भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 62 चक्रवर्ती और तीर्थंकर
वज्रनाभि ने चक्ररत्न से पृथ्वी जीती, वज्रसेन ने कर्म जीते। धनदेव तेजस्वी रत्न बना। वज्रनाभि ने वज्रसेन से रत्नत्रय जाना, राज्य त्यागकर पुत्र वज्रदंत को राज्य देकर दीक्षा ली।
English translation of Ādi purāṇa parv 11 – Shlok 52 to 62
श्लोक ( Shlok ) 52
बज्रनाभिनृपोऽमात्यैः ‘संविधसे स्म राजकम् । मुनीन्द्रोऽपि तपोयोगैर्गुणग्राममपोषयत् ॥५२॥
इधर वज्रनाभि मंत्रियों के द्वारा राजाओं के समूह को अपने अनुकूल करता था और उधर मुनींद्र वज्रसेन भी तप और ध्यान के द्वारा गुणों के समूह का पालन करते थे ।
On one hand, Vajranabhi, with the help of his ministers, won over the assembly of kings; on the other, the great sage Vajrasena upheld a wealth of virtues through penance and meditation. ( 52)
श्लोक ( Shlok ) 53
निजे राज्याश्रमे पुत्रो गुरुरम्स्याश्रमे स्थितः । परार्थबद्धकक्ष्यौ’ तौ पालयामासतुः प्रजाः ॥५३॥
पर इधर पुत्र वज्रनाभि अपने राज्याश्रम में स्थित था और उधर पिता भगवान् वज्रसेन अंतिम मुनि आश्रम में स्थित थे । इस प्रकार वे दोनों ही परोपकार के लिए कमर बांधे हुए थे और दोनों ही प्रजा की रक्षा करते थे । भावार्थ―वज्रनाभि दुष्ट पुरुषों का निग्रह और शिष्ट पुरुषों का अनुग्रह कर प्रजा का पालन करता था और भगवान् वज्रसेन हित का उपदेश देकर प्रजा (जीवों) की रक्षा करते थे ।।53।।
On one hand, Vajranabhi remained devoted to his royal duties, while on the other, his father, Lord Vajrasena, resided in the ultimate ascetic state. Both were equally committed to the welfare of others and worked for the protection of the people.
Interpretation: Vajranabhi governed by punishing the wicked and rewarding the virtuous, ensuring the well-being of his subjects, while Lord Vajrasena safeguarded beings by imparting teachings of righteousness. ( 53)
श्लोक ( Shlok ) 54
वज्रनाभेर्जग्रागारे चक्रं मास्वरमुद्वभौ। योगिनोऽपि मनोगारे ध्यानचक्रं स्फुरद्युतिः ॥५४॥
वज्रनाभि के आयुधगृह में दैदीप्यमान चक्ररत्न प्रकट हुआ था और मुनिराज वज्रसेन के मनरूपी गृह में प्रकाशमान तेज का धारक ध्यानरूपी चक्र प्रकट हुआ था ।।54।।
In Vajranabhi’s royal arsenal, the radiant Chakraratna (divine discus) manifested, while in the mind of Sage Vajrasena, the luminous wheel of meditation—bearing the brilliance of supreme energy—arose. (54)
श्लोक ( Shlok ) 55
ततो ब्यजेष्ट निश्शशेषां महीमेष महीपतिः । मुनिः कर्मजयावाप्तमहिमा जगतीत्रयीम् ॥५५॥
राजा वज्रनाभि ने उस चक्ररत्न से समस्त पृथ्वी को जीता था और मुनिराज वज्रसेन ने कर्मों की विजय से अनुपम प्रभाव प्राप्त कर तीनों लोकों को जीत लिया था ।।55।।
King Vajranabhi conquered the entire Earth with the divine Chakraratna, while Sage Vajrasena, through the conquest of karma, attained unparalleled spiritual glory and triumphed over all three worlds. ( 55)
श्लोक ( Shlok ) 56
स्पर्द्धमानाविवान्योन्यमित्यास्तां तौ जयोद्धुरौ’ । किन्त्वेकस्य जयोऽत्यल्पः परस्य भुवनातिगः ॥५६॥
इस प्रकार विजय प्राप्त करने से उत्कृष्ट (श्रेष्ठ) वे दोनों ही पिता-पुत्र परस्पर स्पर्धा करते हुए से जान पड़ते थे । किंतु एक (वज्रनाभि) की विजय अत्यंत अल्प थी―छह खंड तक सीमित थी और दूसरे (वज्रसेन) की विजय संसार-भर को अतिक्रांत करने वाली थी―सबसे महान् थी ।।56।।
Thus, both father and son appeared to be engaged in a noble rivalry of victory. However, while Vajranabhi’s conquest was limited—spanning only the six continents, Vajrasena’s triumph transcended the entire worldly existence, making it the supreme victory. ( 56)
श्लोक ( Shlok ) 57
धनदेवोऽपि तस्यासीच्चक्रिणो रत्नमूर्जितम् । राज्याङ्ग गृहपत्याख्यं निधो रत्ने च योजितम् ॥५७॥
धनदेव (श्रीमती और केशव का जीव) भी उस चक्रवर्ती की निधियों और रत्नों में शामिल होने वाला तथा राज्य का अंगभूत गृहपति नाम का तेजस्वी रत्न हुआ ।।57।।
Dhanadeva (the soul of Shrīmātī and Keshava) became a part of the Chakravarti’s (Vajranabhi’s) treasures and jewels, manifesting as the radiant gem known as Grihapati, an integral element of the kingdom’s wealth. ( 57)
श्लोक ( Shlok ) 58
ततः कृत मतिर्भुक्त्वा चिरं पृथ्त्री पृथूदयः । गुरोस्तीर्थकृतोऽबोधि बोधि मत्यन्तदुर्लभाम् ॥५८।।
इस प्रकार उस बुद्धिमान् और विशाल अभ्युदय के धारक वज्रनाभि चक्रवर्ती ने चिरकाल तक पृथ्वी का उपभोग कर किसी दिन अपने पिता वज्रसेन तीर्थंकर से अत्यंत दुर्लभ रत्नत्रय का स्वरूप जाना ।।58।।
Thus, the wise and illustrious emperor Vajranabhi, who upheld immense prosperity, ruled over the Earth for a long time. One day, he came to realize the exceedingly rare essence of the Three Jewels (Ratnatraya) through his father, the Tīrthaṅkara Vajrasena. ( 58)
श्लोक ( Shlok ) 59
सद्दृष्टिज्ञानचारित्रत्रयं यः सेवते कृती । रसायनमिवातर्क्यं” सोऽमृतं पदमश्नुते ॥५९॥
जो चतुर पुरुष रसायन के समान सम्यग्दर्शन, सम्यग् ज्ञान और सम्यक् चारित्र इन तीनों का सेवन करता है वह अचिंत्य और अविनाशी मोक्षरूपी पद को प्राप्त होता है ।।59।।
A wise person who embraces the Three Jewels—Right Faith (Samyak Darshan), Right Knowledge (Samyak Jnana), and Right Conduct (Samyak Charitra)—like a divine elixir, attains the inconceivable and eternal state of liberation (Moksha). ( 59)
श्लोक ( Shlok ) 60
इत्याकलय्य मनसा चक्री चक्रे तपोमतिम् । जरत्तृणमिवाशेषं साम्राज्यमवमत्य सः ॥६०॥
हृदय से ऐसा विचार कर उस चक्रवर्ती ने अपने संपूर्ण साम्राज्य को जीर्ण तृण के समान माना और तप धारण करने में बुद्धि लगायी ।।60।।
Reflecting deeply upon this truth, the Chakravarti (Vajranabhi) regarded his vast empire as insignificant as withered grass and resolved to embrace asceticism. ( 60)
श्लोक ( Shlok ) 61 – 62
वज्रदन्ताह्वये सूनौ कृतराज्यसमर्पणः । नृपैः स्वमौलिबद्धाध्दै स्तुम्भिश्च दशभिश्शतैः ॥ ६१॥
समं भ्रातृभिरष्टानिर्धनदेवेन चादधे । दीक्षां मध्यजनोदीक्ष्यां मुक्त्यै स्वगुरुसन्निधौ ॥६२
उसने वज्रदंत नाम के अपने पुत्र के लिए राज्य समर्पण कर सोलह हजार मुकुटबद्ध राजाओं, एक हजार पुत्रों, आठ भाइयों और धनदेव के साथ-साथ मोक्ष प्राप्ति के उद्देश्य से पिता वज्रसेन तीर्थंकर के समीप भव्य जीवों के द्वारा आदर करने योग्य जिनदीक्षा धारण की ।। 61-62 ।।
He entrusted his kingdom to his son, Vajradanta, and, along with sixteen thousand crowned kings, one thousand sons, eight brothers, and Dhanadeva, took the revered Jain initiation in the presence of his father, Tīrthaṅkara Vajrasena, with the noble intent of attaining liberation. ( 61-62)
श्लोक 63 से 71
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51