आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
श्लोक 72 से 81 भगवान का स्वागत और श्रेयान्स का दान
दोनों ने अर्घ चढ़ाया और प्रदक्षिणा दी। वे हर्ष से रोमांचित हुए। भगवान के बीच वे सुमेरु से शोभायमान थे। श्रेयान्स को जातिस्मरण हुआ। उसने पूर्व भव और आहार दान स्मरण किया। उसने प्रातःकाल भगवान को आहार दान दिया। श्रद्धा सहित नवधा भक्ति से दान दिया।
English translation of Ādi purāṇa parv 20 – Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
साध्यं पाद्यं निवेद्याघ्रयोः परीत्य च जगद्गुरुम् । तौ परं जग्मतुस्तोषं निधाविव गृहागते ॥७२॥
उन्होंने भगवान् के चरणकमलों में अर्घसहित जल समर्पित किया, अर्थात् जल से पैर धोकर अर्घ चढ़ाया, जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव की प्रदक्षिणा दी और यह सब कर वे दोनों ही इतने संतुष्ट हुए मानो उनके घर निधि ही आयी हो ।।72।।
“They offered water along with an arghya at the Lord’s lotus feet, meaning they washed His feet with water and then presented the arghya. Circumambulating the Universal Teacher, Lord Rishabhadeva, they both felt so deeply satisfied as if a great treasure had arrived at their home.” ( 72)
श्लोक ( Shlok ) 73
तौ देवदर्शनात् प्रीतौ गात्रे पुलकमूहतुः । मलयानिलसंस्पर्शाद् भूरुहावङ्कुरं यथा ॥७३॥
जिस प्रकार मलयानिल के स्पर्श से वृक्ष अपने शरीर पर अंकुर धारण करने लगते हैं उसी प्रकार भगवान् के दर्शन से हर्षित हुए वे दोनों भाई अपने शरीर पर रोमांच धारण कर रहे थे ।।73।।
“Just as trees sprout new buds upon being touched by the Malaya breeze, similarly, both brothers, overwhelmed with joy at the sight of the Lord, experienced their bodies bristling with goosebumps.” ( 73)
श्लोक ( Shlok ) 74
भगवन्मुखसंप्रेक्षा विकसन्मुखपङ्कजौ । विबुद्धकमलौ प्रातस्तनौ” पद्माकराविव ॥७४॥
भगवान का मुख देखकर जिनके मुखकमल विकसित हो उठे हैं ऐसे वे दोनों भाई ऐसे जान पड़ते थे मानो जिन में कमल फूल रहे हों ऐसे प्रातःकाल के दो सरोवर ही हों ।।74।।
“Seeing the Lord’s face, their lotus-like faces blossomed with joy. Both brothers appeared as if they were two morning lakes, in which lotuses were blooming.” ( 74)
श्लोक ( Shlok ) 75
प्रमोदनिर्भरौ भक्तिभरानमितमस्तकौ । प्रश्रयप्रशमौ भूर्ताविव तो रेजतुस्तदा ॥७५॥
उस समय वे दोनों हर्ष से भरे हुए थे और भक्ति के भार से दोनों के मस्तक नीचे की ओर झुक रहे थे इसलिए ऐसे सुशोभित होते थे मानो मूर्तिधारी विनय और शांति ही हों ।।75।।
“At that moment, both were filled with joy, and the weight of their devotion caused their heads to bow downward. Thus, they appeared as if they were the very embodiments of humility and peace.” ( 75)
श्लोक ( Shlok ) 76
भगवच्चरणोपान्ते तौ तदा भजतुः श्रियम् । सौधर्मैशानकल्पेशौ विभुं द्रष्टुमिवागतौ ॥७६॥
भगवान् के चरणों के समीप वे दोनों ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो भगवान के दर्शन करने के लिए आये हुए सौधर्म और ऐशान स्वर्ग के इंद्र ही हों ।।76।।
“Both of them appeared so radiant near the Lord’s feet, as if they were the Indras of the Saudharma and Aishana heavens who had come to behold the Lord.” ( 76)
श्लोक ( Shlok ) 77
पर्यन्त वर्तिनोर्मध्ये तयोर्मर्ता स्म राजते। महामेरुरिवोद्भूतो मध्ये निषधनीलयोः ॥७७॥
दोनों ओर खड़े हुए सोमप्रभ और श्रेयान्सकुमार के बीच में स्थित भगवान् वृषभदेव ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो निषध और नीलपर्वत के बीच में खड़ा हुआ सुमेरुपर्वत ही हो ।।77।।
Standing between Somaprabha and Prince Shreyans, Lord Rishabhadeva appeared as resplendent as Mount Sumeru standing between the Nishadha and Neela mountains.(77)
श्लोक ( Shlok ) 78
संप्रेक्ष्य भगवन्द्रू पं श्रेयाञ्जातिस्मरोऽभवत् । ततो दाने मर्तिं चक्रे संस्कारैः प्राक्तनैर्युतः ॥७८॥
भगवान् का रूप देखकर श्रेयान्सकुमार को जातिस्मरण हो गया जिससे उसने अपने पूर्व पर्यायसंबंधी संस्कारों से भगवान् के लिए आहार देने की बुद्धि की ।।78।।
“Upon seeing the Lord’s divine form, Prince Shreyans regained memories of his past lives. Through the impressions of his previous births, he understood the proper way to offer alms to the Lord.” ( 78)
श्लोक ( Shlok ) 79
श्रीमती वज्रजङ्गादिवृत्तान्तं सर्वमेव तत् । तदा चरणयुग्माय दत्तं दानं च सोऽध्यगात् ॥७९॥
उसे श्रीमती और वज्रजंघ आदि का वह समस्त वृत्तांत याद हो गया तथा उसी भव में उन्होंने जो चारण ऋद्धिधारी दो मुनियों के लिए आहार दिया था उसका भी उसे स्मरण हो गया ।।79।।
“He recalled the entire account of Shrimati, Vajrajangha, and others, as well as the offering of alms he had made in that very lifetime to two sages who possessed Charan Riddhi (supernatural powers of movement).” ( 79)
श्लोक ( Shlok ) 80
सती गोचार वेलेयं दानयोग्या मुनीशिनाम् । तेन भर्त्रै ददे दानमिति निश्चित्य पुण्यधीः ॥८०॥
यह मुनियों के लिए दान देने योग्य प्रातःकाल का उत्तम समय है ऐसा निश्चय कर पवित्र बुद्धि वाले श्रेयान्सकुमार ने भगवान् के लिए आहार दान दिया ।।80।।
“Realizing that this was the auspicious morning time suitable for offering alms to ascetics, the pure-hearted Prince Shreyans made an offering of food to the Lord.” ( 80)
श्लोक ( Shlok ) 81
श्रद्धादिगुणसंपन्नः पुण्यैर्नवभिरन्वितः । प्रादाद्भगवते दानं श्रेयान् दानादि तीर्थकृत् ॥८१॥
दान के आदि तीर्थ की प्रवृत्ति करने वाले श्रेयान्सकुमार ने श्रद्धा आदि सातों गुणसहित और पुण्यवर्धक नवधा भक्तियों से सहित होकर भगवान् के लिए दान दिया था ।।81।।
“Prince Shreyans, who initiated the first sacred tradition of almsgiving, made the offering to the Lord with the seven virtues, including faith, and with the ninefold devotion that enhances merit.” ( 81)
श्लोक 82 से 101
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71