आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281
श्लोक 282 से 290 देश-विहार और कैलास प्राप्ति
जिनेंद्ररूपी मेघ धर्मामृत बरसाते हैं, और भव्य चातक संतुष्ट होते हैं। वे अनेक देशों में विहार करते हैं। कैलास पर सभामंडप में विराजमान होकर वे अनंतचतुष्टय से युक्त होते हैं। इंद्रों द्वारा पूजित और तीनों लोकों के स्वामी, वे भक्तों को नमस्कार के योग्य हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 25 – Shlok 282 to 290
श्लोक ( Shlok ) 282
यतो विजहे भगवान् हेमाब्जन्यस्तसत्क्रमः । धर्मामृताम्बुसंवर्षैस्ततों भव्या धृतिं दधुः ॥ २८२॥
सुवर्णमय कमलों पर पैर रखने वाले भगवान् ने जहाँ-जहाँ से विहार किया वहीं-वहीं के भव्यों ने धर्मामृतरूप जल की वर्षा से परम संतोष धारण किया था ।।282।।
Wherever the Lord, who placed His feet upon golden lotuses, journeyed, the noble beings of those places showered the nectar-like water of Dharma, attaining supreme satisfaction. ||282||
श्लोक ( Shlok ) 283
जिने घन इवाभ्यर्णे धर्मवर्ष प्रवर्षति । जगत्सुखप्रवाहेण पुप्लुवे घृतनिर्वृतिः ॥२८३॥
जिस समय वे जिनेंद्ररूपी मेघ समीप में धर्मरूपी अमृत की वर्षा करते थे उस समय यह सारा संसार संतोष धारण कर सुख के प्रवाह से प्लुत हो जाता था―सुख के प्रवाह में डूब जाता था ।।283।।
At the time when the Lord, in the form of a cloud, showered the nectar-like rain of Dharma, the entire world would attain satisfaction and be flooded with the flow of happiness, drowning in that blissful current. ||283||
श्लोक ( Shlok ) 284
धर्मवारि जिनाम्भोदात्पायं पायं कृतस्पृहाः । चिरं धृततृषो दध्रुस्तदानीं भव्यचातकाः ॥२८४॥
उस समय अत्यंत लालायित हुए भव्य जीवरूपी चातक जिनेंद्ररूपी मेघ से धर्मरूपी जल को बार-बार पी कर चिरकाल के लिए संतुष्ट हो गये थे ।।284।।
At that time, the highly eager noble souls, in the form of Chātak birds, were repeatedly drinking the Dharma-like water from the Lord, who was like a cloud, and became fully satisfied for an eternity. ||284||
श्लोक ( Shlok ) 285
इत्थं चराचरगुरुर्जगदुज्जिहीर्षन् संसारखञ्ज ननिमग्नमभग्नवृत्तिः ।देवासुरैरनुगतो विजहार पृथ्वीं हेमाब्जगर्भ विनिवेशितपादपद्मः ॥२८५॥
इस प्रकार जो चर और अचर जीवों के स्वामी हैं, जो संसाररूपी गर्त में डूबे हुए जीवों का उद्धार करना चाहते हैं, जिनकी वृत्ति अखंडित है, देव और असुर जिनके साथ हैं तथा जो सुवर्णमय कमलों के मध्य में चरणकमल रखते हैं ऐसे जिनेंद्र भगवान ने समस्त पृथ्वी में विहार किया ।।285।।
In this way, the Lord, who is the master of all moving and non-moving beings, who wishes to uplift the souls trapped in the abyss of worldly existence, whose nature is unwavering, who is accompanied by both gods and demons, and who places His lotus feet amidst golden lotuses, journeyed across the entire earth. ||285||
श्लोक ( Shlok ) 286
तीव्राजवञ्जवदवानलदह्यमान-माह्लादयन् भुवनकाननमस्ततापः ।धर्मामृताम्बुपृषतैः परिषिच्य देवो रेजे घनागम इवोदित दिव्यनादः ॥२८६॥
उस समय संसाररूपी तीव्र दावानल से जलते हुए संसाररूपी वन को धर्मामृतरूप जल के छीटों से सींचकर जिन्होंने सबका संताप दूर कर दिया है और जिनके दिव्यध्वनि प्रकट हो रही है ऐसे वे भगवान् वृषभदेव ठीक वर्षाऋतु के समान सुशोभित हो रहे थे ।।286।।
At that time, the Lord Vṛṣabhadeva, who quenched the burning world-like forest with the droplets of Dharma-nectar, removing the suffering of all beings, and whose divine sounds were manifesting, appeared as radiant as the monsoon season. ||286||
श्लोक ( Shlok ) 287
काशीमवन्तिकुरुकोसल सुह्म पुण्ड्रान् चेद्यङ्गवङ्गमगधान्ध्र कलिङ्गमद्रान् ।पाञ्चालमालवदशार्ण विदर्भदेशान् सन्मार्गदेशनपरो विजहार धीरः ॥२८७॥
समीचीन मार्ग के उपदेश देने में तत्पर तथा धीर-वीर भगवान् ने काशी, अवंति, कुरु, कोशल, सुह्म, पुंड, चेदि, अंग, वंग, मगध, आंध्र, कलिंग, मद्र, पंचाल, मालव, दशार्ण और विदर्भ आदि देशों में विहार किया था ।।287।।
The steadfast and brave Lord, always ready to guide on the righteous path, journeyed through various regions such as Kashi, Avanti, Kuru, Kosala, Suhma, Pundra, Chedi, Anga, Vanga, Magadha, Andhra, Kalinga, Madra, Panchala, Malava, Dasharna, and Vidarbha. ||287||
श्लोक ( Shlok ) 288
देवः प्रशान्तचरितः शनकैर्विहृत्य देशान् बहूनिति विबोधितभव्यसत्व ।भेजे जगत्त्रयगुरुर्विधुवीध्र मुच्चैः कैलास मात्मयशसोऽनुकृतिं दधानम् ।।२८८।।
इस प्रकार जिनका चरित्र अत्यंत शांत है, जिन्होंने अनेक भव्य जीवों को तत्त्वज्ञान प्राप्त कराया है और जो तीनों लोकों के गुरु हैं ऐसे भगवान् वृषभदेव अनेक देशों में विहार कर चंद्रमा के समान उज्ज्वल, ऊँचे और अपना अनुकरण करने वाले कैलास पर्वत को प्राप्त हुए ।।288।।
In this way, the Lord Vṛṣabhadeva, whose character is extremely peaceful, who has imparted true knowledge to many noble souls, and who is the teacher of the three worlds, journeyed through various lands. He then attained the Kailasa mountain, which is bright like the moon, lofty, and the object of imitation for all. ||288||
श्लोक ( Shlok ) 289
तस्याग्रे सुरनिर्मिते सुरुचिरे श्रीमत्सभामण्डले पूर्वोक्ताखिलवर्णना परिगते स्वर्गश्रियं तन्वति ।श्रीमान् द्वादशभिर्गुणैः परिवृतो भक्त्या नतैः सादरैः आसामास विभुर्जिनः प्रविलसत्सत्प्रातिहार्याष्टकः ॥२८९।।
वहाँ उसके अग्रभाग पर देवों के द्वारा बनाये हुए, सुंदर, पूर्वोक्त समस्त वर्णन से सहित और स्वर्ग की शोभा बढ़ाने वाले सभामंडप में विराजमान हुए । उस समय वे जिनेंद्रदेव अनंतचतुष्टयरूप लक्ष्मी से सहित थे, आदर के साथ भक्ति से नम्रीभूत हुए बारह सभा के लोगों से घिरे हुए थे ओर उत्तमोत्तम आठ प्रातिहार्यों से सुशोभित हो रहे थे ।।289।।
There, on the front part of the beautiful hall, made by the gods and described in all the previous details, which enhanced the splendor of heaven, the Lord was seated. At that time, Lord Jina, accompanied by the infinite fourfold wealth (Anantachatushtaya), was surrounded by twelve members of the assembly, who were humbly paying respect with devotion. He was adorned with the finest of eight door-keepers and was shining in unparalleled splendor. ||289||
श्लोक ( Shlok ) 290
तं देवं त्रिदशाधिपार्चिंतपदं घातिक्षयानन्तरं-प्रोत्थानन्तचतुष्टयं जिनमिनं भव्या ब्जिनीनामिनम् ।मानस्तम्भविलोकनानतजगन्मान्यं त्रिलोकीपतिं प्राप्ता चिन्त्यवहिर्विभूतिमनघं भक्त्या प्रवन्दामहे ।।२९०।।
जिनके चरणकमल इंद्रों के द्वारा पूजित है, घातियाकर्मों का क्षय होने के बाद जिन्हें अनंतचतुष्टयरूपी विभूति प्राप्त हुई है, जो भव्यजीवरूपी कमलिनियों को विकसित करने के लिए सूर्य के समान हैं, जिनके मानस्तंभों के देखने मात्र से जगत् के अच्छे-अच्छे पुरुष नम्रीभूत हो जाते हैं, जो तीनों लोकों के स्वामी हैं, जिन्हें अचिंत्य बहिरंग विभूति प्राप्त हुई है, और जो पापरहित हैं ऐसे श्रीस्वामी जिनेंद्रदेव को हम लोग भी भक्तिपूर्वक नमस्कार करते हैं ।।290।।
We, with devotion, offer our salutations to Lord Jina, whose lotus feet are worshiped by Indras, who, after the destruction of harmful karmas, has attained the infinite fourfold wealth, who is like the sun in developing noble souls, whose mere sight of His divine form humbles the greatest men of the world, who is the Lord of the three worlds, who has attained incomprehensible external glory, and who is free from all sin. ||290||
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणस ङ्ग्र हे भगवद्विहारवर्णनं नाम पञ्चविंशतितमं पंर्व॥२५॥
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रह में भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पचीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ।।25।।
Thus, the twenty-fifth chapter, which describes the Lord’s journey, concludes in the Triṣaṣṭilakṣaṇa Mahāpurāṇa-saṅgraha, as composed by Bhagwan Jin Sena Acharya. ||25||
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन
पर्व 26 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181 | श्लोक 182 से 186
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 110 | श्लोक 111 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 143 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281