भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131 मणिमाली का पिता को उपदेश
मणिमाली ने मुनि से पिता के अजगर होने का वृत्तांत जाना और भंडार में जाकर उन्हें संबोधित किया। उसने कहा कि धन और विषयासक्ति से वे कुयोनि में आए। विषय कटु, दुर्जर, और धिक्कार योग्य हैं। वे संसार में परिभ्रमण कराते हैं, शिकारी के गाने समान ठगते हैं, और राग बढ़ाते हैं। विषय चंचल और विचित्र हैं, आत्मा को अटवी में भटकाते हैं। मुनियों को नमस्कार है जो इनसे विमुख रहते हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 5- Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122 – 124
स जातिस्मरतां गत्वा माण्डागारिकवद् भृशम् । तत्प्रवेशे निजं सूनुमन्यमंस्त न चापरम् ॥१२२॥
उसे जातिस्मरण भी हो गया था इसलिए वह भंडारी की तरह भंडार में केवल अपने पुत्र को ही प्रवेश करने देता था अन्य को नहीं ।।122।।
He also regained his memory of his past life, and as a result, like a storekeeper, he allowed only his son to enter the storehouse, not anyone else.”
श्लोक ( Shlok ) 123
अन्येद्यु स्वधिज्ञानलोचनान्मुनिपुङ्गवात् । मणिमाली पितुर्शात्वा तं वृत्तान्तमशेषतः ।।१२३।।
पितृभक्त्या स तन्मूर्च्छामपहर्तुमनाः सुधीः । “शयोरग्ने शनैः स्थित्वा स्नेहार्द्रा गिरमभ्यधात् ।।१२४।।
एक दिन अतिशय बुद्धिमान् राजा मणिमाली किन्हीं अवधिज्ञानी मुनिराज से पिता के अजगर होने आदि का समस्त वृत्तांत मालूम कर पितृभक्ति से उनका मोह दूर करने के लिए भंडार में गया और धीरे से अजगर के आगे खड़ा होकर स्नेहयुक्त वचन कहने लगा ।।123-124।।
“One day, the highly intelligent King Manimali learned the entire story of his father’s transformation into a serpent, and so on, from an enlightened sage. To rid his father of attachment through filial devotion, he went to the storehouse. Quietly standing in front of the serpent, he began to speak affectionate words.”
श्लोक ( Shlok ) 125
पितः पतितवानस्यां कुयोनावधुना त्वकम् । विषयार्सङ्गदोषेण धृतमूर्च्छा धनर्दिषु ॥१२५॥
हे पिता, तुमने धन, ऋद्धि आदि में अत्यंत ममत्व और विषयों में अत्यंत आसक्ति की थी इसी दोष से तुम इस समय इस कुयोनि में सर्पपर्याय में आकर पड़े हो ।।125।।
“O Father, you had an intense attachment to wealth, prosperity, and worldly pleasures, and it is due to this fault that you have now fallen into this lowly existence, taking the form of a serpent.”
श्लोक ( Shlok ) 126
ततो धिगिदमत्यन्तकटुकं विषयामिषम् । बमैतद् दुर्जरं तात किम्पाकफलसन्निभम् ।।१२६।।
यह विषयरूपी आमिष अत्यंत कटुक है, दुर्जर है और किंपाक (विषफल फल के समान है इसलिए धिक्कार के योग्य है । हे पिताजी, इस विषयरूपी आमिष को अब भी छोड़ दो ।।126।।
“This worldly bait is extremely bitter, difficult to overcome, and its result is as poisonous as a venomous fruit, deserving of condemnation. O Father, now let go of this worldly attachment.”
श्लोक ( Shlok ) 127
रथाङ्गमिव संसारमनुबध्नाति संततम् । दुस्त्यजं त्यजदप्येतत् कण्ठस्थमिव जीवितम् ॥१२७॥
हे तात, जिस प्रकार रथ का पहिया निरंतर संसार-परिभ्रमण करता रहता है―चलता रहता है उसी प्रकार यह विषय भी निरंतर संसार-परिभ्रमण करता रहता है-स्थिर नहीं रहता अथवा संसार चतुर्गतिरूप संसार का वन्य करता रहता है । यद्यपि यह कंठस्थ प्राणों के समान कठिनाई से छोड़े जाते हैं परंतु त्याज्य अवश्य हैं ।।127।।
“O Father, just as the wheel of a chariot continuously moves in the cycle of worldly existence, in the same way, worldly pleasures keep revolving in the cycle of the world—they are never still. Although they are as difficult to let go of as the breath that is deeply ingrained in one’s throat, they must be renounced.”
श्लोक ( Shlok ) 128
प्रकटीकृतविश्वासं प्राणहारि भयावहम् । मृगयोरिव दुर्गीतं नृगणैणप्रलम्मकम् ॥१२८॥
ये विषय शिकारी के गाने के समान हैं जो पहले मनुष्यरूपी हरिणों को ठगने के लिए विश्वास दिलाते हैं और बाद में भयंकर हो प्राणों का हरण किया करते हैं ।।128।।
“These worldly pleasures are like the songs of a hunter, which first deceive human-like deer by instilling trust and later, becoming dreadful, snatch away their lives.”
श्लोक ( Shlok ) 129
ताम्बूलमित्र संयोगादिदं रागविवर्द्धनम् । अन्धकारमिवोत्सर्पत् सन्मार्गस्य निरोधनम् ॥१२९॥
जिस प्रकार तांबूल चूना, खैर और सुपारी का संयोग पाकर राग-लालिमा को बढ़ाते हैं उसी प्रकार ये विषय भी स्त्री-पुत्रादि का संयोग पाकर रागस्नेह को बढ़ाते हैं और बढ़ते हुए अंधकार के समान समीचीन भाव को रोक देते हैं ।।
“Just as betel leaf, lime, catechu, and areca nut together enhance the redness of the lips, in the same way, these worldly pleasures, when combined with attachments like those to women and children, intensify affection and attachment. As they grow, like increasing darkness, they obstruct virtuous thoughts and proper conduct.”
श्लोक ( Shlok ) 130
जैनं मतमिव प्रायः परिभूतमतान्तरम् । तडिल्लसितवल्लोलं वैचिच्यात् सुरचापवत् ॥ १३०॥
जिस प्रकार जैनमत मतांतरों का खंडन कर देता है उसी प्रकार ये विषय भी पिता, गुरु आदि के हितोपदेशरूपी मतों का खंडन कर देते हैं । ये बिजली की चमक के समान चंचल हैं और इंद्रधनुष के समान विचित्र हैं ।।130।।
“Just as the Jain doctrine refutes other beliefs, similarly, these worldly pleasures negate the beneficial teachings of fathers, gurus, and others. They are as fleeting as a flash of lightning and as fascinatingly deceptive as a rainbow.”
श्लोक ( Shlok ) 131
किं वात्र बहुनोक्तेन पश्येदं विषयोद्भवम् । सुखं संसारकान्तारे परिभ्रमयतीप्सितम् ॥१३१॥
अधिक कहने से क्या लाभ ? देखो, विषयों से उत्पन्न हुआ यह विषयसुख इस जीव को संसाररूपी अटवी में घुमाता है ।।131।।
“What is the benefit of saying more? Look, the pleasure born from worldly attachments causes this soul to wander endlessly in the forest of worldly existence.”
श्लोक 132 से 141
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
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