आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 |
श्लोक 52 से 61 दक्षिण श्रेणी की संरचना
दक्षिण श्रेणी में 50 नगर थे। इनके कोट और गोपुर ऊँचे थे। प्रत्येक नगरी तीन परिखाओं से घिरी थी। परिखाएँ सुवर्ण और रत्नों से बनी थीं। इनमें कमल कर्णाभरण से थे। कोट सुवर्ण धूलि का और छह धनुष ऊँचा था। परकोटा कंगूरों से युक्त था। यह बारह धनुष चौड़ा और चौबीस धनुष ऊँचा था।
English translation of Ādi purāṇa parv 19 – Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
सूर्यचन्द्रपुरे चामू नित्योद्योतिन्यनुक्रमात् । विमुखी नित्यवाहिन्यौ सुसुखी चैव पश्चिमा ।। ‘५२॥
ये अनुक्रम से 44 सूर्यपुर, 45 चंद्रपुर और 46 नित्योद्योतिनी नाम के नगर है । यह 47 विमुखी, यह 48 नित्यवाहिनी, यह 49 सुमुखी और यह 50 पश्चिमा नाम की नगरी है ।।52।।
These are, in sequence, the cities of Suryapura (44), Chandrapura (45), and Nityodyotini (46). Here is Vimukhi (47), here is Nityavahini (48), here is Sumukhi (49), and here is Pashchima (50). ॥52॥
श्लोक ( Shlok ) 53
नगर्यो दक्षिणश्रेण्यां पञ्चाशत्सङ्ख्यया मिताः । प्राकारगोपुरोतुङ्गाः “खाताभिस्तिसृभिर्वृताः ॥५३॥
इस प्रकार दक्षिण-श्रेणी में 50 नगरियाँ हैं, इन नगरियों के कोट और गोपुर (मुख्य दरवाजे) बहुत ऊँचे है तथा प्रत्येक नगरी तीन-तीन परिखाओं से घिरी हुई है ।।53।।
Thus, there are 50 cities in the southern range. The forts and gateways of these cities are extremely tall, and each city is surrounded by three deep moats. ॥53॥
श्लोक ( Shlok ) 54
तिसृणामपि खातानामन्तरं दण्डसम्मितम् । दण्डाश्चतुर्दशैकस्या व्यासो द्वयूनोऽन्ययोर्द्वयोः ॥५४॥
इन तीनों परिखा का अंतर एक-एक दंड अर्थात् धनुष प्रमाण हैं तथा पहली परिखा चौदह दंड चौड़ी है, दूसरी बारह और तीसरी दस दंड चौड़ी है ।।54।।
The spacing between these three moats is one danda (bow-length) each. The first moat is fourteen dandas wide, the second is twelve dandas wide, and the third is ten dandas wide. ॥54॥
श्लोक ( Shlok ) 55
विष्कम्भादवगा ढास्ताः पादोनं वार्द्धमेव वा । त्रिभाग मुलास्ता ज्ञेया मूलाद्वा चतुरस्त्रिकाः ॥५५॥
ये परिखाएँ अपनी-अपनी चौड़ाई से क्रमपूर्वक पौनी, आधी और एकतिहाई गहरी है अर्थात् पहली परिखा साढ़े दस धनुष, दूसरी छह धनुष और तीसरी सवा तीन धनुष से कुछ अधिक गहरी है । ये सभी परिखाएँ नीचे से लेकर ऊपर तक एक-सी चौड़ी हैं ।।55।।
These moats, in proportion to their width, have depths of three-fourths, one-half, and one-third respectively. That is, the first moat is ten and a half dhanush deep, the second is six dhanush deep, and the third is slightly more than three and a quarter dhanush deep. All these moats maintain a uniform width from bottom to top. ॥55॥
श्लोक ( Shlok ) 56
रत्नोपलैरुपहिताः स्वर्णेष्टकचिताश्च ताः । तौयान्तिक्यः परीवाहयुक्ता’ वा निर्मलोदकाः ॥५६॥
वे परिखाऐं सुवर्णमयी ईंटों से बनी हुई हैं, रत्नमय पाषाणों से जड़ी हुई हैं, उनमें ऊपर तक पानी भरा रहता है और वह पानी भी बहुत स्वच्छ रहता है । वे परिखाएँ जल के आने-जाने के परीवाहों से भी युक्त हैं ।।56।।
These moats are built with golden bricks and adorned with gem-encrusted stones. They are filled with water up to the brim, and the water remains exceptionally clear. Additionally, the moats are equipped with canals that regulate the inflow and outflow of water. ॥56॥
श्लोक ( Shlok ) 57
पद्मोत्पल वतं सिन्यो यादोदोर्घट्टनक्षमाः। महाब्धिभिरिव स्पर्धा कुर्वाणास्तुङ्गवीचिभिः ॥५७॥
उन परिखाओं में जो लाल और नीले कमल हैं वे उनके कर्णाभरण से जान पड़ते हैं, वे जलचर जीवों की भुजाओं के आघात सहने में समर्थ हैं और अपनी ऊँची लहरों से ऐसी मालूम होती है मानो बड़े-बड़े समुद्रों के साथ स्पर्द्धा ही कर रही हो ।।57।।
The red and blue lotuses in these moats appear like their ear ornaments. The waters are strong enough to withstand the movements of aquatic creatures, and with their towering waves, they seem as if they are competing with the vast oceans. ॥57॥
श्लोक ( Shlok ) 58
चतुर्दण्डान्तरश्वातो वप्र षड्धनुरुच्छ्रितः । स्वर्णपांसूपलैश्छन्नः “स्वोत्सेधाद् द्विश्च विस्तृतः ॥५८॥
इन परिखाओं से चार दंड के अंतर फासला पर एक कोट है जो कि सुवर्ण की धूलि के बने हुए पत्थरों से व्याप्त है, छह धनुष ऊँचा है और बारह धनुष चौड़ा है ।।58।।
At a distance of four dandas from these moats stands a fortification, covered with stones dusted in golden powder. It rises six dhanush in height and spans twelve dhanush in width. ॥58॥
श्लोक ( Shlok ) 59
तमू र्ध्वंचयमिच्छन्ति तथा मञ्चक पृष्टकम् । कुम्भकुक्षिसमाकारं “गोक्षुरक्षोदनिस्तलम् ॥५९॥
इस कोट का ऊपरी भाग अनेक कंगूरों से युक्त है । चेहरे गाय के खुर के समान गोल है और घड़े के उदर के समान बाहर की ओर उठे हुए आकार वाले हैं ।।59।।
The upper part of this fortification is adorned with numerous battlements. Its merlons are round like a cow’s hoof and have an outwardly bulging shape, resembling the belly of a pot. ॥59॥
श्लोक ( Shlok ) 60
वप्रस्योपरि सालोऽभूद् विष्कम्भाद् द्विगुणोच्छ्रितः । चतुर्विंशतिमुद्विद्धों धनुषां तलमूलतः ॥६०॥
इस धूलि कोटि के आगे एक परकोटा है जो कि चौड़ाई से दूना ऊँचा है । इसकी ऊँचाई मूल भाग से ऊपर तक चौबीस धनुष है अर्थात् यह बारह धनुष चौड़ा और चौबीस धनुष ऊँचा है ।।60।।
In front of this dust-covered fortification, there is an outer wall, which is twice as high as it is wide. Its height, from the base to the top, measures twenty-four dhanush, while its width is twelve dhanush. ॥60॥
श्लोक ( Shlok ) 61
*”मुरजैः कपि शीर्षैश्च रचिताग्रः समन्ततः । चित्र हैमेष्टकचितः क्वचिद् रत्नशिलामयः ॥६१॥
इस परकोटे का अग्रभाग मृदंग तथा बंदर के शिर के आकार के कंगूरों से बना हुआ है, यह परकोटा चारों ओर से अनेक प्रकार की सुवर्णमयी ईंटों से व्याप्त है और कहीं-कहीं पर रत्नमयी शिलाओं से भी युक्त है ।।61।।
The front section of this outer wall is adorned with battlements shaped like the heads of monkeys and the bodies of mridanga drums. This fortification is entirely covered with various types of golden bricks and, in some places, is also embedded with gem-encrusted stones. ॥61॥
श्लोक 62 से 71
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