आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11
श्लोक 12 से 21 इंद्र का प्रस्थान
इंद्र आनंद से नतमस्तक होकर भगवान को नमस्कार करता उठा। उसने इंद्राणी को केवलज्ञान का समाचार बताया। नगाड़ों की सूचना पर वह देवों के साथ पूजा के लिए निकला। बलाहकदेव ने रत्नमय विमान बनाया। नागदत्त ने ऐरावत हाथी बनाया। सौधर्मेंद्र उस पर सवार हुआ। किल्विषिक और अन्य देव अपनी सवारियों पर पीछे चले। अप्सराएँ नृत्य करती गईं।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
अथोत्थायासनादाशु प्रमोदं परमुद्वहन् । तद्भरादिव नम्रोऽभून्नतमूर्धा शचीपतिः ॥१२॥
तदनंतर परम आनंद को धारण करता हुआ इंद्र शीघ्र ही आसन से उठा और उस आनंद के भार से ही मानो नतमस्तक होकर उसने भगवान् के लिए नमस्कार किया था ।।12।।
Thereafter, filled with supreme joy, Indra quickly rose from his throne and, as if bowing under the weight of that bliss, humbly offered his salutations to the Lord. ||12||
श्लोक ( Shlok ) 13
किमेतदिति पृच्छन्तीं पौलोमीमतिसंभ्रभात् । हरिः प्रबोधयामास विभोः कैवल्यसंभवम् ॥१३॥
‘यह क्या है’ इस प्रकार बड़े आश्चर्य से पूछती हुई इंद्राणी के लिए भी इंद्र ने भगवान् के केवलज्ञान की उत्पत्ति का समाचार बतलाया था ।।13।।
With great astonishment, Queen Indrani asked, “What is this?” In response, Indra informed her about the manifestation of Lord’s omniscience. ||13||
श्लोक ( Shlok ) 14
प्रयाणपटहेपूच्चैः प्रध्वनत्सु शताध्वरः । भर्तुः कैवल्यपूजायै निश्चक्राम सुरैर्वृतः ॥१४॥
अथानंतर जब प्रस्थानकाल की सूचना देने वाले नगाड़े जोर-जोर से शब्द कर रहे थे तब इंद्र अनेक देवों से परिवृत होकर भगवान् के केवलज्ञान की पूजा करने के लिए निकला ।।14।।
Thereafter, as the drums announcing the time of departure resounded loudly, Indra, surrounded by numerous deities, set out to worship the omniscience of the Lord. ||14||
श्लोक ( Shlok ) 15
ततो बलाहकाकार विमानं कामगाह्वयम्। चक्रे बलाहको देवो जम्बूद्वीपप्रमान्वितम् ॥१५॥
उसी समय बलाहकदेव ने एक कामग नाम का विमान बनाया जिसका आकार बलाहक अर्थात् मेघ के समान था और जो जंबूद्वीप के प्रमाण था ।।15।।
At that very moment, the deity Balāhaka created a celestial aircraft named Kāmaga, which resembled a raincloud in appearance and was as vast as Jambūdvīpa. ||15||
श्लोक ( Shlok ) 16
मुक्तालम्बनसंशोभि तदाभाद् रत्ननिर्मितम् । तोषात्प्रहासमातन्वदिव ‘किङ्किणिकास्वनैः ॥१६॥
वह विमान रत्नों का बना हुआ था और मोतियों की लटकती हुई मालाओं से सुशोभित हो रहा था तथा उस पर जो किंकिणियों के शब्द हो रहे थे उनसे वह ऐसा जान पड़ता था मानो संतोष से हँस ही रहा हो ।।16।।
That celestial aircraft was made of precious gems and adorned with hanging garlands of pearls. The tinkling sounds of its small bells made it seem as if it were laughing in divine contentment. ||16||
श्लोक ( Shlok ) 17
शारदाभ्रमिवादभ्रं श्वेतिताखिलदिङ् मुखम् । “नागदताभियोग्येशो नागमैरावतं व्यधात् ॥१७॥
जो आभियोग्य जाति के देवों में मुख्य था ऐसे नागदत्त नाम के देव ने विक्रिया ऋद्धि से एक ऐरावत हाथी बनाया । वह हाथी शरद᳭ऋतु के बादलों के समान सफेद था, बहुत बड़ा था और उसने अपनी सफेदी से समस्त दिशाओं को सफेद कर दिया था ।।17।।
The deity Nāgadatta, who was foremost among the Ābhiyogya class of gods, used his miraculous transformation powers to create an Airāvata elephant. This magnificent elephant was as white as the clouds of autumn, immense in size, and its radiant whiteness illuminated all directions. ||17||
श्लोक ( Shlok ) 18
ततस्तद्विक्रियारब्धमारूढो दिव्यवाहनम् । हरिवाहः सहैशानः प्रतस्थे सपुलोमजः ॥१८॥
तदनंतर सौधर्मेंद्र ने अपनी इंद्राणी और ऐशान इंद्र के साथ-साथ विक्रिया ऋद्धि से बने हुए उस दिव्यवाहन पर आरूढ़ होकर प्रस्थान किया ।।18।।
Thereafter, Saudharma Indra, along with his Indrani and Eshan Indra, ascended the celestial vehicle created by miraculous powers and set out on his journey. ||18||
श्लोक ( Shlok ) 19 – 20
इन्द्रसामानिकत्रायस्त्रिंशपारिषदामराः । सात्मरक्षजगत्पालाः सानीकाः सप्रकीर्णकाः ॥१९॥
पुरः किल्विषिकेषूच्चैरातन्वत्स्वानकस्वनान् । स्वैरं स्वैर्वाहनैः शक्रं व्रजन्तमनुवव्रजुः ॥२०॥
सबसे आगे किल्विषिक जाति के देव जोर-जोर से सुंदर नगाड़ों के शब्द करते जाते थे और उनके पीछे इंद्र, सामानिक, त्रायस्त्रिंश, पारिषद, आत्मरक्ष, लोकपाल, अनीक और प्रकीर्णक जाति के देव अपनी-अपनी सवारियों पर आरूढ़ हो इच्छानुसार जाते हुए सौधर्मेंद्र के पीछे-पीछे जा रहे थे ।।19-20।।
At the forefront, the Kilvishika deities proceeded while loudly sounding their magnificent drums. Behind them, Indra, along with the Sāmanika, Trāyastriṃśa, Pāriṣad, Ātmarakṣa, Lokapāla, Anīka, and Prakīrṇaka deities, followed Saudharma Indra, each riding their respective celestial vehicles, traveling freely as per their divine will. ||19-20||
श्लोक ( Shlok ) 21
अप्सरस्सु नटन्तीषु गन्धर्वातोद्यवादनैः । किन्नरेषु च गायत्सु चचाल सुरवाहिनी ॥२१॥
उस समय अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं, गंधर्व देव बाजे बजा रहे थे और किन्नरी जाति की देवियाँ गीत गा रही थी, इस प्रकार वह देवों की सेना बड़े वैभव के साथ जा रही थी ।।21।।
At that time, Apsaras were gracefully dancing, Gandharva deities were playing musical instruments, and the Kinnari goddesses were singing melodious songs. In this grand manner, the celestial army proceeded with great splendor. ||21||
श्लोक 22 से 31
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11