आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 |
श्लोक 142 से 151 पात्र और अपात्र का वर्णन
अपात्र को दान से कुभोगभूमि मिलती है। अपात्र दान को दूषित करता है। गुणों से युक्त ही पात्र होता है। दोषवान पात्र संसार से पार नहीं कर सकता। मुनिराज ही उत्तम पात्र हैं। श्रेयान्स ने दान से पंचाश्चर्य प्राप्त किए। उसने भरत को दान देने की प्रेरणा दी।
English translation of Ādi purāṇa parv 20 – Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
कुमानु षत्वमाप्नोति जन्तुर्ददरपात्र के । अशोधितिमिवालाबु तद्धि दानं प्रदूषयेत् ॥१४२।।
जो मनुष्य अपात्र के लिए दान देता है वह कुमनुष्य योनि (कुभोगभूमि) में उत्पन्न होता है क्योंकि जिस प्रकार बिना शुद्धि की हुई तूंबी अपने में रखे हुए दूध आदि को दूषित कर देती है उसी प्रकार अपात्र अपने लिए दिये हुए दान को दूषित कर देता है ।।142।।
“A person who gives charity to an unworthy recipient (Apātra) is reborn in a lower realm (Kubhoga-bhūmi).
Just as an unclean vessel (Tūmbī) contaminates the milk or other substances stored in it, similarly, an unworthy recipient taints the merit of the charity given to them.” ( 142)
श्लोक ( Shlok ) 143
आमपात्रे ययाक्षिप्तं मङ्क्षु क्षीरादि नश्यति । अपात्रेऽपि तथा दत्तं तद्धि स्वं तच्च नाशयेत् ।१४३।।
जिस प्रकार कच्चे बरतन में रखा हुआ ईख का रस अथवा दूध स्वयं नष्ट हो जाता है और उस बरतन को भी नष्ट कर देता है उसी प्रकार अपात्र के लिए दिया हुआ दान स्वयं नष्ट हो जाता है―व्यर्थ जाता है और लेने वाले पात्र को भी नष्ट कर देता है―अहंकारादि से युक्त बनाकर विषय-वासनाओं में फँसा देता है ।।143।।
“Just as sugarcane juice or milk kept in an unbaked clay pot gets spoiled on its own and also ruins the pot itself,
Similarly, charity given to an unworthy recipient goes to waste and also harms the recipient, leading them to pride, indulgence, and material desires.” ( 143)
श्लोक ( Shlok ) 144
पात्रं तत्पात्र वज्ज्ञेयं विशुद्धगुणधारणात् । यानपात्रमिवाभीष्टदेशे संप्रापकं च यत् ।।१४४।।
जो अनेक विशुद्ध गुणों को धारण करने से पात्र के समान हो वही पात्र कहलाता है । इसी प्रकार जो जहाज के समान इष्ट स्थान में पहुंचाने वाला हो वही पात्र कहलाता है ।।144।।
“The one who possesses numerous pure virtues is considered a worthy recipient (pātra).
Similarly, just as a ship safely carries one to the desired destination, a true recipient of charity helps in leading the donor towards spiritual upliftment and ultimate liberation.” ( 144)
श्लोक ( Shlok ) 145
न हि लोहमयं यानपात्रमुत्तारयेत् परम् । तथा कर्मभराक्रान्तो दोषवान्नैव तारकः ॥१४५॥
जिस प्रकार लोहे की बनी हुई नाव समुद्र से दूसरे को पार नहीं कर सकती (और न स्वयं ही पार हो सकती है) इसी प्रकार कर्मों के भार से दबा हुआ दोषवान् पात्र किसी को संसार-समुद्र से पार नहीं कर सकता (और न स्वयं ही पार हो सकता है) ।।145।।
“Just as an iron boat cannot cross the ocean (neither for itself nor for others), similarly, a recipient burdened by karmic faults cannot help others cross the ocean of worldly existence, nor can they liberate themselves.” ( 145)
श्लोक ( Shlok ) 146 –148
ततः परमनिर्वाणसाधनं रूपमुद्वहन् । कायस्थित्यर्थमाहारमिच्छन् ज्ञानादिसिद्धये ।।१४६।।
न वाञ्छन् बलमायुर्वा स्वादं या देहपोषणम् । केवलं प्राणधृत्यर्थ संतुष्टो ग्रासमात्र या ।।१४७।।
पात्रं भवेद् गुणैरेभिर्मुनिः स्वपरतारकः। तस्मै दत्तं पुना त्यन्नमपुनर्जन्मकारणम् ॥१४८॥
इसलिए, जो मोक्ष के साधनस्वरूप दिगंबर वेष को धारण करते हैं, जो शरीर की स्थिति और ज्ञानादि गुणों की सिद्धि के लिए आहार की इच्छा करते हैं, जो बल, आयु, स्वाद अथवा शरीर को पुष्ट करने की इच्छा नहीं करते, जो केवल प्राण धारण करने के लिए थोड़े से ग्रासों से ही संतुष्ट हो जाते हैं, और जो निज तथा पर को तारने वाले हैं ऐसे ऊपर लिखे हुए गुणों से सहित मुनिराज ही पात्र हो सकते हैं उनके लिए दिया हुआ आहार अपुनर्भव अर्थात् मोक्ष का कारण है ।।146-148।।
“Therefore, the true worthy recipient is the ascetic monk who adopts the path to liberation, wearing the Digambara attire as a symbol of detachment. Such monks seek alms not for strength, longevity, taste, or bodily nourishment, but solely to sustain life and support the pursuit of spiritual knowledge. They remain content with a few morsels of food, desiring nothing beyond the bare necessities. Since they strive for their own liberation as well as the liberation of others, offering food to such monks becomes a cause for ultimate liberation (Apunarbhava – freedom from rebirth).” (146-148)
श्लोक ( Shlok ) 149
तदुदाहरणं पृष्ट मिदमेव महोदयम्। महत्त्वे दानपुण्यस्य पञ्चाश्चर्यमिहापि यत् ।।१४९॥
दानरूपी पुण्य के माहात्म्य को प्रकट करने के लिए सबसे बड़ा और पुष्ट उदाहरण यही है कि मैंने दान के माहात्म्य से ही पंचाश्चर्य प्राप्त किये हैं ।।149।।
“The greatest and most compelling example of the glory of charity (daan) is this: It is solely due to the power of charity that I have attained five extraordinary wonders (Panchashcharya).” ( 149)
श्लोक ( Shlok ) 150
ततो भरत राजर्षे दानं देयमनुत्तरम् । प्रसरिष्यन्ति पात्राणि भगवत्तीर्थसंनिधौ ॥१५०॥
इसलिए हे राजर्षि भरत, हम सबको उत्तम दान देना चाहिए । अब भगवान् वृषभदेव के तीर्थ के समय सब जगह पात्र फैल जायेंगे । भावार्थ―भगवान के सदुपदेश से अनेक मनुष्य मुनिव्रत धारण करेंगे, उन सभी के लिए हमें आहार आदि दान देना चाहिए ।।150।।
“Therefore, O Rajarsi Bharat, we all must give the highest form of charity (daan). Now, with the establishment of Lord Rishabhdev’s Tirtha, worthy recipients (pātras) will spread everywhere.
Meaning: Due to Lord Rishabhdev’s divine teachings, many people will embrace the path of monkhood (muni-vrata). Hence, we must offer them food and other forms of charity.” (150)
श्लोक ( Shlok ) 151
तेभ्यः श्रेयान् यथाचख्यौ स्व भर्तृभवविस्तरम् । ततः सदस्या स्ते सर्वे सद्दानरुचयोऽभवन् ।।१५१॥
राजकुमार श्रेयान्स ने उन सब सदस्यों के लिए अपने स्वामी भगवान् वृषभदेव के पूर्वभव विस्तार के साथ कहे जिससे उन सबके उत्तम दान देने में रुचि उत्पन्न हुई थी ।।151।।
“Prince Shreyans narrated in detail the past lives of his revered master, Lord Rishabhdev, to all those present. As a result, they all developed a keen interest in offering the highest form of charity (daan).” (151)
श्लोक 152 से 161
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 |