आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31 राजाओं की शिकायतें
राजा सोचते थे कि भगवान भोजन कर खड़े रहते तो ठीक था। वे उनके उद्देश्य को नहीं समझते थे। उन्हें लगा कि भगवान नीति नहीं जानते। वे तप से खिन्न हो गए। वे कंद-मूल से जीवन निर्वाह करने को तैयार हुए। कुछ तप से उदासीन हो दीन वचन बोले। कुछ मूर्ख मुनि भगवान के समीप खड़े हुए। वे कहते थे कि राज्य में वे भगवान के साथ चलते थे, अब तप में असमर्थ हैं। उन्होंने जल-भोजन नहीं लिया। वे भगवान को निर्दयी मानने लगे।
English translation of Ādi purāṇa parv 18 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
साध्यं किमथवोदिृश्य तिष्ठे दूर्ध्वज्ञुरीशिता । षाड्गुण्ये पठितो नैष गुणः कोपि महीक्षिताम् ॥२२॥
अथवा न जाने किस कार्य के उद्देश्य से भगवान इस प्रकार खड़े हुए हैं । राजाओं के जो संधि, विग्रह आदि छह गुण होते हैं उनमें इस प्रकार खड़े रहना ऐसा कोई भी गुण नहीं पढ़ा है ।।22।।
“Or, who knows for what purpose the Lord is standing in this manner? Among the six qualities of kings—peace treaty, war, etc.—standing in this way is not mentioned as any of those qualities.” ( 22)
श्लोक ( Shlok ) 23
अनेकोपद्रवाकीर्णे वनेऽस्मिन् रक्षया विना । तिष्टन्न नीतिविद् भर्ता रक्ष्यो ह्यात्मा प्रयत्नतः ॥२३॥
अनेक उपद्रवों से भरे हुए इस वन में अपनी रक्षा के बिना ही जो भगवान् खड़े हुए हैं उससे ऐसा मालूम होता है कि यह नीति के जानकार नहीं हैं क्योंकि अपनी रक्षा प्रयत्नपूर्वक करनी चाहिए ।।23।।
“In this forest, filled with numerous dangers, the Lord is standing without any protection. This makes it seem as if He is not knowledgeable in matters of strategy, for one should always strive to protect oneself with great effort.” ( 23)
श्लोक ( Shlok ) 24
प्रायः प्राणेषु निर्विण्णो देहमुत्त्रष्टु मीहते । निर्विण्णावयमेतेन तपसा प्राणहारिणा ॥२४॥
भगवान् प्राय: प्राणों से विरक्त होकर शरीर छोड़ने की चेष्टा करते हैं परंतु हम लोग प्राणहरण करने वाले इस तप से ही खिन्न हो गये हैं ।।24।।
“The Lord seems to be detached from His life and is attempting to abandon His body. However, we have become distressed by this very austerity, which takes away our own life force.” ( 24)
श्लोक ( Shlok ) 25
वन्यैः कशिपुभिस्तावत् कन्दमूलफलादिभिः । प्राणयात्रां करिप्यामो यावद्योगावधिर्गुरोः ॥ २५॥
इसलिए जब तक भगवान् के योग की अवधि है अर्थात् जब तक इनका ध्यान समाप्त नहीं होता तब तक हम लोग वन में उत्पन्न हुए कंद, मूल, फल आदि के द्वारा ही अपनी प्राणयात्रा (जीवन निर्वाह) करेंगे ।।25।।
“Therefore, as long as the duration of the Lord’s meditation continues, that is, until His contemplation ends, we shall sustain our lives only with the roots, tubers, and fruits found in the forest.” ( 25)
श्लोक ( Shlok ) 26
इति दीनतरं केचिन्निर्व्यपेक्षास्तपोविधौ ।ब्रुवाणाः कातरा दीनां वृत्तिं प्रत्युन्मुखाः स्थिताः ॥२६॥
इस प्रकार कितने ही कातर पुरुष तपस्या से उदासीन होकर अत्यंत दीन वचन कहते हुए दीनवृत्ति धारण करने के लिए तैयार हो गये ।।26।।
“In this way, many helpless men, disheartened by austerity, began speaking extremely sorrowful words and were ready to adopt a life of humility and dependence.” ( 26)
श्लोक ( Shlok ) 27
परे परापरज्ञं तं परितोऽभ्यर्णवर्तिनः । इति कर्तव्यतामूढाः तस्थुरन्तश्चलाचलाः ॥२७॥
हमें क्या करना चाहिए इस विषय में मूर्ख रहने वाले कितने ही मुनि पूर्वापर (आगा-पीछा) जानने वाले भगवान् के चारों ओर समीप ही खड़े हो गये और अपने अंतःकरण को कभी निश्चल तथा कभी चंचल करने लगे ।।।27।।
“Many sages, who remained ignorant about what should be done, stood close around the Lord, who knows the past and future. They wavered between steadiness and restlessness in their hearts.”।।27।।
श्लोक ( Shlok ) 28 – 29
शयाने शयितं भुक्तं भुञ्जाने तिष्ठति स्थितम् ।गतं गच्छति राज्यस्थे तपःस्थेऽप्यास्थितं तपः ॥२८॥
भृत्याचारोऽयमस्माभिः पूर्व सर्वोऽप्यनुष्ठितः । कालः कुलाभिमानस्य गतोऽद्य प्राणसंकटे ॥२९॥
वे मुनि परस्पर में कह रहे थे कि जब भगवान् राज्य में स्थित थे अर्थात् राज्य करते थे तब हम उनके सो जाने पर सोते थे, भोजन कर चुकने पर भोजन करते थे, खड़े होने पर खड़े रहते थे और गमन करने पर गमन करते थे तथा अब जब भगवान् तप में स्थित हुए अर्थात् जब इन्होंने तपश्चरण करना प्रारंभ किया तब हम लोगों ने तप भी धारण किया । इस प्रकार सेवक का जो कुछ कार्य है वह सब हम पहले कर चुके हैं परंतु हमारे कुलाभिमान का वह समय आज हमारे प्राणों को संकट देने वाला बन गया है अथवा इस प्राण संकट के समय हमारे कुलाभिमान का वह काल नष्ट हो गया है ।।28-29।।
“The sages were saying among themselves: ‘When the Lord was ruling the kingdom, we followed His ways—we slept when He slept, ate after He had eaten, stood when He stood, and walked when He walked. And now that the Lord has embraced austerity, we too have taken up asceticism. Thus, we have fulfilled all the duties of a devoted servant. However, the time when we took pride in our lineage has now become a source of distress for our very lives, or perhaps, in this moment of life-threatening hardship, our pride in our lineage has perished.'” ( 28-29)
श्लोक ( Shlok ) 30
वने प्रवसप्तोऽस्माभिर्न भुक्तं जीवनं प्रभोः । यावच्छक्ता स्थितास्तावदशक्ताः किं नु कुर्महे ॥३०॥
जब से भगवान ने वन में प्रवेश किया है तब से हमने जल भी ग्रहण नहीं किया है । भोजन पान के बिना ही जब तक हम लोग समर्थ रहे तब तक खड़े रहे परंतु अब सामर्थ्यहीन हो गये हैं इसलिए क्या करें ।।30।।
“Since the Lord has entered the forest, we have not even consumed water. Without food or drink, we stood as long as we had the strength, but now, having become weak and powerless, what should we do?” ( 30)
श्लोक ( Shlok ) 31
मिथ्या कारयते योगं गुरु रस्मासु निर्देयः। स्पर्धा कृत्वा सहैतेन मर्तव्यं किमशक्तकैः ॥३१॥
मालूम होता है कि भगवान् हम पर निर्दय हैं―कुछ भी दया नहीं करते, वे हम से झूठमूठ ही तपस्या कराते हैं, इनके साथ बराबरी की स्पर्धा कर क्या हम असमर्थ लोग को मर जाना चाहिए? ।।31।।
“It seems that the Lord is merciless toward us—He shows us no compassion. He is making us perform austerities in vain. Competing with Him in asceticism, should we, who are weak and powerless, simply perish?” ( 31)
श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21