आदिपुराण पर्व 11 सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 11 by Acharya Jinasena
पर्व 11 में वज्रनाभि का स्वर्ग से चक्रवर्ती, मुनि और अहमिंद्र तक का सफर, तप और सुख का वर्णन हैं।
संक्षिप्त सारांश (श्लोक 1 से 221)
जिनेंद्रदेव की स्तोत्र-पूजा से रत्नत्रय प्राप्त होता है, जो भव्य जीवों को पवित्र करता है। अच्युतेंद्र वज्रनाभि ने स्वर्ग छोड़ने से पहले माला मुरझाने का चिह्न देखा, पर धैर्य रखा। अंतिम छह माह में उसने अर्हंत की पूजा की और स्वर्ग से च्युत होकर जंबूद्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में पुंडरीकिणी नगरी में वज्रसेन और श्रीकांता के पुत्र वज्रनाभि के रूप में जन्म लिया। उनके भाई विजय आदि और धनदेव भी वहीं जन्मे।
वज्रनाभि का यौवनकालीन रूप सूर्य-सा देदीप्यमान था। उनके गुणों से लक्ष्मी और सरस्वती आकर्षित थीं। वज्रसेन ने उन्हें राज्य सौंपकर दीक्षा ली। वज्रनाभि चक्रवर्ती बने, चक्ररत्न से पृथ्वी जीती, पर पिता वज्रसेन तीर्थंकर से रत्नत्रय जानकर राज्य त्यागा। उन्होंने पुत्र वज्रदंत को राज्य देकर सोलह हजार राजाओं सहित दीक्षा ली। पांच महाव्रत, समिति-गुप्ति और सोलह भावनाओं का पालन करते हुए वे तीर्थंकर पद के योग्य बने।
उन्होंने कठिन तप किया, चार ऋद्धियाँ प्राप्त कीं और उपशम श्रेणी से ग्यारहवें गुणस्थान तक पहुँचे। आयुांत में श्रीप्रभ पर्वत पर प्रायोपवेशन संन्यास लिया, बाईस परिषह सहन किए, दस धर्म और बारह अनुप्रेक्षाएँ धारण कीं। अंततः सर्वार्थसिद्धि में अहमिंद्र बने। वहाँ उनका शरीर दिव्य, एक हाथ ऊँचा और सुखमय था। वे जिन-पूजा और तत्त्वचर्चा में रत रहे। उनके भाई और धनदेव भी अहमिंद्र बने।
अहमिंद्र का सुख प्रवीचाररहित और विषयों से मुक्त था। विषय-सुख तृष्णा बढ़ाता है, पर अहमिंद्र का सुख आत्मिक था। यह सिद्धों के सुख से कम, पर स्वर्गीय सुख से श्रेष्ठ था। पुण्य से सर्वार्थसिद्धि और पाप से नरक मिलता है। वज्रनाभि ने शम-दम-यम से यह सुख पाया, जो बुद्धिमानों को प्रेरित करता है।
श्लोक 1 से 11 अच्युतेंद्र का स्वर्ग से च्युत होना
जिनेंद्र की स्तुति से रत्नत्रय प्राप्त होता है। अच्युतेंद्र की आयु समाप्ति पर उसकी माला मुरझाई। छह माह शेष रहने पर उसने अर्हंत पूजा की और पंचपरमेष्ठियों का चिंतन कर स्वर्ग छोड़ा। वह पुंडरीकिणी नगरी में वज्रनाभि बना। वरदत्त आदि भाई और मतिवर आदि भी पुत्र बने।
श्लोक 12 से 21 वज्रनाभि और अन्यों का जन्म
मतिवर सुबाहु, आनंद महाबाहु, अकंपन पीठ, धनमित्र महापीठ बने। केशव धनदेव हुआ। वज्रनाभि का यौवन सुवर्ण समान चमका। उसका शिर बादलों से ढके पर्वत, मुख कमल, नाक सीमा रेखा समान था।
श्लोक 22 से 31 वज्रनाभि का रूप वर्णन
वक्ष लक्ष्मी-आलिंगित, कंधे क्रीड़ा-पर्वत, भुजाएँ तोरण-खंभे, नाभि में वज्र चिह्न था। कटि सरोवर, ऊरु अर्गलदंड, जंघाएँ संधि-प्रतीक, चरण कमल समान थे। उसका रूप देवांगनाओं को मोहित करता था।
श्लोक 32 से 41 वज्रनाभि की विद्या और राज्याभिषेक
वज्रनाभि ने शास्त्र और राजविद्या सीखी। लक्ष्मी-सरस्वती उस पर प्रेम करती थीं। वज्रसेन ने उसे राज्य सौंपा। पट्टबंध में वह सिंहासन पर बैठा, चमर ढुलते थे।
श्लोक 42 से 51 राज्य और वज्रसेन की दीक्षा
राज्यलक्ष्मी वज्रनाभि से बंधी। वज्रसेन ने मुकुट उसे सौंपा। लौकांतिक देवों ने वज्रसेन को दीक्षा के लिए प्रेरित किया। वज्रसेन और 1,000 राजाओं ने दीक्षा ली। वज्रनाभि राज्य और वज्रसेन तप में संतुष्ट थे।
श्लोक 52 से 62 चक्रवर्ती और तीर्थंकर
वज्रनाभि ने चक्ररत्न से पृथ्वी जीती, वज्रसेन ने कर्म जीते। धनदेव तेजस्वी रत्न बना। वज्रनाभि ने वज्रसेन से रत्नत्रय जाना, राज्य त्यागकर पुत्र वज्रदंत को राज्य देकर दीक्षा ली।
श्लोक 63 से 71 वज्रनाभि की तपस्या
अन्य राजा भी तप को गए। वज्रनाभि ने पांच महाव्रत, समिति, गुप्तियाँ धारी एकाकी विहार किया। वज्रसेन के समीप सोलह भावनाओं का चिंतन किया—शुद्ध सम्यग्दर्शन, विनय, तप आदि।
श्लोक 72 से 81 सोलह भावनाएँ और ऋद्धियाँ
वज्रनाभि ने वैयावृत्य, भक्ति, समता, छह आवश्यकों का पालन किया। सोलह भावनाओं से तीर्थंकर प्रकृति बंधी। उसे चार बुद्धि ऋद्धियाँ प्राप्त हुईं, जिनसे परभव जाना।
श्लोक 82 से 91 अन्य ऋद्धियाँ और गुणस्थान
वज्रनाभि ने दीप्त, तप्त, उग्र, घोर ऋद्धियाँ पाईं। अणिमा, रस, बल, अक्षीण ऋद्धियाँ भी मिलीं। वह उपशम श्रेणी पर चढ़ा, 10वें-11वें गुणस्थान तक पहुँचा, फिर 7वें में लौटा।
श्लोक 92 से 102 प्रायोपवेशन और परिषह
वज्रनाभि ने श्रीप्रभ पर्वत पर प्रायोपवेशन संन्यास लिया। शरीर त्यागकर निश्चल बैठे। 22 परिषह (क्षुधा, शीत आदि) सहन किये।
श्लोक 103 से 111 वज्रनाभि की तपस्या और उपशम
वज्रनाभि ने दस धर्म (क्षमा, मार्दव आदि) और बारह अनुप्रेक्षाएँ (अनित्यता, अशरण आदि) धारण कीं। वह द्वितीय बार उपशम श्रेणी पर चढ़े, शुक्लध्यान पूर्ण कर 11वें गुणस्थान में पहुँचे, और वहाँ से सर्वार्थसिद्धि में अहमिंद्र बने।
श्लोक 112 से 121 सर्वार्थसिद्धि का वर्णन
सर्वार्थसिद्धि विमान लोक के अंत से 12 योजन नीचे, जंबूद्वीप के आकार का है। यहाँ मनोरथ सिद्ध होते हैं। नीलमणि भूमि, रत्न दीवारें, इंद्रधनुष कोट, सुगंधित मालाएँ इसे शोभायमान करती हैं। वज्रनाभि यहाँ उपपाद शय्या पर प्रकट हुए।
श्लोक 122 से 131 अहमिंद्र का रूप
वज्रनाभि का दोषरहित, यौवनयुक्त शरीर क्षण में प्रकट हुआ। यह शुभ परमाणुओं से बना, चाँदनी से घिरा, हंस समान शोभायमान था। वह सिंहासन पर बैठा, पुण्य से अभिषिक्त, फूलमाला और लक्ष्मी से सुशोभित था।
श्लोक 132 से 142 अहमिंद्र की शोभा और पूजा
अहमिंद्र का स्फटिक समान शरीर, मुकुट, आभूषण, मालाएँ, वस्त्र इसे कल्पवृक्ष समान बनाते थे। वह वैक्रियक शरीर से जिन प्रतिमाओं की पूजा करता, तत्त्वचर्चा और सरोवर किनारे विहार करता था। परक्षेत्र में उनकी क्रीड़ा नहीं होती।
श्लोक 143 से 151 अहमिंद्र की प्रकृति
अहमिंद्र असूया, निंदा, ईर्ष्या से मुक्त, सुखी रहते थे। वज्रनाभि का अहमिंद्र 33 सागर आयु, समचतुरस्र, हंस समान श्वेत शरीर, दिव्य वस्त्रों से युक्त था। उसकी वेषभूषा शांत, ललित, उदात्त थी।
श्लोक 152 से 161 अहमिंद्र का जीवन
वह 33,000 वर्ष में आहार, 16 माह 15 दिन में श्वास लेता था। अवधिज्ञान से त्रसनाडी के द्रव्यों को जानता था। उसका मुख कमल, नेत्र नीलकमल, गाल चंद्रमा समान थे। उनके आठ भाई और धनदेव भी अहमिंद्र बने।
श्लोक 162 से 171 सुख का स्वरूप
अहमिंद्रों का निर्बाध सुख प्रवीचारहित था। संसार में स्त्री-संभोग सुख नहीं, आकुलता है। यह मोह, शिथिलता, तृष्णा बढ़ाता है। रोगी जैसे औषधि लेता है, वैसे कामज्वर से संतप्त जीव संभोग करता है। सच्चा सुख संतोष से मिलता है।
श्लोक 172 से 182 विषय सुख की आलोचना
विषय सुख पराधीन, बाधायुक्त, कर्मबंधक है। यह विष समान, खाज खुजलाने जैसा है। चंदन लेप से अस्थायी राहत मिलती है, पर स्थायी सुख नहीं। कुत्ते, कीड़े आदि का प्रेम सुख नहीं। यह केवल रोग प्रतिकार है।
श्लोक 183 से 191 विषय सुख की मिथ्या प्रकृति
विषयी जीव को विषय निंद्य सुख प्रतीत होते हैं। संभोग से शरीर काँपता, श्वास तीव्र होती, पसीना आता है—यह सुख नहीं। कुत्ता हड्डी चबाकर, विषयी परिश्रम को सुख मानते हैं। स्वाभाविक आह्लाद ही सुख है। स्वर्गीय सुख भी सामग्री के उपभोग से नहीं, केवल सत्ता से नहीं मिलता। यह आर्तध्यान का कारण है।
श्लोक 192 से 201 विषयों का दुःखदायी स्वरूप
विषय संग्रह, रक्षा, नाश से दुःख होता है। ये अतृप्तिकर, विनाशी हैं। ईंधन अग्नि, नदियाँ समुद्र, खारा जल प्यास नहीं मिटाते—विषय भी तृष्णा बढ़ाते हैं। हाथी, मछली, भौंरा, पतंग विषय लालसा से दुःख पाते हैं।
श्लोक 202 से 211 विषयों का चक्र और परित्याग
हरिणी भी गीतों से मरती है। पाँचों इंद्रियों के विषय दुःख देते हैं। यह जीव धन की लालसा से क्लेश, शोक, असंतोष, राग-द्वेष, कर्मबंध, नरक दुःख भोगता है। विषय चक्र से दुःख बढ़ता है। इनका त्याग करना चाहिए।
श्लोक 212 से 221 सच्चा सुख और जिन आज्ञा
तीनों वेद (स्त्री, पुरुष, नपुंसक) संताप हैं, सुख नहीं। अहमिंद्र का प्रवीचाररहित सुख श्रेष्ठ है। सिद्धों का आत्मज सुख बाधारहित, अनुपम है। पुण्य से सर्वार्थसिद्धि, पाप से नरक मिलता है। वज्रनाभि ने शम, दम, यम से तीर्थंकरत्व पाया। श्रेणिक को भी जिन आज्ञा का चिंतन करने की सलाह दी।
पर्व 12
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