आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141
श्लोक 142 से 151 श्रुतज्ञान और तप की साधना
राजकुमारों ने द्वादशांग श्रुतस्कंध के अध्ययन से गहन ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने अन्तःकृत और अनुत्तर विमानौपपादिक अंगों से तीर्थंकरों के उपसर्गों और अनुत्तर विमानों में उत्पन्न मुनियों का वृत्तांत जाना। प्रश्नव्याकरण से जीवों के सुख-दुख का वर्णन, विपाकसूत्र से कर्मों की प्रकृतियों का ज्ञान, और दृष्टिवाद से दृष्टि के भेद समझकर वे जैन शास्त्रों में भक्ति और तीव्र तप में लीन हो गए। चौदह पूर्वों का अध्ययन कर वे श्रुतज्ञान से विशुद्ध तप करने लगे। ग्रीष्म में सूर्य की तपन सहते हुए वे आतापन योग में तप करते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
तथान्तकृद्दशादङगात् मुनीनन्तकृतो दश । तीर्थ प्रति विदामासुः सोढा सह्योपसर्गकान् ॥१४२ll
उन्होंने अन्तःकृत नामके दशवें अङ्गसे प्रत्येक तीर्थवारके तीर्थमें असह्य उपसर्गोको जीतकर मुक्त होनेवाले दश अन्तःकृत मुनियों का वृत्तान्त जान लिया था ।।१४२॥
Through the study of the tenth limb, Antaḥkṛta, they learned the stories of the ten Antaḥkṛta monks, who, having conquered the insurmountable obstacles at each pilgrimage site, attained liberation.142
श्लोक ( Shlok ) 143
अनुत्तरविमानौपपादिकान्दश तादृशान् । शमिनो नवमादङगाद् विदाञ्चविदाम्बराः ॥१४३॥
जाननेवालोंमें श्रेष्ठ उन राजकुमारोंने अनुत्तर विमानौपपादिक नामके नौवें अङ्गसे प्रत्येक तीर्थ करके तीर्थमें असह्य उपसर्ग जीतकर अनुत्तर विमानोंमें उत्पन्न होनेवाले दश-दश मुनियोंका हाल जान लिया था ।। १४३।।
The princes, foremost among the knowers, through the study of the ninth limb, Anuttara Vimāna-uppāda, learned the accounts of the ten monks, born in the supreme celestial abodes, who, by overcoming the insurmountable obstacles at each pilgrimage site, attained liberation.143
श्लोक ( Shlok ) 144
प्रश्न व्याकरणात्प्रश्नमुपादाय शरीरिणाम् । सुखदुःखादिसम्प्राप्ति व्याचक्रुस्ते समाहिताः ॥१४४।॥
वे स्थिर चित्त-वाले मुनिराज प्रश्नव्याकरण नामके दशवें अङ्गसे प्रश्न समझकर जीवोंके सुख-दुःख आदिका वर्णन करने लगे ।।१४४।॥
The steadfast-minded monks, through the study of the tenth limb, Praśnavyākaraṇa, began to explain the questions of existence, narrating the joys and sorrows of living beings with deep understanding.144
श्लोक ( Shlok ) 145
विपाकसूत्रनिर्जातसदसत्कर्मपङक्तयः । बद्धकक्षास्तदुच्छित्तौ तपश्चक्रुरतन्द्रिताः ॥१४५॥
विपाकसूत्र नामके ग्यारहवें अङ्गसे जिन्होंने कर्मोंकी शुभ-अशुभ समस्त प्रकृतियाँ जान ली हैं ऐसे वे मुनि कर्मोंका नाश करनेके लिये तत्पर हो प्रमाद छोड़कर तीव्र तपश्चरण करते थे ।। १४५।।
Through the study of the eleventh limb, Vipāka-sūtra, those monks, who had discerned the entire spectrum of karmic nature—both auspicious and inauspicious—diligently practiced intense austerities, shedding all negligence, in their fervent pursuit to eradicate karma.145
श्लोक ( Shlok ) 146
दृष्टिवादेन निर्शातदृष्टिभेदा जिनागमे । ते तेनुः परमां भक्ति परं संवेगमाश्रिताः ॥१४६॥
दृष्टिवाद नामके बारहवें अङ्गसे जिन्होंने समस्त दृष्टिके भेद जान लिये हैं ऐसे वे राजकुमार परम संवेगको प्राप्त होकर जैनशास्त्रोंमें उत्कृष्ट भक्त्ति करने लगे थे ।।१४६।।
Through the study of the twelfth limb, Dṛṣṭivāda, those princes, having understood the various distinctions of perception, attained supreme devotion and began to practice the highest form of worship in the Jain scriptures.146
श्लोक ( Shlok ) 147
तदन्तर्गत निःशेषश्रुततत्त्वावधारिणः । चतुर्दशमहाविद्यास्थानान्यध्यैषत क्रमात् ॥१४७।।
उस बारहवें अङ्गके अन्तर्गत समस्त श्रुतज्ञानके रहस्यका निश्चय करनेवाले उन मुनियोंने क्रमसे चौदह महा विद्याओंके स्थान अर्थात् चौदह पूर्वो का भी अध्ययन किया था ।।१४७।।
Under the twelfth limb, those monks, who had ascertained the mysteries of all scriptural knowledge, also studied in succession the fourteen great sciences, the Chaudāśa Pūrvas, with profound understanding.147
श्लोक ( Shlok ) 148
ततोऽमी श्रुतनिःशेषश्रुतार्थाः श्रुतचक्षुषः । श्रुतार्थभावनोत्कर्षाद् दधुः शुद्धि तपोविधौ ॥१४८।।।
तदनन्तर जिन्होंने समस्त श्रुतके अर्थोंका श्रवण किया है और श्रुतज्ञान ही जिनके नेत्र हैं ऐसे वे मुनि श्रुतज्ञान की भावना के उत्कर्ष से तपश्चरणमें विशुद्धता धारण करने लगे ।।१४८।।
Thereafter, those monks, who had listened to the meanings of all scriptures and whose eyes were opened by the light of scriptural knowledge, began to cultivate the highest sense of śravaṇajñāna, embracing purity in their practice of austerities. 148
श्लोक ( Shlok ) 149
वाग्देव्या सममालापो मया मौनमनारतम् । इतोर्व्यतीव सन्तापं व्यधतैषु तपः क्रिया ॥१४९॥
ये लोग सरस्वती देवीके साथ तो बातचीत करते हैं और मेरे साथ निरन्तर मौन धारण करते हैं इस प्रकार ईर्ष्या करती हुईके समान तपश्चरणकी क्रिया उन्हें बहुत संताप देती थी ॥१४९॥
These individuals converse with the Goddess Sarasvatī, yet maintain perpetual silence with me. Filled with envy, the very act of their austerities seemed to torment them deeply, as though it were a source of great suffering.149
श्लोक ( Shlok ) 150
तनुतापमसह्यं ते सहमानाः मनस्विनः । बाह्यमाध्यात्मिकं चोयं तपः सुचिरमाचरन् ॥१५०।।
असह्य कायक्लेश सहन करते हुए वे तेजस्वी मुनि अतिशय कठिन अन्तरङ्ग और बाह्य दोनों प्रकारका तप चिरकाल तक करते रहे ॥ १५०॥
Enduring unbearable physical hardship, those radiant monks continued their austere practices—both internal and external—with unwavering resolve, persevering through immense difficulty for a long period of time.150
श्लोक ( Shlok ) 151
ग्रीष्मेऽर्ककरसन्तापं सहमानाः सुदुःसहम् । ते भेजुरातपस्थानम् आरूढगिरिमस्तकाः ।।१५१॥
ग्रीष्मऋतुमें पर्वतों के शिखरपर आरूढ़ होकर अत्यन्त असहय सूर्यकी किरणोंके संतापको सहन करते हुए वे आतापन योगको प्राप्त हुए थे अर्थात् धूपमें बैठकर तपस्या करते थे ।।१५१।।
During the summer season, perched atop the mountain peaks, they endured the excruciating heat of the sun’s rays, thereby attaining the state of Ātāpan Yoga, practicing austerities by sitting in the scorching sunlight. 151
श्लोक 152 से 161
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141
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