आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
श्लोक 162 से 172 भरत और अन्य की प्रबुद्धता
तत्त्व सुनकर भरत आनंदित होते हैं और सम्यग्दर्शन व अणुव्रत ग्रहण करते हैं। वे गुरुदेव से प्रबुद्ध होकर शोभित होते हैं। सभा धर्मामृत से संतुष्ट होती है। वृषभसेन दीक्षा लेकर प्रथम गणधर बनते हैं। अन्य राजा और राजकन्याएँ भी दीक्षा लेते हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 24 – Shlok 162 to 172
श्लोक ( Shlok ) 162
श्रुत्वेति तत्वसद्भावं गुरोः परमपूरुषात् । प्रह्लादं परमं प्राप भरतो भक्ति निर्भरः ॥१६२॥
इस प्रकार जगद्गुरु-परमपुरुष भगवान् वृषभदेव से तत्त्वों का स्वरूप सुनकर भक्ति से भरे हुए महाराज भरत परम आनंद को प्राप्त हुए ।।162।।
In this way, after listening to the true nature of the Tattvas (fundamental principles) from the Jagadguru (Universal Teacher), the Supreme Being Lord Vrishabha Deva, King Bharata, filled with devotion, attained supreme bliss. — 162.
श्लोक ( Shlok ) 163
ततः सम्यक्त्वशुद्धिं च व्रतशुद्धिं च पुष्कलाम् । निष्क’ ‘लाद्भरतो भेजे परमानन्दमुद्वहन् ॥१६३॥
तदनंतर परम आनंद को धारण करते हुए भरत ने निष्फल अर्थात् शरीरानुराग से रहित भगवान वृषभदेव से सम्यग्दर्शन की शुद्धि और अणुव्रत की परम विशुद्धि को प्राप्त किया ।।163।।
Thereafter, filled with supreme bliss, Bharata—free from worldly attachment and devoid of bodily affection—attained the purity of Right Faith (Samyagdarshan) and the supreme purity of Anuvratas (minor vows) from Lord Vrishabha Deva. — 163.
श्लोक ( Shlok ) 164
प्रबुद्धो मानसीं शुद्धिं परमां परमर्षितः । संप्राप्य भरतो रेजे शरदीवाम्बुजाकरः ॥१६४॥
जिस प्रकार शरद्ऋतु में प्रबुद्ध अर्थात् खिला हुआ कमलों का समूह सुशोभित होता है उसी प्रकार महाराज भरत परम भगवान् वृषभदेव से प्रबुद्ध होकर― तत्त्वों का ज्ञान प्राप्त कर मन की परम विशुद्धि को प्राप्त हो अतिशय सुशोभित हो रहे थे ।।164।।
Just as a cluster of fully bloomed lotuses appears splendid in the autumn season, in the same way, King Bharata, having been enlightened by the supreme Lord Vrishabha Deva—attaining knowledge of the Tattvas and the utmost purity of mind—was radiantly glorious. — 164.
श्लोक ( Shlok ) 165
स लेभे गुरुमाराध्य सभ्यग्दर्शननायकाम् । व्रतशीलावली मुक्तेः कण्ठिकामिव निर्मलाम् ॥१६५॥
भरत ने, गुरुदेव की आराधना कर, जिसमें सम्यग्दर्शनरूपी प्रधान मणि लगा हुआ है और जो मुक्तिरूपी लक्ष्मी के निर्मल कंठहार के समान जान पड़ती थी ऐसी व्रत और शीलों की निर्मल माला धारण की थी । भावार्थ―सम्यग्दर्शन के साथ पाँच अणुव्रत और सात शीलव्रत धारण किये थे तथा उनके अतिचारों का बचाव किया था ।।165।।
Having worshiped his Gurudeva, Bharata adorned himself with the pure garland of vows and virtues, which appeared like the pristine necklace of Liberation adorned with the chief gem of Right Faith (Samyagdarshan).
Explanation: This means Bharata embraced the Five Anuvratas (minor vows) and Seven Shilavratas (supplementary vows) along with guarding against their violations. — 165.
श्लोक ( Shlok ) 166
दिदीपे लब्धसंस्कारो गुरुतो भरतेश्वरः । यथा महाकरोद्भूतो मणिः संस्कारयोगतः ॥ १६६॥
जिस प्रकार किसी बड़ी खान से निकला हुआ मणि संस्कार के योग से दैदीप्यमान होने लगता है उसी प्रकार महाराज भरत भी गुरुदेव से ज्ञानमय संस्कार पाकर सुशोभित होने लगे थे ।।166।।
Just as a gem extracted from a great mine begins to shine brilliantly through proper refinement, in the same way, King Bharata, having received the knowledge-filled refinement from his Gurudeva, began to shine gloriously. — 166.
श्लोक ( Shlok ) 167
‘त्रिदशासुरमर्त्यानां सा सभा समुनीश्वरा । पीतसद्धर्मपीयूषा परामाप धृर्तिं तदा ॥१६७॥
उस समय मुनियों से सहित वह देव-दानव और मनुष्यों की सभा उत्तम धर्मरूपी अमृत का पान कर परम संतोष को प्राप्त हुई थी ।।167।।
At that time, the assembly of gods, demons, and humans, along with the monks, attained supreme satisfaction by drinking the excellent nectar of righteousness (Dharma). — 167.
श्लोक ( Shlok ) 168
घनध्वनिमिव श्रुत्वा विभोर्दिव्यध्वनिं तदा । चातका इव भव्यौघाः परं प्रमदमाययुः ॥१६८॥
जिस प्रकार मेघों की गर्जना सुनकर चातक पक्षी परम आनंद को प्राप्त होते हैं उसी प्रकार उस समय भगवान् की दिव्यध्वनि सुनकर भव्य जीवों के समूह परम आनंद को प्राप्त हो रहे थे ।।168।।
Just as the Chatak birds attain supreme joy upon hearing the thunder of clouds, in the same way, at that time, the groups of worthy souls (Bhavya Jeevas) were experiencing great bliss upon hearing the divine speech of the Lord. — 168.
श्लोक ( Shlok ) 169
दिव्यध्वनिमनुश्रुत्य जलदस्त नितोपमम् । अशोकविटपारूढाः सस्वनुर्दिव्यबर्हिणः ॥१६९॥
मेघ की गर्जना के समान भगवान् की दिव्यध्वनि को सुनकर अशोकवृक्ष की शाखाओं पर बैठे हुए दिव्य मयूर भी आनंद से शब्द करने लग गये थे ।।169।।
Upon hearing the Lord’s divine speech, which was like the rumbling of clouds, the celestial peacocks sitting on the branches of the Ashoka trees also began to joyfully call out. — 169.
श्लोक ( Shlok ) 170
सप्तार्चिषमिवासाद्यं तं त्रातारं प्रभास्वरम् । विशुद्धिं भव्यरत्नानि भेजुर्दिव्य प्रभा स्वरम् ॥१७०॥
सबकी रक्षा करने वाले और अग्नि के समान दैदीप्यमान भगवान् को प्राप्त कर भव्य जीवरूपी रत्न दिव्यकांति को धारण करने वाली परम विशुद्धि को प्राप्त हुए थे ।।170।।
The auspicious souls, like precious gems, attained supreme purity and divine radiance upon reaching the all-protecting and blazing Lord, shining like fire. — 170.
श्लोक ( Shlok ) 171 – 172
योऽसौ पुरिमतालेशो भरतस्यानुजः कृती । प्राज्ञः शूरः शुचिर्धीरो धौरेयो मानशालिनाम् ॥१७१॥
श्रीमाम् वृषभसेनाख्यः प्रज्ञापारमितो वशी । स संबुध्य गुरोः पार्श्वें दीक्षित्वाभूद् गणाधिपः ॥१७२॥
उसी समय जो पुरिमताल नगर का स्वामी था, भरत का छोटा भाई था, पुण्यवान्, विद्वान्, शूर-वीर, पवित्र, धीर, स्वाभिमान करने वालों में श्रेष्ठ, श्रीमान्, बुद्धि के पार को प्राप्त―अतिशय बुद्धिमान् और जितेंद्रिय था तथा जिसका नाम वृषभसेन था उसने भी भगवान् के समीप संबोध पाकर दीक्षा धारण कर ली और उनका पहला गणधर हो गया ।।171-172।।
At that time, the ruler of Purimtal city, Bharat’s younger brother named Vrishabsen—who was virtuous, learned, brave, pure, patient, supreme among the proud, wealthy, exceptionally wise, possessing immense intellect, and master of his senses—also attained enlightenment near the Lord, accepted initiation, and became His first Ganadhara (chief disciple). — 171-172.
श्लोक 173 से 181
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161