भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
श्लोक 82 से 91 भोगभूमि और अन्य जीव
कलाओं में कुशल, मधुर कंठ वाले जीव क्रीड़ा करते हैं। पात्रदान से मनुष्य, अपात्र दान से तिर्यंच जन्म लेते। नकुल आदि वहाँ आर्य बने। मतिवर आदि ने दीक्षा ली।
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
यत्र कल्पतरुच्छायामुपेत्य ललितस्मितौ । दम्पती गीतवादित्रै रमेते सततोत्सवैः ॥८२॥
जहाँ स्त्री-पुरुष कल्पवृक्ष की छाया में जाकर लीलापूर्वक मंद-मंद हंसते हुए, गाना-बजाना आदि उत्सवों से सदा क्रीड़ा करते रहते हैं ।।82।।
Where men and women, under the shade of the Kalpavriksha (wish-fulfilling tree), joyfully engage in playful activities, gently laughing, singing, playing music, and celebrating in perpetual delight.
श्लोक ( Shlok ) 83
कलाकुशलता कल्य देहत्वं कलकण्ठता । मात्सर्येर्ष्यादिवैकल्पमपि यत्र निसर्गजम् ॥८३॥
जहाँ कलाओं में कुशल होना, स्वर्ग के समान सुंदर शरीर प्राप्त होना, मधुर कंठ होना और मात्सर्य, ईर्ष्या आदि दोषों का अभाव होना आदि बातें स्वभाव से ही होती हैं ।।83।।
Where beings naturally possess mastery in various arts, heavenly beautiful bodies, sweet voices, and are free from defects like jealousy, envy, and malice.
श्लोक ( Shlok ) 84
स्वभावसुन्दराकाराः स्वभावललितेहिताः । स्वभावमधुरालापा मोदन्ते यत्र देहिनः ।॥८४॥
जहाँ के जीव स्वभाव से ही सुंदर आकार वाले, स्वभाव से ही मनोहर चेष्टाओं वाले और स्वभाव से ही मधुर वचन बोलने वाले होते हैं । इस प्रकार वे सदा प्रसन्न रहते हैं ।।84।।
Where beings naturally possess beautiful forms, delightful gestures, and sweet speech. Thus, they always remain joyful and content.
श्लोक ( Shlok ) 85
दानाद् दानानुमोदाद् वा यत्र पात्रसमाश्रितात् । प्राणिनः सुखमेधन्ते यावञ्जीवमनामयाः ॥८५॥
उत्तम पात्र के लिए दान देने अथवा उनके लिए दिये हुए दान की अनुमोदना करने से जीव जिस भोगभूमि में उत्पन्न होते हैं और जीवनपर्यंत नीरोग रहकर सुख से बढ़ते रहते हैं ।।85।।
By giving charity to worthy recipients or approving such charitable acts, beings are born in a blissful land where they remain healthy and continue to prosper joyfully throughout their lives.
श्लोक ( Shlok ) 86
कुदृष्टयो व्रतैर्हॉीनाः केवलं भोगकाङिक्षणः । दत्वा दानान्यपात्रेषु तिर्यक्त्वं यत्र यान्त्यमी ॥८६॥
जो जीव मिथ्यादृष्टि हैं, व्रतों से हीन हैं और केवल भोगों के अभिलाषी हैं वे अपात्रों में दान देकर वहाँ तिर्यंच पर्याय को प्राप्त होते हैं ।।86।।
Beings who hold false beliefs, lack vows, and are solely driven by the desire for pleasures, when giving charity to unworthy recipients, are reborn in the lower realm of Tiryanch (animal existence).
श्लोक ( Shlok ) 87
कुशीलाः कुत्सिताचाराः कुवेषा दुरुपोषिताः । मायाचाराश्च जायन्ते मृगा यत्र व्रतच्युताः ॥८७॥
जो जीव कुशील हैं―खोटे स्वभाव के धारक हैं, मिथ्या आचार के पालक हैं, कुवेषी हैं, मिथ्या उपवास करने वाले हैं, मायाचारी हैं और व्रत भ्रष्ट हैं वे जिस भोगभूमि में हरिण आदि पशु होते हैं ।।87।।
Beings who are immoral, possess a corrupt nature, follow false conduct, wear improper attire, observe deceitful fasts, practice deceit, and violate vows are reborn in a land of enjoyment as animals such as deer and other creatures.
श्लोक ( Shlok ) 88
मिथुनं मिथुनं तेषां मृगाणामपि जायते । न मिथोऽस्ति विरोधो वा ‘वैरं वैरस्यमेव वा ॥८८॥
और जहाँ पशुओं के युगल भी आनंद से क्रीड़ा करते हे । उनके परस्पर में न विरोध होता है न वैर होता है और न उनका जीवन ही नीरस होता है ।।88।।
Where even animal pairs joyfully engage in playful activities. There is neither conflict nor enmity between them, and their lives are never dull or joyless.
श्लोक ( Shlok ) 89
इत्यत्यन्तसुखे तस्मिन् क्षेत्रे पात्रप्रदानतः । श्रीमती वज्रजङ्घश्च दम्पतित्वमुपेयतुः ॥८९॥
इस प्रकार अत्यंत सुखों से भरे हुए उस उत्तरकुरुक्षेत्र में पात्रदान के प्रभाव से वे दोनों श्रीमती और वज्रजंघ दंपती अवस्था को प्राप्त हुए―स्त्री और पुरुषरूप से उत्पन्न हुए ।।89।।
In this way, through the merit of offering charity to worthy recipients, they were both born as the prosperous and noble couple, Shrimati and Vajrajangha, in the blissful northern region of Uttarakuru, as a woman and a man, respectively.
श्लोक ( Shlok ) 90
प्रागुक्ताश्च मृगा जन्म भेजुस्तत्रेव भद्रकाः । पात्रदानानुमोदेन दिव्यं मानुष्यमाश्रिताः ॥९०॥
जिनका वर्णन पहले किया जा चुका है ऐसे नकुल, सिंह, वानर और शूकर भी पात्रदान की अनुमोदना के प्रभाव से वहीं पर दिव्य मनुष्य शरीर को पाकर भद्रपरिणामी आर्य हुए ।।90।।
The jackals, lions, monkeys, and boars described earlier, through the merit of approving charity to worthy recipients, also attained divine human forms in that land and became noble-natured Aryans.
श्लोक ( Shlok ) 91
तथा मतिवराद्याश्च तद्वियोगाद् गताः शुचम् । दृढ धर्मान्तिके दीक्षां जैनीमाशिश्रियन् पराम् ।।९१।।
इधर मतिवर, आनंद, धनमित्र और अकंपन ये चारों ही जीव श्रीमती और वज्रजंघ के विरह से भारी शोक को प्राप्त हुए और अंत में चारों ने ही श्री दृढ़धर्म नाम के आचार्य के समीप उत्कृष्ट जिनदीक्षा धारण कर ली ।।91।।
Here, Mativar, Anand, Dhanamitra, and Akampan, deeply sorrowed by the separation from Shrimati and Vajrajangha, eventually approached the revered Acharya Shri Dridhadharma and took the supreme Jain initiation.
श्लोक 92 से 101
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81