आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 |
श्लोक 32 से 41 श्रेयान्स के स्वप्न और उनका फल
श्रेयान्स स्वर्ग से चय कर जन्मा था। भगवान के आगमन पर उसने सात स्वप्न देखे। उसने सुमेरु, कल्पवृक्ष, सिंह, बैल, सूर्य-चंद्र, समुद्र, और व्यंतर मूर्तियाँ देखीं। प्रातःकाल उसने सोमप्रभ को स्वप्न सुनाए। पुरोहित ने कहा कि कोई उदार देव आएगा। स्वप्न गुणों की उन्नति दिखाते थे। पुण्य उदय होगा, ऐसा कहा।
English translation of Ādi purāṇa parv 20 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
धनदेवचरो योऽसावहमिन्द्रो दिवश्च्युतः । स श्रेयानित्यभूञछ्रेयः प्रजानां श्रेयसां निधिः ॥३२॥
जो पहले धनदेव था और फिर अहमिंद्र हुआ था वह स्वर्ग से चय कर प्रजा का कल्याण करने वाला और स्वयं कल्याणों का निधिस्वरूप श्रेयान्सकुमार हुआ था ।।32।।
“He who was once Dhanadeva and later became Ahamindra descended from heaven and was reborn as Shreyans Kumar, a benefactor of the people and a treasure trove of virtues.” ||32||
श्लोक ( Shlok ) 33
सोऽदर्शद् भगवत्यस्यां पुरि संनिधिमेष्यति । शर्वर्याः पश्चिमे यामे स्वप्नानेतान् शुभावहान् ॥३३॥
जब भगवान् इस हस्तिनापुर नगर के समीप आने को हुए तब श्रेयान्सकुमार ने रात्रि के पिछले प्रहर में नीचे लिखे स्वप्न देखे ।।33।।
“When Lord Rishabhadeva was about to arrive near the city of Hastinapur, Shreyans Kumar saw the following dreams in the last quarter of the night.” ||33||
श्लोक ( Shlok ) 34 –37
सुमेरुमैक्षतोतुङ्ग हिरण्मयमहा तनुम् । कल्पद्रुमं च शाखाग्रलम्बि भूषणभूषितम् ॥३४॥
सिंहं संहार संध्याम कैसरोद्ध रकन्धरम् । शृङ्गाग्नलग्नमृत्स्नं च वृषभं कूलमुद्रुजम् ॥३५॥
सूर्येन्दू भुवनस्येव नयने प्रस्फुरद्युती । सरस्वन्तमपि प्रोच्चैर्वीचिं रत्नाचितार्णसम् ॥३६॥
अष्टमङ्गलधारीणि भूतरूपाणि चाग्रतः। सोऽपश्यद् भगवत्पाददर्शनैफफलानिमान् ॥३७॥
प्रथम ही सुवर्णमय महा शरीर को धारण करने वाला और अतिशय ऊँचा सुमेरु पर्वत देखा, दूसरे स्वप्न में शाखाओं के अग्रभाग पर लटकते हुए आभूषणों से सुशोभित कल्पवृक्ष देखा, तीसरे स्वप्न में प्रलयकाल संबंधी संध्याकाल के मेघों के समान पीली-पीली अयाल से जिसकी ग्रीवा ऊँची हो रही है ऐसा सिंह देखा, चौथे स्वप्न में जिसके सींग के अग्रभाग पर मिट्टी लगी हुई है ऐसा किनारा उखाड़ता हुआ बैल देखा, पाँचवें स्वप्न में जिनकी कांति अतिशय दैदीप्यमान हो रही है, और जो जगत् के नेत्रों के समान हैं ऐसे सूर्य और चंद्रमा देखे, छठे स्वप्न में जिसका जल बहुत ऊँची उठती हुई लहरों और रत्नों से सुशोभित हो रहा है ऐसा समुद्र देखा तथा सातवें स्वप्न में अष्टमंगल द्रव्य धारण कर सामने खड़ी हुई भूत जाति के व्यंतर देवों की मूर्तियाँ देखी । इस प्रकार भगवान् के चरणकमलों का दर्शन ही जिनका मुख्य फल है ऐसे ये ऊपर लिखे हुए सात स्वप्न श्रेयान्सकुमार ने देखे ।।34-37।।
“First, he saw the great golden-bodied and towering Sumeru Mountain in his dream.
In the second dream, he saw a wish-fulfilling Kalpavriksha, adorned with ornaments hanging from its branches.
In the third dream, he saw a lion with a high-raised neck, its mane glowing yellow like the clouds of dusk during the time of cosmic dissolution.
In the fourth dream, he saw a bull uprooting the land, with its horns smeared with soil.
In the fifth dream, he saw the sun and the moon, radiating immense brilliance, appearing as the very eyes of the universe.
In the sixth dream, he saw a vast ocean, its waters rising in high waves and adorned with shining jewels.
In the seventh dream, he saw celestial beings of the Vyantara category standing before him, holding the eight auspicious symbols (Ashtamangala).
Thus, Shreyans Kumar beheld these seven dreams, whose ultimate significance was the vision of the divine lotus feet of Lord Rishabhadeva.” ||34-37||
श्लोक ( Shlok ) 38
सप्रश्रयमथासाद्य प्रभाते प्रीतमानसः । सोमप्रभाय तान् स्वप्नान् यथादृष्टं न्यवेदयत् ॥३८॥
तदनंतर जिसका चित्त अतिशय प्रसन्न हो रहा है ऐसे श्रेयान्सकुमार ने प्रातःकाल के समय विनयसहित राजा सोमप्रभ के पास जाकर उनसे रात्रि के समय देखे हुए वे सब स्वप्न ज्यों-के-त्यों कहे ।।38।।
“Afterward, with a heart filled with immense joy, Shreyans Kumar respectfully approached King Somaprabha in the early morning and narrated to him exactly all the dreams he had seen during the night.” ||38||
श्लोक ( Shlok ) 39
ततः पुरोधाः कल्याणं फलं तेषामभाषत । प्रसरद्दशनज्योत्स्नाप्रधौतककुबन्तरः ॥३९॥
तदनंतर जिसकी फैलती हुई दाँतों की किरणों से सब दिशाएँ अतिशय स्वच्छ हो गयी हैं ऐसे पुरोहित ने उन स्वप्नों का कल्याण करने वाला फल कहा ।।39।।
“Then, the royal priest, whose radiant teeth illuminated all directions with their brilliance, interpreted the dreams and proclaimed their auspicious meaning.” ||39||
श्लोक ( Shlok ) 40
मेरुसन्दर्शनाद्देवो यो मेहरिव सून्नतः । मेरौ प्राप्ताभिषेकः स गृहमेष्यति नः स्फुटम् ॥४०॥
वह कहने लगा कि हे राजकुमार, स्वप्न में मेरुपर्वत के देखने से यह प्रकट होता है कि जो मेरुपर्वत के समान अतिशय उन्नत (ऊँचा अथवा उदार) है और मेरुपर्वत पर जिसका अभिषेक हुआ है ऐसा कोई देव आज अवश्य ही अपने घर आयेगा ।।40।।
“He said, ‘O Prince, seeing Mount Meru in your dream signifies that today, a divine being, who is as exalted and magnificent as Mount Meru itself and has been anointed upon it, will surely arrive at your home.'” ||40||
श्लोक ( Shlok ) 41
तद्गुणोन्नतिमन्ये च स्वप्नाः संसूचयन्त्यमी । तस्यानुरूपविनयैर्महान् पुण्योदयोऽद्य नः ॥४१॥
और ये अन्य स्वप्न भी उन्हीं के गुणों की उन्नति को सूचित करते हैं । आज उन भगवान् के योग्य की हुई विनय के द्वारा हम लोगों के बड़े भारी पुण्य का उदय होगा ।।41।।
“And these other dreams also indicate the greatness of his virtues. Today, by offering due reverence to that divine Lord, we shall experience the fruition of immense merit.” ||41||
श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 |