आदिपुराण भाग – 2 पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 |
श्लोक 112 से 121
सेना का उत्साह और मार्ग की अव्यवस्था
योद्धा जोर-जोर से चिल्लाकर मार्ग खाली कराते थे, घोड़ों, हाथियों, और रथों से बचने को कहते थे। एक दुष्ट हाथी और उलटा रथ मार्ग रोक रहे थे। घबड़ाया ऊंट और खच्चर से गिरी स्त्री अव्यवस्था दर्शाते थे। एक तरुण पुरुष वेश्या के मुख से चकित होकर गिरा, और बूढ़ा कुट्टिनी के पीछे तरुण सा व्यवहार करता था। सैनिक बातचीत में मग्न होकर शिबिर पहुंचे, बिना परिश्रम का आभास।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 27 – Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
पुरः प्रधावितैः प्रेङ्खद्वारवाणा ग्रपल्लवाः । जातपक्षा इवोड्डीय भटा जग्मुरतिद्रुतम् ॥११२॥
आगे आगे दौड़ने से जिनके कवच के अग्र भाग कुछ कुछ हिल रहे हैं ऐसे योद्धा लोग इतनी जल्दी जा रहे थे मानो पंख उत्पन्न होने से वे उड़े ही जा रहे हों ।॥ ११२ ॥
“The warriors, whose armor at the front was slightly shifting as they ran ahead, were moving so swiftly that it seemed as though they were flying, with wings suddenly sprouting.” ॥112॥
श्लोक ( Shlok ) 113
प्रयात धावतापेत मार्ग मा रुध्वमग्रतः । इत्युच्चैरुच्चरद्ध्वानाः “पौरस्त्यानत्ययुर्भटाः ॥११३॥
चलो, दौड़ो, हटो, आगे का मार्ग मत रोको इस प्रकार जोर जोर से बोलनेवाले योद्धा लोग अपने सामने के लोगों को हटा रहे थे ॥११३॥
“The warriors, shouting loudly, ‘Move, run, clear the way, do not block the path,’ were pushing aside those ahead of them.” ॥113॥
श्लोक ( Shlok ) 114
इतोऽपसर्पताश्वीयादितो धावत हास्तिकात् । इतो रथावपत्रस्ता दूरं नश्यत नश्यत ॥११४॥
अरे, इन घोड़ोंके समूहसे एक ओर हटो, इन हाथियों के समूह से भागो, और बिचले हुए इन रथों से भी दूर भाग जाओ ।॥११४॥
“Hey, move aside from these groups of horses, flee from these groups of elephants, and distance yourself from the chariots that are in the way.” ॥114॥
श्लोक ( Shlok ) 115
अमुष्माज्जनसङघट्टादुत्थापयत डित्थकान् । इतो ‘हस्त्युरसादश्वानपसारयत द्रुतम् ।।११५।।
अरे, इन बच्चों को लोगों की इस भीड़ से उठाओ और इनं हाथियों के आगे से घोड़ों को भी शीघ्र हटाओ ।।११५।।
“Hey, lift these children away from this crowd of people, and quickly move the horses away from the elephants ahead.” ॥115॥
श्लोक ( Shlok ) 116
इतः प्रस्थानमारुध्य स्थितोऽयं घातुको गजः । मध्येऽध्वं प्राजितुर्दोषात् “पर्यस्तोऽयमितो रथः ।। ११६॥
इधर यह दुष्ट हाथी रास्ता रोक कर खड़ा हुआ है और इधर यह रथ सारथि की गलती से मार्ग के बीचमें ही उलट गया है ।। ११६।।
“Here, this wicked elephant is blocking the path, and there, due to the charioteer’s mistake, a chariot has overturned right in the middle of the road.” ॥116॥
श्लोक ( Shlok ) 117
“क्रमेलको ऽयमुत्त्रस्तः प्रतीपं पथि धावति । उत्सृष्टभारो लम्बोष्ठो जनानिव विडम्बयन् ॥११७॥
इधर देखो, जिसने अपना भार पटक दिया है, जिसके लंबे ओठ हैं और जो बहुत घबड़ा गया है ऐसा यह ऊंट मार्ग में इस प्रकार उल्टा दौड़ा जा रहा है मानो लोगों की विडम्बना ही करना चाहता हो ।। ११७।।
“Look here—this camel, which has cast off its load, with long lips and in a state of great panic, is running erratically along the road, as if mocking the people around it.” ॥117॥
श्लोक ( Shlok ) 118
वित्रस्ताद्वेसरादेनां पतन्तीमवरोधिकाम् । सन्धारयन् प्रपातेऽस्मिन् सौविदल्लः पतत्ययम् ॥११८॥
इधर इस ऊँची जमीन पर घबड़ाये हुए खच्चर पर से गिरती हुई अन्तःपुरकी स्त्री को कोई कंचुकी बीच में ही धारण कर रहा है परन्तु ऐसा करता हुआ वह स्वयं गिर रहा है ।। ११८।।
“Here, on this elevated ground, a panicked mule is throwing off a woman from the inner quarters, and as she falls, someone tries to catch her by her bodice mid-air—but in doing so, he himself is falling.” ॥118॥
श्लोक ( Shlok ) 119
यवीयानेष पण्यस्त्रीमुखालोकनविस्मितः । पातितोऽप्यश्वसङघट्टै र्नात्मानं वेद शून्यधीः ॥११९॥
यह तरुण पुरुष वेश्या का मुख देखने से आश्चर्य-चकित होता हुआ घोड़े के धक्के से गिर गया है, परन्तु वह मूर्ख ‘में’ गिर गया हूं इस तरह अब भी अपने आपको नहीं जान रहा है ।। ११९॥
“This young man, astonished upon seeing the face of a courtesan, has fallen due to a jolt from a horse. Yet, in his foolishness, he still seems unaware that he has even fallen.” ॥119॥
श्लोक ( Shlok ) 120
हरिद्रारञ्जितश्मश्रुः कज्जलाङिकतलोचनः । कुट्टिनीमनुयन्नेष प्रवयास्तरुणायते ॥१२०॥
जिसने अपने बाल खिजाब से काले कर लिये हैं, जिसकी आंखों में काजल लगा हुआ है और जो किंसी कुट्टिनी के पीछे पीछे जा रहा है ऐसा यह बूढा ठोक तरुण पुरुष के समान आचरण कर रहा है ।। १२०।।
“This old man, who has dyed his hair black, lined his eyes with kohl, and is following behind some cunning procuress, is behaving like a youthful man, though clearly aged.” ॥120॥
श्लोक ( Shlok ) 121
इति प्रयाणसञ्जल्पैः अज्ञाताध्वपरिश्रमाः । सैनिकाः शिबिरं प्रापन् सेनास्याः प्राऊनिवेशितम् ॥१२१॥
इस प्रकार चलते समय की बात- चीत से जिन्हें मार्ग का परिश्रम भी मालूम नहीं हुआ है ऐसे सैनिक लोग सेनापति के द्वारा पहले से ही तैयार किये हुए शिबिर अर्थात् ठहरने के स्थान पर जा पहुंचे ॥ १२१।।
“Engaged in lively conversation along the way, the soldiers became unaware of the fatigue of the journey and soon reached the encampment—prepared in advance by the commander.” ॥121॥
श्लोक 122 से 131
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 |