आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81
श्लोक 82 से 90
दक्षिण दिशा की पूर्ण विजय
सेनापति कालिंगक वन, तैला, गोदावरी, वैतरणी जैसी नदियों और महेन्द्र, विन्ध्य, मलय जैसे पर्वतों को जीतता है। वह दक्षिण के त्रिकलिंग, पाण्ड्य, कवाटक आदि देशों के राजाओं को भरत की आज्ञा का पालन करने को बाध्य करता है। सेना श्रीपर्वत, किष्किन्ध आदि पर्वतों तक पहुंचकर यथायोग्य लाभ प्राप्त करती है, और चक्रवर्ती भरत की विजय पूर्ण होती है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 29 – Shlok 82 to 90
श्लोक ( Shlok ) 82
सेनानीरपि बभ्राम ‘विभोराज्ञां समुद्वहन् । गिरीन् ससरितो देशान् “कालिङ्गकवनाश्रितान् ॥८२॥
चक्रवर्तीकी आज्ञा धारण करता हुआ सेनापति भी कालिंगक वनके समीपवर्ती अनेक पहाड़ों, नदियों तथा देशोंमें घूमा था ।।८२।।
“Obedient to the command of the Emperor, the commander too had journeyed through many mountains, rivers, and regions near the Kalinga forest.” (Verse 82)
श्लोक ( Shlok ) 83
स साधनैः समं भेजे तैलामिक्षुमतीमपि । नदीं नक्ररवां वङ्गां श्वसनां च महानदीम् ॥८३॥
वह अपनी सेनाओंके साथ साथ तैला, इक्षुमती, नक्ररवा, वंगा और श्वसना आदि महानदियोंको प्राप्त हुआ था।।८३।।
“Together with his armies, he had reached the great rivers—Taila, Ikshumati, Nakrarava, Vanga, and Shvasana.” (Verse 83)
श्लोक ( Shlok ) 84
धुनीं वैतरणीं माषवतीं च समहेन्द्रकाम् । सैनिकैः सममुत्तीर्य ययौ शुष्कनदीमपि ॥८४॥
तथा वैतरणी, माषवती और महेन्द्रका इन नदियों को अपने सैनिकों के साथ पार कर वह शुष्क नदीपर जा पहुंचा था ।।८४।।
“And having crossed the rivers—Vaitarani, Mashavati, and Mahendra—alongside his soldiers, he at last arrived at the dry riverbed.” (Verse 84)
श्लोक ( Shlok ) 85
सप्तगोदावरं तीत्र्वा पश्यन् गोदावरीं शुचिम् । सरो मानसमासाद्य मुमुदे शुचिमानसः ॥८५॥
सप्तगोदावर नामके तीर्थ और पवित्र गोदावरीको देखता हुआ वह पवित्र हृदयवाला सेनापति मानस सरोवर को पाकर बहुत प्रसन्न हुआ ।।८५।।
“Beholding the sacred confluence of Sapta-Godāvarī and the holy river Godāvarī herself, the pure-hearted commander was filled with great joy upon reaching the revered Mānasa Lake.” (85)
श्लोक ( Shlok ) 86
सुप्रयोगां नदीं तीर्त्वा कृष्णवेणां च निम्नंगाम् । सन्नीरां च प्रवेणीं च व्यतीयाय समं बलैः ॥ ८६॥
तदनन्तर उसने सेनाओं के साथ साथ सुप्रयोगा नदी को पार कर कृष्णवर्णा, सन्नीरा और प्रवेणी नाम की नदी को पार किया ।।८६।॥
“Thereafter, accompanied by his armies, he crossed the Suprayogā River, and then forded the rivers Kṛṣṇavarṇā, Sannīrā, and Praveṇī.” (86)
श्लोक ( Shlok ) 87
कुब्जां धैर्यां च चूर्णी च वेणां सूकरिकामपि । “अम्बेणां च नदीं पश्यन् दाक्षिणात्यानशुश्रुवत् ॥८७॥
तथा कुब्जा, धैर्या, चूर्णी, वेणा, सूकरिका और अम्बर्णा नदीको देखते हुए उसने दक्षिण दिशाके राजाओं को चक्रवर्ती की आज्ञा सुनाई ।॥८७॥
“Beholding the rivers Kubjā, Dhairyā, Chūrṇī, Veṇā, Sūkarikā, and Ambarṇā along his path, he proclaimed the mandate of the Emperor to the kings of the southern realms.” (87)
श्लोक ( Shlok ) 88
महेन्द्राद्रि समाक्रामन् विन्ध्योपान्त च निर्जयन् । ‘नागपर्वतमध्यास्य प्रययौ मलयाचलम् ॥८८॥
फिर महेन्द्र पर्वतको उल्लंघन कर विन्ध्याचल के समीपवर्ती प्रदेशों को जीतता हुआ नाग पर्वत पर चढ़कर वह सेनापति मलय पर्वत पर गया ।।८८।।
“Then, crossing the Mahendra mountain and subduing the regions bordering the Vindhya range, the commander ascended the Nāga mountain and proceeded onward to the lofty Malaya peak.” (88)
श्लोक ( Shlok ) 89 – 90
गोशीष दर्दुराद्रिं च गिरि पाण्ड्यकवाटकम् । स शीतगुहमासीदनगं श्रीकटनाह्वयम् ॥८९॥ श्रीपर्वत च किष्किन्धं निर्जयञ्जयसाधनैः । तत्र तत्रोचितैर्लाभैरवर्धत चमूपतिः ॥९०॥
वहां से अपनी सेनाके साथ साथ गोशीर्ष, दर्दुर, पाण्ड्य, कवाटक और शीतगुह नामके पर्वतोंपर पहुंचा तथा श्रीकटन, श्रीपर्वत और किष्किन्ध पर्वतोंको जीतता हुआ वहांके राजाओंसे यथायोग्य लाभ पाकर वह सेनापति अतिशय वृद्धिको प्राप्त हुआ ।।८९-९०।।
“From there, accompanied by his army, he ascended the mountains named Gośīrṣa, Dardura, Pāṇḍya, Kavaṭaka, and Śītaguha; and conquering the Śrīkaṭa, Śrīparvata, and Kiṣkindhā ranges, he received due tribute from the kings of those regions, whereby the commander attained great prosperity and renown.” (89–90)
श्लोक 91 से 101
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81