आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 |
श्लोक 62 से 72 भगवान का तप
मरीचि ने योग और सांख्य शास्त्र शुरू किए। भगवान तप करते रहे। वे मेरु से निष्कंप और समुद्र से क्षोभरहित थे। तप से उनका शरीर दैदीप्यमान था। तीन गुप्तियाँ उनकी रक्षा करती थीं। छह बाह्य और अंतरंग तप उनके थे। अट्ठाईस मूलगुण उनके सैनिक थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 18 – Shlok 62 to 72
श्लोक ( Shlok ) 62
तदुपज्ञमभूद् योगशास्त्रं तन्त्रं च कापिलम् । येनायं मोहितो लोकः सम्यग्ज्ञानपराङ्मुखः ॥६२॥
योगशास्त्र और सांख्यशास्त्र प्रारंभ में उसी के द्वारा कहे गये थे, जिनसे मोहित हुआ यह जीव सम्यग्ज्ञान से पराङ्मुख हो जाता है ।।62।।
“The doctrines of Yoga and Sankhya were originally propounded by him. Being deluded by these teachings, living beings turn away from the path of true knowledge.” ( 62)
श्लोक ( Shlok ) 63
इति तेषु तथाभूतां वृत्तिमासेदिवत्सु सः । तपस्यन् धीबलोपेतस्तथैवास्थान्महामुनिः ॥६३॥
इस प्रकार जब कि वे द्रव्यलिंगी मुनि ऊपर कही हुई अनेक प्रकार की प्रवृत्ति को प्राप्त हो गये तब बुद्धि बल से सहित महामुनि भगवान वृषभदेव उसी प्रकार तपस्या करते हुए विद्यमान रहे थे ।।63।।
“In this way, while those ascetics, who were externally identified by their attire, engaged in various practices as mentioned earlier, the great sage, Lord Rishabhadeva, remained steadfast in his austerities, endowed with the power of true wisdom.” ( 63)
श्लोक ( Shlok ) 64
स मेरुरिव निष्कम्पः सोऽक्षोभ्यो जलराशिवत् । स वायुरिव निःसंगो निर्लेपोम्बरवत् प्रभुः ॥६४॥
वे प्रभु मेरुपर्वत के समान निष्कंप थे, समुद्र के समान क्षोभरहित थे, वायु के समान परिग्रहरहित थे और आकाश के समान निर्लेप थे ।।64।।
“The Lord was as unshakable as Mount Meru, as undisturbed as the ocean, as unattached as the wind, and as untouched as the sky.” ( 64)
श्लोक ( Shlok ) 65
तपस्तापेन तीव्रेण देहोऽस्य व्यद्युतत्तराम् । निष्टप्तस्य सुवर्णस्य ननु छायान्तरं भवेत् ॥६५॥
तपश्चरण के तीन ताप से भगवान का शरीर बहुत ही दैदीप्यमान हो गया था सो ठीक ही है, तपाये हुए सुवर्ण की कांति निश्चय से अन्य हो ही जाती है ।।65।।
“Due to the threefold heat of his austerities, the Lord’s body became exceedingly radiant. This is only natural, for the luster of gold, when purified by fire, indeed becomes distinct.” ( 65)
श्लोक ( Shlok ) 66
गुप्तयो गुप्तिरस्यासनङ्गत्राणं च संयमः । गुणाश्च सैनिका जाताः कर्मशत्रून् जिगोषतः ॥६६॥
कर्मरूपी शत्रु को जलाने की इच्छा करने वाले भगवान् की मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति ये तीन गुप्तियां ही किले आदि के समान रक्षा करने वाली थी, संयम ही शरीर की रक्षा करने वाला कवच था और सम्यग्दर्शन आदि गुण ही उनके सैनिक थे ।।66।।
“Desiring to burn the enemy in the form of karma, the Lord had three protections—restraint of mind, speech, and body—which guarded Him like a fortress. Self-discipline was the armor that protected His body, and the virtues of right faith, knowledge, and conduct were His warriors.” (66)
श्लोक ( Shlok ) 67 – 68
तपोऽनशनमाद्यं स्थाद् द्वितीयमवमोदरम् । तृतीयं वृत्तिसंख्यानं रसत्यागश्चतुर्थकम् ॥६७॥
पञ्चमं तनुसंतापो विविक्तशयनासनम् । षष्टमित्यस्य बाह्यानि तपांस्यासन् महाधृतेः ॥६८॥
पहला उपवास, दूसरा अवमौदर्य, तीसरा वृत्तिपरिसंख्यान, चौथा रसपरित्याग, पांचवां कायक्लेश और छठवाँ विविक्तशय्यासन यह छह प्रकार के बाह्य तप महा धीर-वीर भगवान वृषभदेव के थे ।।67-68।।
“Lord Rishabhadeva, the supremely wise and courageous one, observed six types of external austerities: first, fasting; second, avoiding indulgence in bodily comforts; third, restricting his means of sustenance; fourth, renouncing flavorful foods; fifth, enduring physical hardships; and sixth, sleeping in secluded places.” ( 67-68)
श्लोक ( Shlok ) 69
प्रायश्चित्तादिभेदेन षोढैवाभ्यन्तरं तपः। तत्रास्य ध्यान एवासीत् परं तात्पर्यमोशितुः ॥६९॥
अंतरंग तप भी प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्त्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान के भेद से छह प्रकार का ही है । उनमें से भगवान् वृषभदेव के ध्यान में ही अधिक तत्परता रहती थी अर्थात् वे अधिकतर ध्यान ही करते रहते थे ।।69।।
“Internal austerities are also of six types—atonement, humility, service to others, scriptural study, renunciation, and meditation. Among these, Lord Rishabhadeva was most devoted to meditation, as He remained deeply absorbed in it.” ( 69)
श्लोक ( Shlok ) 70 – 72
व्रतानि पञ्च पञ्चैव समित्याख्याः प्रयत्नकाः । पञ्च चेन्द्रियसंरोधाः षोढावश्यकमिप्यते ॥७०॥
केशलोचश्च भूशय्या दन्तधावनमेव च। अचेलत्वमथास्नानं स्थितिभोजनमप्यदः ॥७१॥
एकभुक्तं च तस्यासन् गुणा मौलाः पदातयः । तेष्वस्य महती शुद्धिरभूत् ध्यानविशुद्धितः ॥७२॥
पाँच महाव्रत, समिति नामक पाँच सुप्रयत्न, पाँच इंद्रियनिरोध, छह आवश्यक, केशलोंच, पृथ्वी पर सोना, दातौन नहीं करना, नग्न रहना, स्नान नहीं करना, खड़े होकर भोजन करना और दिन में एक बार ही भोजन करना इस प्रकार अट्ठाईस मूलगुण भगवान वृषभदेव के विद्यमान थे जो कि उनके पदातियों अर्थात् पैदल चलने वाले सैनिकों के समान थे । ध्यान की विशुद्धता के कारण भगवान् के इन गुणों में बहुत ही विशुद्धता रहती थी ।।70-72।।
“Lord Rishabhadeva observed twenty-eight fundamental virtues, which were like His foot soldiers. These included the five mahavrat , the five careful observances (Samiti), the restraint of the five senses, the six essential duties, plucking out His hair, sleeping on the ground, not using a toothbrush, remaining naked, not bathing, eating while standing, and consuming food only once a day. Due to the purity of His meditation, these virtues were practiced with utmost perfection.” ( 70-72)
श्लोक 73 से 81
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 |