आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
श्लोक 82 से 91 समवसरण की संरचना
समवसरण नृत्यशालाओं, धूपघटों, वनों, ध्वजाओं और कल्पवृक्षों से युक्त थी। स्फटिक कोट और श्रीमंडप इसे अलंकृत करते थे। सौधर्मेंद्र ने इसमें प्रवेश किया।
English translation of Ādi purāṇa parv 23 – Shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
सालमाद्यमुच्चगोपुरोद्गमं संबिभर्ति भासुरं स्म हैमनम् । हैमनार्कसौम्यदीप्तिमुन्नतिं भर्तुरक्ष रैर्विनैव या प्रदर्शिका ॥८२॥
वह भूमि ऊँचे-ऊँचे गोपुरद्वारों से सहित दैदीप्यमान सुवर्णमय पहले कोट को धारण कर रही थी और उससे ऐसी जान पड़ती थी मानो भगवान् वृषभदेव की हेमंतऋतु के सूर्य के समान अतिशय सौम्य दीप्ति और उन्नति को अक्षरों के बिना ही दिखला रही हो ।।82।।
That land, adorned with a resplendent golden outer wall and towering gopura gates, appeared as if it were showcasing the exceedingly gentle radiance and grandeur of Lord Rishabhadeva—akin to the winter sun—without the need for written words. ||82||
श्लोक ( Shlok ) 83
शरद्धनसमश्रियौ नर्तकी तडिद्विलसिते नृतेः शालिके । दधाति रुचिरे स्म “योपासितुं जिनेन्द्रमिव भक्ति संभाविता ॥८३॥
वह समवसरणभूमि प्रत्येक महावीथी के दोनों ओर शरद᳭ऋतु के बादलों के समान स्वच्छ और नृत्य करने वाली देवांगनाओंरूपी बिजलियों से सुशोभित दो-दो मनोहर नृत्यशालाएँ धारण कर रही थी और उनसे ऐसी जान पड़ती थी मानो भक्तिपूर्वक जिनेंद्र भगवान् की उपासना करने के लिए ही उन्हें धारण कर रही हो ।।83।।
That Samavasarana land, on either side of each grand avenue, bore two enchanting dance halls, pristine like autumn clouds and adorned with dancing celestial maidens resembling lightning. It appeared as if it had embraced them solely for the devoted worship of Lord Jina. ||83||
श्लोक ( Shlok ) 84
घटीद्वन्द्वमुपातधूपकं बभार या द्विस्तनयुग्मसन्नि भम् । जिनस्य नृत्यै श्रुतदेवता स्वयं तथा स्थितेव त्रिजगच्छ्रिया समम् ॥८४॥
वह भूमि नाट्यशाला के आगे दो-दो धूपघट धारण कर रही थी और उनसे ऐसी जान पड़ती थी मानो जिनेंद्र भगवान की सेवा के लिए तीनों लोकों की लक्ष्मी के साथ-साथ सरस्वती देवी ही वहाँ बैठी हों और वे घट उन्ही के स्तनयुगल हो ।।84।।
That land bore two incense burners in front of each theater hall, appearing as if Goddess Saraswati herself, along with the wealth of all three worlds, were seated there in service of Lord Jina—while those incense burners resembled her twin bosoms. ||84||
श्लोक ( Shlok ) 85
रम्यं वनं भुङ्गसमूहसेवितं बभ्रे चतुः संख्यमुपातकान्तिकम् । “वासो विनीलं परिधाय तन्निभाद् वरेण्यमाराधयितुं स्थितेव या ॥८५॥
वह भूमि भ्रमरों के समूह से सेवित और उत्तम कांति को धारण करने वाले चार सुंदर वन भी धारण कर रही थी और उनसे ऐसी जान पड़ती थी मानो उन वनों के बहाने से नील वस्त्र पहनकर भगवान् की आराधना करने के लिए ही खड़ी हो ।।85।।
That land, served by swarms of bees and adorned with four magnificent forests of exceptional radiance, appeared as if it stood there draped in blue garments, solely to worship the Lord under the guise of these forests. ||85||
श्लोक ( Shlok ) 86
उपवनसरसीनां बालपद्मैर्द्युयुवतिमुखशोभामाहसन्ती । अधृत च वनवेदी रत्नदीप्रां युवतिरिव कटीस्थां मेखलां या ॥८६॥
जिस प्रकार कोई तरुण स्त्री अपने कटि भाग पर करधनी धारण करती है उसी प्रकार उपवन की सरोवरियों में फूले हुए छोटे-छोटे कमलों से स्वर्गरूपी स्त्री के मुख की शोभा की ओर हँसती हुई वह समवसरण भूमि रत्नों से दैदीप्यमान वनवेदिका को धारण कर रही थी ।।86।।
Just as a young woman adorns her waist with a jeweled girdle, similarly, that Samavasarana land, with its ponds in the groves blooming with small lotuses—smiling towards the beauty of the celestial maiden’s face—bore a radiant forest altar adorned with precious gems. ||86||
श्लोक ( Shlok ) 87
ध्वजाम्बरतताम्बरैः परिगता यका ध्वजनिवेश नैर्दशतयैः । जिनस्य महिमानमारचयितुं नभोङ्गणमिवामृ जत्यतिबभौ ॥८७॥
ध्वजाओं के वस्त्रों से आकाश को व्याप्त करने वाली दस प्रकार की ध्वजाओं से सहित वह भूमि ऐसी अच्छी सुशोभित हो रही थी मानो जिनेंद्र भगवान् की महिमा रचने के लिए आकाशरूपी आंगन को साफ ही कर रही हो ।।87।।
That land, adorned with ten types of flags whose fabrics spread across the sky, appeared so magnificently radiant as if it were cleansing the courtyard of the sky itself to compose the glory of Lord Jina. ||87||
श्लोक ( Shlok ) 88
खमिव सत्तारं कुसुमाढ्य या वनमतिरम्यं सुरभूजानाम् । सह वनवेद्या परतः सालाद् व्यरुचदिवोढ्वा सुकृतारामम् ॥८८॥
ध्वजाओं की भूमि के बाद द्वितीयकोट के चारों ओर वनवेदिका सहित कल्पवृक्ष का अत्यंत मनोहर वन था, वह फलों से सहित था इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो ताराओं से सहित आकाश ही हो । इस प्रकार पुण्य के बगीचे के समान उस वन को धारण कर वह समवसरणभूमि बहुत ही सुशोभित हो रही थी ।।88।।
Beyond the land of flags, around the second enclosure, was an exceedingly enchanting forest of Kalpavriksha trees along with a sacred forest altar. Laden with fruits, it appeared as if it were the star-studded sky itself. Bearing this forest, resembling a garden of merit, the Samavasarana land shone with exceptional splendor. ||88||
श्लोक ( Shlok ) 89
अधृत च यस्मात्परतो दीप्रं स्फुरदुरुरत्नं भवनाभोगम् । मणिमयदेहान्नव च स्तूपान् भुवनविजित्यायिव वद्धेच्छा ॥८९॥
उस वन के आगे वह भूमि, जिसमें अनेक प्रकार के चमकते हुए बड़े-बड़े रत्न लगे हुए हैं ऐसे दैदीप्यमान मकानों को तथा मणियों से बने हुए नौ-नौ स्तूपों को धारण कर रही थी और उससे वह ऐसी जान पड़ती थी मानो जगत् को जीतने के लिए ही उसने इच्छा की हो ।।89।।
Beyond that forest, the land bore radiant mansions adorned with various kinds of shining, magnificent gems, as well as nine jeweled stupas crafted from precious stones. Because of this, it appeared as if it had resolved to conquer the entire universe. ||89||
श्लोक ( Shlok ) 90
स्फटिक्रमयं या रुचिरं सालं प्रवितनमूर्तिः खमणिसुभित्तीः । “उपरितलं च त्रिजगद्ग्राहि व्यधृत परार्ध्य सदनं लक्ष्म्याः ॥९०॥
उसके आगे वह भूमि स्फटिक मणि के बने हुए सुंदर कोट को, अतिशय विस्तार वाली आकाश स्फटिकमणि की बनी हुई दीवालों को और उन दीवालों के ऊपर बने हुए, तथा तीनों लोकों के लिए अवकाश देने वाले अतिशय श्रेष्ठ श्रीमंडप को धारण कर रही थी । ऐसी समवसरण सभा के भीतर इंद्र ने प्रवेश किया था ।।90।।
Beyond that, the land bore a beautiful enclosure made of crystal gems, immensely vast walls crafted from celestial crystal, and above those walls, an exceedingly magnificent Shri Mandapa, spacious enough to accommodate all three worlds. It was into this grand Samavasarana assembly that Indra entered. ||90||
श्लोक ( Shlok ) 91
समं देववयै परार्ध्यो रुशोभां प्रपश्यंस्तथैनां महीं विस्मिताक्षः । प्रविष्टो महेन्द्रः प्रणष्टप्रमोहं जिनं द्रष्टुकामो महत्या विभूत्या ॥९१॥
इस प्रकार अतिशय उत्कृष्ट शोभा को धारण करने वाली उस समवसरण भूमि को देखकर जिसके नेत्र विस्मय को प्राप्त हुए हैं ऐसा वह सौधर्म स्वर्ग का इंद्र मोहनीय कर्म को नष्ट करने वाले जिनेंद्रभगवां के दर्शनों की इच्छा से बड़ी भारी विभूतिपूर्वक उत्तम-उत्तम देवों के साथ-साथ भीतर प्रविष्ट हुआ ।।91।।
Beholding the Samavasarana land adorned with extraordinary splendor, the eyes of Saudharma Indra were filled with wonder. With a deep desire to witness Lord Jina, the destroyer of deluding karma, he entered within with great majesty, accompanied by the most exalted celestial beings. ||91||
श्लोक 92 से 101
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
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