प्रणय और क्रीड़ा
श्रीमती का कटिभाग अन्य पुरुषों को अप्राप्य था। प्रणय-कोप में वह वज्रजंघ के केश खींचती और कर्णोत्पल से ताड़न करती थी, जिससे उसे सुख मिलता था। रति-श्रम को झरोखे की वायु शांत करती थी। श्रीमती का मुख, नेत्र, और स्तन उसे आनंद देते थे। वह उद्यानों और लतागृहों में क्रीड़ा करता था।
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 112 से 121 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 13 to 21
श्लोक ( Shlok ) 13
काञ्चीदाममहानागसंरुद्धेऽन्यैर्दुरासदे । रेमे तस्याः कटिस्थाने महतीव निधानके ।।१३।।
करधनी रूपी महासर्प से घिरे हुए होने के कारण अन्य पुरुषों को अप्राप्य श्रीमती के कटिभागरूपी बड़े खजाने पर वज्रजंघ निरंतर क्रीड़ा किया करता था ।।13।।
Encircled by the great serpent-like girdle, Shrimati’s waist region was an invaluable treasure inaccessible to other men. Yet Vajrajangha constantly reveled and played there.
श्लोक ( Shlok ) 14
कच ग्रहैर्मूदीयोभि कर्णोत्पलविताडितैः । अभूत् प्रणयकोपोऽस्या यूनः प्रीत्यै सुखाय च ।।१४।।
जब कभी श्रीमती प्रणयकोप से कुपित होती थी तब वह धीरे-धीरे वज्रजंघ के केश पकड़कर खींचने लगती थी तथा कर्णोत्पल के कोमल प्रहारों से उसका ताड़न करने लगती थी । उसकी इन चेष्टाओं से वज्रजंघ को बड़ा ही संतोष और सुख होता था ।।14।।
Whenever Shrimati became angry in loving displeasure, she would gently pull Vajrajangha’s hair and playfully strike him with soft blows of her lotus-like hands. These gestures brought great satisfaction and joy to Vajrajangha.
श्लोक ( Shlok ) 15
गलिताभरणम्यासे रतिघर्माम्बुकर्दमे । तस्यासीध्दति स्नेऽस्याः सुखारकर्षः स कामिनाम् ।।15।।
परस्पर की खीचातानी से जिसके आभरण अस्त-व्यस्त होकर गिर पड़े हैं तथा जो रतिकालीन स्वेद-बिंदुओं से कर्दम युक्त हो गया है ऐसे श्रीमती के शरीर में उसे बड़ा संतोष होता था । सो ठीक है कामीजन इसी को उत्कृष्ट सुख समझते हैं ।।15।।
He found great satisfaction in Shrimati’s body, where ornaments had become disheveled and fallen due to their playful tussles, and sweat droplets from their lovemaking had left it glistening. Indeed, this is natural, as passionate souls consider such experiences the height of pleasure.
श्लोक ( Shlok ) 16
सौधवातायनोपान्तकृतशय्यौ रतिश्रमम् । अपनिन्यतुरास्पृष्टौ तौ शनैर्मृदुमारुतैः ॥१६॥
राजमहल में झरोखे के समीप ही इनकी शय्या थी इसलिए झरोखे से आने वाली मंद-मंद वायु से इनका रति-श्रम दूर होता रहता था ।।16।।
Their bed was near the palace window, and the gentle breeze flowing through it constantly eased their fatigue from lovemaking.
श्लोक ( Shlok ) 17
तस्या मुखेन्दुराह्लादं लोचने नयनोत्सवम् । स्तनौ स्पर्शसुखासंगमस्य तेनुर्दुरासदम् ।।१७ ॥
। श्रीमती का मुखरूपी चंद्रमा वज्रजंघ के आनंद को बढ़ाता था, उसके नेत्र, नेत्रों का सुख विस्तृत करते थे तथा उसके दोनों स्तन अपूर्व स्पर्श-सुख को बढ़ाते थे ।।17।।
Shrimati’s moon-like face enhanced Vajrajangha’s joy, her eyes extended the pleasure of his gaze, and her two breasts heightened the unparalleled delight of touch.
श्लोक ( Shlok ) 18
तत्कन्यामृतमासाद्य दिव्यौषधमिवातुरः । स काले सेवमानोऽमत सुखी निर्मदनज्वरः ।।१८।।
जिस प्रकार कोई रोगी पुरुष उत्तम औषध पाकर समय पर उसका सेवन करता हुआ ज्वर आदि से रहित होकर सुखी हो जाता है उसी प्रकार वज्रजंघ भी उस कन्यारूपी अमृत को पाकर समय पर उसका सेवन करता हुआ काम-ज्वर से रहित होकर सुखी हो गयी था ।।18।।
Just as a sick person becomes free from ailments like fever and attains happiness by receiving and taking excellent medicine at the right time, similarly, Vajrajangha, having obtained Shrimati, the nectar-like maiden, and enjoying her at the right time, became free from the fever of desire and found happiness.
श्लोक ( Shlok ) 19 –20
कदाचिन्नन्दनस्पर्द्धिपराद्धर्यतरुशोभिषु । गृहोद्यानेषु रमेऽसौ कान्तयामा महर्द्धिषु ॥१९॥
कदाचिद् बहिरुद्याने लतागृहविराजिनि । क्रीडाद्रिसहितेऽदीव्यत् प्रियया स सममुत्सुकः ।।२०।।
वह वज्रजंघ कभी तो नंदन वन के साथ स्पर्धा करनेवाले श्रेष्ठ वृक्षों से शोभायमान और महाविभूति से युक्त घर के उद्यानों में श्रीमती के साथ रमण करता था और कभी लतागृहों (निकुंजों) से शोभायमान तथा क्रीड़ा-पर्वतों से सहित बाहर के उद्यानों में उत्सुक होकर क्रीड़ा करता था ।।19-20।।
Vajrajangha sometimes delighted with Shrimati in the gardens of his home, adorned with magnificent trees rivaling Nandana Vana and filled with great splendor. At other times, he eagerly played in the outer gardens, beautified by vine-covered arbours and playful mounds.
श्लोक ( Shlok ) 21
नदीपुलिनदेशेषु कदाचिद् विजहार सः । स्वयंगलत्संफुल्ललताकुसुमशोभिषु ।।२१।।
कभी फूली हुई लताओं से झरे हुए पुष्पों से शोभायमान नदीतट के प्रदेशों में विहार करता था ।।21।।
Sometimes he wandered along the riverbanks, adorned with blossoms scattered from blooming vines.
श्लोक 22 से 31
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 |
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 |
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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