आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131 वन्य जीवन और विद्याधरियाँ
हाथी तालाबों में प्रवेश करते थे। सूर्य मणियों से आच्छादित होता था। वृक्ष फूलों से रोते से थे। हंस और मयूर शब्द करते थे। बादल हाथियों से युद्ध करते से थे। वायु से ढकी भूमि भ्रमरों से प्रकट होती थी। वन हाथियों और भ्रमरों से सुंदर था। विद्याधरियाँ जघनों से शोभायमान थीं। वन भ्रमरों से विद्याधरियों को बुलाते थे। अंधेरे में वे दीपक जलाती थीं।
English translation of Ādi purāṇa parv 19 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
सरस्तटं कलरुतसारसाकुलं वनद्विपे विशत्ति सितच्छदावली । नभोभिया समुपगतात्र लक्ष्यते नमः श्रियः पृथुतरहारयष्टिवत् ॥१२२॥
इधर मनोहर शब्द करते हुए सारस पक्षियों से व्याप्त तालाबों के किनारों पर ये जंगली हाथी प्रवेश कर रहे हैं जिससे ये हंसों की पंक्तियाँ श्रावण मास के डर से आकाश में उड़ी जा रही है और ऐसी दिखाई देती हैं मानो आकाशरूपी लक्ष्मी के हार की लड़ियाँ ही हों ।।122।।
“Here, these wild elephants are entering the banks of the ponds, which are filled with cranes, while producing a pleasant sound. Due to this, the rows of swans, fearing the Shravan month, are flying into the sky. They appear as if they are the strings of pearls in the necklace of the celestial goddess Lakshmi.”
श्लोक ( Shlok ) 123
क्वचिद्धरिम्म णितटरोचिषां चयैः परिष्कृतं वपुरिह तिग्मदीधितेः । सरोजिनी हरितपलाश शङ्कया नभश्चरे रुपतटमीक्ष्यते मुहुः ॥१२३॥
इधर यह सूर्य का बिंब हरे-हरे मणियों के बने हुए किनारों की कांति के समूह से आच्छादित हो गया है इसलिए ये विद्याधर इसे कमलिनी का हरा पत्ता समझकर पर्वत के इसी किनारे की ओर बार-बार देखते हैं ।।123।।
“Here, the disk of the sun is covered by the radiance of the green emerald-studded edges. Because of this, the Vidyadharas mistake it for the green leaf of a lotus and keep gazing repeatedly toward this edge of the mountain.”
श्लोक ( Shlok ) 124
क्वचिद्वन द्विरदकपोलघट्टनैः क्षतत्वचो वनतरवः सरस्तटे । रुदन्ति “नु च्युतकुसुमाश्रुबिन्दवो निलीनषट्पदकरुणस्वरान्विताम् ॥ १२४॥
कहीं पर सरोवर के किनारे जंगली हाथियों के कपोलों की रगड़ से जिनकी छाल गिर गयी है ऐसे वन के वृक्ष ऐसे जान पड़ते हैं मानो फूलरूपी आँसुओं की बूंदे डालते हुए और उनके भीतर बैठे हुए भ्रमरों की गुंजार के बहाने करुणाजनक शब्द करते हुए रो ही रहे हों ।।124।।
“Somewhere on the banks of the lake, the trees of the forest, whose bark has fallen off due to the rubbing of wild elephants’ cheeks, appear as if they are weeping—shedding tear-like drops in the form of flowers and producing sorrowful sounds through the humming of the bees sitting within them.”
श्लोक ( Shlok ) 125
इतः कलं कमलवनेषु रूयते मदोद्धुरध्वनिकलहंससारसैः । इतश्च कोकिलकलनादमूच्छितं मनोहरं शिखिविरुतं प्रतायते ॥१२५॥
इधर कमलवनों में मद के कारण जिनके शब्द उत्कट हो गये हैं ऐसे कलहंस और सारस पक्षी मधुर शब्द कर रहे हैं और इधर कोयलों के मनोहर शब्दों से बड़ा हुआ मयूरों का मनोहर शब्द विस्तृत हो रहा है ।।125।।
“Here, in the lotus groves, swans and cranes, whose calls have become intense due to intoxication, are singing melodiously. Meanwhile, the enchanting calls of peacocks, amplified by the sweet songs of cuckoos, are spreading far and wide.”
श्लोक ( Shlok ) 126
इतः शरद्घनघनकालमेघयोर्यदृच्छया वन इत्र संनिधिर्भवन् । मुखोन्मुखप्रहितकरः प्रवर्तते सितासितद्विरदनयोरयं रणः ॥ १२६॥
इधर इस वन में शरदऋतु के से सफेद बादल और वर्षाऋतु के से काले बादल स्वेच्छा से मिल रहे हैं और ऐसे जान पड़ते हैं मानो सफेद और काले दो हाथी एक-दूसरे के मुंह के सामने सूंड चलाते हुए युद्ध ही कर रहे हों ।।126।।
“Here in this forest, the white clouds of autumn and the dark clouds of the rainy season are freely merging together. They appear as if two elephants, one white and one black, are engaged in battle, waving their trunks at each other.”
श्लोक ( Shlok ) 127
वनस्थली मनिलविलोलित द्रुमाभिमामितः कुसुमरजोऽवगुण्ठिताम्। अलक्षिता मधिगम यत्यलिव्रजः समाव्रजन् परिमळलोलुपोऽभितः ॥१२७॥
इधर वायु से जिसके वृक्ष हिल रहे हैं और जो फूलों की पराग से बिल्कुल ढकी हुई है ऐसी यह वन की भूमि यद्यपि दिखाई नहीं दे रही है तथापि सुगंधि का लोलुपी और चारों ओर से आता हुआ यह भ्रमरों का समूह इसे दिखला रहा है ।।127।।
“Here, the land of the forest, where trees are swaying due to the wind and which is completely covered with pollen from the flowers, is not visible. However, the swarm of bees, attracted by the fragrance and coming from all directions, is revealing its presence.”
श्लोक ( Shlok ) 128
इतो वनं वनगजयूथसेवितं विभाव्यते मदजलसिक्तपादपम् । समापतन्मदकलभृङ्ग मालिकासमाकुलद्रुम “लतमन्तरा न्तरा ॥१२८॥
इधर, जो अनेक जंगली हाथियों के झुंडों से सेवित है जिसके वृक्ष उन हाथियों के मदरूपी जल से सींचे गये हैं और जिसके वृक्ष तथा लताएं बीच-बीच में पड़ते हुए और मद से मनोहर शब्द करते हुए भ्रमरों के समूह से व्याप्त हो रही हैं ऐसा यह वन कितना सुंदर सुशोभित हो रहा है ।।128।।
“Here, this forest, which is frequented by numerous herds of wild elephants, whose trees are nourished by the ichor flowing from these elephants, and whose trees and creepers are intermittently covered with swarms of bees humming melodiously in intoxication, appears incredibly beautiful and enchanting.”
श्लोक ( Shlok ) 129
इह खगवनिता नितान्तरम्याः सुरभिसरोजवना वनान्तवीथीः । परिहितरसनैः शनैः श्रयन्ते जितपुलिनैर्जघनैर्घनैः सुदत्यः ॥१२९॥
इधर, जो सुगंधित कमलों के वनों से सहित है और जो अतिशय मनोहर जान पड़ती है ऐसी इन वन की गलियों में ये सुंदर दाँतों वाली विद्याधरों की स्त्रियाँ करधनी पहने हुए और नदियों के किनारों के बालू के टीलों को जीतने वाले अपने बड़े-बड़े जघनों (नितंबों) से धीरे-धीरे जा रही हैं ।।129।।
“Here, in the forest paths adorned with fragrant lotus groves and appearing exceptionally enchanting, the Vidyadhara women, with their beautiful teeth, gracefully walk. Wearing jeweled girdles, they move slowly, their broad hips surpassing even the sand dunes along the riverbanks in grandeur.”
श्लोक ( Shlok ) 130
सरस किसलयप्रसूनक्लृप्तिं विततरिपूणि वनानि नूनमस्मिन् । द्रुतमित इत इत्यमूः खगस्त्रीरलिविरुतैरवि राममाह्वयन्ति ॥१३०॥
इधर, इस पर्वत पर के वन सरस पल्लव और पुष्पों की रचना मानो बाँट देना चाहते हैं इसीलिए वे भ्रमरों के मनोहर शब्दों के बहाने ‘इधर इस वृक्ष पर आओ, इधर इस वृक्ष पर आओ’ इस प्रकार निरंतर इन विद्याधरियों को बुलाते रहते हैं ।।130।।
“Here, the forests on this mountain seem eager to distribute their lush foliage and blossoms. That is why, through the enchanting hum of bees, they continuously call out to the Vidyadhara women, saying, ‘Come to this tree, come to this tree.’”
श्लोक ( Shlok ) 131
कुसुमितवनषण्डमध्यमेता तरुगहनेन घनीकृतान्धकारम् । ‘स्वतनुरुचिविधूतदृष्टिरोधाः खगवनिता बहुदीपिका विशन्ति ॥१३१॥
इधर वृक्षों की सघनता से जिसमें खूब अंधकार हो रहा है, ऐसे फूले हुए वन के मध्यभाग में अपने शरीर की कांति से दृष्टि को रोकने वाले अंधकार को दूर करती हुई ये विद्याधरियाँ साथ में अनेक दीपक लेकर प्रवेश कर रही हैं ।।131।।
“Here, in the midst of the dense forest, where deep darkness prevails due to the thick cluster of trees, these Vidyadhara women enter, carrying numerous lamps. The radiance of their bodies dispels the darkness that would otherwise hinder vision.”
श्लोक 132 से 141
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
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