आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241
श्लोक 242 से 253 क्षपक श्रेणी और गुणस्थान
भगवान क्षपक श्रेणी पर आरूढ़ हुए। सातवें से नौवें गुणस्थान तक पहुँचे। पृथक्त्ववितर्क शुक्लध्यान से मोह को नष्ट किया। कषाय और वेद को चूर्ण किया। अनिवृत्तिकरण में जयभूमि प्राप्त की। तीन करणों का स्वरूप बताया गया।
English translation of Ādi purāṇa parv 20 – Shlok 242 to 253
श्लोक ( Shlok ) 242
भूयोऽप्रमत्ततां प्राप्य भावयन् शुद्धिमुद्धुराम्। आरुक्षत् क्षपकश्रेणीं निश्रेणीं मोक्षसद्मनः ॥२४२॥
तदनंतर उत्कृष्ट विशुद्धि की भावना करते हुए भगवान अप्रमत्त अवस्था को प्राप्त होकर मोक्षरूपी महल की सीढ़ी के समान क्षपक श्रेणी पर आरूढ़ हुए ।।242।।
After that, experiencing the supreme feeling of purity, the Lord, attaining a state of unwavering awareness, ascended the Kshapaka Shreni, which is like the staircase to the mansion of liberation. ||242||
श्लोक ( Shlok ) 243
अधःप्रवृत्तकरणमप्रमादेन भावयन् । अपूर्वकरणों भूत्वाऽनिवृत्तिकरणोऽभवत् ॥२४३॥
प्रथम ही उन्होंने प्रमादरहित हो अप्रमत्तसंयत नाम के सातवें गुणस्थान में अधःकरण की भावना की और फिर अपूर्वकरण नामक आठवें गुणस्थान में प्राप्त होकर अनिवृत्तिकरण नामक नौवें गुणस्थान में प्राप्त हुए ।।243।।
First, having become free from negligence, they contemplated Adhahkarana in the seventh stage of spiritual development (Gunasthana), known as Apramattasamyata. Then, they attained the eighth stage, called Apurvakarana, and subsequently reached the ninth stage, known as Anivrittikarana. ||243||
श्लोक ( Shlok ) 244
‘तत्राद्यं शुक्लमापूर्य ध्यानेद्ध्या नतिशुद्धिकः । मोहराजबलं कृत्स्नमपातयदसाध्वसः ॥२४४॥
वहाँ उन्होंने पृथक्त्ववितर्क नाम का पहला शुक्लध्यान धारण किया और इसके प्रवाह से विशुद्धि प्राप्त कर निर्भय हो मोहरूपी राजा की समस्त सेना को पछाड़ दिया ।।244।।
There, they engaged in the first stage of Shukladhyana, known as Prithaktva Vitarka. Through the continuous flow of this meditation, they attained purity and, becoming fearless, completely vanquished the entire army of delusion, which was like a king of ignorance. ||244||
श्लोक ( Shlok ) 245
अङ्गरक्षानिवास्याष्टौ कषायान्निप्पिपेष सः। वेद शक्तीस्ततस्तिस्त्रो नो कषायाह्वयान्भटान् ॥२४५॥
प्रथम ही उन्होंने मोहरूपी राजा के अंगरक्षक के समान अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण संबंधी आठ कषायों को चूर्ण किया फिर नपुंसकवेद, स्त्रीवेद और पुरुषवेद ऐसे तीन प्रकार के वेदों को तथा नौकषाय नाम के हास्यादि छह योद्धाओं को नष्ट किया था ।।245।।
First, they crushed the eight passions (Kashayas) related to Apratyakhyanavarana and Pratyakhyanavarana, which were like the bodyguards of the king of delusion. Then, they destroyed the three types of sexual inclinations (Vedas)—neutral (Napumsaka), female (Stri), and male (Purusha). Additionally, they annihilated the six warriors known as Naukashayas, which include laughter (Hasya), etc. ||245||
श्लोक ( Shlok ) 246 – 248
ततः संज्वलनक्रोधं महानायकमग्रहम्। मानमप्यस्य पाश्चात्यं मायां लोभं च बादरम् ॥२४६॥
प्रमृद्यैनान् महाध्यानरङ्गे चारित्रसद् ध्वजः । निशातज्ञाननिस्त्रिशो दयाकवचवर्मितः ॥२४७॥
जग्राह जयभूमि तामनिवृति महाभटः । भटानां ह्यनिवृत्तीनां परकीयं न चाग्रतः ॥२४८॥
तदनंतर सबसे मुख्य और सबके आगे चलने वाले संज्वलन क्रोध को, उसके बाद मान को, माया को और बादर लोभ को भी नष्ट किया था । इस प्रकार इन कर्मशत्रुओं को नष्ट कर महाध्यानरूपी रंगभूमि में चारित्ररूपी ध्वज फहराते हुए ज्ञानरूपी तीक्ष्ण हथियार बाँधे हुए और दयारूपी कवच को धारण किये हुए महायोद्धा भगवान् ने अनिवृत्ति अर्थात् जिससे पीछे नहीं हटना पड़े ऐसी नवम गुणस्थान रूप अनिवृत्ति नाम की जयभूमि प्राप्त की सो ठीक ही है क्योंकि पीछे नहीं हटने वाले शूर-वीर योद्धाओं के आगे शत्रु की सेना आदि नहीं ठहर सकती ।।246-248।।
Thereafter, they destroyed Samjvalana Krodha (the most intense form of anger), which was the foremost and most dominant, followed by pride (Māna), deceit (Māyā), and then gross greed (Bādara Lobha).
Thus, having annihilated these karmic enemies, the great warrior—the Lord—stood victorious in the grand battlefield of supreme meditation (Mahā-Dhyāna), raising the banner of pure conduct (Charitra). Armed with the sharp weapon of wisdom (Jñāna) and protected by the armor of compassion (Dayā), they rightfully attained the ninth stage of spiritual development (Anivṛtti), meaning a state of unwavering progress, from which there is no turning back.
And rightly so—because in the presence of fearless and resolute warriors, the army of enemies cannot stand its ground. ||246-248||
श्लोक ( Shlok ) 249
करणत्रययाथात्म्यब्यक्तयेऽर्थपदानि वै। ज्ञेयान्यमूनि सूत्रार्थसद्भावज्ञैरनुक्रमात् ॥२४९॥
अध:करण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण इन तीनों करणों का यथार्थ स्वरूप प्रकट करने के लिए आगम के यथार्थ भाव को जानने वाले गणधरादि देवों ने जो ये अर्थसहित पद कहे हैं वे अनुक्रम से जानने योग्य हैं अर्थात् उनका ज्ञान प्राप्त करना चाहिए ।।249।।
To reveal the true nature of Adhahkarana, Apurvakarana, and Anivrittikarana, the divine beings such as Ganadharas, who possess the true understanding of the scriptures (Agamas), have expressed these meaningful verses. These should be understood in their proper sequence, meaning one must attain the knowledge of them accordingly. ||249||
श्लोक ( Shlok ) 250 – 253
करणाः परिणामा ये विभक्ताः प्रथमक्षणे । ते भवेयुर्द्विती यस्मिन् क्षणेऽन्ये च पृथग्विधाः ॥२५०॥
द्वितीय क्षणसंबन्धिपरिणाम कदम्बकम् । तच्चान्यच्च तृतीये स्वादेवमाचरमक्षणात् ॥२५१॥
ततश्चाधः प्रवृत्ताख्यं करणं तनिरुच्यते। अपूर्वकरणेनैवं ते ह्यपूर्वाः प्रतिक्षणम् ॥ २५२॥
करणे त्वनिवृत्ता ख्ये न निवृत्ति रिहाङ्गिनाम् । परिणामैर्मिथस्ते हि समभावाः प्रतिक्षणम् ॥२५३॥
नाना जीवों की अपेक्षा अध:प्रवृत्तिकरण के प्रथम क्षण में जो परिणाम होते हैं वे ही परिणाम दूसरे क्षण में होते हैं तथा इसी दूसरे क्षण में पूर्व परिणामों से भिन्न और भी परिणाम होते हैं । इसी प्रकार द्वितीय क्षणसंबंधी परिणामों का जो समूह है वही तृतीय क्षण में होता है तथा उससे भिन्न जाति के और भी परिणाम होते हैं, यही क्रम चतुर्थ आदि अंतिम समय तक होता है इसीलिए इस करण का अधःप्रवृत्तिकरण ऐसा सार्थक नाम कहा जाता है । परंतु अपूर्वकरण में यह बात नहीं है क्योंकि वहाँ प्रत्येक समय अपूर्व ही परिणाम होते रहते हैं इसलिए इस करण का भी अपूर्वकरण यह सार्थक नाम है । अनिवृत्तिकरण में जीवों की निवृत्ति अर्थात् विभिन्नता नहीं होती क्योंकि इसके प्रत्येक क्षण में रहने वाले सभी जीव परिणामों की अपेक्षा परस्पर में समान ही होते हैं इसलिए इस करण का भी अनिवृत्तिकरण यह सार्थक नाम है ।।250-253।।
In relation to various living beings, the mental modifications (parināma) that occur in the first moment of Adhahpravrttikarana are the same as those in the second moment. However, in this second moment, in addition to the previous modifications, some new and distinct modifications also arise.
Similarly, the collective modifications of the second moment continue into the third moment, along with additional unique modifications. This sequential process continues from the fourth moment onward until the final stage. Due to this downward progression, this process is aptly named Adhahpravrttikarana (the stage of downward activity).
However, this pattern does not apply to Apurvakarana because, in this stage, at each moment, the modifications are entirely unprecedented (Apurva), meaning they have never occurred before. Hence, the name Apurvakarana (the stage of unprecedented activity) is meaningful.
In Anivrittikarana, there is no regression or variation among living beings. At each moment of this stage, the modifications of all beings remain uniform and identical. Therefore, this stage is aptly named Anivrittikarana (the stage of non-regression). ||250-253||
श्लोक 254 से 261
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241