आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 |
श्लोक 112 से 131 प्रस्थान की शोभा
लक्ष्मी और दिक्कुमारियाँ मंगल द्रव्य लेकर आगे थीं। भगवान की शोभा सूर्य, चंद्र से बढ़कर थी। नगरवासी उनकी स्तुति करते हुए कल्याण की कामना कर रहे थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 112 to 131
श्लोक ( Shlok ) 112
“भूतेषूद्भूतहर्षेषु चित्रकेतनधारिषु । नानालास्यैः प्रधावत्सु ससंघर्ष मितोऽमुतः ॥११२॥
जिन्हें अत्यंत हर्ष उत्पन्न हुआ है और जो चित्र-विचित्र-अनेक प्रकार की पताकाएँ लिये हुए हैं ऐसे भूत जाति के व्यंतर देव भीड़ में धक्का देते तथा अनेक प्रकार के नृत्य करते हुए इधर-उधर दौड़ रहे थे ।।112।।
The Vyantara deities of the Bhuta race, filled with immense joy and carrying various colorful flags, were rushing here and there through the crowd, jostling one another while performing diverse and lively dances. ॥112॥
श्लोक ( Shlok ) 113
शङ्खानाध्मातगण्डेषु पिण्डीभूताङ्गयष्टिषु । सकाहलान्निलिम्पेषु पुरयत्स्वनुरागतः ॥११३॥
देव लोग बड़े अनुराग से अपने गालों को फुलाकर और शरीर को पिंड के समान संकुचित कर तुरही तथा शंख बजा रहे थे ।।113।।
The gods, filled with great devotion, were blowing trumpets and conch shells by puffing up their cheeks and contracting their bodies like spheres. ॥113॥
श्लोक ( Shlok ) 114
अग्रेसरीषु लक्ष्मीषु पङ्कजव्यग्रपाणिषु । समं समङ्गलार्घाभिर्दिक्कुमारीभिरादरात् ॥११४॥
हाथों में कमल धारण किये हुई लक्ष्मी आदि देवियाँ आगे-आगे जा रही थीं और बड़े आदर से मंगल द्रव्य तथा अर्घ लेकर दिक्कुमारी देवियाँ उनके साथ-साथ जा रही थीं ।।114।।
Goddesses like Lakshmi, holding lotuses in their hands, were leading the procession, while the Dikkumari deities accompanied them with great reverence, carrying auspicious offerings and ceremonial water. ॥114॥
श्लोक ( Shlok ) 115 –130
इस्यमीषु विशेषेषु प्रभवत्सु यथायथम् । संप्रमोदमयं विश्वमातन्वन्नद् भुतोदयः ॥११५॥परार्ध्यरत्ननिर्माणं दिव्यं यानमधिष्ठितः । रत्नक्षोणीप्रतिष्ठस्य श्रियं मेरोर्विडम्बयन् ॥११६॥१ कण्ठाभरणभाभारपरिवेषोपरक्तया । मुखार्क्कभासा न्यक्कुर्वन् ज्योतिर्ज्योति र्गणेशिनाम् ॥११७॥ उत्तमाङ्ङ्गधृतेनोच्चैः मौलिना विमणित्विषा । धुन्वानोग्नीन्द्र मौलीनां त्विषामाविष्कृतार्चिषाम् ॥११८॥ किरीटोत्सङ्गसडिगन्या सुमनः शेखरस्त्रजा । मनः प्रसादमात्मीयं मूर्ध्नेवोद् धृत्य दर्शयन् ॥ ११९॥ प्रसन्नया दृशोर्भासा प्रोल्लसन्त्या समन्ततः । दृग्विलासं सहस्राक्षे सांन्यासि कमिवार्पयन् ॥१२०॥ तिरस्कृताधरच्छायेर्दं रोद्भिन्नेः स्मितांशुभिः । क्षालयन्निव निःशेषं रागशेषं स्वशुद्धिभिः ॥१२१॥हारेण हारिणा चारुवक्षःस्थलविलम्बिना । विडम्बयन्निवाद्रीन्दं प्रान्तपर्य स्तनिर्झरम् ॥१२२॥भुजयोः शोभया दीप्रकटकाङ्गदभूषया । निर्भर्त्सयन फणीन्द्राणां फणारत्नरुचां चयम् ॥१२३॥ काञ्चीदामपरिक्षिप्तजघनस्थललीलया । स्वीकुर्वन् वेदिका रुद्ध जम्बूद्वीपस्थलश्रियम् ॥१२४॥ क्रमोपधानपर्यन्त लसत्पदनखांशुभिः । प्रसादांशैरिवाशेषं पुनानः प्रणतं जनम् ॥१२५॥ न्यक्कृतार्करुचा स्वाङ्गदीप्त्या व्याप्तककुम्मुखः। स्वेनौजसाधरीकुर्वन् सर्वान् गीर्वाणनायकान् ॥१२६॥ इति प्रत्यङ्गसङिगन्या नैः सङ्ग्योचितया श्रिया । निर्वासयन्निवासङ्ग चिरं कालोपला लितम् ॥ १२७॥ विधृतेन सितच्छत्रमण्डलेनामलत्विषा विधुनेवोपरिस्थेन सेव्यमानः क्लमच्छिदा ॥ १२८॥प्रकीर्णकप्रतानेन विधुतेना मरेश्वरैः । जन्मोत्सवक्षणप्रीत्या क्षारोदेनेव सेवितः ॥१२९॥इत्याविष्कृतमाहात्म्यः सुरेन्द्रैः परितो वृतः । पुरुः पुराद् विनिष्क्रान्तः पौ रेरित्यभिनन्दितः ॥१३०॥
इस प्रकार जिस समय यथायोग्य रूप से अनेक विशेषताएँ हो रही थीं उस समय अद्भुत वैभव से शोभायमान भगवान वृषभदेव समस्त संसार को आनंदित करते हुए अमूल्य रत्नों से बनी हुई दिव्य पालकी पर आरूढ़ होकर अयोध्यापुरी से बाहर निकले । उस समय वे रत्नमयी पृथ्वी पर स्थित मेरु पर्वत की शोभा को तिरस्कृत कर रहे थे । गले में पड़े हुए आभूषणों की कांति के समूह से उनके मुख पर जो परिधि के आकार का लाल-लाल प्रभामंडल पड़ रहा था उससे उनका मुख सूर्य के समान मालूम होता था, उस मुखरूपी सूर्य की प्रभा से वे उस समय ज्योतिषी देवों के इंद्र अर्थात् चंद्रमा की ज्योति को भी तिरस्कृत कर रहे थे । जिससे मणियों की कांति निकल रही है ऐसे मस्तक पर धारण किये हुए ऊँचे मुकुट से वे, जिनसे ज्वाला प्रकट हो रही है ऐसे अग्निकुमार देवों के इंद्रों के मुकुटों की कांति को भी तिरस्कृत कर रहे थे । उनके मुकुट के मध्य में जो फूलों का सेहरा पड़ा हुआ था उसकी मालाओं के द्वारा मानो वे भगवान् अपने मन की प्रसन्नता को ही मस्तक पर धारण कर लोगों को दिखला रहे थे । उनके नेत्रों की जो स्वच्छ कांति चारों ओर फैल रही थी उससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो इंद्र के लिए संन्यास धारण करने के समय होने वाला नेत्रों का विलास ही अर्पित कर रहे हों अर्थात् इंद्र को सिखला रहे हों कि संन्यास धारण करने के समय नेत्रों की चेष्टाएँ इतनी प्रशांत हो जाती हैं । कुछ-कुछ प्रकट होती हुई मुसकान की किरणों से उनके ओठों की लाल-लाल कांति भी छिप जाती थी जिससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो अपनी विशुद्धि के द्वारा बाकी बचे हुए संपूर्ण राग को ही धो रहे हों । उनके सुंदर वक्षःस्थल पर जो मनोहर हार पड़ा हुआ था उससे वे भगवान् जिसके किनारे पर निर्झरना पड़ रहा है ऐसे सुमेरु पर्वत की भी विडंबना कर रहे थे । जिनमें कड़े बाजूबंद आदि आभूषण चमक रहे हैं ऐसी अपनी भुजाओं की शोभा से वे नागेंद्र के फण में लगे हुए रत्नों की कांति के समूह की भर्त्सना कर रहे थे । करधनी से घिरे हुए जघनस्थल की शोभा से भगवान् ऐसे मालूम होते थे मानो वेदिका से घिरे हुए जंबूद्वीप की शोभा ही स्वीकृत कर रहे हों । ऊपर की दोनों गाँठों तक दैदीप्यमान होती हुई पैरों की किरणों से वे भगवान् ऐसे मालूम होते थे मानो नमस्कार करते हुए संपूर्ण लोगों को अपनी प्रसन्नता के अंशों से पवित्र ही कर रहे हो । उस समय सूर्य की कांति को भी तिरस्कृत करने वाली अपने शरीर की दीप्ति से जिन्होंने सब दिशाएँ व्याप्त कर ली हैं ऐसे भगवान् वृषभदेव अपने ओज से समस्त इंद्रिय को नीचा दिखा रहे थे । इस प्रकार प्रत्येक अंग-उपांगों से संबंध रखने वाली वैराग्य के योग्य शोभा से वे ऐसे जान पड़ते मानो चिरकाल से पालन-पोषण की हुई परिग्रह की आसक्ति को ही बाहर निकाल रहे हों । ऊपर लगे हुए निर्मल कांति वाले सफेद छत्र के मंडल से वे ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो क्लेशों को दूर करने वाला चंद्रमा ही ऊपर आकर उनकी सेवा कर रहा हो । इंद्रों के द्वारा ढुलाये हुए चमरों के समूह से भगवान् ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो जन्मकल्याणक के क्षण-भर के प्रेम से क्षीरसागर ही आकर उनकी सेवा कर रहा हो । इस प्रकार ऊपर लिखे अनुसार जिनका माहात्म्य प्रकट हो रहा है और अनेक इंद्र जिन्हें चारों ओर से घेरे हुए हैं ऐसे वे भगवान वृषभदेव अयोध्यापुरी से बाहर निकले । उस समय नगरनिवासी लोग उनकी इस प्रकार स्तुति कर रहे थे ।।115-130।।
At that moment, as various auspicious and extraordinary events were unfolding in a fitting manner, the resplendent Lord Rishabhadeva, radiant with divine magnificence, emerged from the city of Ayodhya, seated upon a celestial palanquin adorned with priceless gems, delighting the entire world. His presence surpassed even the grandeur of Mount Meru standing on the jewel-studded earth.
The circular, crimson halo cast upon his face by the brilliance of the ornaments adorning his neck made his face resemble the radiant sun. The splendor of this sun-like face outshone even the glow of the luminary gods’ king, the moon. The towering crown upon his head, from which the radiance of precious gems emanated, surpassed even the brilliance of the crowns worn by the fiery Agnikumara deities. The floral wreath adorning the center of his crown seemed as if the Lord was wearing the very joy of his heart upon his head for all to witness.
The serene brilliance of his eyes spread in all directions, as if offering a lesson to Indra on how tranquil one’s gaze becomes upon embracing renunciation. The gentle rays of his subtle smile veiled the deep red luster of his lips, making it seem as though he was washing away every last trace of attachment with his pure essence.
The enchanting necklace adorning his beautiful chest made him appear as if he were mocking the grandeur of Mount Sumeru, with its cascading waterfalls. The radiance of his arms, adorned with shining armlets and bracelets, surpassed even the luminous gems encrusted on the hood of the mighty serpent king. The splendor of his waist, encircled by a golden girdle, made him appear as if he were embodying the divine beauty of Jambudvipa, surrounded by its sacred altar.
The radiant glow emanating from his feet up to the upper knots of his anklets appeared as if he was sanctifying all those who bowed before him with the very essence of his divine bliss. His body’s effulgence, which surpassed even the brilliance of the sun, illuminated all directions, making him appear as one who had triumphed over all sensory indulgences with his divine power.
Every aspect of his form radiated an aura befitting renunciation, as if he were casting away the deep-rooted attachment to possessions that had been nurtured for ages. The spotless white parasol hovering above him, shining with pure brilliance, made it seem as though the moon itself had risen to serve him, dispelling all afflictions. The clusters of yak-tail fans waved by Indra and the gods gave the impression that the ocean of milk itself had risen in devotion to serve him, recalling the moment of his auspicious birth.
Thus, with divine splendor manifesting in every aspect of his being, and surrounded on all sides by countless Indras, Lord Rishabhadeva emerged from the city of Ayodhya. At that moment, the citizens of the city reverently praised him with heartfelt hymns. ॥115-130॥
श्लोक ( Shlok ) 131
व्रज सिद्ध्यै जगन्नाथ शिवः पन्थाः समस्तु ते । निष्ठितार्थः पुनर्देव दृक्पथे नो भवाचिरात् ॥१३१॥
हे जगन्नाथ, आप कार्य की सिद्धि के लिए जाइए, आपका मार्ग कल्याणमय हो और हे देव, आप अपना कार्य पूरा कर फिर भी शीघ्र ही हम लोगों के दृष्टिगोचर होइए ।।131।।
O Lord of the Universe, may you proceed for the fulfillment of your purpose, may your path be auspicious. And O Divine One, after completing your mission, may you soon become visible to us once again. ॥131॥
श्लोक 132 से 141
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आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 |