आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
श्लोक 82 से 93 ब्राह्मी और सुंदरी की शोभा
ब्राह्मी और सुंदरी के अंगों (स्तन, कंठ, मुख, नेत्र, केश आदि) की शोभा का वर्णन। उनकी सुंदरता ऐसी थी कि लोग उन्हें दिव्य कन्याएँ, लक्ष्मी, या सरस्वती मानते थे। दोनों ने भगवान को प्रणाम किया।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 82 to 93
श्लोक ( Shlok ) 82
वहन्त्यौ किंचिदुद्भुत श्यामिकां रोमराजिकाम् । मनोभवगृहावेशधूपधूमशिखामिव ॥८२॥
जिसमें कुछ-कुछ कालापन प्रकट हो चुका है ऐसी जिस रोमराजी को वे पुत्रियाँ धारण कर रही थीं वह ऐसी मालूम होती थी मानो कामदेव के गृहप्रवेश के समय खेई हुई धूप के धूम की शिखा ही हो ।।82।।
The body hair of those daughters, which had developed a slight darkness, appeared as if it were the very plume of smoke rising from incense burned during Kamadeva’s homecoming.
श्लोक ( Shlok ) 83
तनुमध्ये कृशोदर्यावारक्तकरपल्लवे । मृदुबाहुलते किंचिदुभ्दिन्नकुच कुट्मले ।॥८३॥
उन दोनों कन्याओं का मध्यभाग कृश था, उदर भी कृश था, हस्तरूपी पल्लव कुछ-कुछ लाल थे, भुजलताएँ कोमल थीं और स्तनरूपी कुड्मल कुछ-कुछ ऊंचे उठे हुए थे ।।83।।
The midsection of both maidens was slender, their waists were also delicate, their hand-like lotus buds were slightly reddish, their arm-like creepers were soft, and their bud-like breasts were slightly raised.
श्लोक ( Shlok ) 84
दधाने रुचिरं हारमाक्रान्तस्तनमण्डलम् । तदा “श्लेषसुखासङ्गात् स्मयमानमिवांशुभिः ॥८४
वे पुत्रियाँ स्तनमंडल पर पड़े हुए जिस मनोहर हार को धारण किए हुई थी वह अपनी किरणों से ऐसा शोभायमान हो रहा था मानो स्तनों के आलिंगन से उत्पन्न हुए सुख की आसक्ति से हँस ही रहा हो ।।84।।
The enchanting necklace adorning their bosoms shimmered with its radiant glow, appearing as if it were laughing with delight, captivated by the joy of the embrace of their breasts.
श्लोक ( Shlok ) 85
सुकण्ठ्यौ कोकिलालापनिर्हारिमधुरस्वरे । ‘ताम्राधरे दरोभ्दिन्नस्मितांशुरुचिरानने ।।८५।।
उनके कंठ बहुत ही सुंदर थे, उनका स्वर कोयल की वाणी के समान मनोहर और मधुर था, ओठ ताम्रवर्ण अर्थात् कुछ-कुछ लाल थे, और मुख कुछ-कुछ प्रकट हुए मंदहास्य की किरणों से मनोहर थे ।।85।।
Their necks were exceedingly beautiful, their voices as melodious and sweet as the song of a cuckoo, their lips were copper-colored, slightly reddish, and their faces were charming, adorned with the soft glow of a gentle smile.
श्लोक ( Shlok ) 86
सुदस्यौ ललितापाङ्गवीक्षिते सान्द्रपक्ष्मणी । मदनस्येव जैत्रास्त्रे दधाने नयनोत्पले ।।८६।।
उनके दाँत सुंदर थे, कटाक्षों-द्वारा देखना मनोहर था, नेत्रों की बिरौनी सघन थी और नेत्ररूपी कमल कामदेव के विजयी अस्त्र के समान थे ।।86।।
Their teeth were beautiful, their sidelong glances were enchanting, their eyelashes were dense, and their lotus-like eyes resembled the victorious arrows of Kamadeva.
श्लोक ( Shlok ) 87
लसत्कपोल संक्रान्तैरल कप्रतिबिम्बकैः ।ह्वेपयन्त्यावभिव्यक्तलक्ष्मणः शशिनः श्रियम् ।।८७।।
शोभायमान कपोलों पर पड़े हुए केशों के प्रतिबिंब से वे कन्याएं, जिसमें कलंक प्रकट दिखायी दे रहा है ऐसे चंद्रमा की शोभा को भी लज्जित कर रही थीं ।।87।।
With the reflection of their falling locks adorning their radiant cheeks, those maidens put even the beauty of the moon—tainted with blemishes—to shame.
श्लोक ( Shlok ) 88
समाल्यं कबरीभारं धारयन्त्यौ तरङ्गितम् । स्वान्तः संक्रान्तगाङ्गौघं प्रवाहमिव यामुनम् ॥८८॥
वे मालासहित जिस केशपाश को धारण कर रही थी वह ऐसा मालूम होता था मानो जिसके भीतर गंगा नदी का प्रवाह मिला हुआ है ऐसा यमुना नदी का लहराता हुआ प्रवाह ही हो ।।88।।
The tresses they adorned with garlands appeared like the flowing waves of the Yamuna River, within which the current of the Ganga seemed to have merged.
श्लोक ( Shlok ) 89
इति प्रत्यङ्गसंगिन्या कान्त्या कान्ततमाकृती। सौन्दर्यस्येव सन्दोहमेकीकृत्य विनिर्मिते ।।८९।।
इस प्रकार प्रत्येक अंग में रहने वाली कांति से उन दोनों की आकृति अत्यंत सुंदर थी और उससे वे ऐसी मालूम होती थीं मानो सौंदर्य के समूह को एक जगह इकट्ठा करके ही बनायी गयी हों ।।89।
In this way, with the radiance present in each of their features, their forms appeared exceptionally beautiful, as if they were created by gathering all the essence of beauty in one place.
श्लोक ( Shlok ) 90
किमेमे दिव्यकन्ये स्तां किन्नु कन्ये फणीशिनाम् । दिक्कन्ये किमुत स्यातां किं वा सौभाग्यदेवते ॥९०।।
किमिमे श्रीसरस्वत्यौ किं वा तदधिदेवते। किं स्या त्तदवतारोऽयमेवंरूपः प्रतीयते ॥९१।।
लक्ष्म्याविमे जगन्नाथमहावाद्धैः किमुद् गते । कल्याणभागिनी च स्याद् अनयोरियमाकृतिः ।।९२।।
इति संश्लाध्यमाने ते जनैरुत्पन्नविस्मयैः । सप्रश्रयमुपाश्रित्य जगन्नाथं प्रणेमतुः ॥९३॥
क्या ये दोनों दिव्य कन्याएँ हैं, अथवा नागकन्याएँ हैं ? अथवा दिक्कन्याएँ हैं अथवा सौभाग्य देवियाँ हैं, अथवा लक्ष्मी और सरस्वती देवी हैं अथवा उनकी अधिष्ठात्री देवी हैं अथवा उनका अवतार है अथवा क्या जगन्नाथ (वृषभदेव) रूपी महासमुद्र से उत्पन्न हुई लक्ष्मी हैं ? क्योंकि इनकी यह आकृति अनेक कल्याणों का अनुभव करने वाली है इस प्रकार लोग बड़े आश्चर्य के साथ जिनकी प्रशंसा करते हैं ऐसी उन दोनों कन्याओं ने विनय के साथ भगवान् के समीप जाकर उन्हें प्रणाम किया ।।90-93।।
Are these two divine maidens, or are they daughters of the Nagas? Or are they celestial damsels, goddesses of fortune, or perhaps Lakshmi and Saraswati themselves? Are they the presiding deities of beauty, their incarnations, or the very manifestation of Lakshmi emerging from the great ocean in the form of Lord Jagannath (Vrishabhadeva)? For their radiant forms inspire countless auspicious blessings. Filled with wonder, people praised them greatly. With humility, those two maidens approached the Lord and bowed before Him in reverence.
श्लोक 94 से 101
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81