आदिपुराण पर्व 4 सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 4 by Acharya Jinasena
पर्व 4 में लोक वर्णन, सृष्टिवाद खंडन, गंधिल देश, विजयार्ध पर्वत, अतिबल और महाबल का चरित्र का वर्णन हैं।
संक्षिप्त सारांश (श्लोक 1 से 198)
तीन पर्वों का अध्ययन करने वाला आनंद पाता है। अब वृषभदेव का चरित कहा जाएगा। पुराण में आठ आख्यान होते हैं। लोक अकृत्रिम और नित्य है। सृष्टिवाद असंगत है। कर्म ही शरीर बनाते हैं। लोक तीन भागों में है। मध्यलोक में जंबूद्वीप और गंधिल देश है। यहाँ प्रजा सुखी और धार्मिक है। विजयार्ध पर्वत शोभित है। इसकी उत्तर श्रेणी में अलकापुरी है। यह नगरी समृद्ध और सुंदर है। इसका राजा अतिबल शत्रुजयी था। उसका पुत्र महाबल हुआ। अतिबल ने उसे युवराज बनाया। बाद में अतिबल ने राज्य छोड़कर दीक्षा ली। उनका तप कठिन और निर्मल था। महाबल ने राज्य संभाला। वह मध्यम वृत्ति से शासन करता था। उसका राज्य अन्याय से मुक्त था। उसका रूप सुंदर और लोकप्रिय था। उसके चार मंत्री थे। स्वयंबुद्ध सम्यग्दृष्टि था। महाबल मंत्रशक्ति से विजयी था। वह उपवनों में विहार करता था। उसे तीर्थंकर पद मिलने वाला था।
श्लोक 1 से 11 पुराण का स्वरूप
तीन पर्वों का अध्ययन करने वाला आनंद प्राप्त करता है। अब वृषभदेव का चरित कहा जाएगा। पुराण में आठ आख्यान होते हैं। लोकाख्यान में लोक का वर्णन होता है। देशाख्यान में देश का विस्तार बताया जाता है। नगर और राजा का वर्णन क्रमशः पुराख्यान और राजाख्यान है। तीर्थाख्यान में तीर्थंकर का चरित्र है। तपदान और गति-फल का वर्णन भी होता है।
श्लोक 12 से 21 लोक का स्वरूप और सृष्टिवाद
यहाँ लोक की परिभाषा और उसकी प्रकृति पर प्रकाश डाला गया है। लोक वह है जहाँ जीव आदि पदार्थ अपनी पर्यायों सहित दिखाई देते हैं और इसे क्षेत्र भी कहा जाता है। लोक अकृत्रिम (किसी द्वारा निर्मित नहीं), नित्य (अविनाशी), और अनादि (आदि रहित) है, जो आकाश के मध्य में स्थित है। सृष्टिवाद की परीक्षा करते हुए यह तर्क दिया गया कि लोक का कोई बनाने वाला नहीं है। यदि ईश्वर को सृष्टिकर्ता माना जाए, तो प्रश्न उठता है कि वह सृष्टि से पहले कहाँ था, उसने क्या सामग्री से लोक बनाया, और उसका प्रयोजन क्या था। ईश्वर को अमूर्तिक, निष्क्रिय, और विकाररहित मानने से उसका सृष्टिकर्ता होना असंभव है। इस प्रकार, लोक स्वतः सिद्ध माना गया है।
श्लोक 22 से 31 सृष्टिवाद की परीक्षा
इस खंड में सृष्टिवाद के खिलाफ तर्कों को और गहराई से प्रस्तुत किया गया है। यदि ईश्वर कृतकृत्य (सब कार्य पूर्ण) है, तो उसे सृष्टि की इच्छा नहीं होगी; और यदि अकृतकृत्य है, तो वह समर्थ नहीं होगा। सृष्टि से ईश्वर को कोई फल नहीं मिलता, और यदि यह उसकी क्रीड़ा मात्र है, तो यह निरर्थक है। यदि ईश्वर कर्मों के अनुसार सृष्टि करता है, तो वह परतंत्र हो जाता है, जो ईश्वरत्व के विपरीत है। अतः सृष्टि स्वतः सिद्ध है, कर्मों से उत्पन्न होती है, और ईश्वर का अस्तित्व व्यर्थ है। लोक अकृत्रिम, नित्य, और जीव-अजीव का आधार है।
श्लोक 32 से 41 कर्म ही कर्ता
यहाँ यह स्थापित किया गया कि शरीर आदि की विशेष रचना ईश्वर से नहीं, बल्कि जीवों के कर्मों से होती है। संसारी जीव अपने कर्मों से सृष्टि का निर्माण करते हैं। विधि, स्रष्टा, और ईश्वर जैसे शब्द कर्मों के पर्याय हैं। लोक अकृत्रिम, अनादि, और नित्य है, जिसमें तीन भेद हैं: अधोलोक, मध्यलोक, और ऊर्ध्वलोक। इनका आकार क्रमशः वेत्रासन (नीचे चौड़ा, ऊपर संकरा), झल्लरी (सब ओर फैला), और मृदंग (बीच में चौड़ा, सिरों पर संकरा) जैसा है।
श्लोक 42 से 51 लोक का ढांचा
लोक आकाश के मध्य में स्थित है और तीन वातवलयों (घनोदधि, घनवात, तनुवात) से घिरा है। इसकी संरचना इस प्रकार है: अधोलोक 7 राजु, मध्यलोक 1 राजु, और ऊर्ध्वलोक 5 + 1 राजु चौड़ा। मध्यलोक में असंख्य द्वीप-समुद्र हैं, जिनमें केंद्र में जंबूद्वीप है, जो 1 लाख योजन चौड़ा है। इसमें मेरु पर्वत, 6 कुलाचल, 7 क्षेत्र (जैसे भरत), और 14 नदियाँ (जैसे गंगा-सिंधु) हैं। जंबूद्वीप लवण समुद्र से घिरा है और मेरु इसके मध्य में नाभि की तरह स्थित है।
श्लोक 52 से 61 गंधिल देश
जंबूद्वीप के विदेह क्षेत्र में गंधिल देश का वर्णन है, जो स्वर्ग के समान सुंदर है। इसकी सीमाएँ हैं: पूर्व में मेरु, पश्चिम में ऊर्मिमालिनी नदी, दक्षिण में सीतोदा नदी, और उत्तर में नीलगिरि। यहाँ मुनि कर्म नष्ट कर निर्वाण प्राप्त करते हैं। गंधिल देश की प्रजा प्रसन्न रहती है, उत्सव मनाती है, और भोगों में स्वर्ग से श्रेष्ठ है। यहाँ के घरों में सुंदर स्त्रियाँ, चतुर पुरुष, और मधुर बालक हैं। लोगों की चतुराई उनके वेषों से, संपत्ति आभूषणों से, और यौवन भोग-विलास से प्रकट होता है।
श्लोक 62 से 71 देश की समृद्धि
गंधिल देश में लोग पात्रदान, जिनपूजा, शील रक्षा, और प्रोषधोपवास में रुचि रखते हैं। जिनेंद्र के प्रभाव से मिथ्यादृष्टि नहीं है। यहाँ बागों में कोकिलाएँ, खेतों में धान, और तोतों की पंक्तियाँ हैं। पथिक ईख का रस पीते हैं, गाँव समीप हैं, और उनकी सीमाएँ धान खेतों से शोभित हैं। नगर स्वर्ग समान, गाँव भोगभूमि समान, घर विमान समान, और मनुष्य देव समान हैं। हाथी दिग्गज, स्त्रियाँ दिक्कुमारियाँ, और राजा दिक्पाल जैसे हैं।
श्लोक 72 से 81 प्राकृतिक सौंदर्य
यहाँ बावड़ियाँ, कुएँ, और तालाब जल से भरे हैं। नदियाँ वेश्याओं समान हैं: विपंका (कीचड़रहित), ग्राहवती (मगरमच्छ युक्त), स्वच्छ, कुटिलवृत्ति (टेढ़ी), अलंघ्य (गहरी), सर्वभोग्या (सबके लिए), विचित्रा (विविध), और निम्नगा (नीचे बहने वाली)। तालाबों में हंस, वनों में हाथी, और खेतों में बैल हैं। जिनमंदिरों में संगीत से मयूर नृत्य करते हैं। गायें और मेघ दूध व जल से पोषण करते हैं। सुयोग्य राजा के शासन में कोई बाधा नहीं है।
श्लोक 82 से 91 विजयार्ध पर्वत
गंधिल देश में विजयार्ध पर्वत है, जो चाँदीमय, 25 योजन ऊँचा, और 50-30-10 योजन चौड़ा है, जिसमें सवा 6 योजन जमीन में है। इसकी उत्तर-दक्षिण श्रेणियों में विद्याधर निवास करते हैं। विद्याधरियों का महावर इसे शोभित करता है। यह अभेद्य, अविनाशी, निर्मल, और सिद्ध समान है। चारण मुनि यहाँ विहार करते हैं, और यह पंख फैलाकर उड़ने को तत्पर प्रतीत होता है।
श्लोक 92 से 101 पर्वत की शोभा
यहाँ किन्नर और नागकुमार क्रीड़ा करते हैं। पर्वत पर श्वेत बादल, सिद्धायतन, और मुकुट समान कूट हैं। यह वज्रमय कपाटों से युक्त है और गंगा-सिंधु इसके चरणों में हैं। वन, कल्पवृक्ष, और सुगंधित वायु इसे अलंकृत करते हैं। यह दिशाओं का मर्दन करता हुआ अपने माहात्म्य को प्रकट करता है।
श्लोक 102 से 111 विजयार्ध और अलकापुरी
विजयार्ध पर्वत की उत्तर श्रेणी में अलकापुरी है, जो चंद्रमा की शोभा को भी फीका करती है। यह ऊँचे गोपुरों, कमलयुक्त परिखा, और फहराती पताकाओं से शोभित है। घरों में वापिकाएँ और कलहंस हैं। यह नगरी नाना भाषाओं से युक्त और विद्याधर नरेश द्वारा सुरक्षित है।
श्लोक 112 से 121 अलकापुरी की समृद्धि
इस खंड में अलकापुरी की समृद्धि और शोभा का वर्णन है। यहाँ की वापिकाएँ (जलाशय) स्त्रियों के समान हैं: स्वच्छ जल उनका वस्त्र, नील कमल कर्णफूल, कमल मुख, और कुवलय नेत्र हैं। नगरी में कोई अज्ञानी, शीलहीन स्त्री, बगीचे रहित घर, या फलहीन बगीचा नहीं है। उत्सव जिनपूजा के बिना नहीं होते, और मृत्यु संन्यास विधि से होती है। धान के खेत बिना बोए पकते हैं और पुण्य समान फल देते हैं। उपवनों में छोटे पौधों की रक्षा बालकों की तरह की जाती है। बाजार सागर समान हैं: शब्दमय, रत्नों से चमकते, और मनुष्यों से भरे। यहाँ विकोशत्व (खजाने का अभाव), भीरुता, अधरता (नीचता), निस्त्रिंशता (क्रूरता), यांचा (भिक्षा), म्लानता (उदासीनता), और बंधन केवल प्राकृतिक संदर्भों में हैं, मनुष्यों में नहीं। उपवन दंपति समान प्रिय हैं, और अलकापुरी विजयार्ध पर्वत पर तिलक समान शोभित है।
श्लोक 122 से 131 अतिबल राजा
अलकापुरी का राजा अतिबल विद्याधर था, जो शत्रुओं के बल का नाशक और समस्त विद्याधरों का अधिपति था। वह धर्म से विजयी, शूरवीर, और छह गुणों (संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय, द्वैधीभाव) से शत्रुओं को परास्त करने वाला था। वृद्धों की संगति से वह इंद्रियों पर विजय पाकर शत्रुओं को नष्ट करता था। वह दिग्गज समान था: उदय (वैभव), उच्च कुल, लंबी भुजाएँ, और दानशील। उसके दाँतों की किरणें और भौंहें चंद्रमा को जीतती थीं। उसका मस्तक त्रिकूटाचल समान था, और वक्षस्थल लक्ष्मी का क्रीड़ाद्वीप। उसकी भुजाएँ सूँड समान, जाँघें तरकस समान, और चरण कमल समान थे। उसकी रानी मनोहरा कामदेव के बाण समान सुंदर थी।
श्लोक 132 से 141 महाबल का जन्म
अतिबल और मनोहरा का पुत्र महाबल उत्पन्न हुआ, जिसके जन्म से सहोदरों में प्रेम बढ़ा। उसके स्वाभाविक गुण थे: कला-कुशलता, शूरवीरता, दान, बुद्धि, क्षमा, दया, धैर्य, सत्य, और शौच। उसका शरीर और गुण एक-दूसरे से ईर्ष्या करते हुए बढ़ते थे। उसने चार विद्याओं (आन्वीक्षिकी आदि) का अध्ययन किया और पूर्वभव के संस्कारों से तेजस्वी बना। अतिबल ने उसके विनय आदि गुण देखकर उसे युवराज पद दिया। राज्यलक्ष्मी पिता-पुत्र में बँटकर हिमालय-समुद्र समान विस्तृत हुई। अन्य पुत्र होने पर भी अतिबल महाबल को ही अपना उत्तराधिकारी मानते थे।
श्लोक 142 से 152 अतिबल की दीक्षा
अतिबल विषयभोगों से विरक्त होकर दीक्षा लेने को उद्यमी हुए। उन्होंने राज्य को विषपुष्प, दृष्टिविष सर्प, व्यभिचारिणी स्त्री, और उच्छिष्ट माला समान हेय माना। संसार को मिथ्यात्व की जड़, जन्म-मरण के पुष्प, और दुःख के फल वाली बेल मानकर, उन्होंने इसे उखाड़ने का संकल्प लिया। शरीर को नश्वर, बंधुओं को बंधन, धन को दुःखकारक, और लक्ष्मी को चंचल समझकर, उन्होंने राज्य पुत्र महाबल को सौंपकर वन में विद्याधरों संग दीक्षा ली।
श्लोक 153 से 161 अतिबल का तप
अतिबल ने जिनलिंग धारण कर कठिन तप किया, जो सेना समान तीन गुप्तियों (मन, वचन, काय) और पाँच समितियों (ईर्या आदि) से सुरक्षित था। यह तप सर्प के फणरत्न, कल्पवृक्ष, गुरुवचन, पक्षी मंडल, सिद्धस्थान, वातवलय, और रत्नत्रय समान था। उनके तप से आत्मबल बढ़ा। उनके बाद महाबल ने राज्य संभाला, जिसमें विद्याधर उनके चरणों की पूजा करते थे। वह दैव और पुरुषार्थ से संपन्न, वीर, और शत्रुनाशक था। उसकी मंत्रशक्ति से शत्रु वशीभूत होते थे।
श्लोक 162 से 171 महाबल का शासन
महाबल पर प्रजा का प्रेम आम्रवृक्ष पर समान था। वह न कठोर था, न कोमल, बल्कि मध्यम वृत्ति से जगत को वश में करता था। उसने अंतरंग (काम, क्रोध आदि) और बाह्य शत्रुओं को शांत किया। धर्म, अर्थ, काम का संतुलित पालन करते हुए, वह शुद्ध बुद्धि वाला रहा। जवानी, रूप, ऐश्वर्य आदि से वह गर्वित नहीं हुआ। उसके शासन में अन्याय, भय, और क्षोभ नष्ट हुए। गुप्तचर और विचारशक्ति उसके नेत्र थे। यौवन में उसका रूप चंद्रमा समान लोकप्रिय हुआ।
श्लोक 172 से 181 महाबल का रूप
महाबल का रूप कामदेव से श्रेष्ठ था। उसके घुँघराले बाल मेघ समान मेरु शिखर जैसे थे। ललाट लक्ष्मी के विश्राम हेतु सुवर्ण शिला समान, भौंहें कामदेव के धनुष समान, और आँखें बाण यंत्र समान थीं। कान सरस्वती के झूले, नाक नेत्रों की स्पर्धा रोकने वाला पुल, और मुख सुगंधित कमल समान थे। वक्षस्थल लक्ष्मी का स्नानगृह, और कंधे क्रीड़ाचल समान शोभित थे।
श्लोक 182 से 191 महाबल के अंग
महाबल की भुजाएँ कल्पवृक्ष की शाखा समान, मध्य भाग समुद्र समान, नितंब जंबूद्वीप समान, जाँघें निशाने समान, पिंडरियाँ शाण समान, और चरण लक्ष्मी के घर समान थे। उसने रूप और मंत्रशक्ति से जगत जीता। उसके चार मंत्री—महामति, संभिन्नमति, शतमति, स्वयंबुद्ध—बाह्य प्राण समान थे। स्वयंबुद्ध सम्यग्दृष्टि था, शेष मिथ्यादृष्टि, पर सभी स्वामी के हित में तत्पर थे।
श्लोक 192 से 198 मंत्रियों और शासन
चारों मंत्रियों की योजना से राज्य समवृत्त छंद समान विस्तृत हुआ। महाबल स्वयं निर्णय लेता, और मंत्री प्रशंसा करते थे। वह मंत्रियों के साथ उपवनों में विहार करता, जहाँ मंदार वृक्षों की शीतल वायु उसे सुख देती थी। विद्याधरों के मुकुट उसके चरणों को स्पर्श करते थे। वह मेरु पर इंद्र समान विजयार्ध पर्वत पर क्रीड़ा करता रहा, और उसे तीर्थंकर की विभूति प्राप्त होने वाली थी।
पर्व 5
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