आदिपुराण अष्टादशं पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 18 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश
भगवान वृषभदेव ने शरीर से ममत्व छोड़कर छह माह के उपवास सहित मौन तप धारण किया। वे कायोत्सर्ग में सुमेरु पर्वत से निश्चल और समुद्र से गंभीर थे। उनके शरीर की शांति क्रूर जीवों और इंद्रों से उपासित थी। दीक्षा के बाद उन्हें मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त हुआ। कच्छ आदि द्रव्यलिंगी राजाओं का धैर्य टूटा और वे तप से विरक्त हो गए। वे भगवान के धैर्य की प्रशंसा करते हुए भी भोजन और घर की चिंता करने लगे। कुछ ने वल्कल और भस्म धारण कर पाखंडी जीवन अपनाया। मरीचिकुमार ने मिथ्या शास्त्र सिखाए। भगवान का शरीर तप से दैदीप्यमान रहा। उनके अट्ठाईस मूलगुण सैनिक से थे। वन में शांति फैली, जहाँ सिंह-हरिण साथ रहते थे और हाथी कमल चढ़ाते थे। नमि-विनमि भगवान से भोग माँगने आए। धरणेंद्र ने उन्हें भोगों की निंदा कर भरत के पास जाने को कहा। कुमारों ने अभिमान से उसका विरोध किया। धरणेंद्र ने नागकुमार इंद्र रूप प्रकट कर उनकी भक्ति की प्रशंसा की। वह उन्हें विजयार्ध पर्वत ले गया। पर्वत रत्नों, निर्झरों, और विद्याधरियों से शोभायमान था। विद्याधरियाँ तरुणों संग विहार करती थीं। नमि-विनमि पर्वत से संतुष्ट हुए। धरणेंद्र प्रसन्न हो उनकी इच्छा पूर्ति हेतु तैयार हुआ।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 18
श्लोक 1 से 11 भगवान का तप और कायोत्सर्ग
भगवान वृषभदेव ने शरीर से ममत्व छोड़कर मौन धारण किया। उन्होंने छह माह के उपवास की प्रतिज्ञा की। वे कायोत्सर्ग में खड़े हुए, पैरों में अंतर था। कठिन शिला पर पद्मासन से शोभायमान थे। वे अस्पष्ट पाठ पढ़ते हुए पर्वत से जान पड़ते थे। उनकी भुजाएँ लटक रही थीं। केशलोंच से उनका शिर सूर्य से स्पर्धा करता था। उनका मुख निश्चल और सुंदर था। भ्रमर उनकी श्वास से आकर्षित थे। वे कल्पवृक्ष से शोभायमान थे। तप से छत्र होने पर भी अपरिग्रही थे।
श्लोक 12 से 21 तप की महिमा और राजाओं का क्षोभ
हिलते वृक्ष चमर से क्लेश दूर करते दिखे। दीक्षा के बाद उन्हें मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त हुआ। चार ज्ञानों से वे परलोक देखते थे। कच्छ आदि राजाओं का धैर्य टूटने लगा। दो-तीन माह में परीषह से उनका धैर्य छूट गया। वे भगवान के कठिन मार्ग पर चलने में असमर्थ थे। वे भगवान के धैर्य और बल की प्रशंसा करने लगे। वे सोचते थे कि भगवान कितने समय खड़े रहेंगे। उन्हें लगा कि भगवान उन्हें क्लेशित कर रहे हैं।
श्लोक 22 से 31 राजाओं की शिकायतें
राजा सोचते थे कि भगवान भोजन कर खड़े रहते तो ठीक था। वे उनके उद्देश्य को नहीं समझते थे। उन्हें लगा कि भगवान नीति नहीं जानते। वे तप से खिन्न हो गए। वे कंद-मूल से जीवन निर्वाह करने को तैयार हुए। कुछ तप से उदासीन हो दीन वचन बोले। कुछ मूर्ख मुनि भगवान के समीप खड़े हुए। वे कहते थे कि राज्य में वे भगवान के साथ चलते थे, अब तप में असमर्थ हैं। उन्होंने जल-भोजन नहीं लिया। वे भगवान को निर्दयी मानने लगे।
श्लोक 32 से 41 राजाओं की चिंता
वे सोचते थे कि भगवान घर नहीं लौटेंगे। वे परिवार और प्रजा को याद करने लगे। कुछ घर जाने को भगवान को नमस्कार करते थे। कुछ उनकी धीरता की प्रशंसा करते थे। वे सोचते थे कि भगवान राज्य लौटकर उन्हें अपमानित करेंगे। कुछ डरते थे कि भरत उन्हें कष्ट देगा। वे योग समाप्ति तक सहन करने को तैयार हुए। वे मानते थे कि भगवान उन्हें अंगीकृत करेंगे। कुछ धैर्य से दुःखी नहीं हुए।
श्लोक 42 से 51 तप से विरक्ति
कई अभिमानी वहाँ रहे। कुछ अशक्त हो भगवान के चरण स्मरण करते थे। वे तप से विरक्त हो जीविका सोचने लगे। कुछ लज्जा से मुख फेरकर चले। कुछ प्रदक्षिणा कर प्राणयात्रा सोचने लगे। वे भगवान को शरण मानते थे। कुछ काँपते हुए व्रत छोड़ गए। कुछ रक्षा माँगते हुए चले गए। वे तप में असमर्थ हो भ्रष्ट हुए। वे फल-पानी के लिए वन में फैले।
श्लोक 52 से 61 द्रव्यलिंगियों का पाखंड
वन-देवताओं ने उन्हें फल-पानी से रोका। वे डरकर विभिन्न वेष धारण करने लगे। कुछ ने वल्कल, लंगोटी, भस्म, और दंड धारण किए। वे वन में छाल, जल, और कंद से जीवन चलाने लगे। भरत के डर से वे नगर नहीं गए। वे पाखंडी और परिव्राजक बन गए। वे भगवान की पूजा करते थे। मरीचिकुमार परिव्राजक बन मिथ्या शास्त्र सिखाने लगा।
श्लोक 62 से 72 भगवान का तप
मरीचि ने योग और सांख्य शास्त्र शुरू किए। भगवान तप करते रहे। वे मेरु से निष्कंप और समुद्र से क्षोभरहित थे। तप से उनका शरीर दैदीप्यमान था। तीन गुप्तियाँ उनकी रक्षा करती थीं। छह बाह्य और अंतरंग तप उनके थे। अट्ठाईस मूलगुण उनके सैनिक थे।
श्लोक 73 से 81 : तप का प्रभाव
छह माह उपवास में उनका शरीर दैदीप्यमान रहा। आहार न लेने पर भी परिश्रम नहीं हुआ। उनके केश जटाएँ बन गए। जटाएँ कालिमा सी फैलीं। वन में उनकी कांति सूर्य सी थी। वृक्ष और लताएँ उनकी भक्ति करती थीं। फूल उनके चरणों में गिरते थे। हरिण शांतता दिखाते थे।
श्लोक 82 से 92 वन की शांति
सिंह-हरिण बैर छोड़ साथ रहते थे। बाघ चमरियों के बाल सुलझाते थे। हरिण बाघनियों का दूध पीते थे। हाथी कमल चढ़ाते थे। शांति किरणों ने पशुओं को वश किया। उपवास में भूख न हुई। इंद्रों के आसन काँपने लगे। छह माह क्षणभर से व्यतीत हुए। नमि-विनमि सेवा को आए।
श्लोक 93 से 101 नमि-विनमि और धरणेंद्र
नमि-विनमि भोग माँगते हुए ध्यान में विघ्न करने लगे। वे भगवान से आग्रह करते थे। धरणेंद्र ने आसन कंपन से यह जाना। वह पूजा सामग्री लेकर आया। भगवान ध्यान में लवलीन थे। वे यज्वा और कुंजर से शोभायमान थे।
श्लोक 102 से 111 भगवान की तपस्थिति और धरणेंद्र का आगमन
भगवान वृषभदेव सुमेरु पर्वत से अकंपायमान और दृढ़ थे। उनके शरीर की शांति क्रूर जीवों और इंद्रों से उपासित थी। उनका अंतःकरण ध्यान में निश्चल था। वे समुद्र से गंभीर और दोषरहित थे। धरणेंद्र उनके पास पहुँचा। उसने प्रदक्षिणा, प्रणाम, और स्तुति की। उसने नमि-विनमि से कहा कि वे भयंकर हैं, तपोवन शांत है। उसने भोगों की निंदा की। उसने कहा कि भगवान भोगरहित हैं।
श्लोक 112 से 121 धरणेंद्र और कुमारों का संवाद
धरणेंद्र ने कहा कि भोग अंत में संताप देते हैं। उसने सुझाव दिया कि वे भरत से भोग माँगें। उसने भगवान को मोक्षगामी बताया। नमि-विनमि ने जवाब दिया कि धरणेंद्र उनके कार्य में हस्तक्षेप न करे। उन्होंने कहा कि वे योग्य-अयोग्य जानते हैं। उन्होंने अवस्था का भेद मिथ्या बताया। उन्होंने धरणेंद्र को ढीठ कहा।
श्लोक 122 से 131 कुमारों की प्रतिक्रिया
कुमारों ने धरणेंद्र को दुष्ट और चापलूस कहा। उन्होंने बुद्धिमानों की प्रशंसा की। उन्होंने धरणेंद्र के तेज और वेष की सराहना की। उन्होंने पूछा कि वह उनके कार्य में विघ्न क्यों डाल रहा है। उन्होंने कहा कि भगवान को प्रसन्न करना उनका लक्ष्य है। उन्होंने भगवान को कल्पवृक्ष बताया।
श्लोक 132 से 141 धरणेंद्र का प्रत्युत्तर
कुमारों ने भरत को तुच्छ माना। उन्होंने अभिमान से कहा कि वे उदार स्थान चाहते हैं। धरणेंद्र उनके धैर्य से संतुष्ट हुआ। उसने उनकी भक्ति की प्रशंसा की। उसने अपना परिचय नागकुमार इंद्र के रूप में दिया। उसने कहा कि वह भगवान की आज्ञा से भोग देने आया है।
श्लोक 142 से 151 कुमारों की प्रसन्नता और विजयार्ध यात्रा
कुमार प्रसन्न हो भगवान की सम्मति माँगने लगे। धरणेंद्र उन्हें लेकर आकाश में गया। वह सूर्य और योगिराज से शोभायमान था। वे विजयार्ध पर्वत पहुँचे। पर्वत लवण समुद्र में अवगाहन करता था। उसके शिखर रत्नों से चित्रित थे।
श्लोक 152 से 161 विजयार्ध पर्वत का वर्णन
पर्वत की मेखला मेघों से ढकी थी। सुवर्ण किनारे दावानल सी शोभा देते थे। झरनों से मेघ जर्जरित थे। लताएँ भ्रमरों से ढकी थीं। किन्नर गीतों से सुंदर प्रदेश थे। विद्याधरियाँ झूलों पर झूलती थीं। उनके मुख कमलों से पर्वत शोभायमान था।
श्लोक 162 से 171 पर्वत की शोभा
पर्वत स्फटिक भूमियों से लाल था। गुफाओं में सिंह निर्झर से थे। देव-देवियाँ संभोग और विनोद करते थे। शिखरों पर निर्झर पताकाएँ से थे। चंद्रकांतमणियाँ पानी बहाती थीं। पर्वत सुमेरु से हँसता था। वह विद्याधरों और नदियों से विजयी था।
श्लोक 172 से 181 पर्वत का माहात्म्य
पर्वत जिनेंद्र से अचल और शुद्ध था। वह दो गुफाओं से शोभायमान था। नौ कूट मुकुट से थे। वह पचास योजन चौड़ा और पचीस योजन ऊँचा था। रत्न पाषाण गरम थे। सिंह और कोयल शब्दायमान थे।
श्लोक 182 से 191 पर्वत की विविधता
इंद्रधनुष लता बनती थी। देवांगनाओं के नुपूर शब्द गूँजते थे। हाथी क्रीड़ा करते थे। सर्प और सुरागाएँ शब्द करते थे। पर्वत साँस लेता और झूमता था। विद्याधरियाँ विचार करती थीं। भौंरे संगीत करते थे।
श्लोक 192 से 202 विद्याधरियों का वर्णन
विद्याधरियाँ तरुणों संग विहार करती थीं। उनके मुख सुगंधित थे। नेत्र कामदेव के अस्त्र थे। केश काले और अस्त-व्यस्त थे। अधर बिंबफल से थे। स्तन नख चिह्नों से शोभित थे। भुजाएँ लता सी थीं। चरण कमल से झंकृत थे।
श्लोक 203 से 209 पर्वत और कुमारों की संतुष्टि
अकेली विद्याधरियाँ लता सी थीं। वे फल तोड़ती थीं। नमि-विनमि पर्वत से संतुष्ट हुए। पवन ने उनका परिश्रम हटाया। वन कोयल और भ्रमरों से शब्दायमान थे। धरणेंद्र पर्वत को देख प्रसन्न हुआ।
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
पर्व 19
हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47
आदिपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47
Download PDF
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena