भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221
श्लोक 222 से 231 महाबल का संन्यास
मुनि अंतर्धान हो गए। स्वयंबुद्ध महाबल के पास लौटा और मुनि के वचन सुनाए। उसने उपदेश दिया कि जिनेंद्र का धर्म दुःख नाशक है। महाबल ने समाधिमरण का निर्णय लिया, राज्य पुत्र अतिबल को सौंपा, और सिद्धकूट चैत्यालय में संन्यास लिया। उसने आहार और शरीर से ममत्व त्यागने की प्रतिज्ञा की, स्वयंबुद्ध को निर्यापकाचार्य बनाया, और संसार सागर पार करने की तैयारी की।
English translation of Ādi purāṇa parv 5- Shlok 222 to 231
श्लोक ( Shlok ) 222
इत्युदीर्य ततोऽन्वर्द्धिमगात् सोऽम्बरवारणः । सम सधर्मणादित्यगतिराशास्य मन्त्रिणम् ॥ २२२॥
। यह कहकर और स्वयंबुद्ध मंत्री को आशीर्वाद देकर गगनगामी आदित्यगति नाम के मुनिराज अपने साथी अरिंजय के साथ-साथ अंतर्हित हो गये ।।222।।
Having said this and blessing the Swayambudha minister, the sky-traveling Muniraj named Adityagati, along with his companion Arinjaya, disappeared from sight.(222)
श्लोक ( Shlok ) 223
स्वयंबुद्धोऽपि तद्वाक्यश्रवणात् किंचिदाकुलः । द्रुतं प्र त्यावृतत् तस्य प्रतिषोधविधायकः ॥२२३॥
मुनिराज के वचन सुनने से कुछ व्याकुल हुआ स्वयंबुद्ध भी महाबल के समझाने के लिए शीघ्र ही वहाँ से लौट आया ।।223।।
Feeling somewhat anxious after hearing the words of the Muniraj, Svayambuddha quickly returned to explain everything to Mahabal.( 223)
श्लोक ( Shlok ) 224
सत्वरं व समासाद्य तं च दृष्ट्रा महाबलम् । चारणर्षिवचोऽशेषमाल्यत् स्वप्नफलावधि ॥२२४॥
और तत्काल ही महाबल के पास जाकर उसे प्रतीक्षा में बैठा हुआ देख प्रारंभ से लेकर स्वप्नों के फल पर्यंत विषय को सूचित करने वाले ऋषिराज के समस्त वचन सुनाने लगा ।।224।।
Immediately, he went to Mahabal and, seeing him waiting, began to recount all the words of the great sage—from the beginning of the discourse to the interpretation of the dreams.( 224)
श्लोक ( Shlok ) 225
हन्त दुःखानुबन्धानां है न्ता धर्मो जिनोदितः । तस्मात् तस्मिन् मतिं धत्स्व मप्तिमत्रिति चान्वशात्
तदनंतर उसने यह उपदेश भी दिया कि हे बुद्धिमन्, जिनेंद्र भगवान् का कहा हुआ यह धर्म ही समस्त दुःखों की परंपरा का नाश करने वाला है इसलिए उसी में बुद्धि लगाइए, उसी का पालन कीजिए ।।225।।
Thereafter, he also gave this advice: “O wise one, the religion preached by Lord Jina is the only path that destroys the cycle of all sufferings. Therefore, focus your intellect on it and follow it diligently.”( 225)
श्लोक ( Shlok ) 226
ततःस्वायुःक्षयं बुद्ध्वा स्वयंवुद्धाम्महाबलः । तनुत्यागे मति धीमानधत्त विधिवत् तदा ॥२२६।।
बुद्धिमान् महाबल ने स्वयंबुद्ध से अपनी आयु का क्षय जानकर विधिपूर्वक शरीर छोड़ने―समाधिमरण धारण करने में अपना चित्त लगाया ।।226।।
The wise Mahabal, upon learning from Svayambuddha about the decline of his lifespan, focused his mind on properly relinquishing his body by adopting samadhi-marana (peaceful death through meditation).
( 226)
श्लोक ( Shlok ) 227
कृत्वाष्टाङ्किकमिबुद्धिः महामहमहापयत् । दिवसान् स्वगृहोद्यानजिनवेश्मनि भक्तितः ॥ २२७॥
अतिशय समृद्धिशाली राजा अपने घर के बगीचे के जिनमंदिर में भक्तिपूर्वक आष्टाह्निक महायज्ञ करके वहीं दिन व्यतीत करने लगा ।।227।।
The immensely prosperous king devotedly performed the grand Ashtahnika ritual in the Jin temple located in his palace garden and began spending his remaining days there.( 227)
श्लोक ( Shlok ) 228
सुतायातिबलाध्याय दत्वा राज्यं समृद्धिमत् । सर्वानापृच्छय मन्त्र्यादीन् परं स्वातन्त्र्यमाश्रितः ॥२२८
। वह अपना वैभवशाली राज्य अतिबल नामक पुत्र को सौंपकर तथा मंत्री आदि समस्त लोगों से पूछकर परम स्वतंत्रता को प्राप्त हो गया ।।228।।
He entrusted his prosperous kingdom to his son, Atibal, and, after consulting with his ministers and others, attained ultimate liberation.( 228)
श्लोक ( Shlok ) 229
सिद्धकूटमुपेत्याशु पराध्यं जिनमन्दिरम्। सिद्धार्थ्यास्तत्र संपूज्य स “संन्यास्यदसाध्वसः ॥२२९॥
तत्पश्चात् वह शीघ्र ही परमपूज्य सिद्धकूट चैत्यालय पहुँचा । वहाँ उसने सिद्ध प्रतिमाओं की पूजा कर निर्भय हो संन्यास धारण किया ।।229।।
Thereafter, he quickly arrived at the revered Siddhakoot Chaityalaya. There, after worshiping the idols of the Siddhas, he fearlessly embraced renunciation.( 229)
श्लोक ( Shlok ) 230
यावज्जोवं कृताहारशरीरत्यागसंगरः । गुरुसाक्षि समारुक्षद् वीरशय्याममुदधीः ॥२३०॥
बुद्धिमान् महाबल ने गुरु की साक्षीपूर्वक जीवनपर्यंत के लिए आहार पानी तथा शरीर से ममत्व छोड़ने की प्रतिज्ञा की और वीरशय्या आसन धारण की ।।230।।
The wise Mahabal, in the presence of his Guru, took a vow to renounce attachment to food, water, and the body for the rest of his life. He then adopted the fearless posture of Veerashayya (the posture for a peaceful death).(230)
श्लोक ( Shlok ) 231
आारुह्याराधनानावं तितीर्पुर्भवसागरम् । निर्यापकं स्वयंबुद्धं बहु मेने महाबलः ॥२३१॥
वह महाबल आराधनारूपी नाव पर आरूढ़ होकर संसाररूपी सागर को तैरना चाहता था इसलिए उसने स्वयंबुद्ध मंत्री को निर्यापकाचार्य (सल्लेखना की विधि कराने वाले आचार्य, पक्ष में―नाव चलाने वाला खेवटिया) बनाकर उसका बहुत ही सम्मान किया ।।231।।
Mahabal, wishing to cross the ocean of the world by boarding the boat of devotion, appointed Svayambuddha as his guiding teacher, the Niryapakacharya (the one who conducts the Sallekhana ritual), and showed him great respect.( 231)
श्लोक 232 से 241
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221
Download PDF