आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 |
श्लोक 122 से 131 कुमारों की प्रतिक्रिया
कुमारों ने धरणेंद्र को दुष्ट और चापलूस कहा। उन्होंने बुद्धिमानों की प्रशंसा की। उन्होंने धरणेंद्र के तेज और वेष की सराहना की। उन्होंने पूछा कि वह उनके कार्य में विघ्न क्यों डाल रहा है। उन्होंने कहा कि भगवान को प्रसन्न करना उनका लक्ष्य है। उन्होंने भगवान को कल्पवृक्ष बताया।
English translation of Ādi purāṇa parv 18 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
अपृष्टकार्य निर्देशैः व्यलीकानिष्टचाटुभिः । छलयन्ति खला लोकं न सद्वृत्ता भवद्विधाः ॥१२२॥
आप-जैसे निंद्य आचरण वाले दुष्ट पुरुष बिना पूछे कार्यों का निर्देश कर तथा अत्यंत असत्य और अनिष्ट चापलूसी के वचन कहकर लोगों को ठगा करते हैं ।।122।।
“Wicked men like you, who engage in condemnable conduct, give unsolicited instructions, and deceive others with extremely false and harmful flattery.” ॥122॥
श्लोक ( Shlok ) 123
“नामृष्टभाषिणी जिह्वा चेष्टा नानिष्टकारिणी। नान्योपघातपर स्मृतिः स्वप्नेऽपि धीमताम् ।।१२३।।
बुद्धिमान् पुरुषों की जिह्वा कभी स्वप्न में भी अशुद्ध भाषण नहीं करती हैं, उनकी चेष्टा कभी दूसरों का अनिष्ट नहीं करती और न उनकी स्मृति ही दूसरों का विनाश करने के लिए कभी कठोर होती है ।।123।।
“The tongues of wise men never utter impure speech, even in dreams. Their actions never cause harm to others, nor does their memory ever turn harsh with the intent of destroying others.” ॥123॥
श्लोक ( Shlok ) 124
विदिताखिलवेद्यानां नोपदेशो भवादृशाम् । न्यायोऽस्मदादिभिः सन्तो यतो न्यायैकजीविकाः ॥ १२४॥
जिन्होंने जानने योग्य संपूर्ण तत्त्वों को जान लिया है ऐसे आप सरीखे बुद्धिमान् पुरुषों के लिए हम बालकों द्वारा न्यायमार्ग का उपदेश दिया जाना योग्य नहीं है क्योंकि जो सज्जन पुरुष होते हैं वे एक न्यायरूपी जीविका से ही युक्त होते हैं अर्थात् वे न्यायरूप प्रवृत्ति से ही जीवित रहते हैं ।।124।।
“It is not appropriate for us, mere children, to preach the path of righteousness to wise men like you, who have already realized all the fundamental truths. After all, virtuous men sustain themselves solely through righteousness, as it is their very way of life.” ॥124॥
श्लोक ( Shlok ) 125
शान्तो वयोऽनुरूपोऽयं वेषः सौम्येयमाकृतिः । वचः प्रसन्नमृर्जस्वि व्याचप्टे वः प्रबुद्धताम् ॥ १२५॥
आयु के अनुकूल धारण किया हुआ आपका यह वेष बहुत ही शांत है, आपकी यह आकृति भी सौम्य है और आपके वचन भी प्रसादगुण से सहित तथा तेजस्वी हैं और आपकी बुद्धिमत्ता को स्पष्ट कह रहे हैं ।।125।।
“Your attire, suited to your age, is extremely serene; your appearance is also gentle, and your words are filled with grace and brilliance, clearly reflecting your wisdom.” ॥125॥
श्लोक ( Shlok ) 126
बहिःस्फुरत्किमप्यन्तर्गूढं तेजो जनातिगम् । महानुभावतां वक्ति वपुरप्राकृतं च वः ॥१२६॥
जो अन्य साधारण पुरुषों में नहीं पाया जाता और जो बाहर भी प्रकाशमान हो रहा है ऐसा आपका यह भीतर छिपा हुआ अनिर्वचनीय तेज तथा बहुत शरीर आपकी महानुभावता को कह रहा है । भावार्थ―आपके प्रकाशमान लोकोत्तर तेज तथा असाधारण दीप्तिमान शरीर के देखने से मालूम होता है कि आप कोई महापुरुष हैं ।।126।।
“Your indescribable radiance, which is not found in ordinary men and shines outwardly as well, along with your extraordinary and luminous body, speaks of your greatness.
Meaning – By witnessing your extraordinary brilliance and radiant form, it is evident that you are a noble and exalted being.” ॥126॥
श्लोक ( Shlok ) 127
इत्यभिव्यक्त वैशिष्टया भवन्तो भद्रशीलकाः । कार्येऽस्मदीये मुहयन्ति न विद्मः किं नु कारणम् ॥१२७॥
इस प्रकार जिनकी अनेक विशेषताएँ प्रकट हो रही है ऐसे आप कोई भद्रपरिणामी पुरुष हैं परंतु फिर भी आप जो हमारे कार्य में मोह को प्राप्त हो रहे हैं सो उसका क्या कारण है यह हम नहीं जानते ।।127।।
“In this way, you appear to be a noble and distinguished person, possessing many exceptional qualities. However, we do not understand why you are becoming deluded by our actions.” ॥127॥
श्लोक ( Shlok ) 128
गुरुप्रसादनं श्लाध्यमावाभ्यां फलमीप्सितम् । यूयं तत्प्रतिबन्धारः परकार्येंषु शीतलाः ॥१२८॥
गुरु-भगवान वृषभदेव को प्रसन्न करना सब जगह प्रशंसा करने योग्य है और यही हम दोनों का इच्छित फल है अर्थात् हम लोग भगवान को ही प्रसन्न करना चाहते हैं परंतु आप उसमें प्रतिबंध कर रहे हैं―विघ्न डाल रहे हैं इसलिए जान पड़ता है कि आप दूसरों का कार्य करने में शीतल अर्थात् उद्योगरहित हैं―आप दूसरों का भला नहीं होने देना चाहते ।।128।।
“To please the revered Lord Rishabhadeva is something praiseworthy everywhere, and that alone is the desired outcome for both of us—we seek only to please the Lord. However, you are placing obstacles in our path, creating hindrances. It seems that you are indifferent to assisting others and do not wish for their welfare.” ॥128॥
श्लोक ( Shlok ) 129
परेषां वृद्धिमालोक्य नन्वसूयति दुर्जनः । युष्मादृशां तु महतां सत्तां प्रत्युत सा मुदे ॥१२९॥
दूसरों की वृद्धि देखकर दुर्जन मनुष्य ही ईर्ष्या करते हैं । आप जैसे सज्जन और महापुरुषों को तो बल्कि दूसरों की वृद्धि से आनंद होना चाहिए ।।129।।
“Wicked people feel envious when they see others prosper. However, noble and great men like you should instead feel joy at the growth and success of others.” ॥129॥
श्लोक ( Shlok ) 130
वनेऽपि बसतो भर्तुः प्रभुत्वं किं परिच्युतम्। पादमूले जगद् विश्वं यस्याद्यापि चराचरम् ॥१३०॥
भगवान् वन में निवास कर रहे हैं इससे क्या उनका प्रभुत्व नष्ट हो गया है देखो, भगवान् के चरणकमलों के मूल में आज भी यह चराचर विश्व विद्यमान है ।।130।।
“Does residing in the forest diminish the supremacy of the Lord? Behold, even today, this entire animate and inanimate world exists at the feet of His divine lotus feet.” ॥130॥
श्लोक ( Shlok ) 131
कल्पानोकह मुत्सृज्य को नामान्यं महीरुहम् । सेवेत पटुधीरीप्सन् फलं विपुलमूर्जितम् ॥१३१॥
आप जो हम लोगों को भरत के पास जाने की सलाह दे रहे हैं सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा कौन बुद्धिमान होगा जो बड़े-बड़े बहुत से फलों की इच्छा करता हुआ भी कल्पवृक्ष को छोड़कर अन्य सामान्य वृक्ष की सेवा करेगा ।।131।।
“The advice you give us to go to Bharat is also not appropriate. For who, desiring great and abundant fruits, would abandon the wish-fulfilling Kalpavriksha and instead serve an ordinary tree?” ॥131॥
श्लोक 132 से 141
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आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
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