आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31 दूत का प्रस्थान और मार्ग
दूत अपने सेवक और सामग्री के साथ बाहुबली के पोदनपुर नगर की ओर प्रस्थान करता है। वह मार्ग में यह विचार करता है कि यदि बाहुबली शांतिपूर्ण बात करेगा तो वह भी अनुकूल रहेगा, और यदि युद्ध की बात करेगा तो वह शांति का प्रयास करेगा। दूत पोदनपुर के समीप पहुंचकर वहां के धान के खेतों, किसानों, और मनोहर दृश्यों को देखकर आनंदित होता है। वह खेतों की रक्षा करती स्त्रियों और तोतों को भगाने की उनकी क्रिया को देखता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
आत्मनेव द्वितीयेन स्निग्वेनानुगतो द्रुतम्। निजानु जीविलोकेन हस्तशम्बल वाहिना ॥२२॥
जिसने मार्ग में काम आने-वाली भोजन आदिकी समस्त सामग्री अपने साथ ले रखी है और जो प्रेम करनेवाला है ऐसे अपने ही समान एक सेवक से अनुगत होकर वह दूत वहाँसे शीघ्र ही चला ॥ २२॥
Bearing with him all provisions needed for the journey—nourishment and sustenance alike—and accompanied by a loyal servant akin to himself,the messenger set forth swiftly from that place, moved by affection and purpose.Bearing with him all provisions needed for the journey—nourishment and sustenance alike—and accompanied by a loyal servant akin to himself,the messenger set forth swiftly from that place, moved by affection and purpose. 22
श्लोक ( Shlok ) 23
सोऽन्वीपं वक्ति चेदेवम् अहं ब्रूयामकत्थनः। विगृह्य यदि स ब्रूयाद् विरहं विग्रहे घटे ॥२३॥
वह दूत मार्गमें विचार करता जाता था कि यदि वह अनुकूल बोलेगा तो मैं भी अपनी प्रशंसा किये बिना ही अनुकूल बोलूंगा और यदि वह विरुद्ध होकर युद्धकी बात करेगा तो मैं युद्ध नहीं होने के लिये उद्योग करूँगा ।।२३।।
As he journeyed, the messenger pondered thus: If he speaks favorably, then I too shall respond with praise unspoken yet understood;but if he speaks in opposition, invoking war, I shall strive with all means to avert the conflict.23
श्लोक ( Shlok ) 24
सन्धि च पणबन्धं च कुर्यात् सोऽन्तरमेव नः। विक्रम्य” क्षिप्रमेप्यामि विजिगीषावसंगते ॥२४।।
यदि वह सन्धि अथवा पणबन्ध (कुछ भेंट देना आदि) करना चाहेगा तो मेरा यह अन्तरङ्ग ही है अर्थात् में भी यही चाहता हूँ, इसके सिवाय यदि वह चक्रवर्तीको जीतनेकी इच्छा करेगा तो मैं भी कुछ पराक्रम दिखाकर शीघ्र वापिस लौट आऊँगा ।। २४।।
Should he desire peace or to bind a pact—be it through gifts or solemn vows—this is my inner resolve: I too am inclined thus.
But if he seeks to vanquish the Emperor, then I shall display valor in kind and swiftly return.24
श्लोक ( Shlok ) 25 –26
गुणयन्निति सम्पत्तिविपत्ती स्वान्यपक्षयोः । स्वयं निगूढमन्त्रत्वाद निर्भेद्योऽन्यमन्त्रिभिः ॥२५॥मन्त्रभेदभयाद् गूढं स्वपन्नेकः प्रयाणके। युद्धापसारभूमीश्च स पश्यन् दूरमत्यगात् ॥२६॥
इस प्रकार जो अपने पक्षकी सम्पत्ति और दूसरेके पक्षको विपत्तिका विचार करता जाता था, जो अपने मन्त्रको छिपाकर रखनेसे दूसरे मन्त्रियों के द्वारा कभी फोड़ा नहीं जा सकता था और जो मन्त्रभेदके डरसे पड़ावपर किसी एकान्त स्थानमें गुप्त रीतिसे शयन करता था ऐसा वह दूत युद्ध करने तथा उससे निकलनेकी भूमियोंको देखता हुआ बहुत दूर निकल गया ।। २५-२६॥
Thus, he who pondered deeply upon the wealth of his own side and the calamities that might befall the other,he who guarded his counsel so securely that no rival adviser could ever breach it,and who, fearing betrayal of secrets, would rest in secluded quarters under a veil of utmost secrecy—this very envoy, keenly surveying the grounds of battle and retreat, ventured far and wide on his mission.25 –26
श्लोक ( Shlok ) 27
क्रमेण देशान् सिन्धुश्च देशसन्धींश्च” सोऽतियन्। प्रापत् सङ्ख्यातरात्रैस्तत् पुरं पोदन साह्वयम् ॥२७॥
क्रम क्रमसे अनेक देश, नदी और देशोंकी सीमाओंका उल्लंघन करता हुआ वह दूत बाहुबली के पोदनपुर नामक नगर में जा पहुँचा ॥ २७।।
Traversing, step by step, many lands and rivers, breaching the borders of diverse realms,the messenger at last arrived at the city of Podanapura, the stronghold of Bāhubalī.27
श्लोक ( Shlok ) 28
बहिःपुरमथासाद्य रम्याः सस्यवतीर्भुवः । पक्वशालिवनोद्देशान् स पश्यन् प्राप नन्दथुम् ॥२८॥
नगरके बाहर धानोंसे युक्त मनोहर पृथिवी को पाकर और पके हुए चावलोंके खेतोंको देखता हुआ वह दूत बहुत ही आनन्दको प्राप्त हुआ था ॥२८॥
Beholding the land adorned with abundant grainfields beyond the city walls, and gazing upon the ripe paddy fields,the messenger was filled with profound joy and delight.28
श्लोक ( Shlok ) 29
पश्यन् स्तम्बकरिस्तम्बान् प्रभूतफल “शालिनः । कृतरक्षान् जनैर्यत्नात् स मेने रवार्थिनं जनम् ॥२९॥
जो बहुतसे फलोंसे शोभायमान हैं और किसानोंके द्वारा बड़े यत्नसे जिनकी रक्षा की जा रही है ऐसे धानके गुच्छोंको देखते हुए दूतने मनुष्योंको बड़ा स्वार्थी समझा था ।।२९।।
Gazing upon the clusters of rice—resplendent with myriad grains and carefully tended by diligent farmers—the messenger conceived a view of mankind as deeply self-interested and driven by desire.29
श्लोक ( Shlok ) 30
सकुटुम्बिभिरुद्दात्रैः नृत्यद्भिरभिनन्दितान् । केदारलाव सङ्घर्ष तूर्यघोषान्न्यशा मयत् ।।३०।।
जो खेतोंको देखकर आनन्दसे नाच रहे हैं और खेत काटने के लिये जिन्होंने हँसिया ऊँचे उठा रखेहैं ऐसे कुटुम्ब सहित किसानोंके द्वारा प्रशंसनीय, खेत काटने के संघर्षके लिये बजती हुई तुरई-के शब्दोंको भी वह दूत सुन रहा था ।। ३० ।।
He beheld the farmers, joyous and dancing in the fields, their sickles raised high in readiness to reap the harvest;and with their families gathered, he heard the resounding blasts of the trumpet, heralding the noble toil of the harvest struggle.
श्लोक ( Shlok ) 31
क्वचिच्छुक मुखाकृष्टकणाः कणिशमञ्जरीः । शालिवप्रेषु सोऽपश्यद् विटैर्भुक्ता इव स्त्रियः ॥३१॥
कहीं धानके खेतोंमें वह दूत जिनके कुछ दाने तोताओं ने अपने मुखसे खींच लिये हैं ऐसी बालोंके समूह इस प्रकार देखता था मानो विट पुरुषोंके द्वारा भोगी हुई स्त्रियां ही हों ।॥३१॥
In some of the rice fields, the messenger observed clusters of grains plucked by parrots’ beaks,and in his gaze, these tufts appeared as if they were women, once cherished by noble heroes of yore.31
श्लोक 32 से 44
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
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