आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 |
श्लोक 222 से 231 इंद्रों की स्तुति
इंद्रों ने स्तुति की—भगवान स्वयंभू, गुणों से स्फुरित, और दीक्षा से जगत को पवित्र करने वाले हैं। वे स्वयंबुद्ध हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 222 to 231
श्लोक ( Shlok ) 222
म तदा भगवतो रूपमसरूपं विभास्वरम् । पश्यन्नेत्रसहस्त्रेण नापतृप्ति सहस्रदृक् ॥२२२॥
उस समय भगवान् का अनुपम रूप अतिशय दैदीप्यमान हो रहा था । उस रूप को इंद्र हजार नेत्रों से देखता हुआ भी तृप्त नहीं होता था ।।222।।
At that moment, Bhagwan’s unparalleled form was radiating immense brilliance. Even Indra, with his thousand eyes, kept gazing at him but could not be satisfied. ( 222)
श्लोक ( Shlok ) 223
ततस्त्रिजगदीशानं परं ज्योतिर्गिरां पतिम् । तुष्टास्तुष्टुवुरित्युच्चैः स्वःप्रष्ठाः परमेष्ठिनम् ॥२२३।।
तत्पश्चात् स्वर्ग के इंद्रों ने अतिशय संतुष्ट होकर तीनों लोकों के स्वामी-उत्कृष्ट ज्योति स्वरूप और वाचस्पति अर्थात् समस्त विद्याओं के अधिपति भगवान् वृषभदेव की इस प्रकार जोर-जोर से स्तुति की ।।223।।
Thereafter, the Indras of heaven, being immensely pleased, began to loudly praise Bhagwan Rishabhdev— the Lord of the three worlds, the embodiment of supreme radiance, and the master of all knowledge and wisdom. ( 223)
श्लोक ( Shlok ) 224
जगत्स्त्रष्टारमीशानमभीष्टफलदायिनम् । त्वामनिष्टविघाताय समभिष्टुमहे वयम् ।।२२४।।
हे स्वामिन्, आप जगत् के स्रष्टा हैं (कर्मभूमिरूप जगत् की व्यवस्था करने वाले हैं) स्वामी हैं―और अभीष्ट फल के देने वाले हैं इसलिए हम लोग अपने अनिष्टों को नष्ट करने के लिए आपकी अच्छी तरह से स्तुति करते हैं ।।224।।
O Lord! You are the creator of the world (the one who establishes the order of the karmabhumi), the supreme master, and the bestower of desired fruits. Therefore, we wholeheartedly offer our praises to You to destroy all our misfortunes. ( 224)
श्लोक ( Shlok ) 225
गुणास्ते गणनातीताः स्तूयन्तेऽस्मद्विधैः कथम् । भक्त्या तथापि तद्वया जात्तन्मः प्रोन्न तिमात्मनः।।२२५।
हे भगवन्, हम-जैसे जीव आपके असंख्यात गुणों की स्तुति किस प्रकार कर सकते हैं तथापि हम लोग भक्ति के वश स्तुति के छल से मात्र अपनी आत्मा की उन्नति को विस्तृत कर रहे हैं ।।225।।
O Lord! How can beings like us praise Your infinite virtues? Yet, driven by devotion, we merely expand the elevation of our own souls through the pretense of offering praise. (225)
श्लोक ( Shlok ) 226
बहिरन्तर्मलापायात् स्फुरन्तीश गुणास्तव । घनोपरोधनिर्मुक्तमूर्तेरिव रवेः कराः ॥२२६।।
हे ईश, जिस प्रकार मेघों का आवरण हट जाने से सूर्य की किरणें स्फुरित हो जाती हैं, उसी प्रकार द्रव्यकर्म और भावकर्मरूपी बहिरंग तथा अंतरंग मल के हट जाने से आपके गुण स्फुरित हो रहे हैं ।।226।।
O Lord! Just as the rays of the sun shine forth when the covering of clouds disappears, in the same way, Your virtues radiate brilliantly as the external and internal impurities of Dravya Karma and Bhava Karma are removed. ( 226)
श्लोक ( Shlok ) 227
त्रिलोकपावनी पुण्यां’ जैनीं श्रुतिमिवामलाम् । प्रवञ्यां दधते तुभ्यं नमः सार्वाय शंभवे ॥२२७॥
हे भगवन्, आप जिनवाणी के समान मनुष्यलोक को पवित्र करने वाली पुण्यरूप निर्मल जिनदीक्षा को धारण कर रहे हैं इसके सिवाय आप सबका हित करने वाले हैं और सुख देने वाले हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ।।227।।
O Lord! You are embracing the pure and virtuous Jin Diksha, which, like the Jinvani (divine teachings), sanctifies the human world. Besides this, You are the benefactor of all and the giver of true bliss. Salutations to You! ( 227)
श्लोक ( Shlok ) 228
“विध्यापितजगत्तापा जगतामेकपावनी । स्वर्धुनीव पुनीयान्नो दीक्षेयं पारमेश्वरी ॥२२८॥
हे भगवन् आपको यह पारमेश्वरी दीक्षा गंगा नदी के समान जगत्त्रय का संताप दूर करने वाली है और तीनों जगत् को मुख्य रूप से पवित्र करने वाली है, ऐसी यह आपकी दीक्षा हम लोगों को सदा पवित्र करे ।।228।।
O Lord! This supreme initiation (Parameshwari Diksha) of Yours is like the holy Ganga, which removes the suffering of the three worlds and primarily sanctifies all realms. May this divine initiation forever purify us. ( 228)
श्लोक ( Shlok ) 229
“सुवर्णा रुचिरा हृद्या रत्नेदीं प्रैरलं कृता । “रैधारेवामिनि प्क्रान्तिः यौप्माकीयं धिनोति नः ॥२२९॥
हे भगवन्, आपकी यह दीक्षा धन की धारा के समान हम लोगों को संतुष्ट कर रही है क्योंकि जिस प्रकार धन की धारा सुवर्ण अर्थात् सुवर्णमय होती है उसी प्रकार यह दीक्षा भी सुवर्णा अर्थात् उत्तम यश से सहित है । धन की धारा जिस प्रकार रुचिरा अर्थात् कांतियुक्त-मनोहर होती है उसी प्रकार यह दीक्षा भी रुचिरा अर्थात् सम्यक्त्वभाव को देने वाली है (रुचिं श्रद्धां राति ददातीति रुचिरा) धन की धारा जिस प्रकार हृद्या अर्थात् हृदय को प्रिय लगती है, उसी प्रकार यह दीक्षा भी हृद्या अर्थात् संयमीजनों के हृदय को प्रिय लगती है और धन की धारा जिस प्रकार दैदीप्यमान रत्नों से अलंकृत होती है उसी प्रकार यह दीक्षा भी सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूपी दैदीप्यमान रत्नों से अलंकृत है ।।229।।
O Lord! Your initiation is like a stream of wealth, bringing us immense satisfaction. Just as a stream of wealth is golden (Suvarna), radiant (Ruchira), heart-pleasing (Hridaya), and adorned with shining jewels, so too is this divine initiation:
- Suvarna – enriched with supreme glory.
- Ruchira – bestowing the light of right faith (Samyaktva).
- Hridaya – beloved to the hearts of ascetics.
- Adorned with radiant gems – the brilliance of right faith,
- right knowledge, and right conduct.(229)
श्लोक ( Shlok ) 230
“मुक्तावुत्तिष्ठ मानस्त्वं तत्कालोपनतैः ” सितैः। प्रबुद्धः परिणामैः प्राक पश्चाल्लोकान्तिकामरैः ॥ २३०॥
हे भगवन् मुक्ति के लिए उद्योग करने वाले आप तत्कालीन अपने निर्मल परिणामों के द्वारा पहले ही प्रबुद्ध हो चुके थे, लौकांतिक देवों ने तो नियोगवश पीछे आकर प्रतिबोधित किया था ।।230।।
O Lord! You were already awakened by your own pure and enlightened state, making efforts for liberation. The celestial deities of the higher realms came later, merely fulfilling their duty by reminding you. Your awakening was not dependent on them—it was your own divine realization.( 230)
श्लोक ( Shlok ) 231
परिनिष्क्रमणे योऽयमभिप्रायो जगत्सृजः । स ते यतः स्वतो जातः स्वयं बुद्धोऽस्यतो मुनेः ॥२३१।।
हे मुनिनाथ, जगत् की सृष्टि करने वाले आपका, दीक्षा धारण करने के विषय में जो यह अभिप्राय हुआ है वह आपको स्वयं ही प्राप्त हुआ है इसलिए आप स्वयंबुद्ध हैं ।।231।।
O Lord of ascetics! You, the creator of the world’s order, have attained the resolve to accept initiation by yourself. This realization has arisen from within you alone, which is why you are self-enlightened (Svayambuddha).(231)
श्लोक 232 से 241
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 |