आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 |
श्लोक 12 से 21 : समुद्र तट पर सेना का अभियान
भरत की सेना ने सुपारी और नारियल के वनों से घिरे समुद्र तट पर आक्रमण किया। सैनिकों ने सरोवरों की छाया में विश्राम किया और नारियल का रस पिया। ताड़ के वनों में सूखे पत्तों की मर्मर ध्वनि सुनी। भरत ने सुपारी के वृक्षों को पान की लताओं से लिपटे देखकर प्रसन्नता अनुभव की, जो स्त्री-पुरुष के समान प्रतीत होते थे। सूर्यास्त के समय पक्षियों के शब्द मुनियों के स्वाध्याय जैसे लगे। सैनिकों ने कटहल के फल खाए और नारियल का रस, मिरच आदि से भोजन व्यवस्था सुखद रही। मिरच खाकर आंसू बहाते पक्षी और वानरों का दृश्य भी भरत ने देखा।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 30 – Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
इत्यजेतव्यपक्षोऽपि यदयं दिग्जयोद्यतः । तन्नूनं ‘भुक्तिमात्मीयां तद्वद्याजेन परीयिवान् ॥१२॥
इस प्रकार भरतके यद्यपि जीतने योग्य कोई शत्रु नहीं था तथापि वे जो दिग्विजय करनेके लिये उद्यत हुए थे सो केवल दिग्विजयको छलसे अपने उपभोग करने योग्य क्षेत्रों चक्कर लगा आये थे घूम आये थे ।।१२।।
“Thus, although Bharata had no enemies left worthy of conquest, his undertaking of the digvijaya—the conquest of the quarters—was but a pretext, a royal circuit made merely to survey and mark for his enjoyment the realms already subdued.” ॥12॥
श्लोक ( Shlok ) 13
आक्रान्ताः सैनिकैरस्य विभोः पारेऽर्णवं भुवः । पूगद्रुमकृतच्छाया नालिकेरवनैस्तताः ॥१३॥
महाराज भरतके सैनिकोंने, जहां सुपारी के वृक्षोंके द्वारा छाया की गई है और जो नारियल के वनोंसे व्याप्त हो रही है ऐसे समुद्र के किनारेकी भूमि पर आक्रमण किया था ।।१३।।
“The soldiers of Emperor Bharata had launched their assault upon the coastal lands—those shaded by groves of betel-nut trees and thick with expansive forests of coconut palms.” ॥13॥
श्लोक ( Shlok ) 14
निपपे नालिकेराणां तरुणानां स्त्रो रसः। सरस्तीरतरुच्छाया विश्रान्तैरस्य सैनिकैः ॥१४॥
सरोवरोंके किनारेके वृक्षोंकी छायामें विश्राम करनेवाले भरतके सैनिकोंने नारियलके तरुण अर्थात् बड़े बड़े वृक्षों से निकला हुआ रस खूब पिया था ।।१४।।
“Resting in the shade of trees by the lakeshores, the soldiers of Bharata drank their fill of the sap drawn from the tall, youthful coconut palms.” ॥14॥
श्लोक ( Shlok ) 15
स्फुरत्परुषसम्पात पवनाधूननोत्थितः । तालीवनेषु तत्सैन्यैः शुश्रुवे मर्मर ध्वनिः ॥१५॥
वहां भरत की सेनाके लोगोंने ताड़ वृक्षोंके वनों में वायुके हिलनेसे उठी हुई बहुत कठोर सूखे पत्तोंकी मर्मर-ध्वनि सुनी थी ।।१५।।
“There, the soldiers of Bharata heard the harsh rustling of dry palm leaves, stirred by the wind, echoing through the groves of tall palms.” ॥15॥
श्लोक ( Shlok ) 16
समं ताम्बूलवल्लीमिरपश्यत् क्रमुकान् विभुः । एककार्यत्वमस्माकमितीव मिलितान्मिथः ॥१६॥
वहां सम्राट् भरत ने हम लोगों का एक ही समान कार्य होगा यही समझकर जो पान की बेलोंके साथ साथ परस्परमें मिल रहे थे ऐसे सुपारीके वृक्ष देखे ।।१६।।
“There, Emperor Bharata observed the areca palms, entwined with betel vines, growing together in unity, understanding that we, too, must work as one in like manner.” ॥16॥
श्लोक ( Shlok ) 17
नू पस्ताम्बूलवल्लीनामु पघ्नान् क्रमुकद्रुमान् । निध्यायन् वेष्टितांस्ताभि र्मुमुदे दम्पतीयितान् ॥१७॥
जो पानोंकी लताओं के आश्रय थे तथा जो उनके साथ लिपटकर स्त्री-पुरुषके समान जान पड़ते थे ऐसे सुपारी के वृक्षों को बड़े गौरके साथ देखकर महाराज भरत बहुत ही प्रसन्न हुए थे ।।१७।।
“The areca palms, sheltered by the betel vines and appearing as though intertwined in the union of man and woman, were observed by Maharaja Bharata with great admiration, filling him with immense joy.” ॥17॥
श्लोक ( Shlok ) 18
स्वाध्यायमिव कुर्वाणान् वनेष्वविरतस्वनान् । वीन्मुनीनिव सोऽपश्यद् यत्रास्त मितवासिनः ॥१८॥
उन वनोंमें सूर्यास्तके समय निवास करनेवाले जो पक्षी निरन्तर शब्द कर रहे थे और ऐसे जान पड़ते थे मानो सूर्यास्तके समय निवास करनेवाले तथा स्वाध्याय करते हुए मुनि ही हों उन्हें भरत ने देखा था ।।१८।।
“In those groves, Bharata saw the birds that dwelled there at sunset, ceaselessly calling out, seeming as though they were sages, residing at twilight and engrossed in their self-reflection.” ॥18॥
श्लोक ( Shlok ) 19
पनसानि मृदून्यन्तः कण्टकीनि बहिस्त्वचि । सुरसान्यमृतानीव जनाः प्रादन् यथेप्सितम् ॥१९॥
जो भीतर कोमल हैं तथा बाहरी त्वचापर कांटोंसे युक्त हैं ऐसे अमृतके समान मीठे कटहलके फल सेनाके लोगोंने अपने इच्छानुसार खाये थे ।।१९।।
“The soldiers of the army, having their fill of the sweet, nectar-like jackfruit, whose inner flesh was tender yet covered in thorny rind, ate them as they pleased.” ॥19॥
श्लोक ( Shlok ) 20
नालिकेररसः पानं पनसान्यशनं परम् । मरीचान्य पदंशश्च वन्या वृत्तिरहो सुखम् ॥२०॥
वहां पीनेके लिये नारियलका रस, खानेके लिये कटहलके फल और व्यंजनके लिये मिरचें मिलती थीं, इस प्रकार सैनिकोंके लिये वनमें होनेवाली भोजनकी व्यवस्था भी सुखकर मालूम होती थी ॥ २०॥
“There, for drinking, coconut sap; for sustenance, jackfruit; and for seasoning, chili peppers were readily available. Thus, the provision of food in the forest seemed to the soldiers no less than a delight.” ॥20॥
श्लोक ( Shlok ) 21
सरसानि मरीचानि किमप्यास्वाद्य विष्किरान् । रुवतः प्रभुरद्राक्षीद् गलदश्रुविलोचनान् ॥२१॥
जो सरस अर्थात् गीली मिरचें खाकर कुछ कुछ शब्द कर रहे हैं और जिनकी आंखोंसे आंसू गिर रहे हैं ऐसे पक्षियोंको भी भरतने देखा था ।॥२१॥
“Bharata also observed the birds, their eyes shedding tears as they uttered soft cries after tasting the pungent, moist chilies.” ॥21॥
श्लोक 22 से 34
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 |