आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 राजाओं की चिंता
वे सोचते थे कि भगवान घर नहीं लौटेंगे। वे परिवार और प्रजा को याद करने लगे। कुछ घर जाने को भगवान को नमस्कार करते थे। कुछ उनकी धीरता की प्रशंसा करते थे। वे सोचते थे कि भगवान राज्य लौटकर उन्हें अपमानित करेंगे। कुछ डरते थे कि भरत उन्हें कष्ट देगा। वे योग समाप्ति तक सहन करने को तैयार हुए। वे मानते थे कि भगवान उन्हें अंगीकृत करेंगे। कुछ धैर्य से दुःखी नहीं हुए।
English translation of Ādi purāṇa parv 18 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
अनिवर्ती गुरुः सोऽयं कोऽस्यान्वेतुं पदं क्षमः । देवः स्वच्छन्दचार्येष न देवचरितं चरेत् ॥३२॥
ये भगवान् अब घर को नहीं लौटेंगे, इनके पक्ष का अनुसरण करने के लिए कौन समर्थ है ये स्वच्छंदचारी है इसलिए इनका किया हुआ काम किसी को नहीं करना चाहिए ।।32।।
“The Lord will not return home now. Who is capable of following His path? He is an independent wanderer, and therefore, no one should attempt to imitate His actions.” ( 32)
श्लोक ( Shlok ) 33
कच्चिज्जीवति मे माता कञ्चिज्जीवति मे पिता। कच्चित् स्मरन्ति नः कान्ताः कच्चिन्नः सुस्थिताः प्रजाः ॥३३॥
क्या मेरी माता जीवित है, क्या मेरे पिता जीवित हैं, क्या मेरी स्त्री मेरा स्मरण करती है और क्या मेरी प्रजा अच्छी तरह स्थित है ? ।।33।।
“Is my mother alive? Is my father alive? Does my wife remember me? And is my people (subjects) well and prosperous?” ( 33)
श्लोक ( Shlok ) 34
इति स्वान्तर्गतं केचिदृच्छोद्यस्थातुमक्षमाः । अच्छ व्रज्य गुरोः पादौ प्रणता गमनोत्सुकाः ॥३४॥
इस प्रकार वहाँ ठहरने के लिए असमर्थ हुए कितने ही लोग अपने मन की बात स्पष्ट रूप से कहकर घर जाने की इच्छा से बार-बार भगवान् के सम्मुख जाकर उनके चरणों को नमस्कार करते थे ।।34।।
“In this way, many who were unable to stay there any longer openly expressed their thoughts. Wishing to return home, they repeatedly approached the Lord and bowed at His feet.” ( 34)
श्लोक ( Shlok ) 35
अहो गुरुरयं धीरः किमप्युद्दिश्य कारणम् । जितात्मा त्यक्तराज्यश्रीः पुनः संयोक्ष्यते तथा ॥३५॥
कोई कहते थे कि अहा, ये भगवान बड़े ही धीर-वीर हैं इन्होंने अपनी आत्मा को भी वश कर लिया है और इन्होंने किसी-न-किसी कारण को उद्देश्य कर राज्यलक्ष्मी का परित्याग किया है इसलिए फिर भी उससे युक्त होंगे अर्थात् राज्यलक्ष्मी स्वीकृत करेंगे ।।35।।
“Some said, ‘Ah! The Lord is truly steadfast and heroic. He has even conquered His own soul and, for some reason, has renounced the royal fortune. Therefore, He will surely regain it once again.'” (35)
श्लोक ( Shlok ) 36 – 37
यदायमद्य वा श्यो वा योगं संहृत्य धीरधीः। निजराज्यश्रिया भूयो योक्ष्यसे बदतां वरः ॥३६॥
तदास्मान्स्वामिकार्येंऽस्मिन् भग्नोत्साहान् कृतच्छलान् “निर्वासये दसत्कृत्य कुर्याद्वा’ ‘वीतसंपदः॥ ३७॥
स्थिर बुद्धि को धारण करने वाले और बोलने वालों में श्रेष्ठ भगवान् वृषभदेव जब आज या कल अपना योग समाप्त कर अपनी राज्यलक्ष्मी से पुन: युक्त होंगे तब भगवान् के इस कार्य में जिन्होंने अपना उत्साह भग्न कर दिया है अथवा छल किया है ऐसे हम लोगों को अपमानित कर अवश्य ही निकाल देंगे और संपत्तिरहित कर देंगे अर्थात् हम लोगों की संपत्तियाँ हरण कर लेंगे ।।36-37।।
“The Lord, Rishabhadeva, who possesses a steady mind and is supreme among speakers, will one day—whether today or tomorrow—complete His meditation and regain His royal fortune. At that time, He will surely disgrace and expel those of us who have lost our enthusiasm or acted deceitfully in His service, and He will strip us of our wealth.” ( 36-37)
श्लोक ( Shlok ) 38
भरतो वा गुरुं त्यक्त्वा गतानस्मान् विकर्शयेत् । तद्यावद्योगनिप्पत्तिर्विभोस्तावत्सहामहे ॥३८॥
अथवा यदि हम लोग भगवान् को छोड़कर जाते हैं तो भरत महाराज हम लोगों को कष्ट देंगे इसलिए जब तक भगवान् का योग समाप्त होता है तब तक हम लोग यहां सब कुछ सहन करें ।।38।।
“Or, if we abandon the Lord and leave, King Bharata will punish us. Therefore, until the Lord’s meditation is completed, we must endure everything here.” (38)
श्लोक ( Shlok ) 39
भगवानयमद्य श्वः सिद्ध योगो भवेद् ध्रुवम् । सिद्धेयोगे कृतक्लेशानस्मानभ्यव पत्स्यते ॥३९।।
यह भगवान अवश्य ही आज या कल में सिद्धयोग हो जायेंगे अर्थात् इनका योग सिद्ध हो जायेगा और योग के सिद्ध हो चुकने पर अनेक क्लेश सहन करने वाले हम लोगों को अवश्य ही अंगीकृत करेंगे―किसी न किसी तरह हमारी रक्षा करेंगे ।।39।।
This Lord will surely attain perfected yoga today or tomorrow. And once His yoga is perfected, He will certainly accept us, who have endured many hardships, and protect us in some way.” ( 39)
श्लोक ( Shlok ) 40
गुरोर्वा गुरुपुत्राद्वा पीडैवं नैव जातु नः । पूजासत्कार लाभैश्च प्रीतः संप्रीणयेत् स नः ॥४०॥
ऐसा करने से हम लोगों को न तो कभी भगवान से कोई पीड़ा होगी और न उनके पुत्र भरत से ही । किंतु प्रसन्न होकर वे दोनों ही पूजा-सत्कार और धनादि के लाभ से हम लोगों को संतुष्ट करेंगे ।।40।।
“By doing so, we will neither face any suffering from the Lord nor from His son, Bharata. Instead, both of them, being pleased, will satisfy us with honor, reverence, and wealth.” ( 40)
श्लोक ( Shlok ) 41
इति धीरतया केचिदन्तःक्षोभेऽप्य नातुराः । धीरयन्तोऽपि नात्मानं शेकुः स्थापयितुं स्थितौ ॥४१॥
इस प्रकार कितने ही मुनि अंतरंग में क्षोभ रहते हुए भी धीरता के कारण दु:खी नहीं हुए थे और कितने ही पुरुष आत्मा को धैर्य देते हुए भी उसे उचित स्थिति में रखने के समर्थ नहीं हो सके थे ।।41।।
“In this way, some sages, though experiencing inner turmoil, did not express their sorrow due to their steadfastness. However, many others, despite trying to console themselves, were unable to maintain their composure.” ( 41)
श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31