आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131 भरत की निंदा और यश की महत्ता
बाहुबली कहते हैं कि भरत की चक्रवर्ती वृत्ति भिक्षुक की भांति दीनता को दर्शाती है। वे उसके दिग्विजय को विश्वासयोग्य मात्र बताते हैं, क्योंकि वह उपवास और तप के बिना कैसे संभव था। वे भरत को पाप की धूल से कलंकित और कुल को अपमानित करने वाला मानते हैं। उसका पराक्रम म्लेच्छों के सामने कमजोर था। बाहुबली यश को अमर धन मानते हैं, जो रक्षा योग्य है, जबकि रत्न मृत्यु के साथ नष्ट हो जाते हैं। वे कहते हैं कि भरत कुल की पृथ्वी छीनना चाहता है, जो अनुचित है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
इदं वाचनिकं कृत्स्नं त्वदुक्तं प्रतिभाति नः । क्वास्य दिग्विजयारम्भः क्व धनोंच्छन “चुञ्चुता ॥१२२॥
हे दूत, तेरे द्वारा कहा हुआ यह समस्त कार्य हम लोगोंको केवल वचनाडम्बर ही जान पड़ता है क्योंकि कहां तो इसका दिग्विजयका प्रारम्भ करना और कहां धन इकट्ठा करनेमें तत्पर होना ? ॥ १२२।।
O messenger, all that thou hast spoken regarding this undertaking seems to us naught but empty words. How then can we ever begin its conquest of the world? And whence comes our eagerness to gather treasure?122
श्लोक ( Shlok ) 123
दधच्चाक्रचरीं वृत्तिं बलि भिक्षामिवाहरन् । दीनतायाः परां कोटि प्रभुरारोपितस्त्वया ।।१२३॥
जिस प्रकार भिक्षुक चक्र धारण कर भिक्षा मांगता हुआ अतिशय दीनताको प्राप्त होता है उसी प्रकार चक्रवर्तीकी वृत्ति धारण कर भिक्षाके समान कर वसूल करता हुआ तेरा स्वामी भरत तेरे द्वारा दीनताकी परम सीमाको प्राप्त करा दिया गया है ॥ १२३॥
Even as the mendicant, bearing his bowl, attains the utmost depth of poverty, so Bharata, thy master, adopting the emperor’s wheel and gathering tribute as though alms, hath brought us through thee to the very confines of abasement. 123
श्लोक ( Shlok ) 124 – 125
सत्यं दिग्विजये चक्री जितवानमरानिति । ‘प्रत्येयमिदमेतत्तु चिन्त्यमत्र ननु त्वया ॥१२४॥ स कि न दर्भशय्यायां सुप्तो नोपोषितोऽथवा । प्रवृत्तो जलमायायां शरपातं समाचरन् ॥१२५।।
यह ठीक है कि चक्रवर्तीने दिग्विजयके समय देवोंको भी जीत लिया है परन्तु यह बात केवल विश्वास करने योग्य है अन्यथा तू यहां इतना तो विचार कर कि जलस्तम्भन करने में प्रवृत्त हुए तेरे स्वामी भरतने जब बाण छोड़ा था तब वह क्या दर्भकी शय्यापर नहीं सोया था अथवा उसने उपवास नहीं किया था ।।१२४-१२५।।
Indeed, it is true that the Lord of the Wheel (Chakravartin) conquered even the gods in his world-conquest; yet that claim is a matter for faith alone. Otherwise, consider this: when thy lord Bharata loosed his arrow to dry up the ocean, was he not lying on a humble bed of darbha grass, his body bowed by fasting?124 – 125
श्लोक ( Shlok ) 126
कृतचक्रपरिभ्रान्तिः ‘दण्डेनायतिशालिना । घटयन् पार्थिवानेष सकुलालायते वत ॥१२६॥
जिस प्रकार कुम्हार आयति अर्थात् लम्बाईसे शोभायमान डंडे के द्वारा चक्रको घुमाता हुआ पार्थिव अर्थात् मिट्टीके घट बनाता है उसी प्रकार भरत भी आयति अर्थात् सुन्दर भविष्यसे शोभायमान डंड़े (दण्डरत्न) से चक्र (चक्ररत्न) को घुमाता हुआ पार्थिव अर्थात् पृथिवीके स्वामी राजाओंको वश करता फिरता है, इसलिये कहना पड़ता है कि तुम्हारा यह राजा कुम्हारके समान आचरण करता है ।। १२६।।
Even as a potter, with his long and sturdy rod, turns his wheel to fashion clay into vessels, so Bharata, with his resplendent sceptre, turns the wheel of empire and brings the kings of earth to submission.126
श्लोक ( Shlok ) 127
आगः परागमातन्वन् स्वयमेष कलङ्कितः । चिरं कलङकयत्येष कुलं “कुलभृतामपि ॥ १२७॥
वह भरत पापकी धूलिको उड़ाता हुआ स्वयं कलंकित हुआ है और कुलीन मनुष्योंके कुलको भी सदाके लिये कलंकित कर रहा है ॥ १२७॥
He who casts off the dust of sin thus becomes himself defiled; so Bharata, in shaking off that guilt’s dust, has tainted himself, and thus stains even the lineage of the noble forever.127
श्लोक ( Shlok ) 128
नृपानाकर्षतो दूरान्मन्त्रः तन्त्रैश्च योजितैः । श्लाध्यते कियदेतस्य पौरुषं लज्जया विना ॥ १२८॥
हे दूत, प्रयोगमें लाये हुए मंत्र-तंत्रोंके द्वारा दूरसे ही अनेक राजाओंको बुलानेवाले इस भरतका पराक्रम तू लज्जाके बिना कितना वर्णन कर रहा है ? ॥१२८॥
He who, by spells and charms, draws princes from afar unto his side has no true cause for boasting. O messenger, what valor is this that thou dost so brazenly praise without a shred of shame?128
श्लोक ( Shlok ) 129
दुनोति नो भृशं दूत श्लाध्यतेऽस्य यदाहवः । दोलायितं जले यस्य बलं म्लेच्छबलैस्तदा ॥ १२९॥
हे दूत, जिस समय तु इसके युद्धकी प्रशंसा करता है उस समय हम लोगोंको बहुत दुःख होता है क्योंकि उस समय म्लेच्छोंकी सेनाके द्वारा भरतकी सेना पानीमें हिंडोले झूल रही थी अर्थात् हिंडोलेके समान कँप रही थी ॥ १२९॥
O messenger, why dost thou so proudly laud his prowess? At that hour Bharata’s army, like a cradle upon the water, wavered uncertainly—its strength no greater than that of mere barbarians. 129
श्लोक ( Shlok ) 130
यशोधनमसंहार्य क्षत्रपुत्रेण रक्ष्यताम् । निखनन्तो निधीन् भूमौ बहवो निधनं गताः ॥१३०॥
क्षत्रियपुत्रको तो जिसे कोई हरण न कर सके ऐसे यशरूपी धनकी ही रक्षा करनी चाहिये क्योंकि इस पृथिवीमें निधियों को गाड़ कर रखनेवाले अनेक लोग मर चुके हैं। भावार्थ अमरता यशसे ही प्राप्त होती है ।।१३०।।
Let glory and wealth be guarded by a king’s own heir; lo, when warriors fall in battle, their treasures lie buried in the earth.130
श्लोक ( Shlok ) 131
रत्नैः किमस्ति वा कृत्यं यान्यरत्निमितां भुवम् । “न यान्ति यत्कृते यान्ति केवलं निधनं नृपाः ॥१३१॥
अथवा जो रत्न एक हाथ पृथिवी तक भी साथ नहीं जाते और जिनके लिये राजा लोग केवल मृत्युको ही प्राप्त होते हैं ऐसे रत्नोंसे क्या कार्य निकल सकता है ? ॥१३१॥
What profit is there in jewels that cannot travel a single cubit, when kings, for all their hoarded treasure, reap nothing but ruin?131
श्लोक 132 से 141
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
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