आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183
श्लोक 184 से 193 तप की महिमा और भगवान की स्थिति
भगवान कायक्लेश से कर्म जलाते थे। वे सूर्य से दैदीप्यमान थे। उनकी शय्या एकांत में होती थी। वे छह बाह्य और अंतरंग तप करते थे। प्रायश्चित्त उनके चारित्र में सिद्ध था। विनय भी उनमें अंतर्भूत था।
English translation of Ādi purāṇa parv 20 – Shlok 184 to 193
श्लोक ( Shlok ) 184
तत्तदातप्त योगीन्द्रः सोढाशेषपरीषहः । तपस्सुदुस्सहतरं परं निर्वाणसाधनम् ॥१८४॥
इसीलिए उस समय समस्त परीषहों को सहन करने वाले योगिराज भगवान् वृषभदेव मोक्ष का उत्तम साधन और अतिशय कठिन कायक्लेश नाम का तप तपते थे ।।184।।
“Therefore, at that time, the supreme yogi, Lord Rishabhadev, endured all hardships and practiced Kayaklesha, the most excellent means to attain liberation and an extremely arduous austerity.” ( 184)
श्लोक ( Shlok ) 185
कर्मेन्धनानि निर्दग्धुमुद्यतः स तपोऽग्निना । दिदीपे नितरां धीरः प्रज्वलन्निव पावकः ॥१८५॥
तपरूपी अग्नि से कर्मरूपी ईंधन को जलाने के लिए तैयार हुए वे धीर-वीर भगवान् प्रज्वलित हुई अग्नि के समान अत्यंत दैदीप्यमान हो रहे थे ।।185।।
“Prepared to burn the fuel of karma with the fire of austerity, the steadfast and valiant Lord shone brilliantly, like a blazing flame.” (185)
श्लोक ( Shlok ) 186
असंख्यात गुणश्रेण्या धुन्वन् कर्मतमोघनम् । तपोदीप्त्यातिदीप्ताङ्गः सोंऽशुमानिव दिद्युते ।।१८६॥
उस समय वे असंख्यात गुणश्रेणी निर्जरा के द्वारा कर्मरूपी गाढ़ अंधकार को नष्ट कर रहे थे और उनका शरीर तपश्चरण की कांति से अतिशय हो रहा था इसलिए वे ठीक सूर्य के समान सुशोभित हो रहे थे ।।186।।
“At that time, through countless levels of purification, he was destroying the dense darkness of karma. His body radiated with the brilliance of austerity, making him shine gloriously, just like the sun.” (186)
श्लोक ( Shlok ) 187 –188
शय्यास्य विजने देशे जागरूकस्य योगिनः । कदाचिदासनं चासीच्युचौ निर्जन्तुकान्तरे ॥१८७॥
न शिश्ये जागरूकोऽसौ नासीनश्चाभवद्भृशम् । प्रयतो विजहारोवी ” त्यक्तभुक्तिर्जितेन्द्रियः ॥१८८॥
सदा जागृत रहने वाले इन योगिराज की शय्या निर्जन एकांत स्थान में ही होती थी और जब कभी आसन भी पवित्र तथा निर्जीव स्थान में ही होता था । सदा जागृत रहने वाले और इंद्रियों को जीतने वाले वे भगवान् न तो कभी सोते थे और न एक स्थान पर बहुत बैठते ही थे किंतु भोगोपभोग का त्याग कर प्रयत्नपूर्वक अर्थात् ईर्यासमिति का पालन करते हुए समस्त पृथिवी में विहार करते रहते थे । भावार्थ―भगवान सदा जागृत रहते थे इसलिए उन्हें शय्या की नित्य आवश्यकता नहीं पड़ती थी परंतु जब कभी विश्राम के लिए लेटते भी थे तो किसी पवित्र और एकांत स्थान में ही शय्या लगाते थे । इसी प्रकार विहार के अतिरिक्त ध्यान आदि के समय एकांत और पवित्र स्थान में ही आसन लगाते थे । कहने का तात्पर्य यह है कि भगवान् विविक्तशय्यासन नाम का तपश्चरण करते थे ।।187-188।।
“The ever-awakened supreme yogi, Lord Rishabhadev, always rested in secluded and solitary places. Whenever he sat, it was only in pure, lifeless locations.
Being ever-vigilant and victorious over the senses, he neither slept nor remained seated in one place for long. Renouncing all pleasures and luxuries, he diligently observed Irya Samiti (careful movement) and wandered across the entire earth with utmost mindfulness.
Meaning: Since the Lord was always in a state of awareness, he did not require regular rest. However, when he did lie down for repose, it was only in pure and secluded places. Similarly, during meditation or other spiritual practices, he chose solitary and clean locations for sitting. This indicates that he practiced the austerity known as Viviktashayyasana (dwelling in solitude and maintaining pure resting and sitting places).” ( 187-188)
श्लोक ( Shlok ) 189
इति बाह्यं तपः षोडा चरन् परमदुश्चरम् । आभ्यन्तरं च षड्भेदं तपो भेजे स योगिराट् ॥१८९॥
इस प्रकार वे योगिराज अतिशय कठिन छह प्रकार के बाह्य तपश्चरण का पालन करते हुए आगे कहे जाने वाले छह प्रकार के अंतरंग तप का भी पालन करते थे ।।189।।
“In this way, the supreme yogi, Lord Rishabhadev, while observing the six extremely difficult types of external austerities, also practiced the six types of internal austerities, which will be described further.” ( 189)
श्लोक ( Shlok ) 190
प्रायश्चित्तं तपस्तस्मिन् मुनौ निरतिचारके । ‘चरितार्थमभूत् किं नु भानौरस्त्यान्तरं तमः ॥१९०॥
निरतिचार प्रवृत्ति करने वाले मुनिराज वृषभदेव में प्रायश्चित्त नाम का तप चरितार्थ अर्थात् कृतकार्य हो चुका था सो ठीक ही है क्योंकि सूर्य के बीच में भी क्या कभी अंधकार रहता है ? अर्थात् कभी नहीं । भावार्थ―अतिचार लग जाने पर उसकी शुद्धता करना प्रायश्चित्त कहलाता है । भगवान् के कभी कोई अतिचार लगता ही नहीं था अर्थात् उनका चारित्र सदा निर्मल रहता था इसलिए यथार्थ में उनके निर्मल चारित्र में ही प्रायश्चित्त तप कृतकृत्य हो चुका था । जिस प्रकार कि सूर्य का काम अंधकार को नष्ट करना है जहाँ अंधकार होता है वहाँ सूर्य को अपना प्रकाश-पुंज फैलाने की आवश्यकता होती है परंतु सूर्य के बीच में अंधकार नहीं होता इसलिए सूर्य अपने विषय में चरितार्थ अथवा कृतकृत्य होता है ।।190।।
“The sage Lord Rishabhadev, who was unwavering in his pure conduct, had already fulfilled the austerity of Prāyaśchitta (atonement). This is only natural—can there ever be darkness in the midst of the sun? Certainly not.
Meaning: Atonement (Prāyaśchitta) refers to purifying oneself after committing a transgression. However, since Lord Rishabhadev never committed any transgressions, his conduct remained eternally pure. Thus, in reality, the austerity of Prāyaśchitta was already perfected in his immaculate character.
Just as the sun exists to dispel darkness, it only needs to shine where darkness is present. But within the sun itself, there is no darkness, so it remains self-fulfilled and complete.” ( 190)
श्लोक ( Shlok ) 191 –193
प्रश्रयश्च तदास्यासीत् प्रश्रितोऽन्तर्निलीनताम् । विनेता विनयं कस्य स कुर्यादग्रिमः पुमान् ॥१९१॥
अथवा प्रश्रयी सिद्धानसौ भेजे सिषित्सया । नमः सिद्धेभ्य इत्येव यतो दीक्षामुपायत ॥ १९२॥
ज्ञानदर्शनचारित्रतपोवीर्यगुणेषु च । यथार्ह विनयोऽस्यासीद् यतमानस्य तत्वतः ॥१९३॥
इसी प्रकार इनका विनय नाम का तप भी अंतर्निलीनता को प्राप्त हुआ था अर्थात् उन्हीं में अंतर्भूत हो गया था क्योंकि वे प्रधान पुरुष सबको नम्र करने वाले थे फिर भला वे किसकी विनय करते अथवा उन्होंने सिद्ध होने की इच्छा से विनयी होकर सिद्ध भगवान् की आराधना की थी क्योंकि सिद्धों के लिए नमस्कार हो ऐसा कहकर ही उन्होंने दीक्षा धारण की थी । अथवा यथार्थ प्रवृत्ति करने वाले भगवान की ज्ञान दर्शन चारित्र तप और वीर्य आदि गुणों में यथायोग्य विनय थी इसलिए उनके विनय नाम का तप सिद्ध हुआ था ।।191-193।।
“In the same way, the austerity of Vinaya (humility and reverence) was naturally ingrained in Lord Rishabhadev, as it was inherently present within him. Being the supreme being, he was one who humbled all—so to whom would he bow?
However, it can also be said that, with the intent of attaining Siddhahood, he practiced humility by venerating the Siddhas (liberated souls). After all, he had accepted initiation with the very words, ‘Salutations to the Siddhas.’
Alternatively, since Lord Rishabhadev engaged in true spiritual practice, he possessed humility in the appropriate manner regarding his knowledge, perception, conduct, austerity, and energy. Thus, his Vinaya austerity was naturally perfected.” (Verses 191-193)
श्लोक 194 से 201
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