आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
श्लोक 202 से 211 वृक्ष और वनवेदिका
वृक्ष राजाओं-से फल, तेज, और पत्तों से युक्त थे। ये प्रेम और प्रसन्नता प्रकट करते थे। भगवान का केवलज्ञान अनुपम था। वनों के अंत में सुवर्णमयी वनवेदिका थी। यह भव्य बुद्धि-सी ऊँची और सुरक्षित थी। गोपुरद्वारों में घंटे और मालाएँ थीं। ध्वजाएँ महावीथी को अलंकृत करती थीं।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 202 to 211
श्लोक ( Shlok ) 202
“फलैरलंकृता दीप्राः स्वपादाक्रान्तभूतलाः । पार्थिवाः सत्यमेवैते पार्थिवाः पत्रसंभृताः ॥ २०२॥
पार्थिव अर्थात् पृथिवी से उत्पन्न हुए वे वृक्ष सचमुच ही पार्थिव अर्थात् पृथिवी के स्वामी-राजा के समान जान पड़ते थे क्योंकि जिस प्रकार राजा अनेक फलों से अलंकृत होते हैं उसी प्रकार वे वृक्ष भी अनेक फलों से अलंकृत थे, राजा जिस प्रकार तेजस्वी होते हैं उसी प्रकार वे वृक्ष भी तेजस्वी (दैदीप्यमान) थे, राजा जिस प्रकार अपने पाद अर्थात् पैरों से समस्त पृथिवी को आक्रांत किया करते हैं (समस्त पृथिवी में अपना यातायात रखते हैं) उसी प्रकार वे वृक्ष भी अपने पाद अर्थात् जड़ भाग से समस्त पृथिवी को आक्रांत कर रहे थे (समस्त पृथिवी में उनकी जड़ें फैली हुई थीं) और राजा जिस प्रकार पत्र अर्थात् सवारियों से भरपूर रहते हैं उसी प्रकार वे वृक्ष भी पत्र अर्थात् पत्तों से भरपूर थे ।।202।।
Those trees, born from the earth (Pārthiva), truly appeared like earthly kings (Pārthiva) themselves. Just as a king is adorned with many ornaments, they were adorned with abundant fruits. Just as a king radiates splendor, they too shone brilliantly. Just as a king extends his rule over the entire land with his feet (symbolizing his presence), these trees spread their roots across the entire earth. And just as a king is always surrounded by a grand entourage (patra meaning attendants), these trees were abundantly covered with leaves (patra). ॥202॥
श्लोक ( Shlok ) 203
प्रव्यञ्जितानुरागाः स्वैः पल्लवैः कुसुमोत्करैः । प्रसादं दर्शयन्तोऽन्तर्विभुं भेजुरिमे द्रुमाः ॥२०३॥
वे वृक्ष अपने पल्लव अर्थात् लाल-लाल नयी कोपलों से ऐसे जान पड़ते थे मानो अंतरंग का अनुराग (प्रेम) ही प्रकट कर रहे हों और फूलों के समूह से ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो हृदय की प्रसन्नता ही दिखला रहे हों―इस प्रकार वे वृक्ष भगवान् की सेवा कर रहे थे ।।203।।
Those trees, with their tender red sprouts, appeared as if they were expressing their inner love, and with their clusters of blossoms, they seemed to display the joy of their hearts—thus, they were serving the Lord. ॥203॥
श्लोक ( Shlok ) 204
तरूणामेव तावच्चेदीदृशो विभवोदयः। किमस्ति वाच्यमीशस्य विभवेऽनीदृशात्मनः ॥२०४।।
जब कि उन वृक्षों का ही ऐसा बड़ा भारी माहात्म्य था तब उपमारहित भगवान् वृषभदेव के केवलज्ञानरूपी विभव के विषय में कहना ही क्या है―वह तो सर्वथा अनुपम ही था ।।204।।
When even those trees possessed such immense glory, then what can be said about the infinite majesty of Lord Rishabhadeva’s omniscient wisdom? It was truly incomparable in every way. ॥204॥
श्लोक ( Shlok ) 205
ततो वनानां पर्यन्ते बभूव वनवेदिका । चतुभिर्गोपुरैस्तुङ्गैरारुद्धगगनाङ्गणा ॥२०५॥
उन वनों के अंत में चारों ओर एक-एक वनवेदी थी जो कि ऊंचे-ऊंचे चार गोपुर-द्वारों से आकाशरूपी आंगन को रोक रही थी ।।205।।
At the end of those forests, on all four sides, there was a sacred forest enclosure (Vanavedi), which, with its towering four gateway towers (Gopura Dwaras), seemed to enclose the sky-like courtyard. ॥205॥
श्लोक ( Shlok ) 206
काञ्चीयष्टिर्वनस्येव सा बभौ वनवेदिका । चामीकरमयै रत्नैः खचिताङ्गी समन्ततः ॥२०६॥
वह सुवर्णमयी वनवेदिका सब ओर से रत्नों से जड़ी हुई थी जिससे ऐसी जान पड़ती थी मानो उस वन की करधनी ही हो ।।206।।
That golden forest altar (Vanavedika) was encrusted with jewels on all sides, making it appear as if it were the very waistband of the forest. ॥206॥
श्लोक ( Shlok ) 207
सा बभौ वेदिकोदग्रा सचर्या समया वनम् । भव्यधीरिव संश्रित्य सचर्या समयावनम् ॥२०७॥
अथवा वह वनवेदिका भव्य जीवों की बुद्धि के समान सुशोभित हो रही थी क्योंकि जिस प्रकार भव्य जीवों की बुद्धि उदग्र अर्थात् उत्कृष्ट होती है उसी प्रकार वह वनवेदिका भी उदग्र अर्थात् बहुत ऊँची थी, भव्य जीवों की बुद्धि जिस प्रकार सचर्या अर्थात् उत्तम चारित्र से सहित होती है उसी प्रकार वह वनवेदिका भी सचर्या अर्थात् रक्षा से सहित थी और भव्य जीवों की बुद्धि जिस प्रकार समयावनं (समय+अवनं संश्रित्य) अर्थात् आगमरक्षा का आश्रय कर प्रवृत्त रहती है उसी प्रकार वह वनवेदिका भी समया वनं (वनं समया संश्रित्य) अर्थात् वन के समीप भाग का आश्रय कर प्रवृत्त हो रही थी ।।207।।
Or, that Vanavedika (sacred forest altar) shone like the intellect of noble souls. Just as the intellect of enlightened beings is udgra (lofty and excellent), the Vanavedika was also udgra (very tall). Just as their intellect is sacharya (accompanied by virtuous conduct), the Vanavedika was also sacharya (protected and well-guarded). And just as their intellect remains engaged in Samayavana (devoted to the protection of scriptural knowledge), the Vanavedika was established near the forest, symbolizing its close connection with it. ॥207॥
श्लोक ( Shlok ) 208
सुगुप्ताङ्गी सतीवासौ रुचिरा सूत्रपा वनम् । परीयाय श्रुतं जैनं सद्धीर्वा सूत्रपावनम् ॥२०८॥
अथवा वह वनवेदिका, सुगुप्तांगी अर्थात् सुरक्षित थी, सती अर्थान् समीचीन थी, रुचिरा अर्थात् दैदीप्यमान थी, सूत्रपा अर्थात् सूत्र (डोरा) की रक्षा करने वाली थी―सूत के नाप में बनी हुई थी―कहीं ऊँची-नीची नहीं थी, और वन को चारों ओर से घेरे हुए थी इसलिए किसी सत्पुरुष की बुद्धि के समान जान पड़ती थी क्योंकि सत्पुरुष की बुद्धि भी सुगुप्तांगी अर्थात् सुरक्षित होती है―पापाचारों से अपने शरीर को सुरक्षित रखती है, सती अर्थात् शंका आदि दोषों से रहित होती है, रुचिरा अर्थात् श्रद्धागुण प्रदान करने वाली होती है, सूत्रपा अर्थात् आगम की रक्षा करने वाली होती है और सूत्रपावनं अर्थात सूत्रों से पवित्र जैनशास्त्र को घेरे रहती है―उन्हीं के अनुकूल प्रवृत्ति करती है ।।208।।
Or, that Vanavedika (sacred forest altar) resembled the intellect of a noble person. It was Suguptangi (well-protected), just as a virtuous person safeguards their body from sinful actions. It was Sati (pure and flawless), just as a noble intellect remains free from doubts and defects. It was Ruchira (radiant and splendid), just as a virtuous intellect inspires faith. It was Sutrapa (guardian of sacred threads), as it was built with precise measurements, ensuring uniformity without any irregularities—just as a noble intellect preserves the integrity of scriptures. And it was Sutrapavana, encircling the entire forest, just as a virtuous intellect remains devoted to the sacred Jain scriptures, staying aligned with their teachings. ॥208॥
श्लोक ( Shlok ) 209
घण्टाजालानि लम्बानि मुक्तालम्बनकानि च । पुष्पस्त्रजश्च संरेजुरमुष्यां गोपुरं प्रति ॥ २०९॥
उस वेदिका के प्रत्येक गोपुर-द्वार में घंटाओं के समूह लटक रहे थे, मोतियों की झालर तथा फूलों की मालाएँ सुशोभित हो रही थी ।।209।।
At each Gopura Dwara (gateway) of that Vedi (sacred altar), clusters of bells were hanging, while pearl garlands and floral wreaths adorned it beautifully. ॥209॥
श्लोक ( Shlok ) 210
राजतानि वभुस्तस्या गोपुराण्यष्टमङ्गलैः । संगीतातोद्यनृतैश्च रत्नाभरणतोरणैः ॥२१०॥
उस वेदिका के चाँदी के बने हुए चारों गोपुर-द्वार अष्टमंगलद्रव्य, संगीत, बाजों का बजना, नृत्य तथा रत्नमय आभरणों से युक्त तोरणों से बहुत ही सुशोभित हो रहे थे ।।210।।
The four Gopura gateways of that Vedi, made of silver, were exquisitely adorned with Ashtamangala objects, the sounds of music and instruments, graceful dances, and jewel-studded decorative arches, making them exceptionally magnificent. ॥210॥
श्लोक ( Shlok ) 211
ततः परमलं चक्रुर्विविधा ध्वजपङ्क्तयः । महीं वीथ्यन्तरालस्थां हेमस्तम्भाग्रलम्बि ताः ॥२११॥
उन वेदिकाओं से आगे सुवर्णमय खंभों के अग्रभाग पर लगी हुई अनेक प्रकार की ध्वजाओं की पंक्तियाँ महावीथी के मध्य की भूमि को अलंकृत कर रही थीं ।।211।।
Beyond those Vedis, rows of various flags attached to the tops of golden pillars adorned the central pathway of the grand avenue (Mahavithi), enhancing its beauty. ॥211॥
श्लोक 212 से 221
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