आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
श्लोक 162 से 171 पर्वत की शोभा
पर्वत स्फटिक भूमियों से लाल था। गुफाओं में सिंह निर्झर से थे। देव-देवियाँ संभोग और विनोद करते थे। शिखरों पर निर्झर पताकाएँ से थे। चंद्रकांतमणियाँ पानी बहाती थीं। पर्वत सुमेरु से हँसता था। वह विद्याधरों और नदियों से विजयी था।
English translation of Ādi purāṇa parv 18 – Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
श्रेणीद्वयं वितत्य स्वं पक्षद्वयमिवायत्तम् । विद्याधराधिवसती’ र्धारयन्तं पुरीः पराः ॥१६२॥
उस पर्वत की उत्तर और दक्षिण ऐसी दो श्रेणियाँ थीं जो कि दो पंखों के समान बहुत ही लंबी थीं और उन श्रेणियों में विद्याधरों के निवास करने के योग्य अनेक उत्तम-उत्तम नगरियाँ थी ।।162।।
That mountain had two ranges, one to the north and one to the south, which were very long, like two wings. In those ranges, there were many excellent cities, suitable for the residence of the Vidyadharas. ॥162॥
श्लोक ( Shlok ) 163
अध्यधित्यकमाबद्धकेतनैरिव निर्झरान् । दधद्भिः शिखरैः खाग्रं लङ्घयन्तमिवोच्छ्रितैः ॥१६३॥
उस पर्वत के शिखरों पर जो अनेक निर्झरने बह रहे थे उनसे वे शिखर ऐसे जान पड़ते थे मानो उनके ऊपरी भाग पर पताकाएँ ही फहरा रही हों और ऐसे-ऐसे ऊँचे शिखरों से वह पर्वत ऐसा मालूम होता था मानो आकाश के अग्रभाग का उल्लंघन ही कर रहा हो ।।163।।
On the peaks of that mountain, numerous streams were flowing, making the peaks appear as if flags were fluttering on their summits. With such towering peaks, the mountain seemed as if it were surpassing the very forefront of the sky. ॥163॥
श्लोक ( Shlok ) 164
अच्छिन्नधारमाच्छे “दान्निर्झरैः शिखरस्त्रुतैः । जगन्नाडीमिवोन्मातुं विधृतायतदण्डकम् ॥१६४॥
शिखर से लेकर जमीन तक जिनकी अखंड धारा पड़ रही है ऐसे निर्झनों से वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो लोकनाड़ी को नापने के लिए उसने एक लंबा दंड ही धारण किया हो ।।164।।
With uninterrupted streams flowing from the peaks to the ground, that mountain appeared as if it had taken up a long staff to measure the cosmic expanse. ॥164॥
श्लोक ( Shlok ) 165
चन्द्रकान्तोपलैश्चन्द्रकरामर्शादनुक्षपम् । क्षरद्भिर्दावभीत्येव सिञ्चन्तं स्वतटद्रुमान् ॥१६५॥
चंद्रमा की किरणों के स्पर्श से जिनसे प्रत्येक रात्रि को पानी की धारा बहने लगती है ऐसे चंद्रकांतमणियों के द्वारा वह पर्वत ऐसा जान पड़ता है मानो दावानल के डर से अपने किनारे के वृक्षों को ही सींच रहा हो ।।165।।
With moonstones that, upon the touch of the moon’s rays, release streams of water each night, the mountain appeared as if it were watering the trees along its edges out of fear of a forest fire. ॥165॥
श्लोक ( Shlok ) 166
शशिकान्तोपलेरिन्दु तारकाः कुमुदोत्करैः । उडूनि निर्झरच्छेदैः न्यक्कृत्येवोच्चकैः स्थितम् ॥१६६॥
वह पर्वत चंद्रकांतमणियों से चंद्रमा को, कुमुदों के समूह से ताराओं को और निर्झरनों के छींटों से नक्षत्रों को नीचा दिखाकर ही मानो बहुत ऊंचा स्थित था ।।166।।
That mountain seemed to stand exceptionally high, as if outshining the moon with its moonstones, the stars with clusters of lotus flowers, and the constellations with the sparkling sprays of its waterfalls. ॥166॥
श्लोक ( Shlok ) 167
सितैर्घनैस्तटीः शुभ्रः श्रयद्भिरनिलाहृतैः । कृतोपचयमारुद्धवना भोगैर्घनात्यये ॥१६७॥
शरद् ऋतु में जब कभी वायु से टकराये हुए सफेद बादल वन-प्रदेशों को व्याप्त कर उसके सफेद किनारों पर आश्रय लेते थे तब उन बादलों से वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो कुछ बढ़ गया हो ।।167।।
In the autumn season, whenever white clouds, driven by the wind, spread over the forest regions and rested along its white edges, the mountain appeared as if it had grown in size. ॥167॥
श्लोक ( Shlok ) 168
प्रोतुङ्गो मेरुरेकान्तान्नमद्वत्स धृतायतिः । इति तोषादिवोन्मुक्त प्रहासं निर्झरारवैः ॥ १६८॥
उस पर्वत पर जो निर्झरनों के शब्द हो रहे थे उनसे वह ऐसा मालूम होता था मानो सुमेरु पर्वत केवल ऊँचा ही है हमारे समान लंबा नहीं है इसी संतोष से मानो जोर का शब्द करता हुआ हँस रहा हो ।।168।।
The sounds of the waterfalls on that mountain made it seem as if it were laughing loudly, rejoicing in the thought that Mount Sumeru might be taller, but it was not as vast and extensive as itself. ॥168॥
श्लोक ( Shlok ) 169
सुविशुद्धोऽहमामुलादाश्रृङ्गं रजतोच्चयः । शुद्धाः कुछाद्रयो नैवमितीवाविष्कृतोन्नतिम् ॥१६९॥
मैं बहुत ही शुद्ध हूँ और जड़ से लेकर शिखर तक चाँदी-चाँदी का बना हुआ हूँ, अन्य कुलाचल मेरे समान शुद्ध नहीं हैं, यह समझकर ही मानो उसने अपनी ऊँचाई प्रकट की थी ।।169।।
“I am extremely pure and made entirely of silver from base to peak. Other mountains of the Kulachal range are not as pure as I am.”—It was as if the mountain had revealed its great height with this thought in mind. ॥169॥
श्लोक ( Shlok ) 170
खचरैः सह संबन्धाद् गंगासिन्धोरधः स्थितेः । जित्वेव कुलकुत्कीलान् बिभ्राणं विजयार्द्धताम् ॥१७०॥
उस पर्वत का विद्याधरों के साथ सदा संसर्ग रहता था और गंगा तथा सिंधु नाम की दोनों नदियां उसके नीचे होकर बहती थीं । इन्हीं कारणों से उसने अन्य कुलाचलो को जीत लिया था तथा इसी कारण से वह विजयार्ध इस सार्थक नाम को धारण कर रहा था । भावार्थ―अन्य कुलाचलों पर विद्याधर नहीं रहते हैं और न उनके नीचे गंगा सिंधु ही बहती हैं बल्कि हिमवत् नामक कुलाचल के ऊपर बहती हैं । इन्हीं विशेषताओं से मानो उसने अन्य कुलाचलों पर विजय प्राप्त कर ली थी और इस विजय के कारण ही उसका विजयार्ध (विजय+आ+ऋद्धः) ऐसा सार्थक नाम पड़ा था ।।170।।
That mountain was always in the company of the Vidyadharas, and both the Ganga and Sindhu rivers flowed beneath it. Because of these qualities, it had triumphed over other mountains of the Kulachal range and thus rightfully bore the name Vijayardha (meaning “one enriched by victory”).
Explanation: Other mountains of the Kulachal range neither had the presence of the Vidyadharas nor had the Ganga and Sindhu flowing beneath them—rather, the Ganga flowed over the Himalayas. These unique features symbolized its superiority over other mountains, and it was due to this triumph that it was aptly named Vijayardha (Vijaya + ā + ṛddha, meaning “prosperous through victory”). ॥170॥
श्लोक ( Shlok ) 171
अचलस्थितिमुतुङ्ग “शुद्धिभाजं जगद्गुरुम् । जिनेन्द्रमिव नाकीन्द्रेः शश्वदाराध्यमादरात् ॥१७१॥
इंद्र लोग निरंतर उस पर्वत की जिनेंद्रदेव के समान आराधना करते थे क्योंकि जिस प्रकार जिनेंद्रदेव अचल स्थित हैं अर्थात् निश्चल मर्यादा को धारण करने वाले हैं उसी प्रकार वह पर्वत भी अचल स्थित था अर्थात् सदा निश्चल रहने वाला था, जिस प्रकार जिनेंद्रदेव उत्तंग अर्थात् उत्तम हैं उसी प्रकार वह पर्वत भी उत्तुंग अर्थात् ऊँचा था, जिनेंद्रदेव जिस प्रकार शुद्धिभाक् हैं अर्थात राग, द्वेष आदि कर्म विकार-रहित होने के कारण निर्मल हैं उसीप्रकार वह पर्वत भी शुद्धिभाक् था अर्थात् भूमि, कंटक आदि से रहित होने के कारण स्वच्छ था और जिस प्रकार जिनेंद्रदेव जगत् के गुरु हैं इसी प्रकार वह पर्वत भी जगत् में श्रेष्ठ अथवा उसका गौरव स्वरूप था ।।171।।
The gods, including Indra, continuously worshiped that mountain as they did Lord Jinedra, because of the striking similarities between them. Just as Lord Jinedra is immovable, upholding an unwavering state of serenity, so too was the mountain, standing firm and motionless. Just as Lord Jinedra is exalted and supreme, the mountain was also towering and magnificent. Just as Lord Jinedra is pure, free from passions like attachment and aversion, the mountain was also pure, free from impurities like thorns and rough terrain. And just as Lord Jinedra is the spiritual teacher of the world, the mountain, in its grandeur, was a symbol of greatness and reverence in the world. ॥171॥
श्लोक 172 से 181
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