आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 |
श्लोक 12 से 21 विद्याओं की सिद्धि और संपदा
विद्याधरों को महाप्रज्ञप्ति आदि विद्याएँ कामधेनु सी फल देती थीं। विद्याएँ कुल-परंपरा और तप से प्राप्त होती थीं। तप से सिद्धि हेतु पवित्र स्थान पर ब्रह्मचर्य और पूजा करनी पड़ती थी। सिद्ध विद्याधर भगवान की पूजा कर फल भोगते थे। वे धान्य आदि संपदा का भी उपभोग करते थे। यहाँ धान्य बिना बोये उत्पन्न होता था। बावड़ियाँ कमलों से, नदियाँ रत्नों से, और वन कोकिल-भ्रमरों से शोभायमान थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 19 – Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
महाप्रज्ञप्तिविद्याद्याः सिद्धयन्तीह खगेशिनाम् । विद्याः कामदुघायास्ताः फलिप्यन्तीप्सितं फलम्॥१२॥
यहाँ विद्याधरों को जो महाप्रज्ञप्ति आदि विद्याएं सिद्ध होती हैं वे इन्हें कामधेनु के समान यथेष्ट फल देती रहती है ।।12।।
“Here, the Vidyadharas attain great mystical sciences such as Mahaprajnapti, which continuously grant them desired results, just like the wish-fulfilling cow, Kamadhenu.”
श्लोक ( Shlok ) 13
“कुलजात्याश्रिता विद्यास्तपोविद्याश्च ता द्विधाः । कुलाम्नायागताः पूर्वा यत्नेनाराधिताः पराः ॥१३॥
वे विद्याएं दो प्रकार की हैं―एक तो ऐसी हैं जो कुछ पितृपक्ष अथवा जाति (मातृपक्ष) के आश्रित हैं और दूसरी ऐसी हैं जो तपस्या से सिद्ध की जाती हैं । इनमें से पहले प्रकार की विद्याएं कुल-परंपरा से ही प्राप्त हो जाती हैं और दूसरे प्रकार की विद्याएं यत्नपूर्वक आराधना करने से प्राप्त होती हैं ।।13।।
“These mystical sciences (Vidyas) are of two types—one kind is dependent on lineage, either from the paternal or maternal side, while the other is attained through austerities. The first type is inherited through family tradition, whereas the second type is acquired through dedicated effort and rigorous practice.”
श्लोक ( Shlok ) 14 – 16
तासामाराधनोपायः सिद्धायतनसंनिधौ । अन्यत्र वाशुचौ देशे द्वीपाद्रिपुलिनादिके ॥१४॥
संपूज्य शुचिवेषेण विद्यादेवव्रताश्रितैः । महोपवासैराराध्या नित्यार्चनपुरःसरैः ॥ १५॥
सिद्धयन्ति विधिनानेन महाविद्या नभोजुषाम् । पुरश्चरणनित्यार्चाजपहोमाद्यनुक्रमात् ॥१६॥
जो विद्याएँ आराधना से प्राप्त होती है उनकी आराधना करने का उपाय यह है कि सिद्धायतन के समीपवर्ती अथवा द्वीप, पर्वत या नदी के किनारे आदि किसी अन्य पवित्र स्थान में पवित्र वेष धारण कर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए विद्या की अधिष्ठातृ देवता की पूजा करे तथा नित्य पूजापुर्वक महोपवास धारण कर उन विद्याओं की आराधना करे । इस विधि से तथा तपश्चरण नित्यपूजा जप और होम आदि अनुक्रम के करने से विद्याधरों को वे महाविद्याएँ सिद्ध हो जाती हैं ।।14-16।।
“The method for attaining the mystical sciences (Vidyas) through dedicated practice involves worshiping the presiding deity of the Vidya while residing in a sacred place—such as near a Siddhayatana (a shrine of the perfected beings), on an island, by a mountain, or along a riverbank. One must adopt a pure appearance, observe the vow of celibacy, and engage in daily worship.
By maintaining rigorous fasting (Mahopavasa) along with regular worship, meditation, chanting (japa), and sacrificial offerings (homa), the Vidyadharas can successfully attain these great mystical sciences (Mahavidyas).”
श्लोक ( Shlok ) 17
सिद्धविद्यैस्ततः सिद्धप्रतिमार्चनपूर्वकम् ।विद्याफलानि भोग्यानि वियद गमनचुञ्चुभिः ॥१७॥
तदनंतर जिन्हें विद्याएँ सिद्ध हो गयी हैं ऐसे आकाशगामी विद्याधर लोग पहले सिद्ध भगवान् की प्रतिमा की पूजा करते हैं और फिर विद्याओं के फल का उपभोग करते हैं ।।17।।
“After attaining mastery over the mystical sciences (Vidyas), the sky-traveling Vidyadharas first worship the idol of the perfected Lord (Siddha Bhagavan) and then enjoy the fruits of their Vidyas.”
श्लोक ( Shlok ) 18
यथा विद्या फलान्येषां भोग्यानीह खगेशिनाम् । तथैव स्वैरसंभोग्याः सस्यादिफलसंपदः ॥१८॥
इस विजयार्ध गिरि पर ये विद्याधर लोग जिस प्रकार इन विद्याओं के फलों का उपभोग करते हैं उसी प्रकार वे धान्य आदि फल संपदाओं का भी अपनी इच्छानुसार उपभोग करते हैं ।।18।।
“On this Vijayardha Mountain, the Vidyadharas not only enjoy the fruits of these mystical sciences (Vidyas) but also freely partake in the wealth of grains and other natural resources as per their desires.”
श्लोक ( Shlok ) 19
सस्यान्यष्कृष्टपच्यानि वाप्यः सोरफुल्लपङ्कजाः । ग्रामाः संसक्तसीमानः सारामाः सफलत्रुमाः ॥१९॥
यहाँ पर धान्य बिना बोये ही उत्पन्न होते हैं, यहाँ की बावड़ियाँ फूले हुए कमलों से सहित हैं, यहाँ के गाँवों का सीमाएँ एक दूसरे से मिली हुई रहती हैं, उनमें बगीचे रहते हैं और वे सब फले हुए वृक्षों से सहित होते हैं ।।19।।
“Here, grains grow without being sown, the reservoirs are adorned with blooming lotuses, the villages are interconnected with one another, and they are filled with gardens abundant with fruit-bearing trees.”
श्लोक ( Shlok ) 20
सरत्नसिकता नद्यो हंसाध्यासितसैकताः । दीर्घिका पुष्करिण्याद्याः स्वच्छतोया जलाशयाः ॥२०॥
यहाँ की नदियाँ रत्नमयी बालू से सहित हैं, बावड़ियों तथा पोखरियों के किनारे सदा हंस बैठे रहते हैं, और जलाशय स्वच्छ जल से भरे रहते हैं ।।20।।
“The rivers here have sand made of precious gems, swans always sit along the banks of ponds and reservoirs, and the water bodies are filled with clear, pure water.”
श्लोक ( Shlok ) 21
रमणीया वनोद्देशाः पुंस्कोकिलकलस्वनैः । लताः कुसुमिता गुञ्जद्भृंङ्गीसंगीतसंगताः ॥२१॥
यहाँ के वनप्रदेश कोकिलों की मधुर कूजन से मनोहर रहते हैं और फूली हुई लताएँ गुँजार करती हुई भ्रमरियों के संगीत से संगत होती हैं ।।21।।
“The forests here remain enchanting with the sweet cooing of cuckoos, and the blooming creepers resonate with the melodious humming of bees.”
श्लोक 22 से 31
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 |