भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241
श्लोक 242 से 252 भविष्य और पुंडरीकिणी यात्रा
चारों जानवरों ने दान देखकर जाति-स्मरण पाया, भोगभूमि की आयु बाँधी। वज्रजंघ आठवें भव में वृषभनाथ, श्रीमती श्रेयान्स राजा बन मोक्ष पाएँगे। वज्रजंघ हर्षित हुआ, मुनियों को नमस्कार कर डेरे लौटा। मुनि आकाशमार्ग से गए। वज्रजंघ ने शष्प सरोवर पर समय बिताया, फिर पुंडरीकिणी पहुँच लक्ष्मीमती और अनुंधरी को सांत्वना दी, राज्य निष्कंटक किया।
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 242 to 252
श्लोक ( Shlok ) 242
युष्मद्दानं समीक्ष्यैते प्रमोदं परमागताः । प्राप्ता जातिस्मरत्वं प्व निर्वेदमधिकं श्रिताः ॥ २४२॥
हे राजन् आपके दान को देखकर ये चारों ही परम हर्ष को प्राप्त हो रहे हैं और इन चारों को ही जाति-स्मरण हो गया है जिससे ये संसार से बहुत ही विरक्त हो गये हैं ।।242।।
O King, upon witnessing your generosity, all four of them have attained immense joy. They have also regained the memory of their past lives, which has led them to develop great detachment from worldly existence.( 242)
श्लोक ( Shlok ) 243
भवद्दानानुमोदेन बद्धायुष्काः कुरुष्वमी। ततोऽमी भीतिमुत्सृज्य स्थिता धर्मश्रवार्थिनः ॥२४३॥
आपके दिये हुए दान की अनुमोदना करने से इन सभी ने उत्तम भोगभूमि की आयु का बंध किया है । इसलिए ये भय छोड़कर धर्मश्रवण करने की इच्छा से यहाँ बैठे हुए हैं ।।243।।
By rejoicing in the charity you have given, all of them have secured the binding of a lifespan in the superior Bhogbhumi (a realm of pleasurable existence). Therefore, abandoning fear, they are seated here with the desire to listen to the teachings of Dharma.( 243)
श्लोक ( Shlok ) 244
इतोऽष्टमे भवे भाविन्यपुनर्भवतां भवान् । ‘भवितामी च तत्रैव भवे ‘सेत्स्यन्त्यसंशयम् ॥२४४॥
हे राजन् इस भव से आठवें आगामी भव में तुम वृषभनाथ तीर्थंकर होकर मोक्ष प्राप्त करोगे और उसी भव में ये सब भी सिद्ध होंगे, इस विषय में कुछ भी संदेह नहीं है ।।244।।
O King, in the eighth future birth from this one, you will become the Tirthankara Rishabhanatha and attain liberation. In that very birth, all of them will also attain Siddhahood. There is no doubt about this.(244)
श्लोक ( Shlok ) 245
तावच्चाभ्युदयं सौख्यं दिव्यमानुषगोचरम् ।त्वयैव सममेतेऽनुभोक्तारः पुण्यभागिनः ॥२४५॥
और तब तक ये पुण्यशील जीव आपके साथ-साथ ही देव और मनुष्यों के उत्तम-उत्तम सुख तथा विभूतियों का अनुभोग करते रहेंगे ।।245।।
Until then, these virtuous beings will continue to accompany you, experiencing the finest pleasures and glories of both divine and human realms.(245)
श्लोक ( Shlok ) 246
श्रीमती च भवत्तीर्थे दानतीर्थप्रवर्त्तकः । श्रेयान् भूत्वा परं श्रेयः श्रमिष्यति न संशयः ॥२४६।
इस श्रीमती का जीव भी आपके तीर्थ में दानतीर्थ की प्रवृत्ति चलाने वाला राजा श्रेयान्स होगा और उसी भव से उत्कृष्ट कल्याण अर्थात् मोक्ष को प्राप्त होगा, इसमें संशय नहीं है ।।246।।
The soul of this noble lady will become King Shreyans in your Tirtha, promoting the practice of charity. From that very birth, she will attain supreme welfare, that is, liberation. There is no doubt about this.(246)
श्लोक ( Shlok ) 247
इति चारणयोगीन्द्रवचः श्रुत्वा नराधिपः । दधे रोमाञ्जितं गात्रं ततं प्रेमाङ्कुरैरिव ॥२४७॥
इस प्रकार चारण ऋद्धिधारी मुनिराज के वचन सुनकर राजा वज्रजंघ का शरीर हर्ष से रोमांचित हो उठा जिससे ऐसा मालूम होता था मानो प्रेम के अंकुरों से व्याप्त ही हो गया हो ।।247।।
Hearing the words of the Charan Riddhi-bearing Muni, King Vajrjangha’s body thrilled with joy, as if it had become entirely enveloped by the sprouts of love and devotion.( 247)
श्लोक ( Shlok ) 248
ततोऽभिवन्द्य योगीन्द्रौ नरेन्द्रः प्रिययान्वितः । स्वावासं प्रत्यगात् प्रीतैः समं मतिवरादिभिः ॥२४८॥
तदनंतर राजा उन दोनों मुनिराजों को नमस्कार कर रानी श्रीमती और अतिशय प्रसन्न हुए मतिवर आदि के साथ अपने डेरे पर लौट आया ।।248।।
Thereafter, the king bowed to both the Muni sages and, accompanied by Queen Shrimati and the immensely delighted Mativar and others, returned to his camp.(248)
श्लोक ( Shlok ) 249
मुनी च वातरशनौ वायुमन्वीयतुस्तदा । मुनिवृत्तेरसंगत्वं ख्यापयन्तौ नभोगती ॥२४९॥
तत्पश्चात् वायुरूपी वस्तु को धारण करने वाले (दिगंबर) वे दोनों मुनिराज मुनियों की वृत्ति परिग्रहरहित होती है इस बात को प्रकट करते हुए वायु के साथ-साथ ही आकाशमार्ग से विहार कर गये ।।249।।
Thereafter, the two Digambara sages, clad only in the element of air, revealed the detachment inherent in the conduct of ascetics. They traveled along the path of the sky, moving with the wind.( 249)
श्लोक ( Shlok ) 250
नृपोऽपि तद्गुणध्यानसमुत्कण्ठितमानसः । तत्रैव तदहःशेषम तिवाह्य ससाधनः ॥२५०॥
राजा वज्रजंघ ने उन मुनियों के गुणों का ध्यान करते हुए उत्कंठित चित्त होकर उस दिन का शेष भाग अपनी सेना के साथ उसी शष्प नामक सरोवर के किनारे व्यतीत किया ।।250।।
King Vajrjangha, contemplating the virtues of those sages with an eager heart, spent the remainder of that day with his army on the shores of the lake named Shashpa.(250)
श्लोक ( Shlok ) 251 -252
ततः प्रयाणकैः कैश्चित् संप्रापत् पुण्डरीकिणीम् । तत्रापश्यच्च शोकार्ता देवीं लक्ष्मीमर्ती सतीम् ॥२५१॥
अनुन्धरीं प्व सोत्कण्ठां समाश्वास्य शनैरसौ । पुण्डरीकस्य तद्राज्यमकरोन्निरुपप्ल वम् ॥२५२॥
तदनंतर वहाँ से कितने ही पड़ाव चलकर वे पुंडरीकिणी नगरी में जा पहुँचे । वहाँ जाकर राजा वज्रजंघ ने शोक से पीड़ित हुई सती लक्ष्मीमती देवी को देखा और भाई के मिलने की उत्कंठा से सहित अपनी छोटी बहन अनुंधरी को भी देखा । दोनों को धीरे-धीरे आश्वासन देकर समझाया तथा पुंडरीक के राज्य को निष्कंटक कर दिया ।।251-252।।
Thereafter, traveling several stages from there, they reached the city of Pundarikini. There, King Vajrjangha saw the virtuous Queen Lakshmimati, who was distressed by grief, and also his younger sister Anundhari, who was yearning to reunite with her brother. He gently consoled and reassured both of them and made Pundarik’s kingdom free from troubles.( 251-252)
श्लोक 253 से 257
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241