आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
श्लोक 62 से 71 भरत की भगवान् वृषभदेव की स्तुति (भाग 4)
भरत भगवान् के अनंत बल और सम्यक्चारित्र की प्रशंसा करते हैं। उनका सुख विषय-कषाय से मुक्त है। वे उनके जन्म के चमत्कारों का वर्णन करते हैं और उन्हें सर्वगत, सनातन कहते हैं। उनकी भक्ति से प्रेरित होकर भरत स्तुति करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 24 – Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
विश्वं विजानतोऽपीश यचेनास्ता श्रमक्लमौ । अनन्तवीर्यताशक्तेस्तन्महात्म्यं परिस्फुटम् ॥६२॥
हे ईश, आप संसार के समस्त पदार्थों को जानते हैं फिर भी आपको कुछ भी परिश्रम और खेद नहीं होता है । यह आपके अनंत बल की शक्ति का प्रकट दिखाई देने वाला माहात्म्य है ।।62।।
“O Lord, You know all the substances of the universe, yet You experience neither effort nor distress. This is a manifest glory of the power of Your infinite strength.” ( 62)
श्लोक ( Shlok ) 63
रागादिचितकालुष्यव्यपायादुदिता तव । विरतिः सुखमात्मोत्थं व्यनक्त्यान्तन्तिकं विभो ॥६३ll
हे विभो, चित्त को कलुषित करने वाले राग आदि विभाव भावों के नष्ट हो जाने से जो आपके सम्यक्चारित्र प्रकट हुआ है वह आपके विनाशरहित और केवल आत्मा से उत्पन्न होने वाले सुख को प्रकट करता है ।।63।।
“O Lord, with the destruction of impurities like attachment and other defiling emotions, Your perfect conduct (Samyak Charitra) has manifested, revealing the bliss that arises solely from the pure, indestructible soul.” ( 63)
श्लोक ( Shlok ) 64
विरतिः सुखमिष्टं चेत् सुखं त्वय्येव केवलम् । नो चेन्नैवासुखं नाम किंचिदत्र जगत्त्र ये ॥६४॥
यदि विषय और कषाय से विरक्त होना ही सुख माना जाये तो वह सुख केवल आपमें ही माना जायेगा और यदि विषय कषाय से विरक्त न होने को सुख माना जाये तो फिर यही मानना पड़ेगा कि तीनों लोकों में दुःख है ही नहीं । भावार्थ―निवृति अर्थात् आकुलता के अभाव को सुख कहते हैं, विषयकषायों में प्रवृत्ति करते हुए आकुलता का अभाव नहीं होता इसलिए उनमें वास्तविक सुख नहीं है परंतु आप विषयकषायों से निवृत्त हो चुके हैं―आपकी तद्विषयक आकुलता दूर हो गयी है इसलिए वास्तविक सुख आप में ही है । यदि विषयवासनाओं में प्रवृत्ति करते रहने को सुख कहा जाये तो फिर सारा संसार सुखी ही सुखी कहलाने लगे क्योंकि संसार के सभी जीव विषयवासनाओं में प्रवृत्त हो रहे हैं परंतु उन्हें वास्तविक सुख प्राप्त हुआ नहीं मालूम होता इसलिए सुख का पहला लक्षण ही ठीक है और वह सुख आपको ही प्राप्त है ।।64।।
“If detachment from sensual pleasures and passions is considered true happiness, then such happiness can only be attributed to You. And if indulgence in sensual pleasures and passions is regarded as happiness, then it would imply that there is no suffering anywhere in the three worlds.
Explanation: True happiness is defined as the absence of restlessness or disturbance (Nivritti). While indulging in sensual pleasures and passions, restlessness persists, so real happiness cannot exist there. You have completely transcended attachment to sensual pleasures and passions—therefore, true bliss resides only within You. If engagement in worldly desires were true happiness, then all beings indulging in them would be considered happy, but that is evidently not the case. Hence, the first definition of happiness is correct, and such happiness is attained only by You.” (64)
श्लोक ( Shlok ) 65
प्रसन्नकलुषं तोयं यथेह स्वच्छतां व्रजेत् । मिथ्यात्वकर्दमापायाइक् शुद्धिस्ते तथा मता ॥६५॥
हे भगवन् जिस प्रकार कलुष―मल अर्थात् कीचड़ के शांत हो जाने से जल स्वच्छता को प्राप्त हो जाता है उसी प्रकार मिथ्यात्वरूपी कीचड़ के नष्ट हो जाने से आपका सम्यग्दर्शन भी स्वच्छता को प्राप्त हुआ है ।।65।।
“O Lord, just as water attains purity when the dirt or mud settles, similarly, Your Samyagdarshan (Right Perception) has attained perfect clarity upon the destruction of the mire of Mithyatva (False Belief).” ( 65)
श्लोक ( Shlok ) 66
सत्योऽपि लब्धयः शेषास्त्वयि नार्थक्रिया कृतः । कृतकृत्ये बहिर्द्रव्यसंबन्धो हि निरर्थकः ॥६६॥
हे देव, यद्यपि दान, लाभ आदि शेष लब्धियाँ आप में विद्यमान है तथापि वे कुछ भी कार्यकारी नहीं हैं क्योंकि कृतकृत्य पुरुष के बाह्य पदार्थों का संसर्ग होना बिल्कुल व्यर्थ होता है ।।66।।
“O Lord, although attributes like Giving (Dana), Gain (Labh), and other attainments still exist within You, they serve no functional purpose. For a perfected being (Kritakritya), association with external objects is entirely meaningless.” ( 66)
श्लोक ( Shlok ) 67
एवं प्राया गुणा नाथ भवतोऽनन्तधा मताः । तानहं लेशतोऽपीश न स्तोतुमलमल्प धीः ॥६७॥
हे नाथ, ऐसे-ऐसे आपके अनंतगुण माने गये हैं, परंतु हे ईश, अल्पबुद्धि को धारण करने वाला मैं उन सबकी लेशमात्र भी स्तुति करने के लिए समर्थ नहीं हूँ ।।67।।
O Lord, such are Your infinite virtues that have been acknowledged. But, O Divine One, I, possessing limited intellect, am not capable of praising even a fraction of them.” (67)
श्लोक ( Shlok ) 68
तदास्तां ते गुणस्तोत्रं नाममात्रं च कीर्तितम् । पुनाति नस्ततो देव त्वन्नामोद्दे शतः श्रिताः ॥६८॥
इसलिए हे देव, आपके गुणो का स्तोत्र करना तो दूर रहा, आपका लिया हुआ नाम ही हम लोगों को पवित्र कर देता है अतएव हम लोग केवल नाम लेकर ही आपके आश्रय में आये हैं ।।68।।
“Therefore, O Lord, far from being able to praise Your virtues, merely uttering Your name sanctifies us. Thus, we have sought refuge in You by simply taking Your name.” ( 68)
श्लोक ( Shlok ) 69
हिरण्यगर्भमाहुस्त्वां यत्तो वृष्टिर्हिरण्मयी । गर्भावतरणे नाथ प्रादुरासीत्तदाद्भुता ॥६९॥
हे नाथ, आपके गर्भावतरण के समय आश्चर्य करने वाली हिरण्यमयी अर्थात् सुवर्णमयी वृष्टि हुई थी इसलिए लोग आपको हिरण्यगर्भ कहते हैं ।।69।।
“O Lord, at the time of Your descent into the womb, there occurred a wondrous shower of golden rain; therefore, people refer to You as Hiranyagarbha (the Golden-Wombed).” (69)
श्लोक ( Shlok ) 70
वृषभोऽसि सुरैर्वृष्टरत्नवर्षः स्वसम्भवे । जन्माभिषिक्तये मेरुं मृष्टवान्वृषभोऽप्यसि ॥७०॥
आपके जन्म के समय देवों ने रत्नों की वर्षा की थी इसलिए आप वृषभ कहलाते हैं और जन्माभिषेक के लिये आप सुमेरुपर्वत को प्राप्त हुए थे इसलिये आप ऋषभ भी कहलाते हैं ।।70।।
“At the time of Your birth, the gods showered precious jewels, hence You are called Vrishabha (the Auspicious One). And because You reached Mount Sumeru for Your birth consecration, You are also known as Rishabha.” ( 70)
श्लोक ( Shlok ) 71
अशेषज्ञेयसंक्रान्तज्ञानमूर्तिर्यतो भवान् । अतः सर्वगतं प्राहुस्त्वां देव परमर्षयः ॥७१॥
हे देव, आप संसार के समस्त जानने योग्य पदार्थों को ग्रहण करने वाले ज्ञान की मूर्तिरूप हैं इसलिए बड़े-बड़े ऋषि लोग आपको सर्वगत अर्थात् सर्वव्यापक कहते हैं ।।71।।
“O Lord, You are the embodiment of knowledge that comprehends all knowable substances of the universe. Therefore, great sages refer to You as Sarvagata (All-Pervading).” ( 71)
श्लोक 72 से 81
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61