आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
श्लोक 102 से 111 भगवान के चरणों की पूजा
भगवान वृषभदेव के चरणकमलों की नख-किरणें देवों के मस्तकों को स्पर्श करती थीं, मानो शेषाक्षत अर्पित कर रही हों। इंद्रों ने भक्ति से प्रणाम किया, उनके मस्तक चरण-प्रभा से पवित्र हुए। इंद्राणी ने अप्सराओं संग नमस्कार किया, नख-किरणें उसके स्तनों पर पड़ीं। इंद्र कल्पवृक्ष-से पूजा करते दिखे। इंद्रों और इंद्राणी ने गंध, पुष्प, धूप, अक्षत आदि से चरणों की पूजा की। इंद्राणी ने रत्न-चूर्ण से मंडल बनाया और जलधारा छोड़ी।
English translation of Ādi purāṇa parv 23 – Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
जिनस्याङ्घ्रिपद्मौ नखांशुप्रतानैः सुरानास्पृशन्तौ समेत्याधिमूर्धम् । स्त्रजाम्लानमूर्त्या स्वशेषां पवित्रां शिरस्यार्पिपेता मिवानुगृहीतुम् ॥१०२॥
जिनेंद्र भगवान् के दोनों ही चरणकमल अपने नखों की किरणों के समूह से देवों के मस्तक पर आकर उन्हें स्पर्श कर रहे थे और उससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो कभी म्लान न होने वाली माला के बहाने से अनुग्रह करने के लिए उन देवों के मस्तकों पर शेषाक्षत ही अर्पण कर रहे हों ।।102।।
The lotus feet of Lord Jina, with the radiance of their toenail beams, gently touched the foreheads of the celestial beings. They appeared as if, under the guise of an unfading garland, they were bestowing divine grace upon the gods by directly offering themselves in blessing. ||102||
श्लोक ( Shlok ) 103
जिनेन्द्राङ्घ्रिभासा पवित्रीकृतं से स्वमूहुः सुरेन्द्राः प्रणम्यातिभक्त्या नखांशुप्रतानाम्बुलब्धाभिषेकं समुतङ्गमत्युत्तमं चोत्तमाङ्गम् ॥१०३॥
वे इंद्र लोग, अतिशय भक्तिपूर्वक प्रणाम करते समय जो जिनेंद्रभगवां के चरणों की प्रभा से पवित्र किये गये हैं तथा उन्हीं के नखों की किरणसमूहरूपी जल से जिन्हें अभिषेक प्राप्त हुआ है ऐसे अपने उन्नत और अत्यंत उत्तम मस्तकों को धारण कर रहे थे । भावार्थ―प्रणाम करते समय इंद्रों के मस्तक पर जो भगवान् के चरणों की प्रभा पड़ रही थी उससे वे उन्हें अतिशय पवित्र मानते थे, और जो नखों की कांति पड़ रही थी उससे उन्हें ऐसा समझते थे मानो उनका जल से अभिषेक ही किया गया हो इस प्रकार वे अपने उत्तमांग अर्थात् मस्तक को वास्तव में उत्तमांग अर्थात् उत्तम अंग मानकर ही धारण कर रहे थे ।।103।।
With utmost devotion, the Indras bowed before Lord Jina, their exalted and magnificent foreheads sanctified by the divine radiance of his feet. As the brilliance of his toenails cast its luminous beams upon them, they felt as if they were being anointed with sacred water. Thus, they regarded their foreheads—the most revered part of their bodies—as truly blessed and worthy, believing them to be purified by the very glow of the Lord’s feet. ||103||
श्लोक ( Shlok ) 104
नखांशू त्करव्याजमव्याजशोभं पुलोमात्मजा साप्सरा भक्तिनम्रा । स्तनोपान्तलग्नं समूहेंऽशुके तत्प्रहासायमानं लसन्मुक्तिलक्ष्म्याः ॥१०४॥
इंद्राणी भी जिस समय अप्सराओं के साथ भक्तिपूर्वक नमस्कार कर रही थी उस समय दैदीप्यमान मुक्तिरूपी लक्ष्मी के उत्तम हास्य के समान आचरण करने वाला और स्वभाव से ही सुंदर भगवान् के नखों की किरणों का समूह उसके स्तनों के समीप भाग में पड़ रहा था और उससे वह ऐसी जान पड़ती थी मानो सुंदर वस्त्र ही धारण कर रही हो ।।104।।
As Indrani, along with the celestial nymphs, bowed in devotion, the radiant beams from Lord Jina’s toenails—resembling the divine smile of the supreme goddess of liberation—fell upon her bosom. This luminous glow made her appear as if she were adorned with the most exquisite and resplendent garments. ||104||
श्लोक ( Shlok ) 105
प्रणामक्षणे ते सुरेन्द्रा विरेजुः स्वदेवीसमेता ज्वलद्भूषणाङ्गाः । महाकल्पवृक्षाः समं कल्पवल्ली समित्येव भक्त्या जिनं सेवमानाः ॥ १० ५ ll
अपनी-अपनी देवियों से सहित तथा दैदीप्यमान आभूषणों से सुशोभित थे वे इंद्र प्रणाम करते ऐसे जान पड़ते थे मानो कल्पलताओं के साथ बड़े-बड़े कल्पवृक्ष ही भगवान् की सेवा कर रहे हों ।।105।।
Adorned with radiant ornaments and accompanied by their celestial consorts, the Indras, as they bowed in reverence, appeared like great Kalpavriksha trees, serving Lord Jina alongside their divine creepers. ||105||
श्लोक ( Shlok ) 106
अथोत्याय तुष्ट्या सुरेन्द्राः स्वहस्तैर्जिनस्याङ्घ्रिपूजां प्रचक्रुः प्रतीताः । सगन्धैः समाल्यैः सधूपैः सदीपैः सदिव्याक्षतैः प्राज्यपीयूषपिण्डैः ॥१०६॥
अथानंतर इंद्रों ने बड़े संतोष के साथ खड़े होकर श्रद्धायुक्त हो अपने ही हाथों से गंध, पुष्पमाला, धूप, दीप, सुंदर अक्षत और उत्कृष्ट अमृत के पिंडों-द्वारा भगवान् के चरणकमलों की पूजा की ।।106।।
Thereafter, the Indras, standing with great satisfaction and deep reverence, worshipped the lotus feet of Lord Jina with their own hands, offering fragrant sandalwood, floral garlands, incense, lamps, sacred rice grains, and excellent nectar-filled offerings. ||106||
श्लोक ( Shlok ) 107
पुरोरङ्गवल्ल्या तते भूमिभागे सुरेन्द्रोपनीता बभौ सा सपर्या । शुचिद्रव्यसंपत्समस्तेव भर्तुः पदोपास्तिमिच्छुः श्रिता तच्छलेन ॥१०७॥
रंगावली से व्याप्त हुई भगवान् के आगे की भूमि पर इंद्रों के द्वारा लायी वह पूजा की सामग्री ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो उसके छल से संसार की समस्त द्रव्यरूपी संपदाएं भगवान् के चरणों की उपासना की इच्छा से ही वहाँ आयी हों ।।107।।
The offerings brought by the Indras, placed upon the land in front of Lord Jina—adorned with colorful Rangoli—shone with such brilliance that it seemed as if, through divine illusion, all the material wealth of the world had gathered there solely to worship the Lord’s sacred feet. ||107||
श्लोक ( Shlok ) 108
सच्ची रत्नचूर्णेर्बंलि भर्तुरग्रे तता नोन्मयूख प्ररोहैर्विचित्राम् । मृदुस्निग्धचित्रे रनेकप्रकारैः सुरेन्द्रायुधानामिव श्लक्ष्णचूर्णै ॥१०८॥
इंद्राणी ने भगवान् के आगे कोमल चिकने और सूक्ष्म अनेक प्रकार के रत्नों के चूर्ण से मंडल बनाया था, वह मंडल ऊपर की ओर उठती हुई किरणों के अंकुरों से चित्र-विचित्र हो रहा था और ऐसा जान पड़ता था मानो इंद्रधनुष के कोमल चूर्ण से ही बना हो ।।108।।
In front of Lord Jina, Indrani created a delicate, smooth, and intricate mandala using the finely powdered dust of various precious gems. The mandala was adorned with sprouts of rising rays, forming exquisite patterns, and it appeared as if it were made from the soft dust of a celestial rainbow. ||108||
श्लोक ( Shlok ) 109
ततो नीरधारां शुचि स्वानुकारां लसद्रत्नभृङ्गारनालस्त्रुताम् । निजां स्वान्तवृतिप्रसन्नामिवाच्छां जिनोपाङ्घ्रि संपातयामास भक्त्या ॥१०९॥
तदनंतर इंद्राणी ने भक्तिपूर्वक भगवान् के चरणों के समीप में दैदीप्यमान रत्नों के भृंगार की नाल से निकलती हुई पवित्र जलधारा छोड़ी । वह जलधारा इंद्राणी के समान ही पवित्र थी और उसी की मनोवृत्ति के समान प्रसन्न तथा स्वच्छ थी ।।109।।
Thereafter, with deep devotion, Indrani poured a sacred stream of pure water near the lotus feet of Lord Jina from a radiant gem-studded vessel. This stream was as pure as Indrani herself, as serene and clear as her own devoted heart. ||109||
श्लोक ( Shlok ) 110
“स्वरुद्भूतगन्धैः सुगन्धीकृताशैर्भ्रमद्भूङ्गमालाकृतारावहृद्यै । जिनाङ्घ्री स्मरन्ती विभोः पादपीठं समानर्च भक्त्या तदा शक्रपत्नी ॥ ११०॥
उसी-समय इंद्राणी ने जिनेंद्रभगवां के चरणों का स्मरण करते हुए भक्तिपूर्वक जिसने समस्त दिशाएँ सुगंधित कर दी थीं, तथा जो फिरते हुए भ्रमरों की पंक्तियों-द्वारा किये हुए शब्दों से बहुत ही मनोहर जान पड़ती थी ऐसी स्वर्गलोक में उत्पन्न हुई सुगंध से भगवान् के पादपीठ (सिंहासन) की पूजा की थी ।।110।।
At that very moment, remembering the lotus feet of Lord Jina with deep devotion, Indrani worshipped his sacred throne with celestial fragrances. These divine scents, born in the heavens, filled all directions with their aroma and were made even more enchanting by the soft humming of swarming bees. ||110||
श्लोक ( Shlok ) 111
व्यधान्मौक्तिकोघैर्विंभोस्तण्डुलेज्यां स्वचित्तप्रसादैरिव स्वच्छभाभिः । तथाम्ला नमन्दारमालाशतैश्च प्रभोः पादपूजामकार्षीत् प्रहर्षात् ॥१११ll
इसी प्रकार अपने चित्त की प्रसन्नता के समान स्वच्छ कांति को धारण करने वाले मोतियों के समूहों से भगवान् की अक्षतों से होने वाली पूजा की तथा कभी नहीं मुरझाने वाली कल्पवृक्ष के फूलों की सैकड़ों मालाओं से बड़े हर्ष के साथ भगवान् के चरणों की पूजा की ।।111।।
In the same manner, with great joy, Indrani worshipped Lord Jina using pristine pearls that shone as purely as the delight in her heart. She also adorned his sacred feet with hundreds of garlands made from the unfading flowers of the celestial Kalpavriksha tree. ||111||
श्लोक 112 से 121
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