आदिपुराण 27 पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 27 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 27 (श्लोक 1 से 152)
महाराज भरत ने गंगा नदी की शोभा देखी, जिसे सारथि ने ऋषभदेव की वाणी समान पवित्र और आनंददायी बताया। गंगा हिमवान् और समुद्र को पवित्र करती है, हाथियों को शांत करती है, और राजलक्ष्मी सी शोभित है। शरद् ऋतु में सप्तपर्ण, बाण वृक्ष, और कमल सरोवरों की शोभा बढ़ाते हैं। हंस, चकवा, और भौंरे प्रकृति को जीवंत करते हैं। वन में देव, किन्नर, और विद्याधरियां संगीत-नृत्य से उत्सव सजाते हैं। वसंत, ग्रीष्म, और वर्षा ऋतु की लताएं और पुष्प वन को रंगीन बनाते हैं। सेना के क्षोभ से मृग, हाथी, और सिंह भयभीत होकर भागते हैं। वन की तुलना भरत की सेना से की गई, जो बाण-असन वृक्षों और गैंडों से युक्त है। मध्याह्न की गर्मी में पक्षी और हंस छाया में शरण लेते हैं, रानियों के मुख पर पसीने की बूंदें कमल की ओस सी शोभित होती हैं। घोड़े और सैनिक तीव्र गति से दौड़ते हैं, पर मार्ग में अव्यवस्था फैलती है। भरत शिबिर पहुंचे, जहां रत्नों, तंबुओं, और बाजार की शोभा समुद्र सी थी। शिबिर का आंगन रथों, हाथियों, और राजकुमारों से सुशोभित था। भरत ने तंबू में प्रवेश किया, और पूर्व दिशा के राजाओं ने धन, कन्याएं, और वस्तुएं भेंटकर उनकी सेवा की, जबकि अन्य राजा दूर से प्रणाम करते थे
श्लोक 1 से 11
गंगा नदी की महिमा और भरत की दृष्टि
महाराज भरत ने गंगा नदी पर दृष्टि डाली, जो स्वच्छ जल से उनके लिए पादोदक प्रदान करती सी प्रतीत हुई। सारथि ने गंगा की तुलना ऋषभदेव की वाणी से की, जो संसार को आनंदित और पापों को नष्ट करती है। गंगा हिमवान् पर्वत और समुद्र को पवित्र करती है। यह जंगली हाथियों को शांत करती है, जैसे सम्यग्ज्ञान मुनियों को अहंकार से मुक्त करता है। गंगा का प्रवाह समुद्र द्वारा धारण किया जाता है, जो इसकी पवित्रता और निर्मलता को दर्शाता है। यह हिमवान् की कीर्ति के समान है और आकाशगंगा कहलाती है।
श्लोक 12 से 21
गंगा की शोभा और शरद् ऋतु
गंगा नदी तटवर्ती वनों से नीले वस्त्र धारण किए सी सुशोभित है। हंसों की पंक्तियां इसकी सुवर्णमय करधनी और सहायक नदियां इसकी सखियां प्रतीत होती हैं। यह राजलक्ष्मी के समान पूज्य और प्रेम उत्पन्न करने वाली है। गंगा वनवेदिका को धारण करती है। शरद् ऋतु में सप्तपर्ण वृक्ष सुगंध बिखेरते हैं, बाण वृक्ष कामी चित्त को आकर्षित करते हैं, और तालाबों में नील कमल शरद् लक्ष्मी के मुख समान खिलते हैं। भौंरे कमलों में आसक्त हैं।
श्लोक 22 से 31
प्रकृति और गंगा की शोभा
भौंरे कमल के पराग से पीले होकर कामरूपी अग्नि के स्फुलिंग समान हैं। स्थल कमल शरद् लक्ष्मी के तंबू प्रतीत होते हैं। हंस कमल को स्थल समझकर पानी में डूब जाता है, मृणाल को मक्खन समझकर बच्चों को देता है, और चकवी को न देखकर करुण स्वर में रोता है। गंगा के किनारे सप्तपर्ण वृक्ष चंदोवा की शोभा धारण करते हैं। गंगा की लहरों से उठा पवन थकान हरता है और वनों को हिलाता है।
श्लोक 32 से 41
वन और देव क्रीड़ा
गंगा का पवन जल की बूंदों से अतिथि सत्कार करता प्रतीत होता है। वन दुर्गम और देवों द्वारा अधिष्ठित है, जहां लतागृह फूलों की शय्याओं से सुशोभित हैं। देव और देवांगनाएं मंदार वृक्षों की छाया में चंद्रकांत शिलाओं पर क्रीड़ा करते हैं। किन्नर, सिद्ध, और विद्याधरियां संगीत, नृत्य, और विलास से वन की शोभा बढ़ाते हैं। ऋतुओं का समूह वन में एकत्र होकर उत्सव जैसा प्रतीत होता है।
श्लोक 42 से 51
वन में ऋतुओं की शोभा
अशोक और आम्र वृक्ष फूलों से विद्याधरियों और कोकिलों की शोभा बढ़ाते हैं। चंपक वृक्ष वसंत में कामदेव के दीपक समान खिलते हैं। भौंरे और कोयल कामदेव की सेना के बाजे और नगाड़े प्रतीत होते हैं। माधवी और मालती लताएं वसंत और ग्रीष्म की सुगंध से भौंरों को चंचल करती हैं। वर्षा ऋतु में कदंब और केतकी की सुगंध वायु में फैलती है। मयूर, कोयल, और हंस विभिन्न शब्दों से वन को जीवंत बनाते हैं।
श्लोक 52 से 61
वन का संगीतमय वातावरण
भौंरे किन्नरियों के गीतों, कोयल सिद्धों की वीणा, और हंस विद्याधरियों के नूपुरों का अनुकरण करते हैं। मयूर नृत्य करते हैं, और हंसों के शब्द सुबह सोए हुए पक्षियों को जगाते हैं। लतागृह चंद्रकांत शिलाओं और फूलों की शय्याओं से देवों के नंदन वन समान प्रीतिकर हैं। वन के बाहर दुर्गम जंगल है, जहां सेना के क्षोभ से मृग भयभीत होकर भागते हैं।
श्लोक 62 से 71
वन्य जीवों का क्षोभ
सेना के क्षोभ से हाथी, सर्प, और अजगर भयभीत हैं। शुकर और गैंडा सेना को व्याकुल करते हैं। सिंह, भैंसा, और अन्य क्रूर जीव वन से निकलकर सेना का भय बढ़ाते हैं। अष्टापद नामक जीव छलांग मारकर भी दुखी नहीं होता। मृग और खरगोश भय से इधर-उधर दौड़ते हैं, जिससे सेना का क्षोभ बढ़ता है।
श्लोक 72 से 81
वन्य जीव और वन की शोभा
कृष्णसार मृग और हरिण सेना के बीच छिपते हैं। घायल हरिण समूह भरत से जीव पालन का आग्रह करता प्रतीत होता है। मयूर अपनी पूंछ से वन की शोभा बढ़ाते हैं। हरिण रथ के शब्द सुनकर भी मार्ग से नहीं हटते। स्त्रियां हरिणियों के नेत्रों और पूंछों में अपनी शोभा देखती हैं। वन जीवों के सह-अस्तित्व से शांत रहता है। घने वृक्षों की छाया सैनिकों को सूर्य की तीव्रता से बचाती है, मानो वनलक्ष्मी ने मंडप सजाए हों।
श्लोक 82 से 91
वन की शोभा और सेना की तुलना
गंगा के किनारे स्वच्छ तालाब वन-लक्ष्मी की प्याऊ जैसे प्रतीत होते हैं, जो गर्मी और क्लेश दूर करते हैं। सारथि ने वन की तुलना भरत की सेना से की, जिसमें बाण-असन वृक्ष धनुषों, गैंडा-हाथी तलवारधारी सैनिकों, और विशालता सेना की अनंतता को दर्शाते हैं। भरत ने वन को पार किया, बिना इसकी लंबाई का आभास हुए। घोड़ों की धूलि दिशाओं को परदे सी ढक रही थी। सैनिकों के कवच और स्त्रियों के वस्त्र धूल से रंगे थे। मध्याह्न में सूर्य विजिगीषु राजा सा प्रतापी और निर्मल था। पक्षी और हंस गर्मी से वृक्षों की छाया में शरण लेते थे।
श्लोक 92 से 101
मध्याह्न की गर्मी और प्रकृति
जंगली हाथी और शूकर गर्मी से सरोवरों में शरण लेते थे। हंस मृणाल से ढके और चकवा शेवाल से नीले कुरते सा प्रतीत होता था। राजहंस कमल के छत्र तले गोते लगाते थे। सूर्य की तीव्रता नदियों के किनारों पर हंसों को असंतोष देती थी। सूर्य, मध्यस्थ होकर भी संतापकारी था। रानियों के मुख पर पसीने की बूंदें कमल पर ओस सी शोभा बढ़ाती थीं, मानो मोती पिघलकर तरल हो गए हों।
श्लोक 102 से 111
रानियों और सेना की स्थिति
रानियों के मुख पर पसीने की बूंदें सौंदर्य रस को पुष्ट करती थीं। घोड़ों के मुख पर फेन और खुर स्खलित हो रहे थे। उत्तम घोड़े तीव्र वेग, सुंदर गमन, और बुद्धि-बल से युक्त थे, जो धूलि से रजस्वला पृथ्वी को घृणा करते हुए दौड़ते थे। पैदल सैनिक जूतों से कांटे-पत्थर लांघते, रथ-घोड़ों से तेज चलते थे। शक्ति, लट्ठ, भाला, और तलवारधारी योद्धा स्पर्धा में जल्दी दौड़ते थे।
श्लोक 112 से 121
सेना का उत्साह और मार्ग की अव्यवस्था
योद्धा जोर-जोर से चिल्लाकर मार्ग खाली कराते थे, घोड़ों, हाथियों, और रथों से बचने को कहते थे। एक दुष्ट हाथी और उलटा रथ मार्ग रोक रहे थे। घबड़ाया ऊंट और खच्चर से गिरी स्त्री अव्यवस्था दर्शाते थे। एक तरुण पुरुष वेश्या के मुख से चकित होकर गिरा, और बूढ़ा कुट्टिनी के पीछे तरुण सा व्यवहार करता था। सैनिक बातचीत में मग्न होकर शिबिर पहुंचे, बिना परिश्रम का आभास।
श्लोक 122 से 131
शिबिर की ओर प्रस्थान
मध्याह्न में सूर्य रानियों के मुख की कान्ति मलिन करता था, पर छत्ररत्न और रथ के कारण भरत को गर्मी का कष्ट नहीं हुआ। रथ का वेग और वृद्धों की कथाओं ने मार्ग को सरल बनाया। ध्वजा मार्ग सूचित करती थी। अन्य राजा कठिनाई से भरत के रथ के समीप पहुंचे। शिबिर के रावडी तंबू, चांदी के खंभे, और स्थलकमल जैसे अग्रभाग मनोहर थे।
श्लोक 132 से 141
शिबिर और बाजार की शोभा
शिबिर की कटीली बाड़ियां भरत के निष्कंटक राज्य का प्रतीक थीं। वृक्षों पर टंगे पलान और डेरे शोभा बढ़ाते थे। बाजार में तोरण, ध्वजाएं, और रत्नों की राशि थी। भरत ने रत्नों को देखकर निधियों की संख्या को प्रसिद्धि मात्र माना। बाजार समुद्र सा था, जिसमें घोड़े लहरें, तलवारें मछलियां, और हाथी मगर थे। राजमार्ग राजकुमारों से भरा था।
श्लोक 142 से 152
शिबिर का वैभव और भरत की आराधना
शिबिर का आंगन रत्नों, रथों, घोड़ों, और हाथियों से सुशोभित था, जो बगीचे और सभामंडप सा प्रतीत होता था। द्वारपाल भीड़ को हटाते थे, और मंगलमय शब्द सरस्वती की उपस्थिति दर्शाते थे। शिबिर की अनोखी शोभा भरत को आश्चर्यचकित करती थी। लक्ष्मीपति भरत ने पताकाओं और मंगल-द्रव्यों से युक्त तंबू में प्रवेश किया। सेना शांत होकर शिबिर में बसी। पूर्व दिशा के राजाओं ने धन, कन्याएं, और वस्तुएं भेंटकर भरत की सेवा की, जबकि अन्य राजा दूर से प्रणाम करते थे।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 27
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द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena