आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
श्लोक 42 से 51 सजातीय विरोध और बाहुबली की भूमिका
पुरोहित कहते हैं कि सजातीय लोग भी बलवान की राह में बाधा बन सकते हैं, जैसे सूर्यकांत मणि सूर्य के सामने चमकती है। भरत के निन्यानबे भाई, विशेषकर बाहुबली, अहंकारवश केवल आदिनाथ को प्रणाम करने का निश्चय करते हैं। पुरोहित सुझाते हैं कि शीघ्र प्रतिकार आवश्यक है, क्योंकि शत्रु, ऋण, या अग्नि का छोटा अंश भी उपेक्षित नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं कि पृथिवी का शासन केवल भरत को करना चाहिए, न कि अनेक राजाओं को। यदि भाई आज्ञाकारी न हों, तो दूतों के माध्यम से या युद्ध द्वारा उन्हें वश में करना होगा।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
स्वपक्षैरेव तेजस्वी महानप्युपरुद्धयते। प्रत्यर्क मर्ककान्तेन ज्वलतेदमुदाहृतम् ॥४२।।
तेजस्वी पुरुष बड़ा होनेपर भी अपने सजातीय लोगों के द्वारा रोका जाता है यह बात सूर्यके सन्मुख जलते हुए सूर्यकान्त मणिके उदाहरणसे स्पष्ट है ।।४२।।
Even a radiant and mighty soul, upon rising to greatness, is restrained by his own kind—
Just as the blazing sunstone, though set afire by the sun itself, is subdued in the very presence of that celestial orb.Verse42
श्लोक ( Shlok ) 43
विबलोऽपि सजातीयो लब्ध्वा तीक्ष्णं प्रतिष्कसम् । दण्डः परश्वधस्येव निबर्हयति पार्थिवम्० ॥४३॥
सजातीय पुरुष निर्बल होनेपर भी किसी बलवान् पुरुष का आश्रय पाकर राजा का उस प्रकार नष्ट कर देता है जिस प्रकार निर्बल दण्ड कुल्हाड़ीका तीक्ष्ण आश्रय पाकर अपने सजातीय वृक्ष आदिको नष्ट कर देता है ॥४३॥
Even a feeble man, if he gains the support of one who is powerful, may bring about the ruin of a king—Just as a fragile wooden handle, finding strength in a sharp axe-head, fells trees that are its own kin.Verse 43
श्लोक ( Shlok ) 44
भ्रातरोऽमी तवाजय्या बलिनो मानशालिनः । “यवीयांस्तेषु धौरेयो धीरो बाहुबली बली ।॥४४॥
ये आपके बलवान् तथा अभिमानी भाई अजेय हैं और इनमें भी अतिशय युवा धीर वीर तथा बलवान् बाहुबली मुख्य है ।।४४।।
These mighty and proud brothers of yours are invincible;
And among them, the foremost is a youth of towering strength—steadfast, valiant, and endowed with formidable arms.Verse 44
श्लोक ( Shlok ) 45
एकान्नशत संख्यास्ते सोदर्या वीर्यशालिनः । प्रभोरादिगुरोर्नान्यं प्रणमाम इति स्थिताः ॥४५॥
आपके ये निन्यानबे भाई बड़े बलशाली हैं, हमलोग भगवान् आदिनाथको छोड़कर और किसीको प्रणाम नहीं करेंगे ऐसा वे निश्चय कर बैठे हैं ।।४५।।
Your ninety-nine brothers are men of great might,
And they have firmly resolved: “We shall bow to none but the Supreme Lord, Adinatha.”Verse 45
श्लोक ( Shlok ) 46
तदत्र प्रतिकर्त्तव्यम् माशु चक्रधर त्वया । ऋणव्रणाग्निशत्रूणां शेषं नोपेक्षते कृती ॥४६॥
इसलिये हे चक्रधर, आपको इस विषयमें शीघ्र ही प्रतिकार करना चाहिये क्योंकि बुद्धिमान् पुरुष ऋण, घाव, अग्नि और शत्रुके बाकी रहे हुए थोड़े भी अंशकी उपेक्षा नहीं करते हैं ।॥४६॥
Therefore, O Chakradhara, you must swiftly take countermeasures in this matter;For the wise do not neglect even the slightest remnant—be it of debt, wound, fire, or foe.Verse 46
श्लोक ( Shlok ) 47
राजन् राजन्वती भूयात् त्वयैवेयं वसुन्धरा । माभूद्राजवती तेषां भूम्ना द्वराजदुःस्थिताः ॥४७॥
हे राजन्, यह पृथिवी केवल आपके द्वारा ही राजन्वती अर्थात् उत्तम राजा से पालन की जानेवाली हो, आपके भाइयों के अधिक होनेसे अनेक राजाओंके सम्बन्धसे जिसकी स्थिति बिगड़ गई है ऐसी होकर राजवती अर्थात् अनेक साधारण राजाओंसे पालन की जानेवाली न हो। भावार्थ-जिस पृथिवीका शासक उत्तम हो वह राजन्वती कहलाती है और जिसका शासक अच्छा न हो, नाम मात्रका ही हो वह राजवती कहलाती है। पृथिवीपर अनेक राजाओंका राज्य होनेसे उसकी स्थिति छिन्न भिन्न हो जाती है इसलिये एक आप ही इस रत्नमयी वसुंधराके शासक हों, आपके अनेक भाइयोंमें यह विभक्त न होने पावे ॥४७॥
O King, let this earth be ruled by you alone—nurtured under the care of a sovereign truly worthy of the name.
Let it not fall into the hands of many, becoming rājavatī—a realm fragmented and governed by lesser lords—
For when ruled by one noble king, it is rājñvatī, graced by righteous dominion;
But when divided among many, even the jewel-like Earth descends into disarray.
Therefore, let this resplendent land remain undivided—may you alone reign over her, not your multitude of brothers.Verse 47
श्लोक ( Shlok ) 48
त्वयि राजनि राजोक्तिर्वेव नान्यत्र राजते। सिंहे स्थिते मृगेन्द्रोक्ति हरिणा बिभृयुः कथम् ॥४८॥
हे देव, आपके राजा रहते हुए राजा यह शब्द किसी दूसरी जगह सुशोभित नहीं होता सो ठीक ही है क्योंकि सिंह के रहते हुए हरिण मृगेन्द्र शब्दको किस प्रकार धारण कर सकते हैं ? ॥४८॥
O Lord, so long as you reign as king, the very title ruler finds no glory elsewhere—and rightly so;
For how can the timid deer ever bear the title lord of beasts while the lion still walks the earth?Verse 48
श्लोक ( Shlok ) 49
देव त्वामनुवर्तन्तां भ्रातरो धूतमत्सराः । ज्येष्ठस्य कालमुख्यस्य शास्त्रोक्तमनुवर्तनम् ॥४९॥
हे देव, आपके भाई ईर्ष्या छोड़कर आपके अनुकूल रहें क्योंकि आप उन सबमें बड़े हैं और इस कालमें मुख्य हैं इसलिये उनका आपके अनुकूल रहना शास्त्रमें कहा हुआ है ।।४९।।
O Lord, may your brothers forsake envy and remain in harmony with you,
For you are the eldest among them and the foremost in this age—
And thus, it is enjoined by scripture that they should stand aligned with you.Verse 49
श्लोक ( Shlok ) 50
तच्छासनहरा गत्वा सोपायमुपजप्य तान्। त्वदाज्ञानुवशान् कुर्युर्विगृह्य ब्रूयुरन्यथा ॥५०॥
आपके दूत जावें और युक्तिके साथ बातचीत कर उन्हें आपके आज्ञाकारी बनावें, यदि वे इस प्रकार आज्ञाकारी न हों तो विग्रह कर (बिगड़कर) अन्य प्रकार भी बातचीत करें ।॥ ५०॥
Let your envoys go forth and, with reasoned counsel, win them to your obedience;But if they refuse to submit through peaceful means, then let firm measures follow—Even conflict, if need be, to bring them to accord.Verse 50
श्लोक ( Shlok ) 51
मिथ्यामदोद्धतः कोऽपि नोपेयाद्यदि ते वशम् । स नाशयेद्वतात्मानमात्मगृह्यं च राजकम् ॥५१॥
मिथ्या अभिमानसे उद्धत होकर यदि कोई आपके वश नहीं होगा तो खेद है कि वह अपने आपको तथा अपने आधीन रहनेवाले राजाओंके समूहका नाश करावेगा ।।५१।।
Alas, if any—driven by false pride—refuses to come under your command,He shall bring ruin upon himself, and upon the host of kings who follow under his sway.Verse 51
श्लोक 52 से 61
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
Download PDF

