भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118
श्लोक 119 से 135 प्रस्थान की तैयारियाँ
मंत्री, सेनापति आदि ने वज्रजंघ को घेरा। उसने उसी दिन प्रस्थान किया। कर्मचारियों में कोलाहल हुआ। वज्रजंघ ने सेवकों को हथिनियाँ, घोड़े, पालकियाँ, दासियाँ, सेना के लिए डेरे, भोजनशाला, और सुरक्षा की व्यवस्था करने के निर्देश दिए। ज्योतिषियों से शुभ मुहूर्त पूछा।
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 119 to 135
श्लोक ( Shlok ) 119 –135
यूयमाबद्धसौवर्णग्रैवेयादिपरिच्छदाः । करेणूर्मंद वैमुख्यात् सतीः कुलवधूरिव ॥119
राज्ञीनामधिरोहाय सज्जाः प्रापयत द्रतम् । यूयमश्वत रीराशु पर्याणयत शीघ्रगाः ।॥१२०॥
नृपवल्लभिकानां च यूयमर्पयताश्विमाः । काचवाहजनान् यूयं गवेषयत दुर्दमान् ॥121॥
तुरङ्गमकुलं चेदमापाय्योदकमाशुगम् । बद्धपर्याणकं यूयं कुरुध्वं सुवनोऽन्वितम् ॥१२२॥
भुजिप्याः सर्वकर्मीणा यूयमाह्वयत द्रूतम्। पाकधान्यपरिक्षोद शोधनादिनियोगिनीः ॥१२३
यूयं सेनाग्रगा भूत्वा निवेशं प्रति सूच्छिताः । अनुतिष्ठत” सत्काय मानगर्भा महावृतीः ।।१२४॥
यूयं महानसे राज्ञो नियुक्ताः सर्वसंपदाः । समग्रयत तद्योग्यां सामग्री निरवग्रहाः ।।१२५।।
यूयं गोमण्डलं चारु वात्सकं बहुधेनुकम् । सोदकेषु प्रदेशेषु सच्छायेव्वभिरक्षत ॥१२६।।
यूयमारक्षत स्त्रैणं राज्जकीयं प्रयत्नतः । सपाठीना इवाम्भोधेस्तरङ्गा भासुरातपः ॥१२७।।
यूयं कञ्चुकिनो वृद्धा वृद्धा मध्येऽन्तः पुरयोषिताम् । अङ्गरक्षानियोगं स्वमशून्यं कुरुतादृताः ।।१२८।।
यूयमत्रैव पाश्चात्य कर्माण्येवानुतिष्ठत । यूयं समं समागत्य स्वान् नियोगान् प्रपश्यत ।।१२९।।
देशाधिकारिणो गत्वा यूयं चोदयत द्रूतम् । प्रतिग्रहीतुं भूनाथं सामग्या स्वानुरूपया ।।१३०।।
यूयं विभृत हस्त्यश्वं यूयं पालयतौष्ट्रकम् । यूयं सवात्सकं भूरिक्षीरं रक्षत धेनुकम् ॥१३१॥
यूयं जैनेश्वरीमर्च्या रत्नत्रयपुरस्सराम् । यजेत शान्तिकं कर्म समाधाय महीक्षितः ।।१३२।।
कृताभिषेवनाः सिद्धशेषां गन्धाम्बुमिश्रिताम् । यूयं क्षिपेत पुण्याशीः शान्तिघोषैः समं प्रभोः ।।१३३।।
यूयं नैमित्तिकाः सम्यग निरूपित्तशुभोदयाः । प्रस्थानसमयं ब्रूत राज्ञो यात्राप्रसिद्धये ॥१३४॥
इति “तन्त्रनियुक्तानां तदा कोलाहलो महान्। उदतिष्ठत् प्रयाणाय सामग्री मनुतिष्ठताम् ।।१३५।।
वे अपने सेवकों से कह रहे थे कि तुम रानियों के सवार होने के लिए शीघ्र ही ऐसी हथिनियाँ लाओ जिनके गले में सुवर्णमय मालाएँ पड़ी हों, पीठ पर सुवर्णमय मालाएं पड़ी हों और जो मदरहित होने के कारण कुलीन स्त्रियों के समान साध्वी हों । तुम लोग शीघ्र चलने वाली खबरियों को जीन कसकर शीघ्र ही तैयार करो । तुम स्त्रियों के चढ़ने के लिए पालकी लाओ और तुम पालकी ले जानेवाले मजबूत कहारों को खोजो । तुम शीघ्रगामी तरुण घोड़ों को पानी पिलाकर और जीन कसकर शीघ्र ही तैयार करो । तुम शीघ्र ही ऐसी दासियाँ बुलाओ जो सब काम करने में चतुर हों और खासकर रसोई बनाना, अनाज कूटना, शोधना आदि का कार्य कर सकें । तुम सेना के आगे-आगे जाकर ठहरने की जगह पर डेरा-तंबू आदि तैयार करो तथा घास-भुस आदि के ऊँचे-ऊँचे ढेर लगाकर भी तैयार करो । तुम लोग सब संपदाओं के अधिकारी हो इसलिए महाराज की भोजनशाला में नियुक्त किये जाते हो । तुम बिना किसी प्रतिबंध के भोजनशाला की समस्त योग्य सामग्री इकट्ठी करो तुम बहुत दूध देने वाली और बछड़ों सहित सुंदर-सुंदर गाय ले जाओ, मार्ग में उन्हें जलसहित और छाया वाले प्रदेशों में सुरक्षित रखना । तुम लोग हाथ में चमकीली तलवार लेकर मछलियों सहित समुद्र की तरंगों के समान शोभायमान होते हुए बड़े प्रयत्न से राजा के रनवास की रक्षा करना । तुम वृद्ध कंचुकी लोग अंतःपुर की स्त्रियों के मध्य में रहकर बड़े आदर के साथ अंग रक्षा का कार्य करना । तुम लोग यहाँ ही रहना और पीछे के कार्य बड़ी सावधानी से करना । तुम साथ-साथ जाओ और अपने-अपने कार्य देखो । तुम लोग जाकर देश के अधिकारियों से इस बात की शीघ्र ही प्रेरणा करो कि वे अपनी योग्यतानुसार सामग्री लेकर महाराज को लेने के लिए आयें । मार्ग में तुम हाथियों और घोड़ों की रक्षा करना, तुम ऊँटों का पालन करना और तुम बहुत दूध देने वाली बछड़ों सहित गायों की रक्षा करना । तुम महाराज के लिए शांतिवाचन करके रत्नत्रय के साथ-साथ जिनेंद्रदेव की प्रतिमा की पूजा करो । तुम पहले जिनेंद्रदेव का अभिषेक करो और फिर शांतिवाचन के साथ-साथ पवित्र आशीर्वाद देते हुए महाराज के मस्तक पर गंधोदक से मिले हुए सिद्धों के शेषाक्षत क्षेपण करो । तुम ज्योतिषी लोग ग्रहों के शुभोदय आदि का अच्छा निरूपण करते हो इसलिए महाराज की यात्रा की सफलता के लिए प्रस्थान का उत्तम समय बतलाओ । इस प्रकार उस समय वहाँ महाराज वज्रजंघ के प्रस्थान के लिए सामग्री इकट्ठी करने वाले कर्मचारियों का भारी कोलाहल हो रहा था ।।119-135।।
The servants were busy receiving instructions:
- “Bring elephants adorned with golden necklaces and covered in golden cloth, gentle and calm like noble women, suitable for the queens to ride.”
- “Prepare swift messengers with saddled horses ready for immediate departure.”
- “Bring palanquins for the women and find strong bearers to carry them.”
- “Feed the swift young horses, saddle them, and prepare them without delay.”
- “Summon skilled maidservants who can handle all tasks, especially cooking and grain processing.”
- “Go ahead of the army and set up camps, tents, and stacks of hay and fodder.”
- “As custodians of royal provisions, ensure that all supplies for the king’s kitchen are gathered without restrictions.”
- “Take along beautiful cows with calves, ensuring their safety in shaded areas with access to water.”
- “Guard the king’s residence vigilantly, gleaming swords in hand, like the waves of the ocean.”
- “Elderly guards, remain among the royal women and protect them with utmost care.”
- “Stay back to oversee rear duties meticulously.”
- “Move alongside and manage your designated tasks.”
- “Meet regional officials and urge them to bring suitable offerings to welcome the king.”
- “Protect elephants, horses, and camels on the journey. Safeguard the cows with calves.”
- “Perform peace rites, worship the Jinendra deity, and conduct rituals with holy water mixed with fragrant substances, bestowing blessings upon the king.”
- “Astrologers, determine the most auspicious moment for the king’s successful departure.”
Thus, there was great commotion as officials diligently prepared for King Vajrajangha’s departure. 119-135.
श्लोक 136 से 151
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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