्वक निरन्तर प्रजाके उपकार करने में लगा रहे हैं और आदर सत्कार, दान तथा विश्वास आदि से जो मंत्री आदि प्रमुख कार्यकर्ताओंको आनन्दित कर रहे हैं ऐसे वे महाराज नमस्कार करते हुए राजाओंको इस प्रकार शिक्षा देते हैं कि तुम लोग न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करो, यदि अन्यायमं प्रवृत्ति रक्खोगे तो अवश्य ही तुम्हारी वृत्तिका लोप हो जावेगा ॥ २५४-२५८।।
On the following dawn, those who have donned their sacred ornaments, seated upon the royal throne amid the assembly of great kings, with fans (chāmaras) waved all around—each fan shimmering like the spray of the sacred waters of the Ganges, moved by the hands of celestial attendants—stand as embodiments of fortitude, peace, radiance, vigor, and purity.These qualities are the very fragments, the subtle forms of the earth and other deities, whose divine energies tirelessly labour for the welfare of the people.With respect, honour, gifts, and trust, they delight the ministers and chief officials around them.Thus, these great monarchs greet the kings with reverence and instruct them thus:
“Rule your subjects with justice and righteousness. Should you entertain injustice in your conduct, surely your reign shall come to an end.”254 – 258
श्लोक ( Shlok ) 259
न्यायश्च द्वितयो दुष्टनिग्रहः शिष्टपालनम्। सोऽयं सनातनः क्षात्रो धर्मो रक्ष्यः प्रजेश्वरैः ॥२५९॥
न्याय दो प्रकारका है-एक दुष्टोंका निग्रह करना और दूसरा शिष्ट पुरुषोंका पालन करना । यहक्षत्रियोंका सनातन धर्म है। राजाओंको इसकी रक्षा अच्छी तरह करनी चाहिये ॥ २५९॥
Justice has twofold meaning: the restraint of the wicked and the protection of the virtuous.This is the eternal duty of the Kṣatriyas, and the kings must guard it diligently.259
श्लोक ( Shlok ) 260
दिव्यास्त्रदेवताश्चामूराराध्याः स्युर्विधानतः । ताभिस्तु सुप्रसन्नाभिरवश्यं भावुको जयः ॥२६०॥
ये दिव्य अस्त्रोंके अधिष्ठाता देव भी विधिपूर्वक आराधना करने योग्य हैं क्योंकि इनके प्रसन्न होनेपर युद्धमें विजय अवश्य ही होती है ।।२६०।।
These divine gods, patrons of celestial weapons, are indeed worthy of reverent worship performed according to sacred rites; for by their favor, victory in battle is assured.260
श्लोक ( Shlok ) 261
राजवृत्तिमिमां सम्यक् पालयद्भिरतन्द्रितैः । प्रजासु वर्तितव्यं भो भवद्भिर्न्यायवर्त्मना ॥२६१॥
इस राजवृत्तिका अच्छी तरह पालन करते हुए आप लोग आलस्य छोड़कर प्रजाके साथ न्याय-मार्गसे बर्ताव करो ॥ २६१॥
By faithfully observing this royal duty, cast aside all laziness and deal with your subjects steadfastly along the path of justice.261
श्लोक 262 से 271
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251
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