आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 63 गर्भान्वय और दीक्षान्वय क्रियाएं
गर्भान्वय क्रियाएं तिरेपन हैं, जैसे आधान, प्रीति, आदि। दीक्षान्वय क्रियाएं अड़तालीस हैं, जो उपासकाध्ययनांग से प्राप्त ज्ञान पर आधारित हैं। इनमें आधान, विवाह, दीक्षा, और निर्वाण तक की क्रियाएं शामिल हैं। ये क्रियाएं गर्भ से निर्वाण तक के जीवन चक्र को दर्शाती हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 52 to 63
श्लोक ( Shlok ) 52
आधानाद्यास्त्रिपञ्चाश ज्ञेया गर्भान्वयक्रियाः । चत्वारिंशदथाष्टौ च स्मृता दीक्षान्वयक्रियाः ॥५२॥
गर्भान्वय क्रियाएं, आधान आदि तिरेपन जानना चाहिये और दीक्षान्वय क्रियाएं अड़तालीस समझना चाहिये ।। ५२ ।।
One should know that the actions related to conception—such as impregnation and others—are fifty-three in number;
And the consecratory rites related to initiation are to be understood as numbering forty-eight.52
श्लोक ( Shlok ) 53
कर्त्रन्वयक्रियाश्चैव सप्त तज्ज्ञैः समुच्चिताः । तासां यथाक्रमं ‘नामनिर्देशोऽयमनूद्यते ॥५३॥
इनके सिवाय उस विषयके जानकार विद्वानोंने कर्त्रन्वय क्रियाएं सात संग्रह की हैं। अब आगे यथाक्रमसे उन क्रियाओंका नाम निर्देश किया जाता है ।॥५३॥
Apart from these, the learned scholars well-versed in this discipline have compiled seven actions pertaining to the agent (kartṛ-anvaya).
Now, in due order, the names of those actions shall be set forth.53
श्लोक ( Shlok ) 54
अङ्गानां सप्तमादङ्गाद् दुस्तरादर्णवादपि । श्लोकैरष्टाभिरुन्नेष्ये प्राप्तं ज्ञानलवं मया ॥५४॥
जो समुद्रसे भी दुस्तर है ऐसे बारह अंगोंमें सातवें अंग (उपासकाध्ययनांग) से जो कुछ मुझे ज्ञानका अंश प्राप्त हुआ है उसे मैं नीचे लिखे हुए आठ श्लोकोंसे प्रकट करता हूँ ॥५४॥
From among the twelve limbs—more unfathomable than the ocean—it is from the seventh limb, the Study of the Worshipper, that I have gained a portion of knowledge.
That fragment of wisdom I now reveal through the eight verses that follow.54
श्लोक ( Shlok ) 55 – 63
आधानं प्रीतिसुप्रीती धृतिर्मोदः प्रियोद्भवः । नामकर्मबहिर्याननिषद्याः प्राशनं तथा ।।५५।।व्युष्टिश्च केशवापश्च लिपिसंख्यानसङ्ग्रहः । उपनीतिर्व्रतं चर्या व्रतावतरणं तथा ॥५६॥विवाहो वर्णलाभश्च कुलचर्या गृहीशिता । प्रशान्तिश्च गृहत्यागो दीक्षाद्यं जिनरूपता ॥५७।।मौनाध्ययनवृत्तत्वं तीर्थकृत्त्वस्य भावना । गुरुस्थानाभ्युपगमो गणोपग्रहणं तथा ॥५८॥स्वगुरुस्थानसंक्रान्तिर्निस्सङ्गत्वात्मभावना । योगनिर्वाणसम्प्राप्तिर्योगनिर्वाणसाधनम् ॥५९LLइन्द्रोपपादाभिषेकौ विधिदानं सुखोदयः । इन्द्रत्यागावतारौ च हिरण्योत्कृष्टजन्मता ॥६०॥मन्दरेन्द्राभिषेकश्च गुरुपूजोपलम्भनम् । यौवराज्यं स्वराज्यं च चक्रलाभो दिशाञ्जयः ॥६१॥चक्राभिषेकसाम्राज्ये निष्क्रान्तिर्योगसम्महः । आर्हन्त्यं तद्विहारश्च योगत्यागोऽग्रनिर्वृतिः ॥६२॥त्रयः पञ्चाशदेता हि मता गर्भान्वयक्रियाः । गर्भाधानादिनिर्वाणपर्यन्ताः परमागमे ॥६३॥
१ आधान, २ प्रीति, ३ सुप्रीति, ४ धृति, ५ मोद, ६ प्रियोद्भव, ७ नामकर्म, ८ बहिर्यान, ९ निषद्या, १० प्राशन, ११ व्युष्टि, १२. केशवाप, १३लिपि संख्यानसंग्रह, १४ उपनीति, १५ व्रतचर्या, १६ व्रतावतरण, १७ विवाह, १८ वर्णलाभ, १९ कुल-चर्या, २० गृहीशिता, २१ प्रशान्ति, २२ गृहत्याग, २३ दीक्षाद्य, २४ जिनरूपता, ३५ मौना-ध्ययनवृत्तत्व, २६ तीर्थकृत्भावना, २७ गुरुस्थानाभ्युपगम, २८ गणोपग्रहण, २९ स्वगुरु-स्थानसंक्रान्ति, ३० निःसंगत्वात्मभावना, ३१ योगनिर्वाणसंप्राप्ति, ३२ योगनिर्वाण साधन, ३३ इन्द्रोपपाद, ३४ अभिषेक, ३५ विधिदान, ३६ सुखोदय, ३७ इन्द्रत्याग, ३८ अवतार, ३९ हिरण्योत्कृष्टजन्मता, ४० मन्दरेन्द्राभिषेक, ४१ गुरुपूजोपलम्भन, ४२ यौवराज्य, ४३ स्वराज्य, ४४ चक्रलाभ, ४५ दिग्विजय, ४६ चक्राभिषेक, ४७ साम्राज्य, ४८ निष्क्रान्ति, ४९ योगसन्मह, ५० आर्हन्त्य, ५१ तद्विहार, ५२ योगत्याग और ५३ अग्रनिवृति । परमागम में ये गर्भसे लेकर निर्वाणपर्यन्त तिरपन क्रियाएं मानी गई हैं ।॥५५-६३।।
- Ādhāna (Impregnation),
- Prīti (Initial Affection),
- Suprīti (Deepening of Affection),
- Dhṛti (Steadfastness),
- Moda (Joy),
- Priyodbhava (Birth of the Beloved),
- Nāmakarma (Naming Ceremony),
- Bahiryāna (First Outing),
- Niṣadyā (First Sitting),
- Prāśana (First Feeding),
- Vyushti (Commencement of Articulation),
- Keśavāpa (Tonsure),
- Lipi-Saṅkhyāna-Saṅgraha (Learning of Script and Numeration),
- Upanīti (Initiation into Learning),
- Vratacaryā (Observance of Vows),
- Vratāvataraṇa (Assumption of Vows),
- Vivāha (Marriage),
- Varṇalābha (Acceptance into a Social Order),
- Kula-Caryā (Observance of Family Duties),
- Gṛhīśitā (Assuming the Role of Householder),
- Praśānti (Appeasement Rites),
- Gṛhatyāga (Renunciation of the Household),
- Dīkṣādya (Commencement of Initiation),
- Jinarūpatā (Assumption of the Form of a Jina),
- Mauna-Dhyānavṛttatva (Discipline of Silence and Meditation),
- Tīrthakṛdbhāvanā (Contemplation on Becoming a Ford-Maker),
- Gurusthānābhyupagama (Approaching the Guru’s Position),
- Gaṇopagrahaṇa (Acceptance into the Monastic Order),
- Svaguru-Sthānasaṅkrānti (Transition into the Teacher’s Place),
- Niḥsaṅgatvātma-Bhāvanā (Cultivation of Non-Attachment),
- Yoga-Nirvāṇa-Samprāpti (Attainment of Liberation through Yogic Practice),
- Yoga-Nirvāṇa-Sādhana (Means for Yogic Liberation),
- Indropapāda (Ascension as Indra),
- Abhiṣeka (Anointment),
- Vidhidāna (Bestowal of Rites),
- Sukhodaya (Emergence of Bliss),
- Indratyāga (Renunciation of Indraship),
- Avatāra (Descent to Earth),
- Hiraṇyotkṛṣṭa-Janmatā (Most Excellent Golden Birth),
- Mandarendra-Abhiṣeka (Consecration by the Lord of Mandara),
- Gurupūjopalambhana (Reception of Worship as a Guru),
- Yauvarājya (Crown Princehood),
- Svarājya (Sovereignty),
- Cakralābha (Acquisition of the Disc),
- Digvijaya (Conquest of the Directions),
- Cakrābhiṣeka (Consecration with the Disc),
- Sāmrājya (Universal Sovereignty),
- Niṣkrānti (Renunciation),
- Yogasanmaha (Exalted Yogic Discipline),
- Ārhantya (State of Enlightened Lordship),
- Tadvihāra (Conduct befitting that State),
- Yogatyāga (Abandonment of Yogic Activity),
- Agranivṛtti (Final Cessation).
These fifty-three sacred actions, beginning with conception and culminating in liberation, are enshrined in the Paramāgama as the complete sequence of the soul’s journey.55 – 63
श्लोक 64 से 71
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
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