आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
श्लोक 152 से 161 गृहत्याग और दीक्षाद्य-जिनरूपता क्रिया
गृहत्याग क्रिया में गृहस्थ ज्येष्ठ पुत्र को बुलाकर उसे कुलधर्म पालन का उपदेश देता है। वह धन के तीन भाग करता है: एक धर्मकार्य, एक घर खर्च, और एक भाई-बहनों में बांटने के लिए। पुत्र को शास्त्र, सदाचार, और पूजा के माध्यम से कुलधर्म निभाने का निर्देश देता है। इसके बाद वह निराकुल होकर दीक्षा के लिए घर छोड़ता है। दीक्षाद्य क्रिया में सम्यग्दृष्टि गृहस्थ एक वस्त्र धारण कर दीक्षा की तैयारी करता है। जिनरूपता क्रिया में वह परिग्रह त्यागकर दिगंबर रूप धारण करता है, जो धीर-वीर पुरुषों के लिए उपयुक्त है। यह क्रिया अहिंसा और संयम की ओर ले जाती है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152 –156
कलक्रमस्त्वया तात सम्पाल्योऽस्मत्परोक्षतः । त्रिधा कृतं च नो द्रव्यं त्वयेत्थं विनियोज्यताम् ॥१५२॥एकोऽशो धर्मकार्येऽतो द्वितीयः स्वगृहव्यये । तृतीयः संविभागाय भवेत्त्वत्सहजन्मनाम् ॥१५३॥ पुत्र्यश्च संविभागार्हाः समं पुत्रैः समांशकैः । त्वं तु भूत्वा कुलज्येष्ठः संतति नोऽनुपालय ॥१५४॥श्रुतवृत्तक्रियामन्त्रविधिज्ञस्त्वमतन्द्रितः । प्रपालय कुलाम्नायं गुरुं देवांश्च पूजयन् ॥१५५॥इत्येवमनुशिष्य स्वं ज्येष्ठं सूनुमनाकुलः । ततो दीक्षामुपादातुं द्विजः स्वं गृहमुत्सृजेत् ॥१५६॥इति गृहत्यागः ।
गृहत्याग करते समय ज्येष्ठ पुत्रको बुलाकर उससे इस प्रकार कहना चाहिये कि पुत्र, हमारे पीछे यह कुलक्रम तुम्हारे द्वारा पालन करने योग्य है। मैंने जो अपने धनके तीन भाग किये हैं उनका तुम्हें इस प्रकार विनियोग करना चाहिये कि उनमेंसे एक भाग तो धर्मकार्यमें खर्च करना चाहिये, दूसरा भाग अपने घर खर्चके लिये रखना चाहिये और तीसरा भाग अपने भाइयोंमें बांट देनेके लिये है। पुत्रोंके समान पुत्रियोंके लिये भी बराबर भाग देना चाहिये । हे पुत्र, तू कुलका बड़ा होकर मेरी सब संतानका पालन कर । तू शास्त्र, सदाचार, क्रिया, मन्त्र और विधिको जाननेवाला है इसलिये आलस्यरहित होकर देव और गुरुओंकी पूजा करता हुआ अपने कुलधर्मका पालन कर । इस प्रकार ज्येष्ठ पुत्रको उपदेश देकर वह द्विज निराकुल होवे और फिर दीक्षा ग्रहण करनेके लिये अपना घर छोड़ दे ।।१५२-१५६॥ यह बाईसवीं गृहत्याग नामकी क्रिया है।
At the time of renouncing the household, one must call the eldest son and address him thus:
“O my son, henceforth this sacred lineage is to be upheld by you. The wealth that I have divided into three portions must be thus employed: one part should be offered in service of righteousness (dharma), the second set aside for household needs, and the third be distributed among your brothers. To daughters, as to sons, equal portions must be given.O son, being the eldest of the house, you must protect and care for all my offspring. Well-versed as you are in the scriptures, noble conduct, sacred rites, mantras, and ordained duties—let there be no sloth in you. Worship the Divine and the preceptors with reverence, and uphold the sacred traditions of our lineage.Having thus instructed the eldest son, the twice-born should relinquish all anxiety, and, with a tranquil heart, depart from his home to receive initiation.”॥152–156॥
This is the twenty-second rite, known as Gṛhatyāga—the Renunciation of the Householder’s Life.
श्लोक ( Shlok ) 157 –158
त्यक्ता गारस्य सदृष्टेः प्रशान्तस्य गृहीशिनः । प्राग्दीक्षौपयिकात् कालादेकशाटकधारिणः ॥१५७।। यत्पुरश्चरणं दीक्षाग्रहणं प्रति धार्यते । दीक्षाद्यं नाम तज्ज्ञेयं क्रियाजातं द्विजन्मनः ॥१५८॥ इति दीक्षाद्यम् ।
जिसने घर छोड़ दिया है, जो सम्यग्दृष्टि है, प्रशान्त है, गृहस्थोंका स्वामी है और दीक्षाधारण करनेके समयके कुछ पहले जिसने एक वस्त्र धारण किया है उसके दीक्षाग्रहण करनेके पहले जो कुछ आचरण किये जाते हैं उन आचरणों अथवा क्रियाओंके समूहको द्विजकी दीक्षाद्य क्रिया कहते हैं ।॥ १५७-१५८।। यह तेईसवीं दीक्षाद्य क्रिया है।
He who has forsaken the household, whose vision is clear and serene, who is master of his domestic realm, and who, shortly before assuming initiation, dons a single garment—The set of practices and rites performed prior to receiving initiation are collectively known as the Dvija-dyā ceremony, the initiation preparatory rite of the twice-born.॥157–158॥
This is the twenty-third rite, called Dīkṣādya Kriyā.
श्लोक ( Shlok ) 159
त्यक्तचेलादिसंगस्य जैनी दीक्षामुपेयुषः । धारणं जातरूपस्य यत्तत् स्याज्जिनरूपता ॥१५९॥
जिसने वस्त्र आदि सब परिग्रह छोड़ दिये हैं और जो जिनदीक्षाको प्राप्त करना चाहता है ऐसे पुरुषका दिगम्बररूप धारण करना जिनरूपता नामकी क्रिया कहलाती है ॥ १५९॥
He who has relinquished all possessions, including garments, and who aspires to receive the Jina’s initiation—Such a man assumes the form of the Digambara, and this rite is called Jinarūpata.॥159॥
श्लोक ( Shlok ) 160
अशक्यधारणं चेदं जन्तूनां कातरात्मनाम् । जैनं निस्सङ्गतामुख्यं रूपं धीरैनिषेव्यते ॥ १६०॥इति जिनरूपता ।
जिनका आत्मा कातर है ऐसे पुरुषोंको जिनरूप (दिगम्बररूप) का धारण करना कठिन है इसलिये जिसमें परिग्रह त्यागकी मुख्यता है ऐसा यह जिनेन्द्रदेवका रूप धीरवीर मनुष्योंके द्वारा ही धारण किया जाता है ।।१६०।। यह चौबीसवीं जिनरूपता क्रिया है।
For those whose souls are faint and timid, it is difficult to assume the form of the Jina—that austere Digambara guise.Hence, the embodiment of Lord Jina, marked chiefly by renunciation of possessions, is embraced only by those resolute and courageous mortals.॥160॥
This is the twenty-fourth rite, called Jinarūpata Kriyā.
श्लोक ( Shlok ) 161
कृतदीक्षोपवासस्य प्रवृत्तेः पारणाविधौ । मौनाध्ययनवृत्तत्वमिष्टमाश्रुतनिष्ठितेः ॥१६१॥
जिसने दीक्षा लेकर उपवास किया है और जो पारणकी विधिमें अर्थात् विधि-पूर्वक आहार लेने में प्रवृत्त होता है ऐसे साधुका शास्त्रकी समाप्ति पर्यन्त जो मौन रहकर अध्ययन करनेमें प्रवृत्ति होती है उसे मौनाध्ययनवृत्तत्व कहते हैं ॥१६१॥
He who, having taken initiation, observes fasting and who carefully follows the prescribed method of breaking the fast,Such a sage, who devotes himself to silent study until the conclusion of the scriptures, is said to possess the practice of Mounādhyayanavṛttatva — the vow of silent learning.॥161॥
श्लोक 162 से 171
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
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