आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 |
श्लोक 212 से 221 भरत के गुण
भरत के रूप में गुणरूपी संपदा थी। गुणों ने उसके सुंदर शरीर को स्वीकृत किया। सत्य, शौच, क्षमा आदि आत्मिक गुण और कांति, लावण्य आदि शारीरिक गुण उसके थे। वह गुणों से और सुशोभित था। वह दिव्य, तेजस्वी, और लक्ष्मी पुंज सा था। उसकी रूपसंपदा से लोग पुण्य की प्रशंसा करते थे। अभ्युदय पुण्य से प्राप्त होता है। पुण्य संचय आवश्यक है।
English translation of Ādi purāṇa parv 15 – Shlok 212 to 221
श्लोक ( Shlok ) 212
रूपानुरूपमेवास्य बभूवे गुणसंपदा । गुणैर्विमुच्यते जातु नहि तादृग्विधं वपुः ॥२१२॥
उस भरत के रूप के अनुरूप ही उसमें गुणरूपी संपदा विद्यमान थी सो ठीक ही है क्योंकि गुणों से वैसा सुंदर शरीर कभी नहीं छोड़ा जा सकता ।।212।।
It is only natural that Bharata possessed virtues corresponding to his magnificent form, for such a beautiful body can never be devoid of noble qualities. ||212||
श्लोक ( Shlok ) 213
यत्रा कृतिर्गुणास्तत्र वसन्तीति न संशयः । यतोऽस्यानीदृगाकारो गुणैरेत्य स्वयं वृतः ॥२१३॥
‘जहाँ सुंदर आकार है वहीं गुण निवास करते हैं’ इस लोकोक्ति में कुछ भी संशय नहीं है क्योंकि गुणों ने भरत के उपमारहित―सुंदर शरीर को स्वयं आकर स्वीकृत किया था ।।213।।
There is no doubt in the saying, “Where there is a beautiful form, virtues also reside,” because virtues themselves had come and accepted Bharata’s unparalleled and magnificent body. ||213||
श्लोक ( Shlok ) 214
सत्यं शौचं क्षमा त्यागः प्रज्ञोत्साहो दया दमः। प्रशमो विनयश्चेति गुणाः सत्त्वानुषङ्गिणः ॥२१४॥
सत्य, शौच, क्षमा, त्याग, प्रज्ञा, उत्साह, दया, दम, प्रशम और विनय―ये गुण सदा उसकी आत्मा के साथ-साथ रहते थे ।।214।।
Truth, purity, forgiveness, renunciation, wisdom, enthusiasm, compassion, self-control, tranquility, and humility—these virtues always resided with his soul. ||214||
श्लोक ( Shlok ) 215
वपुः कान्तिश्च दीप्तिश्च लावण्यं प्रियवाक्यता । कलाकुशलता चेति शरीरान्वयिनो गुणाः ॥२१५॥
शरीर की कांति, दीप्ति, लावण्य, प्रिय वचन बोलना और कलाओं में कुशलता ये उसके शरीर से संबंध रखने वाले गुण थे ।।215।।
Radiance, brilliance, grace, sweet speech, and proficiency in various arts—these were the qualities associated with his body. ||215||
श्लोक ( Shlok ) 216
निसर्गरुचिराकारो गुणैरेभिर्विभूषितः । स रेजे नितरां यद्वन्मणिः संस्कारयोगतः ॥२१६॥
जिस प्रकार स्वभाव से ही सुंदर मणि संस्कार के योग से अत्यंत सुशोभित हो जाता है उसी प्रकार स्वभाव से ही सुंदर आकार वाला भरत ऊपर लिखे हुए गुणों से और भी अधिक सुशोभित हो गया था ।।216।।
Just as a naturally beautiful gem becomes even more splendid with refinement, similarly, Bharata, who possessed an inherently magnificent form, became even more radiant with the above-mentioned virtues. ||216||
श्लोक ( Shlok ) 217
अप्राकृताकृतिर्दिव्यमनुष्यो महसां निधिः । लक्ष्म्याः पुञ्जोऽयमित्युच्चैर्वभूवाद्भुत चेष्टितः ॥२१७॥
वह भरत एक दिव्य मनुष्य था, उसकी आकृति भी असाधारण थी, वह तेज का खजाना था और उसकी सब चेष्टाएँ आश्चर्य करने वाली थीं इसलिए वह लक्ष्मी के अतिशय ऊँचे पुंज के समान शोभायमान होता था ।।217।।
That Bharata was a divine being with an extraordinary form, a treasure of brilliance, and his every action was astonishing. Therefore, he shone like an exceedingly radiant mass of prosperity and splendor. ||217||
श्लोक ( Shlok ) 218
रूपसंपदमित्युच्चैर्दृष्ट्वा नान्यत्रभाविनीम्। जनाः पुरातनीमस्य शशंसुः पुण्यसंपदम् ॥२१८॥
दूसरी जगह नहीं पायी जाने वाली उसकी उत्कृष्ट रूपसंपदा देखकर लोग उसके पूर्वभव-संबंधी पुण्य संपदा की प्रशंसा करते थे ।।218।।
Seeing his unparalleled beauty, which was not found anywhere else, people praised the immense merits accumulated from his past lives. ||218||
श्लोक ( Shlok ) 219 – 220
वपुरारोग्यमैश्वर्यं धनर्द्धिंः कामनीयकम्। बलमायुर्यशो मेधा वाक्सौभाग्यं विदग्धता ॥२१९॥
इति यावान् जगत्यस्मिन् पुरुषार्थः सुखोचितः । स सर्वोभ्युदयः पुण्यपरिपाकादिहाङ्गिनाम् ॥२२०॥
सुंदर शरीर, नीरोगता, ऐश्वर्य, धन-संपत्ति,सुंदरता, बल, आयु, यश, बुद्धि, सर्वप्रिय वचन और चतुरता आदि इस संसार में जितना कुछ सुख का कारण पुरुषार्थ है वह सब अभ्युदय कहलाता है और वह सब संसारी जीवों को पुण्य के उदय से प्राप्त होता है ।।219-220।।
A beautiful body, good health, prosperity, wealth, charm, strength, longevity, fame, intelligence, sweet speech, and cleverness—everything in this world that serves as a cause of happiness and success is called Abhyudaya (worldly prosperity). All these are attained by worldly beings as a result of the rise of their past merits (punya). ||219-220||
श्लोक ( Shlok ) 221
न विनाभ्युदयः पुण्यादस्ति कश्चन पुष्कलः । तस्मादभ्युदयं प्रेप्सुः पुण्यं संचिनुयाद् बुधः ॥२२१॥
पुण्य के बिना किसी भी बड़े अभ्युदय की प्राप्ति नहीं होती, इसलिए जो विद्वान् पुरुष अभ्युदय प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें पहले पुण्य का संचय करना चाहिए ।।221।।
Without merit (punya), no great prosperity (Abhyudaya) can be attained. Therefore, wise individuals who seek success and well-being should first accumulate merit. ||221||
श्लोक 222 से 224
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 |