आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
श्लोक 62 से 71
वन्य जीवों का क्षोभ
सेना के क्षोभ से हाथी, सर्प, और अजगर भयभीत हैं। शुकर और गैंडा सेना को व्याकुल करते हैं। सिंह, भैंसा, और अन्य क्रूर जीव वन से निकलकर सेना का भय बढ़ाते हैं। अष्टापद नामक जीव छलांग मारकर भी दुखी नहीं होता। मृग और खरगोश भय से इधर-उधर दौड़ते हैं, जिससे सेना का क्षोभ बढ़ता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 28 – Shlok 62 to 102
श्लोक ( Shlok ) 62
सन्त्यब्धिनिलया देवास्त्वद्भुक्त्यन्र्तार्निवासिनः । तान् विजेतुमयं कालस्तवेत्युच्चैर्जुघोष च ॥६२॥
उसी समय पुरोहितने यह भी जोरसे घोषणा की कि हे देव, इस समुद्र में निवास करने वाले देव आपके उप-भोग करने योग्य क्षेत्रके भीतर ही रहते हैं इसलिये उन्हें जीतने के लिये आपका यह समय है ॥६२।।
At that very moment, the priest also loudly proclaimed: “O Lord, the gods who dwell in this ocean remain within the territory meant for your enjoyment; therefore, now is the time to conquer them.” (62)
श्लोक ( Shlok ) 63
ततः कतिपयैरेव नायकै परिवारितः । जगतीतल मारुक्षद् गङ्गाद्वारस्य चक्रभृत् ।।६३।।
तदनन्तर कुछ वीर पुरुषों से घिरे हुए चक्रवर्ती भरत गङ्गाद्वार की वेदी पर जा चढ़े ।।६३।।
Thereafter, surrounded by a few brave warriors, Emperor Bharata ascended the altar at Gangadwara. (63)
श्लोक ( Shlok ) 64
न केवलं समुद्रान्तःप्रवेशद्वारमेव तत् । कार्यसिद्धेरपि द्वारं तदमंस्त रथाङ्गभृत् ॥६४॥
चक्रवर्ती ने उस गङ्गाद्वार की वेदी को केवल समुद्रके भीतर प्रवेश करनेका द्वार ही नहीं समझा था किन्तु अपने कार्य की सिद्धि होनेका भी द्वार समझा था ।। ६४ ।।
The Emperor did not regard the altar at Gangadwara merely as a gateway to enter the ocean, but also as the gateway to the fulfillment of his mission. (64)
श्लोक ( Shlok ) 65
धृतमङगलवेषस्य तद्वेद्यारोहण विभोः। विजयश्रीसमुद्वाह वेद्यारोहणवद् बभौ ॥६५॥
मंगल वेषको धारण करने-वाले चक्रवर्ती का उस वेदी पर आरूढ होना विजय लक्ष्मी के विवाह की वेदीपर आरूढ़ होने के समान बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहा था ।। ६५।।
The ascent of the Emperor, adorned in auspicious attire, onto that altar shone brilliantly, as if he were ascending the wedding altar of the goddess of victory herself. (65)
श्लोक ( Shlok ) 66
मद्गृहाङ्गणवेदीयं जगतीति विकल्पयन् । दृशं व्यापारयामास ‘कुल्याबुद्ध्या महोदधौ ॥६६॥
यह वेदी मेरे घरके आंगनकी वेदी है इस प्रकार कल्पना करते हुए भरतने महासागर पर कृत्रिम नदी की बुद्धि से दृष्टि डाली थी । भावार्थ-भरतने अपने बल की अधिकतासे गङ्गाकी वेदीको ऐसा समझा था मानो यह हमारे घर के आंगन की ही वेदी है और महासमुद्र को ऐसा माना था मानो यह एक छोटी-सी नहर ही है ।।६६।।
Imagining that this altar was like the altar in the courtyard of his own home, Bharata cast his gaze upon the great ocean, perceiving it as no more than an artificial stream.
(Meaning: Due to the immense power he possessed, Bharata regarded the altar at Gangadwara as if it were merely the altar in his own courtyard, and viewed the vast ocean as nothing more than a small canal.) (66)
श्लोक ( Shlok ) 67
स प्रतिज्ञामिवारूढो जगतीं तां महायतिम् । निस्तीर्णमिव तत्पारं पारावारमजीगणत् ॥६७॥
वे उस बड़ी लम्बी वेदीपर इस प्रकार आरूढ़ हुए थे जैसे अपनी प्रतिज्ञा पर ही आरूढ़ हुए हों और समुद्र को उन्होंने ऐसा माना था जैसे उसके दूसरे किनारे पर ही पहुंच गये हों ।॥६७।।
He ascended that great and lengthy altar as if he were ascending his own solemn vow, and he regarded the ocean as though he had already reached its far shore. (67)
श्लोक ( Shlok ) 68 -102
मुहुः प्रचलदुद्वेलकल्लोलमनिलाहतम् । विलङ्घनाभयादुच्चैः फूत्कुर्वन्तमिवारवैः ॥६८॥
वीचिबाहु भिरुन्मुक्तैः सरत्नैः शीकरोत्करैः । पाद्यं स्वस्येव तन्वानं मौक्तिकाक्षतमिश्रितैः ॥६९।।
असङ जयशङ खमाक्रान्तविश्वद्वीपमपारकम् । परैरलङ्गवचमक्षोभ्यं स्वबलौघानुकारिणम् ॥७०॥
उत्फेन ‘जुम्भिकारम्भैः सापस्मारमिवोल्वणम् । केनाप्यशक्यमाधर्तु क्वचिदप्यनवस्थितम् ॥७१॥
अकस्मादुच्चरद्ध्वानमनिमित्तचलाचलम् ।अकारणकृतावर्तमति सङ्कुसुकस्थितिम् ॥ ७२।।
हसन्तमिव फेनोघैर्लसन्तमिव वीचिभिः । चलन्तमिव कल्लोलैर्माद्यन्तमिव घूर्णितैः ॥७३॥
सरत्नमुल्बगविजं मुक्तशूत्कारभीकरम् । स्फुरत्तरङगनिर्मोक स्फुरन्तमिव भोगिनम् ॥७४॥
अत्यम्बुपानादुद्रिक्तप्रतिश्यायमिवाधिकम् । क्षुतानोव विकुर्वाण ध्वनितानि सहस्रशः ॥७५॥
“आद्यनमसकृत्पीतविश्वस्रोतस्विनीरसम् । रसातिरेकादुद्गारं तत्वानमिव खात्कृतैः ॥७६॥
निजगम्भीरपातालमहागर्तापदेशतः । अतृप्यन्तमिवाम्भोभिरातालुविवृताननम् ॥ ७७।।
दिशां ‘रावणमाक्रान्त्याचलग्राहं विभीषणम् । रक्षसामिव सम्पातमतिकायं महोदरम् ॥७८॥
वीचीबाहुभिराघ्नन्तम जस्त्रं तटवेदिकाम् । समर्यादत्वमाहत्य श्रावयन्तमिवात्मनः ॥७९॥
चलद्भिरचलोदग्रैः कल्लोलै रतिवर्तिनम् । सरिद्युवतिसम्भोगाद् सम्मान्तमिवात्मनि ॥८०॥
तरङ्गिततनुं वृद्धं पृथुकं व्यक्तरङि्गतम् । सरत्नमतिकान्ताङ्गं सग्राहमतिभीषणम् ।। ८१॥
लावण्येऽपि न सम्भोग्य गाम्भीर्येऽप्यनवस्थितम् । महत्त्वेऽपि कृताक्रोशं व्यक्तमेव जलाशयम् ॥८२॥
न चास्य मदिरासङ्गो न कोऽपि मदनज्वरः । तथाप्युद्रिक्त कन्दर्पमारूढमधुविक्रियम् ॥८३॥
अनाशितंभवं पीत्वा सुस्वादुसरितां जलम् । गतागतानि कुर्वन्तं सन्तोषादिव वीचिभिः ॥८४॥
नदीवधूभिरासेव्यं कृतरत्नपरिग्रहम् । महा भोगिभिराराध्यं चातुरन्तमिव प्रभुम् ॥८५॥
यादोदोर्घातनिर्घातैर्दूरोच्चलितशीकरैः । सपताकमिवाशेषशेषार्णवविनिर्जयात् ।।८६।।
कुलाचलपृथुस्तम्भजम्बूद्वीपमहौकसः । विनीलरत्ननिर्माणमेकं सालमिवोच्छ्रितम् ॥८७॥
अनादिमस्तपर्यन्तमखिलार्थावगाहनम् । गभीरशब्दसन्दर्भ श्रुतस्कन्धमिवापरम् ॥८८॥
नित्यप्रवृत्तशब्दत्वाद् द्रव्यार्थिकनयाश्रितम् । वीचीनां क्षणभङ्गित्वात् पर्यायनयगोचरम् ॥८९॥
नित्यानुबद्धतृष्णत्वात् शश्वज्जलपरिग्रहात्। गुरूणां च तिरस्कारात् ‘किराजानमिवान्वहम् ॥९०॥
ससत्त्वमतिगम्भीरं भोगिभिर्धृतवेलकम् । सुराजानमिवात्युच्चे र्धृत्तिं मर्यादया धृतम् ॥९१॥
अनेकमन्तरद्वीपमन्तर्वर्तिनमात्मनः । दुर्गदेशमिवाहार्य पालयन्तमलङ्घनैः ॥९२॥
गर्जद्भिरतिगम्भीर नभोव्यापिभिरूर्जितैः । आपूर्यमाणमम्भोभिःर्वनौघैः किङ्करैरिव ॥९३॥
‘रङ्गितैश्चलितैः क्षोभैः रुत्थितैश्च विवर्तनै । ग्रहाविष्टमिवोज्जृम्भं सध्वानं च सघूर्णितम् ॥९४॥
रत्नांशुचित्रिततलं मुक्ताशबलितार्णसम् । ग्राहैरध्यासितं विष्वक्सुखालोकं च भीषणम् ॥९५॥
नदीनं रत्नभूयिष्ठमप्प्राणं चिरजीवितम् । समुद्रमपि चोन्मुद्र झषके “तुममन्मथम् ॥९६॥
अदृष्टपारमक्षोभ्यमसंहार्य मनुत्तरम् । सिद्धालयमिव व्यक्तम व्यक्तममृतास्पदम् ॥९७॥
क्वचिन्महोपलच्छाया ” धृतसन्ध्याभूविभूमम् । कृतान्धतमसारम्भं क्वचिन्नीलाश्मरश्मिभिः ॥ ९८॥
हरिन्मणिप्रभोत्सपैः क्वचित्सन्दिग्ध शैवलम् । क्वचिच्च कौङ्कुमीं कान्ति तन्वानं विद्रुमाङ्कुरैः ॥९९॥
क्वचिच्छुक्तिपुटोद्भेदसमुच्चलितमौक्तिकम् । तारकानिकराकीर्ण हसन्तं जलभृत्पथम् ।।१००।।
बेलापर्यन्तसम्मू र्छंत्सर्वरत्नांशु शीकरैः । क्वचिदिन्द्रधनुर्लेखां लिखन्तमिव खाङ्गणे ॥१०१।।
रथाङ्गपाणिरित्युच्चैः सम्भूतं रत्नकोटिभिः । महानिधिमिवापूर्वमपश्यन्मकराकरम् ॥१०२॥
- उस वेदीपरसे उन्होंने समुद्र देखा, उस समुद्रमें बारबार तटको उल्लंघन करने-वाली लहरें उठ रही थीं, पवन उसका ताड़न कर रहा था और वह अपने गंभीर शब्दोंसे ऐसा मालूम होता था मानो उल्लंघनके भयसे रो ही रहा हो तरंगरूपी भुजाओंसे किनारेपर छोड़े हुए रत्न सहित जलके छोटे छोटे कणोंसे वह ऐसा जान पड़ता था मानो भरतके लिये मोती और अक्षतोंसे मिला हुआ अर्घ ही दे रहा हो। उस समुद्रमें असंख्यात शंख थे, उसने समस्त द्वीपोंको आक्रान्त कर लिया था, वह पाररहित था, उसका कोई उल्लंघन नहीं कर सकता था और न उसे कोई क्षोभित ही कर पाता था इसलिये वह ठीक भरतकी सेनाके समूहका अनुकरण कर रहा था क्योंकि उसमें भी बजाये जानेवाले असंख्यात शंख थे, उसने भी समस्त द्वीप आक्रान्त कर लिये थे-अपने आधीन बना लिये थे, वह भी अपार था, वह भी दूसरोंके द्वारा अलंघनीय तथा क्षोभित करनेके अयोग्य था। वह समुद्र किसी अपस्मार (मृगी) के रोगीके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार अपस्मारका रोगी फेन सहित आती हुई जृम्भिकाओं अर्थात् जमुहाइयोंसे व्याकुल रहता है उसी प्रकार वह समुद्र भी फेन सहित उठती हुई जृम्भिका अर्थात् लहरोंसे व्याकुल था, जिस प्रकार अपस्मारका रोगी किसी के द्वारा पकड़-कर नहीं रखा जा सकता उसी प्रकार वह समुद्र भी किसी के द्वारा नहीं रोका जा सकता और जिस प्रकार अपस्मारका रोगी किसी भी जगह स्थिर नहीं रहता इसी प्रकार वह समुद्र भी किसी जगह स्थिर नहीं था-लहरों के कारण चंचल हो रहा था। वह समुद्र अकस्मात् ही गम्भीर शब्द करता था, विना कारण ही चंचल था और बिना कारण ही उसमें आवर्त अर्थात् भंवर पड़ते थे, इसलिये उसकी दशा किसी अन्यन्त भयभीत मनुष्यके समान हो रही थी क्योंकि अत्यन्त भयभीत मनुष्य भी अचानक शब्द करने लगता है, चिल्ला उठता है, बिना कारण ही कांपने लगता है, और बिना कारण ही आवर्त करने लगता है इधर उधर भागने लगता है। वह समुद्र फेन उठनेसे ऐसा जान पड़ता था मानो हँस ही रहा हो, ज्वार-भाटाओंसे ऐसा मालूम होता था मानो लास्य (नृत्य) ही कर रहा हो, लहरोंसे ऐसा सुशोभित होता था मानो चल ही रहा हो और हिलनेसे ऐसा दिखाई देता था मानो नशे में भूम ही रहा हो अथवा वह समुद्र किसी सर्पके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार सर्प रत्नसहित होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी रत्नसहित था, जिस प्रकार सर्पमें उत्कट विष अर्थात् जहर रहता है उसी प्रकार समुद्रमें भी उत्कट विष अर्थात् जल था, जिस प्रकार सर्प सू सू आदि फुंकारोंसे भयंकर होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी सू सू आदि शब्दोंसे भयंकर था, जिस प्रकार सर्पके देदीप्यमान कांचली होती है उसी प्रकार उस समुद्रके भी देदीप्यमान लहरें थीं, और जिस प्रकार सर्प चंचल रहता है उसी प्रकार वह समुद्र भी चंचल था। अथवा वह समुद्र ऐसा जान पड़ता था मानो अधिक पानी पीनेसे उसे सर्दी (जुकाम) ही हो गई हो और इसीलिये हजारों शब्दोंके बहाने छींकें ही ले रहा हो। अथवा वह समुद्र किसी आद्यून अर्थात् बहुत खानेवाले-पेटू-मनुष्य के समान जान पड़ता था, क्योंकि जिस प्रकार आद्यून मनुष्य बहुत खाता है और बादमें भोजन की अधिकता होनेसे डकारें लेता है उसी प्रकार उस समुद्रने भी समस्त नदियोंका जल पी लिया था और बादमें जलकी अधिकता होनेसे वह भी शब्दोंके बहाने डकारें ले रहा था। वह समुद्र अपने गम्भीर पातालरूपी महाउदरके बहानेसे जलसे कभी तृप्त नहीं होता था और इसी लिये मानो उसने तालु पर्यन्त अपना मुख खोल रखा था । भावार्थ-वह समुद्र किसी ऐसे मनुष्यके समान जान पड़ता था जो बहुत खानेपर भी तृप्त नहीं होता, क्योंकि जिस प्रकार तृप्त नहीं होनेवाला मनुष्य बहुत कुछ खाकर भी तृष्णासे अपना मुख खोले रहता है उसी प्रकार वहसमुद्र भी बहुत कुछ जल ग्रहण कर चुकनेपर भी तृष्णासे अपना मुख खोले रहता था-नदियों का अन्य जल ग्रहण करनेके लिये तत्पर रहता था। वह समद्र समस्त दिशाओंमें व्याप्त होकर
- शब्द कर रहा था इसलिये ‘रावण’ था, उसने अनेक पहाड़ अपने जलके भीतर डुबा लिये थे इसलिये ‘अचलग्राह’ था। वह सब जीवोंको भय उत्पन्न कराता था इसलिये विभीषण था, अत्यन्त बड़ा था इसलिये ‘अतिकाय’ था और बहुत गहरा होनेसे ‘महोदर’ था इस प्रकार वह ऐसा जान पड़ता था मानो राक्षसोंका समूह ही हो। वह समुद्र अपनी तरङ्गरूपी भुजाओं के द्वारा किनारेकी वेदीपर निरन्तर आघात करता रहता था इसलिये ऐसा जान पड़ता था मानो धक्का देकर उसे अपने समर्यादपनेको ही सुना रहा हो। वह पर्वतके समान ऊंची उठती हुई लहरोंसे किनारेको उल्लंघन कर रहा था इसलिये ऐसा जान पड़ता था मानो नदीरूप स्त्रियोंके साथ संभोग करनेसे अपने आपमें ही नहीं समा रहा हो। उसके शरीरमें अनेक तरंग-रूपी सिकुड़नें उठ रही थीं इसलिये वह वृद्ध पुरुषके समान जान पड़ता था, (पक्षमें अत्यन्त बड़ा था) अथवा वह समुद्र किसी पृथुक अर्थात् बालकके समान मालूम होता था (पक्षमें पृथु क अधिक है जल जिसमें ऐसा था) क्योंकि जिस प्रकार बालक पृथिवीपर घुटनोंके बल चलता है उसी प्रकार वह समुद्र भी लहरोंके द्वारा पृथिवीपर चल रहा था, जिस प्रकार बालक सरकता है उसी प्रकार वह भी लहरोंसे सरकता था, जिस प्रकार बालक अत्यन्त सुन्दर होता है उसी प्रकार वह भी अत्यन्त सुन्दर था। इसके सिवाय वह समुद्र मगरमच्छ आदि जलचरजीवों से सहित था तथा अत्यन्त भयंकर था अथवा वह समुद्र स्पष्ट ही जलाशय (ड और ल में अभेद होने से जडाशय) अर्थात् मूर्ख था क्योंकि लावण्य रहनेपर भी वह उपभोग करने योग्य नहीं था जो लावण्य अर्थात् सुन्दरतासे सहित होता है वह उपभोग करने योग्य अवश्य होता है परन्तु समुद्र वैसा नहीं था (पक्षमें लावण्य अर्थात् खारापन होनेसे किसीके पीने योग्य नहीं था) गंभीरता होनेपर भी वह स्थिर नहीं था, जो गंभीरता अर्थात् धैर्यसे सहित होता है वह स्थिर अवश्य रहता है परन्तु समुद्र ऐसा नहीं था (पक्षमें गंभीरता अर्थात् गहराई होनेपर भी वह लहरोंसे चंचल रहता था) और महत्त्वके रहते हुए भी वह चिल्लाता रहता था-गालियां बका करता था, जो महत्त्व अर्थात् बड़प्पनसे सहित होता है वह बड़ा शान्त रहता है, चिल्लाता नहीं है परन्तु समुद्र ऐसा नहीं था (पक्षमें बड़ा भारी होनेपर भी लहरोंके आघातसे शब्द करता रहता था) इन सब कारणोंसे स्पष्ट है कि वह जड़ाशय अवश्य था (पक्षमें जल है आशयमें जिसके अर्थात् जलसे भरा हुआ था। उस समुद्रके यद्यपि मद्यका संगम नहीं था-मद्य-पानका अभाव था तथापि वह आरूढ मधुविक्रिय था अर्थात् मद्यपानसे उत्पन्न होनेवाले विकार नशाको धारण कर रहा था, इसी प्रकार यद्यपि उसके काम-ज्वर नहीं था तथापि वह उद्रिक्त-कंदर्प था अर्थात् तीव्र काम-विकारको धारण करनेवाला था। भावार्थ इस श्लोकमें इलेष- मूलक विरोधाभास अलंकार है इसलिये प्रारम्भ-कालमें विरोध मालूम होता है परन्तु बादमें उसका परिहार हो जाता है। परिहार इस प्रकार समझना चाहिये कि वह मद्यके संगमसे रहित होकर मधु अर्थात् पुष्परसकी विक्रिया धारण कर रहा था अथवा मनोहर जलपक्षियों की क्रियाएं धारण कर रहा था और कामज्वरसे रहित होकर भी उद्रिक्त-कं-दर्प था अर्थात् जलके अहंकार से सहित था। वह समुद्र किनारेपर आती जाती हुई लहरोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो जिससे कभी तृप्ति न हो ऐसा नदियोंका मीठा जल पीकर लहरों द्वारा संतोपसे गमना-गमन ही कर रहा हो। अथवा वह समुद्र चक्रवर्तीके समान जान पडता था ययोंकि जिस प्रकार चक्रवर्ती अनेक स्त्रियोंके द्वारा सेवित होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी नदीरूपी अनेक स्त्रियोंके द्वारा सेवित था, जिस प्रकार चक्रवर्ती के पास अनेक रत्नोंका परिग्रह रहता है उसी प्रकार उस समुद्रके पास भी अनेक रत्नोंका परिग्रह था, जिस प्रकार चक्रवर्ती महाभोगी अर्थात् बड़े बड़े राजाओंके द्वारा आराधन करने योग्य होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी महाभोगी अर्थात् बड़े-बड़े सर्पोंके द्वारा आराधन करने योग्य था और जिस प्रकार चक्रवर्ती चारों ओर प्रसिद्ध रहता है उसी प्रकार वह समुद्र भी चारों ओर प्रसिद्ध था-व्याप्त था। जल-जन्तुओंके आघातसे उड़ी हुई और बहुत दूरतक ऊंची उछटी हुई जलकी बूंदोंसे वह समुद्र ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो बाकीके समस्त समुद्रोंको जीतनेसे अपनी विजय-पताका ही फहरा रहा हो। उस समुद्र-का नीले रंगका पानी वायुके वेगसे ऊपरको उठ रहा था जिससे वह ऐसा जान पड़ता था मानो कुलाचलरूपी वड़े बड़े खंभोंपर बने हुए जम्बूद्वीपरूपी विशाल घरका नील रत्नोंसे बना हुआ एक ऊंचा कोट ही हो। अथवा वह समुद्र दूसरे श्रुतस्कन्धके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार श्रुतस्कन्ध आदि-अन्त-रहित है त है उसी प्रकार वह समुद्र भी आदि-अन्त-रहित था, जिस प्रकार श्रुतस्कन्ध समस्त पदार्थोंका अवगाहन-निरूपण करनेवाला है उसी प्रकार वह समुद्र भी समस्त पदार्थोंका अवगाहन-प्रवेशन-धारण करनेवाला है, और जिस प्रकार श्रुतस्कन्ध में गंभीर शब्दोंकी रचना है उसी प्रकार उस समुद्रमें भी गम्भीर शब्द होते रहते थे-अथवा वह समुद्र द्रव्यार्थिक नयका आश्रय लेता हुआ सा जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार द्रव्या-थिक नयसे प्रत्येक पदार्थ में नित्य शब्दकी प्रवृत्ति होती है उसी प्रकार उस समुद्रमें भी नित्य शब्द की प्रवृत्ति हो रही थी अर्थात् निरन्तर गंभीर शब्द होता रहता था। अथवा उसकी लहरें क्षण-भंगुर थीं इसलिये वह पर्यायार्थिकके गोचर भी मालूम होता था क्योंकि पर्यायार्थिक नय पदार्थोंको क्षणभंगुर अर्थात् अनित्य बतलाता है। अथवा वह समुद्र किसी दुष्ट राजाके समान मालूम होता था क्योंकि जिस प्रकार दुष्ट राजा सदा तृष्णासे सहित होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी सदा तृष्णासे सहित रहता था अर्थात् प्रतिक्षण अनेक नदियोंका जल ग्रहण करते रहने पर भी संतुष्ट नहीं होता था, जिस प्रकार दुष्ट राजा जल (जड़) अर्थात् मूर्ख मनुष्योंसे घिरा रहता है उसी प्रकार वह समुद्र भी निरन्तर जल अर्थात् पानीसे घिरा रहता था, और जिस प्रकार दुष्ट राजा गुरु अर्थात् पूज्य महापुरुषोंका तिरस्कार करता है उसी प्रकार वह समुद्र भी गुरु अर्थात् भारी वजनदार पदार्थोंका तिरस्कार करता रहता था अर्थात् उन्हें डुबोता रहता था। अथवा वह समुद्र किसी उत्तम राजाके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार उत्तम राजा सत्त्व अर्थात् पराक्रमसे सहित होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी सत्त्व अर्थात् जल-जन्तुओं से सहित था, जिस प्रकार उत्तम राजा अत्यन्त गंभीर होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी अत्यन्त गंभीर अर्थात् गहरा था, जिस प्रकार उत्तम राजाके समीप अनेक भोगी अर्थात् राजा लोग विद्यमान रहते हैं उसी प्रकार उस समुद्रकी बेला (तट) पर भी अनेक भोगी अर्थात् सर्प विद्य-मान रहते थे, जिस प्रकार उत्तम राजाकी वृत्ति उच्च होती है उसी प्रकार उस समुद्रकी वृत्ति भी उच्च थी अर्थात् उसका जल हवासे ऊंचा उठ रहा था और जिस प्रकार उत्तम राजा मर्यादा अर्थात् कुल-परम्परासे आई हुई समीचीन पद्धतिसे सहित होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी मर्यादा अर्थात् पालीसे सहित था। वह समुद्र अपने मध्यमें रहनेवाले अनेक अन्तर्दीपोंकी रक्षा कर रहा था वे अन्तर्डीप उसके अलंघनीय तथा हरण करनेके अयोग्य किलोंके समान जान पडते थे । वह अतिशय गम्भीर समुद्र ऐसा जान पड़ता था मानो सेवकोंके समान निरन्तर बढ़ते हुए, गर्जते हुए और आकाशमें फैले हुए मेघोंके द्वारा ही जलसे भरा गया हो अथवा वह समुद्र किसी ग्रहाविष्ट अर्थात् भूत लगे हुए मनुष्यके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार ग्रहाविष्ट मनुष्य जमीनपर रेंगता है, चलता है, क्षुब्ध होता है, ऊंचा उछलता है और इधर उधर घूमता है अथवा करवटें बदलता है उसी प्रकार वह समुद्र भी लहरोंसे पृथिवीपर रेंग रहा था, चल रहा था, क्षुब्ध था, ऊंचा उछलता और इधर उधर घूमता था अर्थात् कभी इधर लहरता था तो कभी उधर लहरता था, तथा ग्रहाविष्ट मनुष्य जिस प्रकार उज्जृम्भ अर्थात् उठती हुई जमुहाइयोंसे सहित होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी उज्जृम्भ अर्थात् उठती हुई लहरोंसे सहित था, जिस प्रकार ग्रहाविष्ट मनुष्य शब्द करता है उसी प्रकार समुद्र भी शब्द कर रहा था और जिस प्रकार ग्रहाविष्ट मनुष्य कांपता रहता है उसी प्रकार वह समुद्र भी वायुसे कांपता रहता था। उस समुद्रका तल भाग रत्नोंकी किरणोंसे चित्र-विचित्र हो रहा था, उसका जल मोतियोंसे चित्रित था, और वह चारों ओर मगरमच्छोंसे भरा हुआ था इसलिये वह देखनेंमें अच्छा भी लगता था और भयानक भी मालूम होता था। वह समुद्र अनेक रत्नों से भरा हुआ था इसलिये नदीन अर्थात् दीन नहीं था यह उचित था (पक्षमें ‘नदी इन’ नदियोंका स्वामी था) परन्तु अप्राण अर्थात् प्राण रहित होकर भी चिरजीवित अर्थात् बहुत समय तक जीवित रहनेवाला था, समुद्र अर्थात् मुद्रा सहित होकर भी उन्मुद्र अर्थात् मुद्रा-रहित था और झषकेतु अर्थात् मछलीरूप पताकासे सहित होकर भी अमन्मथ अर्थात् कामदेव नहीं था यह विरुद्ध बात थी किन्तु नीचे लिखे अनुसार अर्थमें परिवर्तन कर देनेसे कोई विरुद्ध बात नहीं रहती। वह प्राणरहित होनेपर भी चिरजीवित अर्थात् चिरस्थायी रहनेवाला था अथवा चिरकालसे जल सहित था, समुद्र अर्थात् सागर होकर भी उन्मुद्र अर्थात् उत्कृष्ट आनन्दको देनेवाला था (उद्-उत्कृष्टां मुदं हर्ष राति-ददातीति उन्मुद्रः) और झषकेतु अर्थात् समुद्र अथवा मछलियोंके उत्पातसे सहित होकर भी अमन्मथ अर्थात् काम नहीं था। अथवा वह समुद्र स्पष्ट ही सिद्धालयके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार सिद्धालयका पार दिखाई नहीं देता है उसी प्रकार उस समुद्रका भी पार दिखाई नहीं देता था-दोनों ही अदृष्ट-पार थे, जिस प्रकार सिद्धालय अक्षोभ्य है अर्थात् आकुलता-रहित है उसी प्रकार समुद्र भी अक्षोभ्य था अर्थात् क्षोभित करनेके अयोग्य था उसे कोई गँदला नहीं कर सकता था, जिस प्रकार सिद्धालयका कोई संहार नहीं कर सकता उसी प्रकार उस समूहका भी कोई संहार नहीं कर सकता था, जिस प्रकार सिद्धालय अनुत्तर अर्थात् उत्कृष्ट है उसी प्रकार वह समुद्र भी अनुत्तर अर्थात् तैरनेके अयोग्य था, जिस प्रकार सिद्धालय अव्यक्त अर्थात् अप्रकट है उसी प्रकार वह समुद्र भी अव्यक्त अर्थात् अगम्य था और सिद्धालय जिस प्रकार अमृतास्पद अर्थात् अमृत (मोक्ष) का स्थान है उसी प्रकार वह समुद्र भी अमृत (जल) का स्थान था। कहीं तो वह समुद्र पद्मरागमणियों से संध्या कालके बादलोंकी शोभा अथवा संदेह धारण कर रहा था और कहीं नील मणियोंकी किरणोसे गाढ़ अन्धकारका प्रारम्भ करता हुआ सा जान पड़ता था। कहीं हरित मणियोंकी कान्तिके प्रसारसे उसमें शेवालका संदेह हो रहा था और कहीं वह मूंगाओंके अंकुरोंसे कुंकुम की कान्ति फैला रहा था। कहीं सीपोंके संपुट खुल जानेसे उसमें मोती तैर रहे थे और उनसे वह ऐसा जान पड़ता था मानो ताराओंके समूहसे भरे हुए आकाशकी ओर हँस ही रहा हो । तथा कहींपर किनारेके समीप ही समस्त रत्नोंकी किरणों सहित जलकी छोटी छोटी बूंदें पड़ रही थों उनसे ऐसा जान पड़ता था मानो आकाशरूपी आंगनमें इन्द्रधनुषकी रेखा ही लिख रहा हो । इस प्रकार जो ऊँचे तक करोड़ों रत्नोंसे भरा हुआ था ऐसे उस समुद्रको चक्रवर्तीने अपूर्व महानिधिके समान देखा ।।६८-१०२।।
- From that altar, Bharata beheld the ocean. In that vast expanse, waves repeatedly rose, breaching the shore; the wind lashed its surface, and the deep, resonant sounds it produced seemed like the ocean was weeping out of fear of being crossed. With its wave-like arms, it tossed tiny, jewel-laden droplets onto the shore, as though offering Bharata a handful of pearls and sacred rice in welcome.
- The ocean, teeming with countless conch shells, had submerged entire islands, was boundless, and insurmountable, imitating the vastness and invincibility of Bharata’s own army—resounding with conch blasts, conquering all lands, immeasurable, and unconquerable.
- The ocean resembled an epileptic patient: just as such a person, foaming at the mouth and writhing, cannot be restrained or stilled, so too was the ocean, restless with foaming waves. It would roar without cause, churn without provocation, and swirl in sudden vortices, like a man seized by sudden, overwhelming terror—crying out, trembling, and convulsing in fear.
- With the foam cresting its waves, the ocean seemed to laugh; in its tides, it danced; in its rolling waves, it strode; and in its heaving, it staggered like a drunken man. The ocean resembled a serpent: adorned with gems, filled with deadly venom (water), hissing fearfully, shimmering with glistening waves like a snake’s shining skin, and restlessly coiling in movement.
- Or, it seemed like a man afflicted with a cold from drinking too much water, constantly sneezing out a thousand noisy sprays.
- Or again, like a glutton, who overeats and then belches from excess—so too the ocean, having swallowed the waters of countless rivers, belched in booming echoes.
- The ocean, with its vast, fathomless abyss like a gaping mouth, never knew satisfaction, ever thirsting for more rivers’ waters—just like a man who eats insatiably and keeps his mouth ever open.
- The ocean roared in every direction, earning the name ‘Ravana’; it submerged countless mountains, making it ‘Achalagraha’ (seizer of immovables); it terrified all creatures, making it ‘Vibhishana’ (one who spreads fear); it was colossal (‘Atikaya’); and by its unfathomable depth, it was ‘Mahodara’ (the one with the great belly)—thus, it appeared like an entire host of demons.
- With its wave-like arms continually striking the shore, the ocean seemed to be warning the shore to stay within its bounds. When it flung its waves like great mountains, crossing the shore, it looked like a passionate lover rushing towards river-maidens. Its wave-creases resembled the wrinkles of an old man, yet its lapping motions made it seem a playful child, crawling across the earth on its knees—rolling, sliding, and beautiful in innocence.
- Besides this, the ocean teemed with terrible creatures like crocodiles. It seemed both pleasing and fearsome—its surface sparkling with pearls, its waters shining with gem-radiance, yet filled with lurking beasts.
- Although the ocean had abundant luster, it was unfit for drinking—thus, it was like a beautiful but inaccessible fool. It possessed depth but was not stable; had grandeur but was noisy; all traits suggesting a foolish nature, despite its majesty.
- Though untouched by wine, it appeared intoxicated with the perfume of flowers or the frolicking of water-birds. Though unaffected by desire, it seemed overwhelmed by the pride of its own mighty waters.
- Its endless procession of waves appeared like its ceaseless, unsatisfiable thirst for the sweet waters of rivers.
- Or it looked like a universal emperor (Chakravarti), served by river-maidens, adorned with endless treasures, admired by serpent kings (nagas), and famous across the four quarters.
- The ocean flung up jets of water high into the sky, like a victorious flag after conquering all other seas. The blue waters, whipped by winds, rose so high that they seemed like a jeweled fortress of Jambudvipa raised on the columns of Mount Meru.
- At times, the ocean resembled the great body of sacred knowledge (Shrutaskandha)—limitless, encompassing all, resounding with profound voices; or it echoed the philosophical vision of constant change (Paryayarthika Nay), with its ever-shifting, fleeting waves.
- It looked like a wicked king—greedy and insatiable, surrounded by foolish followers (waters), disrespectful to the mighty (drowning mountains); or like a noble king—full of strength (aquatic creatures), dignity (depth), treasures (snakes at the shores), high aspirations (waters rising skyward), and adherence to order (staying within bounds).
- The ocean guarded its inner islands like fortified castles. Its great depths seemed filled by swelling, thundering clouds, or it resembled a man possessed, thrashing about, rolling, and trembling, seized by sudden spasms, his cries and movements mirrored in the ocean’s waves and roars.
- The ocean bed was adorned with the brilliance of myriad jewels, the waters shimmered with pearls, and the shores teemed with crocodiles—thus, it was simultaneously beautiful and terrifying.
- It was rich with treasures and so was not “poor” (nadīn, wordplay); it was lifeless (apran) yet appeared eternal; it was “sea” (samudra) and yet beyond mere joy; it bore the banner of fishes (matsya-ketu) but was devoid of the passions of Kama.
- Alternatively, the ocean seemed a divine Siddha-realm—endless, unstirred, indestructible, unsurpassable, ungraspable, and the very source of immortality.
- Sometimes, it glowed crimson from the light of ruby-like stones, resembling the twilight sky; sometimes it deepened into blue darkness from sapphire hues; sometimes its green stones mimicked algae; sometimes coral reefs blushed like saffron powder.
- The open oysters scattered pearls across the surface, making the ocean seem like a sky scattered with stars, laughing with brilliance.
- Near the shores, the droplets, sparkling with myriad gem-radiances, looked as though the ocean was writing rainbows across the courtyard of the sky.
- Thus did Bharata behold the ocean—vast, radiant, adorned with treasures—as if it were a newly discovered, wondrous treasure house.(Verses 68–102)
श्लोक 103 से 111
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61