आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192
श्लोक 193 से 208 राज्याभिषेक का वर्णन
भगवान के राज्याभिषेक का भव्य वर्णन। देवों ने संगीत, नृत्य, और तीर्थजल से अभिषेक किया।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 193 to 208
श्लोक ( Shlok ) 193 – 194
सुरैः कृतादरैर्दिव्यैः सलिलैरादिवेधसः । कृतोऽभिषेक इत्येव वर्णनास्तु किमन्यया ।।१९३।।
तथाप्यनूद्यते किंचित् तद्गतं वर्णनान्तरम् । सुप्रतीतमपि प्रायो यन्नावैति पृथग्जनः ॥१९४।
यद्यपि भगवान् के राज्याभिषेक का अन्य विशेष वर्णन करने से कोई लाभ नहीं है इतना वर्णन कर देना ही बहुत है कि आदर से भरे हुए देवों ने दिव्य जल से उन आदि ब्रह्मा भगवान् वृषभदेव का अभिषेक किया था तथापि उसका कुछ अन्य वर्णन कर दिया जाता है क्योंकि प्राय: साधारण मनुष्य अत्यंत प्रसिद्ध बात को भी नहीं जानते हैं ।।193-194।।
“Although there is no great benefit in providing an extensive description of Lord Rishabhadeva’s coronation, it is sufficient to say that the gods, filled with reverence, anointed the Adi-Brahma, Lord Rishabhadeva, with divine water.
However, some further details are given, as ordinary people often remain unaware even of widely known events.”
श्लोक ( Shlok ) 195
तदा किल जगद्विश्वं बभूवानन्दनिर्भरम् । दिवोऽवा तारिषुर्देवाः पुरोधाय पुरंदरम् ॥१९५।।
उस समय समस्त संसार आनंद से भर गया था, देव लोग इंद्र को आगे कर स्वर्ग से अवतीर्ण हुए थे―उतरकर अयोध्यापुरी आये थे ।।195।।
“At that time, the entire world was filled with joy. The gods, led by Indra, descended from heaven and arrived in Ayodhya.”
श्लोक ( Shlok ) 196
कृ तोपशोभमभवत् पुरं साकेतसाह्वयम् । हर्म्याग्रभूमिकाबद्धकेतुमाला कुलाम्बरम् ।।१९६॥
उस समय अयोध्यापुरी खूब ही सजायी गयी थी । उसके मकानों के अग्रभाग पर बाँधी गयी पताकाओं से समस्त आकाश भर गया था ।।196।।
“At that time, the city of Ayodhya was magnificently decorated. The flags tied to the fronts of buildings filled the entire sky.”
श्लोक ( Shlok ) 197
तदानन्दमहाभेर्यः प्रणेदुनृपमन्दिरे । मङ्गलानि जगुर्वारनार्यों नेटुः सुराङ्गनाः ॥१९७॥
उस समय राजमंदिर में बड़ी आनंद-भेरियाँ बज रही थी, वार स्त्रियाँ मंगलगान गा रही थीं और देवांगनाएँ नृत्य कर रही थीं ।।197।।
“At that time, joyful drums resounded in the royal palace, noble women sang auspicious hymns, and celestial maidens (Apsaras) performed graceful dances.”
श्लोक ( Shlok ) 198
सुरबैतालिकाः पेठु” रुत्साहान् सह मङ्गलैः । प्रचक्रुरमरास्तोषाज्जय जीवेति घोषणाम् ॥१९८॥
देवों के बंदीजन मंगलों के साथ-साथ भगवान् के पराक्रम पढ़ रहे थे और देव लोग संतोष से ‘जय जीव’ इस प्रकार की घोषणा कर रहे थे ।।198।।
“The celestial bards recited hymns of victory along with Lord Rishabhadeva’s heroic deeds, while the gods, filled with joy, proclaimed ‘Jai Jeeva’ (Victory to the Living One) in celebration.”
श्लोक ( Shlok ) 199 – 208
प्रथमं पृथिवीमध्ये मृत्स्नारचितवेदिकं । सुरशिल्पिसमारब्धपराद्धर्यानन्दमण्डपे ॥१९९॥
रत्नचूर्णचयन्यस्त रङ्गवल्युपचित्रिते । प्रत्यग्रोद्भिन्नविक्षिप्तसुमनः प्रकराञ्जिते ॥२००॥
मणिकुट्टिमसंक्रान्तविम्बमौक्तिकलम्बने । लसद्वितानकक्षौम च्छायाचित्रितरङ्गके ॥२०१॥
घृतमङ्गलमा कस्त्री रुद्धसंचारवर्तिनि [वर्त्मनि]। पर्यन्तनिहितानल्पभङ्गलद्रव्यसंपदि ॥ २०२॥
मुरवारवधूहस्तविधूतचलचामरे । अन्योन्यहस्तसंक्रान्तनानास्नानपरिच्छदे ॥२०३॥
सलीलपदविन्याससंचरन्नाककामिनी । रणन्नूपुरझंकार मुखरीकृतदिङ्मुखे ॥२०४॥
नृपाङ्गणमहीरङ्गे वृतमङ्गलसंग्रहे । निवेश्य प्राङ्मुखं देवमुचिते हरिविष्टरे ॥२०५॥
गन्धर्वारब्धसंगीत मृदंगामन्द्रनिःस्वने । त्रिविष्टपकुटीकोडमाक्रामति सदिक्तटम् ॥२०६
नृत्यन्नाकाङ्गनापाट्य निस्स्वनानुगतस्वरम् । गायन्तीपु यशो जिष्णोः किन्नरीयु श्रवस्सुखम् ॥२०७॥
ततोऽभिषेचनं भर्तुः कर्तु मारेभिरे ऽमराः । शातकुम्भविनिर्माणैः कुम्भस्तीर्था म्बुसंभृतैः ॥२०८॥
राज्याभिषेक के प्रथम ही पृथिवी के मध्यभाग में जहाँ मिट्टी की वेदी बनायी गयी थी और उस वेदी पर जहाँ देव-कारीगरों ने बहुमूल्य―श्रेष्ठ आनंदमंडप बनाया था, जो रत्नों के चूर्णसमूह से बनी हुई रंगावली से चित्रित हो रहा था, जो नवीन खिले हुए बिखेरे गये पुष्पों के समूह से सुशोभित था, जहाँ मणियों से जड़ी हुई जमीन में ऊपर लटकते हुए मोतियों का प्रतिबिंब पड़ रहा था, जहाँ रेशमी वस्त्र के शोभायमान चंदोवा की छाया से रंगभूमि चित्रित हो रही थी, जहाँ मंगल द्रव्यों को धारण करने वाली देवांगनाओं से आने-जाने का मार्ग रुक गया था, जहाँ समीप में बड़े-बडे मंगलद्रव्य रखे हुए थे, जहाँ देवों की अप्सराएँ अपने हाथों से चंचल चमर ढोल रही थीं, जहाँ स्नान की सामग्री को लोग परस्पर एक दूसरे के हाथ में दे रहे थे, जहाँ लीलापूर्वक पैर रखकर इधर-उधर चलती हुई देवांगनाओं के रुनझुन शब्द करते हुए नुपूरों की झनकार से दशों दिशाएं शब्दायमान हो रही थीं, और जहाँ अनेक मंगलद्रव्यों का संग्रह हो रहा था ऐसे राजमहल के आँगनरुपी रंगभूमि में योग्य सिंहासन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके भगवान वृषभदेव को बैठाया और जब गंधर्व देवों के द्वारा प्रारंभ किए हुए संगीत के समय होने वाला मृदंग का गंभीर शब्द समस्त दिक्तटों के साथ-साथ तीन लोकरूपी कुटी के मध्य में व्याप्त हो रहा था तथा नृत्य करती हुई देवांगनाओं के पढ़ें जाने वाले संगीत के स्वर में स्वर मिलाकर किन्नर जाति की देवियाँ कानों को सुख देने वाला भगवान का यश गा रही थीं उस समय देवों ने तीर्थोदक से भरे हुए सुवर्ण के कलशों से भगवान् वृषभदेव का अभिषेक करना प्रारंभ किया ।।195-208।।
“At the very beginning of the coronation ceremony, in the central part of the earth, a sacred altar of clay was constructed. Upon this altar, the divine artisans built a magnificent royal pavilion adorned with precious gems and decorated with colorful rangoli made from crushed jewels.
The pavilion was beautifully embellished with freshly bloomed flowers, and the reflections of hanging pearl garlands shimmered on the gem-studded floor. The entire ceremonial ground was shaded by ornate silk canopies, casting a divine aura. The pathways were crowded with celestial maidens carrying auspicious offerings, while nearby, sacred objects were carefully placed for the grand ritual.
Apsaras (celestial dancers) gracefully waved chowries (ceremonial fans) with their delicate hands, while attendants passed ritual bathing ingredients to one another. The anklets of divine maidens, playfully walking across the pavilion, resounded with melodious jingles, filling the ten directions with their sweet sound. A grand collection of sacred materials was assembled for the ceremony.
In this royal courtyard, serving as the grand coronation hall, Lord Rishabhadeva was seated on a magnificent throne, facing the eastern direction. As the Gandharva celestial musicians began their melodious tunes, the deep, resonant sound of drums echoed across the three worlds.
The Kinnaras (heavenly singers) harmonized their voices with the Apsaras who danced gracefully, singing divine hymns that glorified Lord Rishabhadeva. At that auspicious moment, the gods began the sacred anointment of Lord Rishabhadeva, using golden pitchers filled with consecrated water from holy places (Tirthodaka), marking the grand coronation ceremony.”
श्लोक 209 से 221
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192