आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
श्लोक 162 से 171 : पर्वत का वैभव
वायु भ्रमरों से शोभायमान था। देवांगनाओं और यहाँ की स्त्रियों में अंतर था। हाथी मणियों से डर भागता था। मयूर नीलमणि से नृत्य करता था। हंस और वृक्ष कामदेव को बुलाते थे। किन्नर स्त्रियों संग विहार करते थे। पर्वत सिंह और रंगों से यश धारण करता था। देवों को यहाँ संतोष मिलता था। सिंह चट्टानों पर प्रहार करता था।
English translation of Ādi purāṇa parv 19 – Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
सुरभिकुसुमरेणूना किरन्विश्वदिक्कं परिमलमिलितालिव्यक्तझंकारहृद्यः । प्रतिवनमिह शैले वाति मन्दं नभस्वान् प्रतिविहितनभोगस्त्रे णसंभोगखेदः ॥१६२॥
जो सुगंधित फूलों की पराग को सब दिशाओं में फैला रहा है, जो सुगंधि के कारण इकट्ठे हुए भ्रमरों की स्पष्ट झंकार से मनोहर जान पड़ता है और जो विद्याधरियों के संभोगजनित खेद को दूर कर देता है ऐसा वायु इस पर्वत के प्रत्येक वन में धीरे-धीरे बहता रहता है ।।162।।
“The breeze on this mountain gently flows through every forest, carrying the fragrant pollen of blossoms to all directions. Enriched by the sweet hum of bees drawn to its aroma, it appears even more enchanting, soothing the sorrows of the celestial Vidyadharis born from their passionate unions.”
श्लोक ( Shlok ) 163
सुरयुवतिसमाजस्यास्य च स्त्रीजनस्य प्रकृति कृतमियत् स्यादन्तरं व्यक्तरूपम् । स्तिमितनयनमैन्द्र स्त्रेणमेतत्तु लीलावलितललितलोलापाङ्गवीक्षाविलासम् ।।१६३॥
देवांगनाओं तथा इस पर्वत पर रहने वाली स्त्रियों के बीच प्रकृति के द्वारा किया हुआ स्पष्ट दिखने वाला केवल इतना ही अंतर है कि देवांगनाओं के नेत्र टिमकार से रहित होते हैं और यहाँ की स्त्रियों के नेत्र लीला से कुछ-कुछ टेढ़े सुंदर और चंचल कुटाक्षों के विलास से सहित होते हैं ।।163।।
“The only visible difference between the celestial nymphs and the women residing on this mountain, as ordained by nature, is that the eyes of the celestial nymphs lack the playful flicker, whereas the eyes of these mountain women are adorned with graceful, slightly curved glances, full of charm and mischievous sidelong looks.”
श्लोक ( Shlok ) 164
अत्रायमुन्मदमधुव्रत सेव्यमान-गण्डस्थलो गजपतिर्वनमाजिहानः । दृष्ट्वा हिरण्मयतटीर्गिरिमर्तुरस्य-दावानलप्रतिभयाद् वनमुज्जहाति ॥१६४॥
इधर देखो, जिसके गंडस्थल पर अनेक उन्मत्त भ्रमर मंडरा रहे हैं ऐसा यह वन में प्रवेश करता हुआ हाथी इस गिरिराज के सुवर्णमय तटों को देखकर दावानल के डर से वन को छोड़ रहा है ।।164।।
“Look here! This elephant, with many intoxicated bees swarming around its temples, is entering the forest. However, upon seeing the golden slopes of this great mountain, it is leaving the forest out of fear of a wildfire.”
श्लोक ( Shlok ) 165
अत्रानीलं मणितटमुच्चैः पश्यन् मेघाशङ्गी नटति कलापी हृष्टः । “केकाः कुर्वन्विरचितबर्हाटोपो लोकस्तस्वं गणयति नार्थी मूढः ॥१६५॥
इधर, नीलमणि के बने हुए ऊँचे किनारे को देखता हुआ यह मयूर मेघ की आशंका से हर्षित हो मधुर शब्द करता हुआ पूँछ उठाकर नृत्य कर रहा है सो ठीक ही है क्योंकि मूर्ख स्वार्थी जन सचाई का विचार नहीं करते हैं ।।165।।
“Here, this peacock, upon seeing the high cliffs made of blue sapphire, mistakes them for rain clouds. Overjoyed, it raises its tail and dances while making sweet sounds. This is only natural, for foolish and self-serving people do not think deeply about the truth.”
श्लोक ( Shlok ) 166
सरसि कलममी रुवन्ति हंसास्तरुषु च कोकिलषट्पदाः स्वनन्ति। फलनमितशिखाश्च पादपौघाः चल विटपैर्ध्रुवमाह्वयन्त्यनङ्गम् ॥ १६६॥
इधर तालाबों में ये हंस मधुर शब्द कर रहे हैं और वृक्षों पर कोयल तथा भ्रमर शब्द कर रहे हैं । इधर फलों के बोझ से जिनकी शाखाएँ नीचे की ओर झुक गयी हैं ऐसे ये वृक्ष अपनी हिलती हुई शाखाओं से ऐसे मालूम होते हैं मानो कामदेव को ही बुला रहे हों ।।166।।
“Here, in the ponds, these swans are making sweet sounds, while the cuckoos and bees are singing in the trees. The trees, with their branches bending under the weight of heavy fruits, sway as if they are calling upon Kamadeva himself.”
श्लोक ( Shlok ) 167
मन्थरं व्रजति काननमध्यादेष वाजिवदनः “सहकान्तः। संस्पृशन् स्तनतटं दयितायास्तत्सु खानुभवमीलितनेत्रः ॥१६७॥
इधर अपनी स्त्री के स्तन-तट का स्पर्श करता हुआ और उस सुख के अनुभव से कुछ-कुछ नेत्रों को बंद करता हुआ यह किन्नर अपनी स्त्री के साथ-साथ वन के मध्यभाग से धीरे-धीरे जा रहा है ।।167।।
“Here, this Kinnar, gently touching his wife’s bosom and closing his eyes slightly in the pleasure of that touch, is slowly walking through the heart of the forest along with her.”
श्लोक ( Shlok ) 168
एष सिंहचमरीमृगकोटीः सानुभिर्वहति निर्मलमूर्तिः सन्ततीरिव यशोविसरस्म स्वस्य लोध्रधवला रजताद्रिः ॥१६८॥
यह विजयार्ध पर्वत अपने शिखरों पर निर्मल शरीर वाले करोड़ों सिंह, करोड़ों चमरी गायें और करोड़ों रंगों को धारण कर रहा है और उन सबसे ऐसा मालूम होता है मानो लोध्रवृक्ष के समान सफेद अपने यशसमूहकी संतति को ही धारण कर रहा हो ।।168।।
“This Vijayardha Mountain, with its peaks adorned by millions of pure-bodied lions, millions of Chamari cows, and countless hues, appears as if it is bearing its own progeny of glory, much like the Lodhra tree bearing its white blossoms.”
श्लोक ( Shlok ) 169
यास्य सानुषु धृतिर्विबुधानां राजतेषु वनितानुगतानाम् । सा न नाकवसतौ न हिमाद्रौ नापि मन्दरगिरेस्तटभागे ॥१६९॥
अपनी-अपनी देवांगना के साथ विहार करते हुए देवों को इस पर्वत के रजतमयी शिखरों पर जो संतोष होता है वह उन्हें न तो स्वर्ग में मिलता है, न हिमवान् पर्वत पर मिलता है और न सुमेरु पर्वत के किसी तट पर ही मिलता है ।।169।।
“The satisfaction that the gods experience while wandering with their celestial maidens on the silver peaks of this mountain is unmatched—not found in heaven, nor on the Himalayas, nor on any slope of Mount Sumeru.”
श्लोक ( Shlok ) 170
गण्डोपलं वनकरीन्द्रकपोलकाष संक्रान्तदानसलि लप्लुतमत्र शैले । पश्यन्नयं द्विपविशङ्किमना मृगेन्द्रो भूयोऽमिहन्ति नखरैर्विलिखत्युपान्तम ॥१७०॥
इधर देखो, जो जंगली हाथियों के गंडस्थलों की रगड़ से लगे हुए मद-जल से तर-बतर हो रहा है, ऐसे इस पहाड़ पर की गोल चट्टान को यह सिंह हाथी समझ रहा है इसीलिए यह उसे देखकर बार-बार उस पर प्रहार करता है और नाखूनों से समीप की भूमि को खोदता है ।।170।।
“Look here! This lion mistakes the round rock on this mountain, drenched with the ichor flowing from the temples of wild elephants rubbing against it, for an actual elephant. Enraged, it repeatedly strikes the rock and claws at the ground nearby.”
श्लोक ( Shlok ) 171
सिंहोऽयमत्र गहने शनकैर्विबुद्धो व्याजम्भते शिखरमुत्पतितुं कृतेच्छः । तन्वन् गिरेरधिगुहा ‘मुखमट्टहासलक्ष्मी शरच्छ शिधरामलदेहकान्तिः ॥१७१॥
इधर इस वन में शरद्ऋतु के चंद्रमा के समान निर्मल शरीर की कांति को धारण करता हुआ तथा इस पर्वत के गुफारूपी मुख पर अट्टाहास की शोभा बढ़ाता हुआ यह सिंह धीरे-धीरे जागकर जमुहाई ले रहा है और पर्वत के शिखर पर छलांग मारने की इच्छा कर रहा है ।।171।।
“Here in this forest, a lion, possessing a radiant body like the autumn moon, slowly awakens, yawning gracefully. Enhancing the grandeur of the mountain’s cave-like mouth with its thunderous roar, it prepares to leap onto the mountain’s peak.”
श्लोक 172 से 181
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161