आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11
श्लोक 12 से 21 संसार की विनश्वरता पर चिंतन
भगवान ने संसार की नश्वरता पर चिंतन किया—लक्ष्मी, यौवन, शरीर सब चंचल हैं। नरकों और तिर्यंच योनि में जीव अनंत दुख भोगता है। यह संसार दुखों से भरा है, और सुख दुर्लभ है।
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
अहो जगदिदं भङ्गि श्रीस्तटि द्वल्लरीचला । यौवनं वपुरारोग्यमैश्वर्यं व चलाचलम् ॥१२॥
बड़े आश्चर्य की बात है कि यह जगत् विनश्वर है, लक्ष्मी बिजलीरूपी लता के समान चंचल है, यौवन, शरीर, आरोग्य और ऐश्वर्य आदि सभी चलाचल हैं ।।12।।
“It is truly astonishing that this world is perishable, fortune is as fleeting as a streak of lightning, and youth, the body, health, and wealth—all are transient and ever-changing.”
श्लोक ( Shlok ) 13
रूपयौवन सौभाग्यमदोन्मत्तः पृथग्जनः । बध्नाति स्थायिनीं बुद्धिं किं न्वत्र न विनश्वरम् ॥१३।।
रूप, यौवन और सौभाग्य के मद से उन्मत्त हुआ अज्ञ पुरुष इन सबमें स्थिर बुद्धि करता है परंतु उनमें कौन-सी वस्तु विनश्वर नहीं है ? अर्थात् सभी वस्तुएँ विनश्वर हैं ।।13।।
“Deluded by the pride of beauty, youth, and good fortune, an ignorant person considers these to be permanent. But what among them is truly imperishable? In reality, everything is transient.”
श्लोक ( Shlok ) 14
संध्यारागनिभा रूपशोभा तारुण्यमुज्ज्वलम् । पल्लवच्छविवत् सद्यः परिम्लानिमुपाश्नुते ॥१४॥
यह रूप की शोभा संध्या काल की लाली के समान क्षणभर में नष्ट हो जाती है और उज्ज्वल तारुण्य अवस्था पल्लव की कांति के समान शीघ्र ही म्लान हो जाती है ।।14।।
“This beauty, like the redness of the evening sky, fades away in a moment, and the radiance of youth withers quickly, just like the freshness of a tender leaf.”
श्लोक ( Shlok ) 15
यौवनं वनवल्लीनामिव पुष्पं परिक्षयि । विषवल्लीनिभा भोगसंपदो भङ्गि जीवितम् ॥१५॥
वन में पैदा हुई लताओं के पुष्पों के समान यह यौवन शीघ्र ही नष्ट हो जाने वाला है, भोग संपदाएं विषवेल के समान हैं और जीवन विनश्वर है ।।15।।
“This youth is as fleeting as the blossoms of creepers growing in the forest; worldly pleasures and riches are like poisonous vines, and life itself is perishable.”
श्लोक ( Shlok ) 16
घटिका जलधारेव गलत्यायुःस्थितिर्द्रुतम् । शरीरमिदमस्यन्तपूतिगन्धि जुगुप्सितम् ॥१६॥
यह आयु की स्थिति घटीयंत्र के जल की धारा के समान शीघ्रता के साथ गलती जा रही है―कम होती जा रही है और यह शरीर अत्यंत दुर्गंधित तथा घृणा उत्पन्न करने वाला है ।।16।।
“This lifespan is swiftly diminishing, like the flow of water from a leaking vessel, and this body itself is full of foul odor and is inherently repulsive.”
श्लोक ( Shlok ) 17
निःसारे खलु संसारे सुखलेशोपि दुर्लभः । दुःखमेव महत्तस्मिन् सुखं. काम्यत्ति मन्दधीः ॥१७॥
यह निश्चय है कि इस असार संसार में सुख का लेश मात्र भी दुर्लभ है और दुःख बड़ा भारी है फिर भी आश्चर्य है कि मंदबुद्धि पुरुष उसमें सुख की इच्छा करते हैं ।।17।।
“It is certain that in this fleeting world, even the slightest trace of true happiness is rare, while suffering is immense. Yet, it is astonishing that foolish people still desire happiness in it.”
श्लोक ( Shlok ) 18
नरकेषु यदेतेन दुःखमासेवितं महत् । तच्चेत्स्मर्येत कः कुर्याद् भोगेषु स्पृहयालुताम् ॥१८॥
इस जीव ने नरकों में जो महान् दुःख भोगे हैं यदि उनका स्मरण भी हो जाये तो फिर ऐसा कौन है, जो उन भोगों की इच्छा करे ।।18।।
“If one were to remember the immense suffering endured in the hellish realms, then who would still desire worldly pleasures?”
श्लोक ( Shlok ) 19
नूनमार्तधियां भुक्ता भोगाः सर्वेऽपि देहिनाम् । दुःखरूपेण पच्यन्ते निरये निरयोदये ॥१९॥
निरंतर आर्तध्यान करने वाले जीव जितने कुछ भोगों का अनुभव करते हैं वे सब उन्हें अत्यंत असाता के उदय से भरे हुए नरकों में दुःखरूप होकर उदय होते हैं ।।19।।
“The pleasures experienced by beings who are constantly engrossed in distressful thoughts ultimately manifest as intense suffering in the hellish realms, arising from the fruition of extremely inauspicious karmas.”
श्लोक ( Shlok ) 20
स्वप्नजं च सुखं नास्ति नरके दुःखभूयसि । दुःखं दुःखानुबन्ध्येव यतस्तत्र दिवानिशम् ॥२०॥
दुःखों से भरे हुए नरकों में कभी स्वप्न में भी सुख प्राप्त नहीं होता क्योंकि वहाँ रात-दिन दुःख ही दुःख रहता है और ऐसा दुःख जो कि दुःख के कारणभूत असाता कर्म का बंध करने वाला होता है ।।20।।
“In the hellish realms filled with suffering, even in dreams, no happiness can be found, for there, day and night, only pain exists—such immense suffering that it further leads to the bondage of inauspicious karma, which becomes the cause of even more misery.”
श्लोक ( Shlok ) 21
ततो विनिःसृतो जन्तुस्तैरश्चं दुःखमायतम्। स्वसात्करोति ” मन्दात्मा नाना योनिषु पर्यटन् ॥२१॥
उन नरकों से किसी तरह निकलकर यह मूर्ख जीव अनेक योनियों में परिभ्रमण करता हुआ तिर्यंच गति के बड़े भारी दुःख भोगता है ।।21।।
“Somehow escaping from those hellish realms, this ignorant being wanders through numerous life forms, suffering immense misery in the animal realm.”
श्लोक 22 से 31
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11