आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131 लतावन का वैभव
आकाश केसर से सुगंधित था। भ्रमर फूलों पर गूंजते थे। वायु लताओं को हिलाता था। क्रीड़ा पर्वत और लतागृह संतोष देते थे। चंद्रकांत शिलाएँ विश्राम के लिए थीं। सुवर्णमय कोट निषध पर्वत-सा था। यह इंद्रधनुषों से चित्रित था। मोती और मूँगे इसकी शोभा बढ़ाते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
यत्र मन्दानिलोद् धूत किन्जल्का स्तरमम्बरम् । धत्ते स्म पटवासाभां पिञ्जरीकृतदिङ्मुखाम् ॥१२२॥
मंद-मंद वायु के द्वारा उड़ी हुई केशर से व्याप्त हुआ और जिसने समस्त दिशाएँ पीली-पीली कर दी है ऐसा वहाँ का आकाश सुगंधित चूर्ण (अथवा चँदोवे) की शोभा धारण कर रहा था ।।122।।
The sky there, filled with saffron carried by the gentle breeze and turning all directions golden-yellow, appeared as if it were adorned with a fragrant canopy of scented powder. ||122||
श्लोक ( Shlok ) 123
प्रतिप्रसवमासीनमन्जुगुञ्जन्मधुव्रतम् । विडम्बयदिवाभाति यत्सहस्त्राक्षविभ्रमम् ॥१२३॥
उस लतावन में प्रत्येक फूल पर मधुर शब्द करते हुए भ्रमर बैठे हुए थे जिनसे वह ऐसा जान पड़ता था मानो हजार नेत्रों को धारण करने वाले इंद्र के विलास की विडंबना ही कर रहा हो ।।123।।
In that creeper forest, bees sat on every flower, humming sweet melodies. This made the forest appear as if it were playfully imitating the grandeur of Indra, the thousand-eyed deity. ||123||
श्लोक ( Shlok ) 124
सुमनोमन्जरीपुञ्जात् किन्जल्कं सान्द्रमाहरन् । यत्र गन्धवहो मन्दं वाति स्मान्दोलयल्लताः ॥१२४
फूलों की मंजरियों के समूह से सघन पराग को ग्रहण करता हुआ और लताओं को हिलाता हुआ वायु उस लतावन में धीरे-धीरे बह रहा था ।।124।।
The wind gently flowed through the creeper forest, shaking the vines as it carried the dense pollen gathered from clusters of blooming flowers. ||124||
श्लोक ( Shlok ) 125
यत्र क्रीडादयो रम्याः सशय्याश्च लतालयाः । धृतये स्म सुरस्त्रीणां कल्पन्ते शिशिरानिलाः ॥१२५॥
उस लतावन में बने हुए मनोहर क्रीड़ा पर्वत, शय्याओं से सुशोभित लतागृह और ठंडी-ठंडी हवा देवांगनाओं को बहुत ही संतोष पहुंचाती थी ।।125।।
The charming play-mountains, vine-covered resting pavilions, and the cool, soothing breeze in that creeper forest brought immense delight and comfort to the celestial maidens. ||125||
श्लोक ( Shlok ) 126
वल्लीः कुसुमिता यत्र स्पृशन्ति स्म मधुव्रताः । रजस्वला अपि प्रायः क्व शौचं मधु पायिनाम् ॥१२६ ll
उस वन में अनेक कुसुमित अर्थात् फूली हुई और रजस्वला अर्थात् पराग से भरी हुई लताओं का मधुव्रत अर्थात् भ्रमर स्पर्श कर रहे थे सो ठीक ही है क्योंकि मधुपायी अर्थात् मद्य पीने वालों के पवित्रता कहाँ हो सकती है । भावार्थ―जिस प्रकार मधु (मदिरा) पान करने वाले पुरुषों के पवित्र और अपवित्र का कुछ भी विचार नहीं रहता, वे रजोधर्म से युक्त ऋतुमती स्त्री का भी स्पर्श करने लगते हैं, इसी प्रकार मधु (पुष्परस) का पान करने वाले उन भ्रमरों के भी पवित्र-अपवित्र का कुछ भी विचार नहीं था, क्योंकि वे ऊपर कही हुई कुसुमित और रजस्वला लतारूपी स्त्रियों का स्पर्श कर रहे थे । यथार्थ में कुसुमित और रजस्वला लताएँ अपवित्र नहीं होतीं । यहाँ कवि ने श्लेष और समासोक्ति अलंकार की प्रधानता से ही ऐसा वर्णन किया है ।।126।।
In that forest, swarms of bees eagerly touched the blooming and pollen-laden creepers. And rightly so—for when have honey-drinkers ever cared for purity?
(Explanation): Just as those who indulge in intoxicating drinks disregard notions of purity and impurity, even approaching women during their cycle, similarly, these bees, absorbed in their love for nectar, made no distinction between pure and impure as they touched the pollen-rich vines.
(Note: In reality, blooming and pollen-laden creepers are not impure. The poet has used the literary devices of śleṣa (double entendre) and samāsokti (implicit comparison) to craft this verse.) ||126||
श्लोक ( Shlok ) 127
लताभवनमध्यस्था हिमानीस्पर्शशीतलाः । चन्द्रकान्तशिला यत्र विश्रमायामरेशिनाम् ॥१२७॥
उस वन के लतागृहों के बीच में पड़ी हुई बर्फ के समान शीतल स्पर्श वाली चंद्रकांतमणि की शिलाएं इंद्रों के विश्राम के लिए हुआ करती थीं ।।127।।
Amidst the vine-covered pavilions of that forest, lay slabs of Moonstone (Chandrakant Mani), cool to the touch like ice, serving as resting places for the celestial Indras. ||127||
श्लोक ( Shlok ) 128
तयोऽध्वानमतीत्यान्तः कियन्तमपि तां महीम्। प्रकारः प्रथमो वब्रे निषधाभो हिरण्मयः ॥१२८॥
उस लतावन के भीतर की ओर कुछ मार्ग उल्लंघन कर निषध पर्वत के आकार का सुवर्णमय पहला कोट था जो कि उस समवसरण भूमि को चारों ओर से घेरे हुए था ।।128।।
Deeper within the creeper forest, after crossing a few pathways, stood the first enclosure, golden in color and shaped like the Nishadha Mountain, completely encircling the Samavasarana land. ||128||
श्लोक ( Shlok ) 129
रुरुचेऽसौ महान् सालः क्षितिं तां परितः स्थितः। यथाऽसौ चक्रवा लाद्रिर्नृलोकाध्युषितां भुवम् ॥ १२९॥
उस समवसरण भूमि के चारो ओर स्थित रहने वाला वह कोट ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो मनुष्यलोक की भूमि के चारों ओर स्थित हुआ मानुषोत्तर पर्वत ही हो ।।129।।
The enclosure surrounding the Samavasarana land appeared so magnificent, as if it were the Manushottara Mountain encircling the realm of human beings. ||129||
श्लोक ( Shlok ) 130
नूनं सालनिभेनैत्य सुरचापपरःशतम् । वामलंकुरुते स्म क्ष्मां पिञ्जरीकृतखाङ्गणम् ॥१३०॥
उस कोट को देखकर ऐसा मालूम होता था मानो आकाशरूपी आंगन को चित्र-विचित्र करने वाला सैकड़ों इंद्रधनुषों का समूह ही कोट के बहाने से आकर उस समवसरण भूमि को अलंकृत कर रहा हो ।।130।।
Upon seeing that enclosure, it appeared as if a multitude of rainbows, which adorn the courtyard of the sky with their vibrant hues, had gathered in the form of the enclosure, embellishing the Samavasarana land. ||130||
श्लोक ( Shlok ) 131
यस्योपरितले लग्ना सुव्यक्ता मौक्तिकावली । तारातत्तिरियं किंस्विदित्याशङ्कास्पदं नृणाम् ॥१३१॥
उस कोट के ऊपरी भाग पर स्पष्ट दिखाई देते हुए जो मोतियों के समूह जड़े हुए थे वे क्या यह ताराओं का समूह है, इस प्रकार लोगों की शंका के स्थान हो रहे थे ।।131।।
The clusters of pearls embedded in the upper part of that enclosure were so clearly visible that they became a source of wonder, making people question—
“Are these truly pearls, or a cluster of stars?” ||131||
श्लोक 132 से 141
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