आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71
श्लोक 72 से 81 आसन और स्थान की व्यवस्था
पर्यंक आसन अधिक सुखकर है। बलवान सभी आसनों से ध्यान करते हैं। कायोत्सर्ग और पर्यंक अशक्तों के लिए हैं। शक्तिशाली को सभी आसन ठीक हैं। शरीर की अवस्था ध्यान के विरोधी न हो। एकांत स्थान निवास के योग्य है। शहर में चित्त व्याकुल होता है। वन में रहना उचित है। सभी काल ध्यान के लिए ठीक हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 21 – Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
“तदवस्थाद्वयस्यैव प्राधान्यं ध्यायतो यतेः । प्रायस्तत्रापि पल्यङ्कमामनन्ति सुखासनम् ॥७२॥
ध्यान करने वाले मुनि के प्राय: इन्हीं दो आसनों की प्रधानता रहती है और उन दोनों में भी पर्यंक आसन अधिक सुखकर माना जाता है ।।72।।
The meditating sages generally prefer these two postures, and among them, the Paryanka Asana is considered more comfortable. ||72||
श्लोक ( Shlok ) 73
वज्रकाया महासत्त्वाः सर्वावस्थान्तरस्थिताः । श्रूयन्ते ध्यानयोगेन संप्राप्ताः पदमव्ययम् ॥७३॥
आगम में ऐसा भी सुना जाता है कि जिनका शरीर वज्रमयी है और जो महाशक्तिशाली हैं ऐसे पुरुष सभी आसनों से विराजमान होकर ध्यान के बल से अविनाशी पद (मोक्ष) को प्राप्त हुए हैं ।।73।।
It is also heard in the Agamas that those whose bodies are as strong as vajra (diamond-like) and who are immensely powerful have attained the imperishable state (moksha) through meditation, regardless of the posture they adopted. ||73||
श्लोक ( Shlok ) 74
बाहुल्यापेक्षया तस्मादवस्था द्वयसंगरः । सक्तानां तूपसर्गाद्यैस्तद्वै चित्र्यं न दुष्यति ॥७४॥
इसलिए कायोत्सर्ग और पर्यंक ऐसे दो आसनों का निरूपण असमर्थ जीवों की अधिकता से किया गया है । जो उपसर्ग आदि के सहन करने में अतिशय समर्थ हैं ऐसे मुनियों के लिए अनेक प्रकार के आसनों के लगाने में दोष नहीं है । भावार्थ―वीरासन, वज्रासन, गोदोहासन, धनुरासन आदि अनेक आसन लगाने से कायक्लेश नामक तप की सिद्धि होती अवश्य है पर हमेशा तप शक्ति के अनुसार ही किया जाता है, । यदि शक्ति न रहते हुए भी ध्यान के समय दुःखकर आसन लगाया जाये तो उससे चित्त चंचल हो जाने से मूल तत्त्व-ध्यान की सिद्धि नहीं हो सकेगी इसलिए आचार्य ने यहाँ पर अशक्त पुरुषों की बहुलता देख कायोत्सर्ग और पर्यंक इन्हीं दो सुखासनों का वर्णन किया है परंतु जिनके शरीर में शक्ति है, जो निषद्या आदि परीषहों के सहन करने में समर्थ हैं उन्हें विचित्र-विचित्र प्रकार के आसनों के लगाने का निषेध भी नहीं किया है । आसन लगाते समय इस बात का स्मरण रखना आवश्यक है कि वह केवल बाह्य प्रदर्शन के लिए न हो किंतु कायक्लेश तपश्चरण के साथ-साथ ध्यान की सिद्धि का प्रयोजन होना चाहिए । क्योंकि जैन शास्त्रों में मात्र बाह्य प्रदर्शन के लिए कुछ भी स्थान नहीं है और न उस आसन लगाने वाले के लिए कुछ आत्मलाभ ही होता है ।।74।।
Therefore, the determination of Kāyotsarga and Paryanka as the primary postures is made considering the majority of beings who lack strength. However, for monks who are highly capable of enduring hardships and obstacles, there is no fault in adopting various other postures.
Interpretation: Adopting postures like Vīrāsana, Vajrāsana, Godohāsana, Dhanurāsana, and others helps in achieving the austerity known as Kāyakleśa Tapas (austerity through bodily discipline), but it should always be practiced according to one’s strength. If an uncomfortable posture is adopted during meditation without sufficient capability, it may cause restlessness, preventing the attainment of the core meditative state.
Thus, the Āchārya has primarily described Kāyotsarga and Paryanka, considering the majority of practitioners who lack physical endurance. However, those who possess strength and can endure hardships like Nishadyā Pariṣaha (discomfort due to prolonged sitting) are not restricted from adopting diverse postures.
While assuming any posture, it is essential to remember that it should not be for mere external display, but rather for self-discipline (Kāyakleśa Tapas) and the attainment of meditation. Jain scriptures do not endorse practices done solely for outward exhibition, as they do not bring any spiritual benefit to the practitioner. ||74||
श्लोक ( Shlok ) 75
देहावस्था पुनर्यैव न स्याद् ध्यानोपरोधिनी । तदवस्थो मुनिर्ध्यायेत् स्थित्वा सित्वाधिशय्य वा ॥७५॥
अथवा शरीर की जो-जो अवस्था (आसन) ध्यान का विरोध करने वाली न हो उसी-उसी अवस्था में स्थित होकर मुनियों को ध्यान करना चाहिए । चाहें तो वे बैठकर ध्यान कर सकते हैं, खड़े होकर ध्यान कर सकते हैं और लेटकर भी ध्यान कर सकते हैं ।।75।।
Or, monks should meditate in whatever posture or position of the body that does not hinder their meditation.They may meditate while sitting, standing, or even lying down, as long as the posture supports their practice. ||75||
श्लोक ( Shlok ) 76
देशादिनियमोऽप्येवं प्रायो वृतिव्यपाश्रयः । कृतात्मनां तु सर्वोऽपि देशा दिर्थ्यांनसिद्धये ॥७६॥
इसी प्रकार देश आदि का जो नियम कहा गया है वह भी प्रायोवृत्ति को लिये हुए है अर्थात् हीन शक्ति के धारक ध्यान करने वालों के लिए ही देश आदि का नियम है, पूर्ण शक्ति के धारण करने वालों के लिए तो सभी देश और सभी काल आदि ध्यान के साधन हैं ।।76।।
Similarly, the rules regarding place and other conditions are primarily meant for those with limited strength in meditation.For those who possess complete strength, every place, time, and circumstance serves as a means for meditation. ||76||
श्लोक ( Shlok ) 77
स्त्रीपशुक्लीबसंसक्तरहितं विजनं मुनेः । “सर्वदैवोचितं स्थानं ध्यानकाले विशेषतः ॥७७॥
जो स्थान स्त्री, पशु और नपुंसक जीवों के संसर्ग से रहित हो या एकांत हो वही स्थान मुनियों के सदा निवास करने के योग्य होता है और ध्यान के समय तो विशेष कर ऐसा ही स्थान योग्य समझा जाता है ।।77।।
A place that is free from the presence of women, animals, and hermaphroditic beings, or one that is secluded, is always considered suitable for monks to reside.Such a place is especially regarded as ideal for meditation. ||77||
श्लोक ( Shlok ) 78
वसतोऽस्य जनाकीर्णे विषयानभिपश्यतः । बाहुल्यादिन्द्रियार्थानां जातु व्यग्रीभवेन्मनः ॥७८॥
जो मुनि मनुष्यों से भरे हुए शहर आदि में निवास करते हैं और निरंतर विषयों को देखा करते हैं ऐसे मुनियों का चित्त इंद्रियों के विषयों की अधिकता होने से कदाचित् व्याकुल हो सकता है ।।78।।।
Monks who reside in crowded cities and are constantly exposed to sensory objects may sometimes experience restlessness due to the overwhelming presence of worldly distractions. ||78||
श्लोक ( Shlok ) 79
ततो विंविक्तशायित्वं वने वासश्च योगिनाम् । इति साधारणो मार्गो जिनस्थविरकल्पयोः ॥७९॥
इसलिए मुनियों को एकांत स्थान में ही शयन करना चाहिए और वन में ही रहना चाहिए । यह जिनकल्पी और स्थविरकल्पी दोनों प्रकार के मुनियों का साधारण मार्ग है ।।79।।
Therefore, monks should sleep in secluded places and reside in forests.This is the common practice followed by both Jinkalpi and Sthavirakalpi monks. ||79||
श्लोक ( Shlok ) 80
इत्यमुष्यां व्यवस्थायां सत्यां धीरास्तु कैचन। विहरन्ति जनाकीर्णे शून्ये च समदर्शिनः ॥८०॥
यद्यपि मुनियों के निवास करने के लिए यह साधारण व्यवस्था कही गयी है तथापि कितने ही समदर्शी धीर-वीर मुनिराज मनुष्यों से भरे हुए शहर आदि तथा वन आदि शून्य (निर्जन) स्थानों में विहार करते हैं ।।80।।
Although this is the general guideline for monks’ residence, many equanimous, wise, and courageous monks wander both in crowded cities and in remote, uninhabited forests. ||80||
श्लोक ( Shlok ) 81
न चाहोरात्रसंध्यादिलक्षणः कालपर्ययः । नियतोऽस्यास्ति दिध्यासोस्तद्धयानं सार्वकालिकम् ॥८१॥
इसी प्रकार ध्यान करने के इच्छुक धीर-वीर मुनियों के लिए दिन-रात और संध्याकाल आदि काल भी निश्चित नहीं है अर्थात् उनके लिए समय का कुछ भी नियम नहीं है क्योंकि वह ध्यानरूपी धन सभी समय में उपयोग करने योग्य है अर्थात् ध्यान इच्छानुसार सभी समयों में किया जा सकता है ।।81।।
Similarly, for wise and courageous monks who wish to meditate, there is no fixed time such as day, night, or twilight.Since meditation is a precious wealth, it can be practiced at any time, according to one’s will. ||81||
श्लोक 82 से 95
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
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