आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 61 समवसरण की शोभा और भक्ति का फल
उनकी उपासना करने वाले उनकी समानता प्राप्त करते हैं। समवसरण में अशोकवृक्ष, चमर, छत्र और सिंहासन उनकी शोभा बढ़ाते हैं। देवों के दुंदुभि उनके जयोत्सव की घोषणा करते हैं। पुष्पवर्षा और प्रभामंडल समवसरण को प्रभातमय बनाते हैं। उनके नखों की किरणें चरणों को कल्पवृक्ष की तरह सुशोभित करती हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 25 – Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
गुणिनं त्वामुपासीना निर्धूतगुण बन्धनाः । त्वया सारूप्य मायान्ति स्वामिच्छन्दं तु शिक्षितुः ॥५२॥
हे प्रभो, अन्य सब गुणरूपी बंधनों को छोड़कर केवल आपकी उपासना करने वाले गुणी पुरुष आपकी ही सदृशता प्राप्त हो जाते हैं सो ठीक ही है क्योंकि स्वामी के अनुसार चलना ही शिष्यों का कर्त्तव्य है ।।52।।
O Lord, it is only natural that virtuous beings who renounce all other bonds of qualities and devote themselves solely to your worship attain likeness to you. For, it is the duty of disciples to follow the path of their master. ॥52॥
श्लोक ( Shlok ) 53
अयं मन्दानिलोद्धतचलच्छाखाकरोत्करैः । श्रीमानशोकवृक्षस्ते नृत्यतीवात्तसम्मदः ॥५३॥
हे स्वामिन्, आपका यह शोभायमान अशोकवृक्ष ऐसा जान पड़ता है मानो मंद-मंद वायु से हिलती हुई शाखारूपी हाथों के समूहों से हर्षित होकर नृत्य ही कर रहा हो ।।53।।
O Lord, this radiant Ashoka tree of yours appears as if it is joyfully dancing, swayed by the gentle breeze, with its branch-like arms gracefully moving in delight. ॥53॥
श्लोक ( Shlok ) 54
चलत्क्षीरोदवीथीभिः स्पर्धा कर्तुमिवामितः। चामरौघाः पतन्ति त्वां मरुद्भिर्लींलया धुताः ॥५४॥
हे नाथ, देवों के द्वारा लीलापूर्वक धारण किये हुए चमरों के समूह आपके दोनों ओर इस प्रकार ढोरे जा रहे हैं मानो वे क्षीरसागर की चंचल लहरों के साथ स्पर्धा ही करना चाहते हों ।।54।।
O Lord, the clusters of fly-whisks gracefully waved by the gods on either side of you appear as if they are trying to compete with the playful, restless waves of the ocean of milk (Kshirasagar). ॥54॥
श्लोक ( Shlok ) 55
मुक्तालम्बनविभ्राजि भ्राजते विधुनिर्मलम् । छत्रत्रयं तवोन्मुक्तप्रारोहमिव खाङ्गणे ॥५५॥
हे भगवन्, चंद्रमा के समान निर्मल और मोतियों की जाली से सुशोभित आपके तीन छत्र आकाशरूपी आंगन में ऐसे अच्छे जान पड़ते हैं मानो उनमें अँकूरे ही उत्पन्न हुए हों ।।55।।
O Lord, your three parasols, pure like the moon and adorned with pearl nets, appear so splendid in the sky-like courtyard as if new sprouts have emerged from them. ॥55॥
श्लोक ( Shlok ) 56
सिंहेरूढं विभातीदं तव विष्टरमुच्चकैः । रत्नांशुभिर्भवत्स्पर्शान्मुक्तहर्षाङ्कुरैरिव ॥५६॥
हे देव, सिंहों के द्वारा धारण किया हुआ आपका यह ऊँचा सिंहासन रत्नों की किरणों से ऐसा सुशोभित हो रहा है मानो आपके स्पर्श से उसमें हर्ष के रोमांच ही उठ रहे हों ।।56।।
O Lord, your lofty throne, borne by lions and adorned with the rays of precious gems, appears so radiant as if, upon being touched by you, it is overwhelmed with joy, causing goosebumps of delight to arise. ॥56॥
श्लोक ( Shlok ) 57
ध्वनन्ति मधुरध्वानाः सुरदुन्दुभिकोटयः । घोषयन्त्य इवापूर्य रोदसी स्वज्जयोत्सवम् ॥५७॥
हे स्वामिन्, मधुर शब्द करते हुए जो देवों के करोड़ों दुंदुभि बाजे बज रहे हैं वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो आकाश और पाताल को व्याप्त कर आपके जयोत्सव की घोषणा ही कर रहे हों ।।57।।
O Lord, the millions of divine drums producing sweet sounds seem as if they are pervading the heavens and the netherworld, proclaiming the celebration of your victory. ॥57॥
श्लोक ( Shlok ) 58
तव दिव्यध्वनि धीरमनुकर्तुमिवोद्यताः । ध्वनन्ति सुरर्तूर्याणां कोटयोऽर्धत्रयोदश ॥५८॥
हे प्रभो, जो देवों के साढ़े बारह करोड़ दुंदुभि आदि बाजे बज रहे हैं वे आपकी गंभीर दिव्यध्वनि का अनुकरण करने के लिए ही मानो तत्पर हुए हैं ।।58।।
O Lord, the twelve and a half crore divine drums and other instruments played by the gods seem as if they are eager to imitate the profundity of your majestic, divine voice. ॥58॥
श्लोक ( Shlok ) 59
सुरैरियं नभोरङ्गात् पौष्पीवृष्टिर्वितन्तेय । तुष्टया स्वर्गलक्ष्म्येव चोदितैः कल्पशाखिभिः ॥५९॥
आकाशरूपी रंग-भूमि से जो देव लोग यह पुष्पों की वर्षा कर रहे हैं वह ऐसी जान पड़ती है मानो संतुष्ट हुई स्वर्गलक्ष्मी के द्वारा प्रेरित हुए कल्पवृक्ष ही वह पुष्पवर्षा कर रहे हों ।।59।।
The flowers being showered by the gods from the sky-like arena appear as if the wish-fulfilling trees (Kalpavrikshas), inspired by the satisfied Goddess of Heaven, are themselves performing this floral rain. ॥59॥
श्लोक ( Shlok ) 60
तव देहप्रभोत्सर्पः समाक्रामन्नभोऽभितः । शश्वत्प्रभातमास्थानी जनानां जनयत्यलम् ॥६०॥
हे भगवन्, आकाश में चारों ओर फैलता हुआ यह आपके शरीर का प्रभामंडल समवसरण में बैठे हुए मनुष्यों को सदा प्रभातकाल उत्पन्न करता रहता है अर्थात् प्रातःकाल की शोभा दिखलाता रहता है ।।60।।
O Lord, the radiant halo of your body, spreading all around in the sky, continually creates the beauty of dawn for the people seated in the Samavasarana, as if perpetually manifesting the brilliance of morning. ॥60॥
श्लोक ( Shlok ) 61
नखांशवस्तवाताम्राः प्रसरन्तिदिशास्वमी । त्वदङ्घ्रिकल्पवृक्षाग्रात् प्रारोहा इव निःसृताः ॥६१
हे देव, आपके नखों की ये कुछ-कुछ लाल किरणें दिशाओं में इस प्रकार फैल रही है मानो आपके चरणरूपी कल्पवृक्षों के अग्रभाग से अँकूरे ही निकल रहे हों ।।61।।
O Lord, the slightly reddish rays emanating from your nails spread across all directions, as if new sprouts are emerging from the tips of your wish-fulfilling tree-like feet. ॥61॥
श्लोक 62 से 71
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181 | श्लोक 182 से 186
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51