आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 |
श्लोक 152 से 161 अहमिंद्र का जीवन
वह 33,000 वर्ष में आहार, 16 माह 15 दिन में श्वास लेता था। अवधिज्ञान से त्रसनाडी के द्रव्यों को जानता था। उसका मुख कमल, नेत्र नीलकमल, गाल चंद्रमा समान थे। उनके आठ भाई और धनदेव भी अहमिंद्र बने।
English translation of Ādi purāṇa parv 11 – Shlok 153 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
त्रिसहस्राधिक त्रिंशत्सहस्राब्दव्यतिक्रमे । मानसं दिव्यमाहारं स्वसात्कुर्वन् धृतिं दधौ ॥१५२॥
वह अहमिंद्र तैंतीस हजार वर्ष व्यतीत होनेपर मानसिक दिव्य आहार ग्रहण करता हुआ धैर्य धारण करता था ।।152।।
“That Ahmindra, after thirty-three thousand years, would partake of celestial mental nourishment while maintaining unwavering composure.”
श्लोक ( Shlok ) 153
मासैः षोडशभिः पञ्चदशभिश्च दिनैर्मतैः । प्राप्तोच्छ्वासस्थितिस्तत्र सोऽहमिन्द्रोऽवसत् सुखम् ॥१५३॥
और सोलह महीने पंद्रह दिन व्यतीत होने पर श्वासोच्छ्वास ग्रहण करता था । इस प्रकार वह अहमिंद्र वहाँ (सर्वार्थसिद्धि में) सुखपूर्वक निवास करता था ।।153।।
“And after sixteen months and fifteen days, he would begin to take breaths. In this way, that Ahmindra resided blissfully in Sarvārthasiddhi.”
श्लोक ( Shlok ) 154
लोकनाडीगतं योग्यं मूर्त्तद्रव्यं सपर्ययम् । स्वावधिज्ञानदीपेन द्योतयन् सोऽद्युतत्तराम् ॥१५४॥
अपने अवधिज्ञानरूपी दीपक के द्वारा त्रसनाडी में रहनेवाले जानने योग्य मूर्तिक द्रव्यों को उनकी पर्यायोंसहित प्रकाशित करता हुआ वह अहमिंद्र अतिशय शोभायमान होता था ।।154।।
“With the lamp of his Avadhi Jnana (clairvoyance), he illuminated the knowable material substances along with their modifications residing in the animate realm. In doing so, that Ahmindra shone with extraordinary brilliance.”
श्लोक ( Shlok ) 155
तन्मात्रां त्रिक्रियां कर्तुमस्य सामर्थ्यमस्त्यदः । वीतरागस्तु तन्नैवं कुरुते निष्प्रयोजनः॥१५५॥
उस अहमिंद्र के अपने अवधिज्ञान के क्षेत्र बराबर विक्रिया करने की भी सामर्थ्य थी, परंतु वह रागरहित होने के कारण बिना प्रयोजन कभी विक्रिया नहीं करता था ।।155।।
“That Ahmindra possessed the ability to extend his influence as far as the domain of his Avadhi Jnana (clairvoyance). However, being free from attachment, he never exercised his powers without purpose.”
श्लोक ( Shlok ) 156
नलिनाभं मुखं तस्य नेत्रे नीलोत्पलोपमे । कपोलाविन्दु सच्छायौ बिम्बकान्तिधरोऽधरः॥१५६॥
उसका मुख कमल के समान था, नेत्र नीलकमल के समान थे, गाल चंद्रमा के तुल्य थे और अधर बिंबफल की कांति को धारण करता था ।।156।।
“His face resembled a lotus, his eyes were like blue lotuses, his cheeks shone like the moon, and his lips radiated the brilliance of the Bimba fruit.”
श्लोक ( Shlok ) 157
इत्यादि वर्णनातीतं वपुरस्यातिभास्वरम् । कामनीयकसर्वस्वमेकीभूतामिवारुधत् ॥ १५७॥
अभी तक जितना वर्णन किया है उससे भी अधिक सुंदर और अतिशय चमकीला उसका शरीर ऐसा शोभायमान होता था मानो एक जगह इकट्ठा किया गया सौंदर्य का सर्वस्व (सार) ही हो ।।157।।
“His body, even more beautiful and radiant than what has been described so far, shone magnificently as if it were the very essence of all accumulated beauty gathered in one form.”
श्लोक ( Shlok ) 158
आहारकशरीरं यन्निरलंकारभास्वरम् । योगिनामृद्धिजं तेन सदृगस्याचका द् वपुः ॥१५८॥
छठे गुणस्थानवर्ती मुनियों के आहारक ऋद्धि से उत्पन्न होने वाला और आभूषणों के बिना ही दैदीप्यमान रहनेवाला जो आहारक शरीर होता है ठीक उसके समान ही उस अहमिंद्र का शरीर दैदीप्यमान हो रहा था [विशेषता इतनी ही थी कि वह आभूषणों से प्रकाशमान था] ।।158।।
“The radiant body of that Ahmindra shone just like the Aharaka body generated by the Aharaka Riddhi of monks in the sixth spiritual stage (Gunasthana), which remains luminous even without ornaments—except that Ahmindra’s brilliance was further enhanced by his divine adornments.”
श्लोक ( Shlok ) 159
एकान्तशान्तरूपं यत् सुखमाप्तैर्भिरूपितम् । तदैकध्यमिवापन्नम भूत्तस्मिन् सुरोत्तमे ॥१५९॥
जिनेंद्रदेव ने जिस एकांत और शांतरूप सुख का निरूपण किया है मालूम पड़ता है वह सभी सुख उस अहमिंद्र में जाकर इकट्ठा हुआ था ।।159।।
“The solitary and serene bliss that Lord Jina has described seemed to have gathered entirely within that Ahmindra.”
श्लोक ( Shlok ) 160
तेऽप्यष्टौ भ्रातरस्तस्य धनदेवोऽप्यनल्पधीः । जातास्तत्सदृशा एव देवाः पुण्यानुभावतः ॥१६०॥
वज्रनाभि के वे विजय, वैजयंत, जयंत, अपराजित, बाहु, सुबाहु, पीठ और महापीठ नाम के आठों भाई तथा विशाल बुद्धि का धारक धनदेव ये नौ जीव भी अपने पुण्य के प्रभाव से उसी सर्वार्थसिद्धि में वज्रनाभि के समान ही अहमिंद्र हुए ।।160।।
“Vajranabhi’s eight brothers—Vijaya, Vaijayanta, Jayanta, Aparajita, Bahu, Subahu, Peetha, and Mahapeetha—as well as the highly intelligent Dhanadeva, all became Ahmindras in Sarvārthasiddhi, just like Vajranabhi himself, due to the influence of their immense merit.”
श्लोक ( Shlok ) 161
इति तत्राहमिन्द्रास्ते सुखं मोक्षसुखोपमम् । भुञ्जाना निष्प्रवीचाराश्चिरमासन् प्रमोदिनः॥१६१ ॥
इस प्रकार उस सर्वार्थसिद्धि में वे अहमिंद्र मोक्षतुल्य सुख का अनुभव करते हुए प्रवीचार (मैथुन) के बिना ही चिरकाल तक सुखी रहते थे ।।161।।
“Thus, in Sarvārthasiddhi, those Ahmindras experienced bliss akin to liberation and remained happy for an immensely long time, without any desire for sensual pleasures.”
श्लोक 162 से 171
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 |