आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
श्लोक 192 से 199 : दिग्विजय की पूर्णता
भरत ने नाट्यमाल देव का सत्कार कर विदा किया। विद्याधर आकाशमार्ग से उनकी परिचर्या करते थे। विजयार्थ पर्वत की गुफा से निकलकर भरत सूर्य सा उदित हुए। वायु उनकी सेवा करता था। सेनापति ने म्लेच्छ खंड जीता। भरत ने चिलात, आवर्त, हिमवान् देव, और गंगा-सिन्धु देवियों को जीता, दो भद्रासन प्राप्त किए, और छह खंडों की पृथिवी को पुण्य से वश किया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 32 – Shlok 192 to 199
श्लोक ( Shlok ) 192
कृतोपच्छन्दनं चामुं नाट्यमालं सुरर्षभम् । व्यसर्जयद्यथोद्देशं सत्कृत्य भरतर्षभः ॥१९२॥
भरत महाराजने अनेक प्रकारकी स्तुति करनेवाले उस नाट्यमाल नामके श्रेष्ठ देवका सत्कार कर उसे अपने स्थानपर जानेके लिये बिदा कर दिया ॥ १९२॥
“King Bharata, having honored the exalted celestial Nāṭyamāla, who praised him with various hymns, bid him farewell and directed him to return to his rightful abode.” (Verse 192)
श्लोक ( Shlok ) 193
कृतोदयमिनं ध्वान्तात्परितो गगनेचराः । परिचेरुर्नभोमार्गमारुध्य धृतसायकाः ॥१९३॥
धनुष बाण धारण करनेवाले विद्याधर चारों ओरसे आकाशमार्गको घेरकर, सूर्यके समान अन्धकारसे परे रहकर उदय होनेवाले चक्रवर्तीकी परिचर्या करते थे ॥ १९३॥
“The Vidyādharas, bearing bows and arrows, surrounded the sky on all sides, serving the mighty Emperor, who, like the sun emerging beyond the realm of darkness, shone forth with unmatched brilliance.” (Verse 193)
श्लोक ( Shlok ) 194
नमिविनमिपुरो गैरन्वितः खेचरेन्द्रैः खचरगिरिगुहान्तर्ध्वान्तमुत्सार्य दूरम् । रविरिव किरणोघैर्द्योतयन्दिग्विभागान् निधिपतिरुदियाय’ प्रीणयन् जीवलोकम् ॥१९४।।
जिनमें नमि और विनमि मुख्य हैं ऐसे विद्या-धरों सहित तथा विजयार्ध पर्वतकी गुफाके भीतरी अन्धकारको दूर हटाकर सूर्यके समान किरणोंके समूहसे दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ वह निधियोंका अधिपति चक्रवर्ती समस्त जीवलोकको आनन्दित करता हुआ उदित हुआ अर्थात् गुफाके बाहर निकला ।।१९४।।
“Accompanied by the Vidyādharas, with Nami and Vinami foremost among them, the sovereign of treasures, dispelling the darkness within the cave of the victorious half-mountain, emerged like the sun, scattering beams of light across the directions, and filling all realms of life with joy as he rose from the depths of the cave.” (Verse 194)
श्लोक ( Shlok ) 195
सरस किसलयान्तः स्पन्दमन्दे सुरस्त्रीस्तनतटपरिलग्नक्षौमसंक्रान्तवासे । सरति मरुति मन्दं कन्दरेष्वद्रिभर्तुर्निधिपतिशिबिराणां प्रादुरासन्निवेशाः ॥१९५।।
रस-युक्त नवीन कोमल पत्तोंके भीतर प्रवेश करनेसे मन्द हुआ तथा देवांगनाओंके स्तनतटपर लगे हुए रेशमी वस्त्रोंमें जिसकी सुगन्धि प्रवेश कर गई है ऐसा वायु जिस समय उस विजयार्ध पर्वतकी गुफाओंमें धीरे धीरे बह रहा था उस समय निधियोंके स्वामी चक्रवर्तीकी सेनाके डेरोंकी रचना शुरू हुई थी ।। १९५।।
“As a gentle breeze, infused with the fragrance of silk garments adorning the celestial nymphs, slowly swept through the caves of the victorious half-mountain, it grew tender, entering the soft, dewy leaves. In that moment, the master of treasures, the mighty emperor, began the construction of his camp at the encampments of his army.” (Verse 195)
श्लोक ( Shlok ) 196
किसलयपुटभेदी देवदारुद्रुमाणाम सकृदमरसिन्धोः सीकरान्व्याधुनानः । श्रमसलिलममुष्णा दुष्णसम्भूष्णु जिष्णोः खचरगिरितटान्तान्निष्पतन्मातरिश्वा ॥१९६॥
देवदारु वृक्षोंके कोमल पत्तोंके संपुटको भेदन करनेवाला तथा गङ्गा नदीके जलकी बूंदोंको बार-बार हिलाता हुआ और विजयार्ध पर्वतके किनारेके अन्त भागसे आता हुआ वायु गर्मीसे उत्पन्न हुए महाराज भरतके पसीनेको दूर कर रहा था ॥१९६।।
“The breeze, piercing the tender clusters of deodar leaves, stirring the droplets of Ganga’s waters with gentle ripples, and flowing from the distant edge of the victorious half-mountain, was soothing the perspiration of King Bharata, caused by the heat, with its cool caress.” (Verse 196)
श्लोक ( Shlok ) 197
सपदिविजय सैन्यैर्निर्जितम्लेच्छखण्डः समुपहृतजयश्रीश्च क्रिणादिष्टमात्रात्” । जिनमिव जयलक्ष्मी सन्निधानं निधीनां परि वृढमुपत स्थौ नम्रमौलिश्चमूभृत् ॥१९७।
चक्रवर्तीके द्वारा आज्ञा प्राप्त होने मात्रसे ही जिसने अपनी विजयी सेनाओंके द्वारा बहुत शीघ्र समस्त म्लेच्छ खण्ड जीत लिये हैं और जो जयलक्ष्मीको ले आया है ऐसा सेनापति अपना मस्तक झुकाये हुए, निधियोंके स्वामी भरत महाराजके समीप आ उपस्थित हुआ । उस समय भरत ठीक जिनेन्द्रदेवके समान मालूम होते थे क्योंकि जिस प्रकार जिनेन्द्र देवके समीप सदा जयलक्ष्मी विद्यमान रहती है उसी प्रकार उनके समीप भी जयलक्ष्मी सदा विद्यमान रहती थीं ।॥१९७॥
“Upon receiving the command of the Emperor, the commander, who had swiftly conquered all the Mleccha territories with his victorious forces and brought along the goddess of victory, approached King Bharata, bowing his head in reverence. At that moment, Bharata seemed like Lord Jina Himself, for just as the goddess of victory is ever present at the side of Jina, so too was she ever present by the side of the mighty Emperor Bharata.” (Verse 197)
श्लोक ( Shlok ) 198
जित्वा म्लेच्छनृपौ विजित्य च “सुरं प्रालेयशैलेशिनं देव्यौं’च प्रणमय्य दिव्यमुभयं स्वीकृत्य भद्रासनम् । हेलानिर्जितखेचराद्रिरधिराट् प्रत्यन्तपालान् जयन् सेनान्या विजयी व्यजेष्ट निखिलां षट्षण्डभूषां भुवम् ll१९८ll
विजयी भरतने (चिलात और आनर्त नामके) दोनों म्लेच्छराजाओं को जीतकर हिमवान् पर्वतके स्वामी हिमवान् देवको कुछ ही समय में जीता, तथा (गङ्गा सिन्धु नामकी) दोनों देवियोंसे प्रणाम कराकर (उनके द्वारा दिये हुए) दो दिव्य भद्रासन स्वीकृत किये, और विजयार्ध पर्वतको लीला मात्रमें जीतकर उसके समीपवर्ती राजाओंको जीतते हुए उन्होंने सेनापतिके साथ-साथ छह खण्ड़ोंसे सुशोभित भरत क्षेत्रकी समस्त पृथिवी को जीता ॥१९८॥
“The victorious Bharata, having subdued the Mleccha kings Chilāta and Ānarta, soon conquered Himavān, the lord of the snowy peaks. Receiving respectful salutations from the divine maidens Gaṅgā and Sindhu, he graciously accepted from them two celestial thrones. With effortless ease, he triumphed over the victorious half-mountain, and vanquishing the surrounding kings, he, alongside his commander, brought the entire expanse of the Bharata region—adorned with its six divisions—under his sovereign rule.” (Verse 198)
श्लोक ( Shlok ) 199
पुण्यादित्ययमाहिमाह्वयगिरेरातोयधेः प्राक्तनादाचापा ” च्यपयोनिधेर्जलनिधेरा च प्रतीच्यादितः । चक्रेक्ष्मामरिचक्र भीकरकरश्चक्रेण चक्री वशे तस्मात्पुण्यमुपार्जयन्तु सुधियो जैने मते सुस्थिताः ॥१९९॥
जिनका हाथ अथवा टैक्स शत्रुओंके समूह में भय उत्पन्न करनेवाला है ऐसे चक्रवर्ती भरतने चक्ररत्नके द्वारा पुण्यसे ही हिमवान् पर्वतसे लेकर पूर्व दिशाके समुद्र तक और दक्षिण समुद्रसे लेकर पश्चिम समुद्र तक समस्त पृथिवी अपने वश की थी। इसलिये बुद्धिमान् लोगोंको जैन मतमें स्थिर रहकर सदा पुण्य उपार्जन करना चाहिये ।।१९९।।
“Emperor Bharata—whose hand, or rather his royal levy, struck fear into the hearts of hostile hosts—brought the entire earth under his dominion through the merit-born power of the Discus-jewel, from Mount Himavān to the eastern ocean, and from the southern sea to the western shores. Therefore, the wise should steadfastly adhere to the Jain path and ever strive to accumulate merit.” (Verse 199)
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे भरतोत्तरार्द्ध विजयवर्णनं नाम द्वात्रिंशत्तमं पर्व ॥३२॥
“Thus ends the thirty-second canto, describing the victorious exploits of Bharata in the latter half, in the Hindi translation of the Triṣaṣṭi-lakṣaṇa Mahāpurāṇa Saṅgraha, composed by the venerable Acharya Jinaseṇa.”
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन
पर्व 33 – श्लोक 1 से 11
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
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