आदिपुराण पर्व 3 सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 3 by Acharya Jinasena
पर्व 3 में महापुराण की पीठिका के रूप में कालद्रव्य, उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल, और चौदह कुलकरों के कार्यों का वर्णन हैं।
संक्षिप्त सारांश (श्लोक 1 से 239)
ग्रंथकर्ता वृषभनाथ को नमस्कार कर पीठिका शुरू करता है। कालद्रव्य अनादि और सूक्ष्म है। यह लोकाकाश में सहकारी कारण है। व्यवहारकाल इसके भेद हैं। उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल के छह-छह भेद हैं। सुषमासुषमा में मनुष्यों की आयु तीन पल्य और ऊँचाई 6000 धनुष थी। वे कल्पवृक्षों से भोग प्राप्त करते थे। सुषमा में आयु दो पल्य और ऊँचाई 4000 धनुष थी। सुषमादुःषमा में आयु एक पल्य और ऊँचाई एक कोश थी। प्रतिश्रुति पहले कुलकर थे। इन्होंने सूर्य-चंद्रमा का भय दूर किया। सन्मति ने तारों का भय हटाया। क्षेमंकर ने पशुओं से रक्षा सिखाई। क्षेमंधर ने लाठी का उपदेश दिया। सीमंकर और सीमंधर ने कल्पवृक्षों की सीमाएँ नियत कीं। विमलवाहन ने सवारी का उपदेश दिया। चक्षुष्मान ने पुत्र-मुख देखने की प्रथा शुरू की। यशस्वान ने आशीर्वाद की रीत चलाई। अभिचंद्र ने चंद्रमा के साथ क्रीड़ा सिखाई। चंद्राभ ने संतानों के साथ जीवित रहने की प्रथा लाई। मरुदेव ने नाव और सीढ़ियाँ बनवाईं। प्रसेनजित ने जरायु हटाना सिखाया। नाभिराज ने नाल काटने का उपदेश दिया। उनके समय मेघ आए और धान्य उत्पन्न हुए। प्रजा ने नाभिराज से उपयोग पूछा। उन्होंने वृक्षों और ओषधियों का उपयोग बताया। चौदह कुलकरों ने पुण्य से यहाँ जन्म लिया। इन्होंने दंड व्यवस्था बनाई। उनकी आयु संख्याएँ पूर्व, पर्व आदि हैं। गौतम ने यह कथा कही। सभा आनंदित हुई। वे वृषभदेव का पुराण कहने को तैयार हुए।
श्लोक 1 से 10: कालद्रव्य का स्वरूप
ग्रंथकर्ता वृषभनाथ को नमस्कार कर पीठिका का व्याख्यान करता है। कालद्रव्य अनादिनिधन और सूक्ष्म है। यह लोकाकाश में भरा है। यह पदार्थों के परिणमन में सहकारी है। जीव, पुद्गल आदि पाँच अस्तिकाय हैं। काल एकप्रदेशी होने से अस्तिकाय नहीं है। यह व्यवहारकाल का मूल है। इसमें गुण और पर्याय हैं। यह अनस्तिकाय सिद्ध होता है। व्यवहारकाल मुख्य काल से उत्पन्न है।
श्लोक 11 से 20 व्यवहारकाल और उसके भेद
व्यवहारकाल समय, आवलि आदि भेदों से जाना जाता है। यह सूर्यादि के चक्र से प्रकट होता है। भव और आयु का समय अगत होता है। इसके दो भेद हैं—उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी। प्रत्येक का प्रमाण दस कोड़ाकोड़ी सागर है। दोनों के छह-छह भेद हैं। अवसर्पिणी के भेद सुषमासुषमा से दुःषमदुःषमा हैं। उत्सर्पिणी इसके विपरीत है। ये नाम सार्थक हैं। दोनों कालचक्र से घूमते हैं।
श्लोक 21 से 30 सुषमासुषमा काल
भरतक्षेत्र में सुषमासुषमा काल चार कोड़ाकोड़ी सागर का था। यहाँ भोगभूमि जैसी स्थिति थी। मनुष्यों की आयु तीन पल्य और ऊँचाई छह हजार धनुष थी। उनके शरीर सुवर्ण-से थे। वे आभूषण धारण करते थे। पुण्य से उन्हें सौंदर्य मिलता था। वे बलवान और तेजस्वी थे। वे तीन दिन बाद भोजन करते थे।
श्लोक 31 से 40 सुषमासुषमा की व्यवस्था
उन्हें रोग या परिश्रम नहीं था। स्त्रियाँ भी समान आयु और ऊँचाई की थीं। दोनों भोगों में अनुरक्त थे। उनका रूप और वचन सुंदर थे। कल्पवृक्ष उन्हें भोग देते थे। ये वृक्ष प्रकाशमान थे। ये दस प्रकार के थे। ये पुण्यात्माओं को भोग देते थे।
श्लोक 41 से 51 सुषमा काल
आयु अंत में पुरुष जम्हाई और स्त्री छींक से स्वर्ग जाते थे। वे भद्र थे। सुषमासुषमा का वर्णन हुआ। इसके बाद सुषमा काल तीन कोड़ाकोड़ी सागर का था। यहाँ मध्यम भोगभूमि थी। मनुष्यों की आयु दो पल्य और ऊँचाई चार हजार धनुष थी। वे दो दिन बाद भोजन करते थे। फिर सुषमादुःषमा काल शुरू हुआ।
श्लोक 52 से 62 सुषमादुःषमा काल
सुषमादुःषमा दो कोड़ाकोड़ी सागर का था। मनुष्यों की आयु एक पल्य और ऊँचाई एक कोश थी। वे एक दिन बाद भोजन करते थे। पल्य का आठवाँ भाग शेष रहने पर कल्पवृक्ष कमजोर हुए। आषाढ़ पूर्णिमा को सूर्य और चंद्रमा दिखे। वे आकाश में सुवर्ण-से शोभते थे। वे साधुओं और राजाओं का अनुकरण करते थे।
श्लोक 63 से 71 प्रतिश्रुति कुलकर
प्रतिश्रुति पहले कुलकर थे। उनकी आयु पल्य का दसवाँ भाग और ऊँचाई 1800 धनुष थी। वे आभूषणों से शोभित थे। वे अवधिज्ञान धारक थे। उन्होंने प्रजा को अमृत-से वचन दिए। सूर्य-चंद्रमा को देख भयभीत प्रजा को उन्होंने आश्वस्त किया। वे ग्रहों का स्वरूप समझाते थे।
श्लोक 72 से 81 सन्मति कुलकर
प्रतिश्रुति ने व्यवस्थाएँ बताईं। प्रजा ने उनकी स्तुति की। असंख्यात वर्ष बाद सन्मति कुलकर हुए। वे आभूषणों से शोभित थे। उनकी आयु संख्यात वर्ष और ऊँचाई 1300 धनुष थी। ज्योतिरंग वृक्ष मंद हुए। रात्रि में तारे दिखे।
श्लोक 82 से 91 सन्मति का उपदेश
तारों को देख प्रजा भयभीत हुई। सन्मति ने उन्हें भयमुक्त किया। उन्होंने तारों और ज्योतिश्चक्र का स्वरूप बताया। वे सूर्यग्रहण आदि समझाते थे। प्रजा ने उनकी प्रशंसा की। असंख्यात वर्ष बाद क्षेमंकर मनु हुए। वे मेरु-से शोभित थे।
श्लोक 92 से 101 क्षेमंकर मनु
क्षेमंकर की आयु अटट और ऊँचाई 800 धनुष थी। पशु विकारग्रस्त हुए। प्रजा ने भयभीत होकर उनसे पूछा। क्षेमंकर ने पशुओं के बदलाव को कालदोष बताया। उन्होंने दुष्ट पशुओं को छोड़ने की सलाह दी। प्रजा ने गाय-भैंस के साथ रहना शुरू किया।
श्लोक 102 से 111 क्षेमंधर और सीमंकर
क्षेमंकर की आयु समाप्त होने पर असंख्यात वर्षों बाद क्षेमंधर चौथे मनु हुए। उनकी आयु तुटिक वर्ष और ऊँचाई 775 धनुष थी। इन्होंने दुष्ट पशुओं से रक्षा के लिए लाठी का उपदेश दिया। इसके बाद सीमंकर पाँचवें मनु हुए। उनकी आयु कमल वर्ष और ऊँचाई 750 धनुष थी। इन्होंने कल्पवृक्षों की सीमा नियत की।
श्लोक 112 से 124 सीमंधर और विमलवाहन
सीमंधर छठे मनु हुए। उनकी आयु नलिन वर्ष और ऊँचाई 725 धनुष थी। इन्होंने कल्पवृक्षों की सीमाएँ चिह्नित कीं। इसके बाद विमलवाहन सातवें मनु हुए। उनकी आयु पद्म वर्ष और ऊँचाई 700 धनुष थी। इन्होंने सवारी के लिए पशुओं पर उपकरण लगाने का उपदेश दिया। फिर चक्षुष्मान आठवें मनु हुए। उनकी आयु पद्मांग वर्ष और ऊँचाई 675 धनुष थी। इन्होंने पुत्र-मुख देखने का भय दूर किया।
श्लोक 125 से 138 यशस्वान से चंद्राभ
यशस्वान नौवें मनु हुए। उनकी आयु कुमुद वर्ष और ऊँचाई 650 धनुष थी। इन्होंने संतानों को आशीर्वाद देने की प्रथा शुरू की। अभिचंद्र दसवें मनु हुए। उनकी आयु कुमुदा वर्ष और ऊँचाई 625 धनुष थी। इन्होंने चंद्रमा के साथ क्रीड़ा सिखाई। चंद्राभ ग्यारहवें मनु हुए। उनकी आयु नयुत वर्ष और ऊँचाई 600 धनुष थी। ये संतानों के साथ जीवित रहने की प्रथा लाए।
श्लोक 139 से 151 मरुदेव और प्रसेनजित
मरुदेव बारहवें मनु हुए। उनकी आयु नयुत वर्ष और ऊँचाई 575 धनुष थी। इन्होंने नाव और सीढ़ियाँ बनाने का उपदेश दिया। प्रसेनजित तेरहवें मनु हुए। उनकी आयु एक पर्व और ऊँचाई 550 धनुष थी। इन्होंने जरायु हटाने का उपदेश दिया। ये सूर्य-से शोभित थे।
श्लोक 152 से 163 नाभिराज का स्वरूप
नाभिराज चौदहवें मनु हुए। उनकी आयु एक करोड़ पूर्व और ऊँचाई 525 धनुष थी। वे आभूषणों से शोभित थे। उनका मुख चंद्रमा को लज्जित करता था। उनकी भुजाएँ सर्प-सी थीं। उनका कटि स्थिर और नाभि सुंदर थी। उनका शरीर इंद्र से भी श्रेष्ठ था।
श्लोक 164 से 171 मेघों का आगमन
नाभिराज के समय मेघ प्रकट हुए। वे बिजली और गर्जना से युक्त थे। ठंडी वायु बहने लगी। चातक और मोर हर्षित हुए। मेघ पर्वतों का अभिषेक करते थे।
श्लोक 172से 183 धान्य की उत्पत्ति
मेघों से नदियाँ बहीं। वे शोक-से रोते थे। बिजली नटी-सी नृत्य करती थी। चातक मेघों से प्रेम करते थे। मेघों से धान्य उत्पन्न हुए। ये पुण्य से पक गए।
श्लोक 184 से 192 प्रजा की व्याकुलता
धान्य मध्यम वृष्टि से फले। चावल, गेहूँ आदि उत्पन्न हुए। प्रजा उपयोग नहीं जानती थी। कल्पवृक्ष नष्ट होने से वे व्याकुल हुए। भूख से चित्त अशांत हुआ। वे नाभिराज से प्रार्थना करने लगे।
श्लोक 193 से 201 नाभिराज का उपदेश
प्रजा ने वृक्षों और झाड़ियों के उपयोग पूछा। नाभिराज ने उन्हें भयमुक्त किया। इन्होंने कहा कि ये वृक्ष भोग्य हैं। विषवृक्षों को छोड़ना चाहिए। ओषधियाँ स्वाद बढ़ाती हैं।
श्लोक 202 से 212 प्रजा का हित
नाभिराज ने रस निकालने और बर्तन बनाने का उपदेश दिया। प्रजा प्रसन्न हुई। भोगभूमि नष्ट हो गई। चौदह कुलकर विदेह से आए थे। इन्होंने पुण्य से सम्यग्दर्शन प्राप्त किया। ये कुल और वंश स्थापित करते थे।
नाभिराज ने रस निकालने, बर्तन बनाने का उपदेश। प्रजा प्रसन्न, भोगभूमि समाप्त। कुलकर विदेह से उत्पन्न, सम्यग्दर्शन धारक। कार्यों हेतु कुलकर नाम।
श्लोक 213 से 221 दंड और संख्याएँ
वृषभदेव और भरत भी कुलकर थे। कुलकरों ने दंड व्यवस्था बनाई। प्रथम पांच (हा), अगले पांच (हा, मा), शेष (हा, मा, धिक)। भरत ने शारीरिक दंड शुरू किए। आयु की संख्याएँ पूर्व, पर्व आदि हैं। इनका गुणाकार से निश्चय होता है।
श्लोक 222 से 239 कुलकरों का कार्य
संख्याएँ संख्यात और असंख्यात हैं। कुलकरों के नाम प्रतिश्रुति से नाभिराज तक हैं। इन्होंने भय दूर करने से लेकर नाल काटने तक के कार्य किए। गौतम ने यह कथन किया। सभा आनंदित हुई। वे वृषभदेव का पुराण कहने को तत्पर हुए।
पर्व 4
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