आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
English translation of Ādi purāṇa parv 15 – Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
अब्जिनीयमितो धत्ते विकसत्पङ्कज्ञाननम् । इतञ्ज ग्लानिमासाद्य नम्रास्येयं कुसुइती ॥११२॥
हे देवि, इधर यह कमलिनी अपने विकसित कमलरूपी मुख को धारण कर रही है और इधर यह कुमुदिनी मुरझाकर नम्रमुख हो रही है अर्थात् मुरझाये हुए कुमुद को नीचा कर रही हैं ।।112।।
“O Goddess, here this lotus (Kamalini) is bearing its fully bloomed lotus-like face, while there this water lily (Kumudini) is withering and lowering its face in humility, that is, it is drooping with its wilted bloom.”
श्लोक ( Shlok ) 113
सरसां पुलिनेप्वेताः कुरर्यः कुर्वते रुतम्। युष्मन्नूपुरसंवादि तारं मधुरमेव च ॥११३॥
इधर तालाब के किनारों पर ये कुरर पक्षियों की स्त्रियाँ तुम्हारे नूपुर के समान उच्च और मधुर शब्द कर रही हैं ।।113।।
“Here, on the banks of the pond, the female Kurara birds are making high and melodious sounds, similar to the tinkling of your anklets.”
श्लोक ( Shlok ) 114
स्वनीडादुत्पतन्यश्च कृतकोलाहलस्वनाः । प्रभातमङ्गलानीव पठन्तोऽमी शकुन्तयः ॥११४॥
इस समय ये पक्षी कोलाहल करते हुए अपने-अपने घोंसलों से उड़ रहे हैं और ऐसे जान पड़ते हैं मानो प्रात:काल का मंगल-पाठ ही पढ़ रहे हों ।।114।।
“At this moment, these birds are flying out of their nests, chirping noisily, and it seems as if they are reciting the auspicious hymns of the morning.”
श्लोक ( Shlok ) 115
अप्राप्तस्त्रेणसंस्कारा “परिक्षीणदका इमे। काञ्चुकीयः समं दीपा यान्ति कालेन भन्दताम् ॥११५॥
इधर प्रातःकाल का समय पाकर ये दीपक कंचुकियों (राजाओं के अंतःपुर में रहने वाले वृद्ध या नपुंसक पहरेदारों) के साथ-साथ ही मंदता को प्राप्त हो रहे हैं क्योंकि जिस प्रकार कंचुकी स्त्रियों के संस्कार से रहित होते हैं उसी प्रकार दीपक भी प्रातःकाल होने पर स्त्रियों के द्वारा की हुई सजावट से रहित हो रहे हैं और कंचुकी जिस प्रकार परिक्षीण दशा अर्थात् वृद्ध अवस्था को प्राप्त होते हैं उसी प्रकार दीपक भी परिक्षीण दशा अर्थात् क्षीण बत्ती वाले हो रहे हैं ।।115।।
“Here, as the morning approaches, these lamps are fading along with the kanchukis (the aged or eunuch guards of the royal inner chambers). Just as the kanchukis lack the refinement of women, the lamps too, at dawn, are losing the adornment given to them by women. And just as the kanchukis grow weak and aged over time, the lamps too are becoming feeble, with their wicks burning low.”
श्लोक ( Shlok ) 116
इतो निजगृहे देवि स्वन्मङ्गलविधित्सया । कुन्जवामनिकाप्रायः परिवारः प्रतीच्छति ॥११६॥
हे देवि, इधर तुम्हारे घर में तुम्हारा मंगल करने की इच्छा से यह कुब्जक तथा वामन आदि का परिवार तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है ।।116।।
“O Goddess, here in your home, the family of Kubjaka and Vamana, desiring to perform your auspicious rituals, is waiting for you.”
श्लोक ( Shlok ) 117
विमुञ्च शयनं तस्मात् नदीपुलिनसंनिभम् । इंसीव राजहंसस्य वक्ष्तभा मानसाध्या ॥११७॥
इसलिए जिस प्रकार मानसरोवर पर रहने वाली, राजहंस पक्षी की प्रिय वल्लभा―हंसी नदी का किनारा छोड़ देती है उसी प्रकार भगवान् वृषभदेव के मन में रहने वाली और उनकी प्रिय वल्लभा तू भी शय्या छोड़ ।।117।।
“Therefore, just as the beloved mate of the royal swan, dwelling in Manasarovar, leaves the riverbank, in the same way, O beloved of Lord Vrishabhadeva, who resides in His heart, you too should rise from your bed.”
श्लोक ( Shlok ) 118
इत्युच्चैर्वन्दिदृन्देषु पठत्सु समयोचितम् । प्राबोधिकान कध्वानैः सा विनिद्रामवच्छनैः ॥११८॥
इस प्रकार जब बंदीजनों के समूह जोर-जोर मंगल-पाठ पढ़ रहे थे तब वह यशस्वती महादेवी जगाने वाले दुंदुभियों के शब्दों से धीरे-धीरे निद्रारहित हुई―जाग उठी ।।118।।
“In this way, as the group of court bards recited auspicious hymns loudly, the glorious Mahadevi gradually awoke from her slumber to the sound of awakening drums.”
श्लोक ( Shlok ) 119 – 120
विमुक्तशयना वैषा कृतमङ्गलमज्जना । प्रध्युकामा स्वद्दष्टानां स्वप्नानां तत्वतः फलम् ॥११९॥
प्रीतिकण्टकिता भेजे पश्द्मिनीत्रार्कसुदुचम् । प्राणनाथं जगत्प्राणिस्वान्तध्वान्तमुदं विभुम् ॥१२०॥
और शय्या छोड़कर प्रातःकाल का मंगलस्नान कर प्रीति से रोमांचित शरीर हो अपने देखे हुए स्वप्नों का यथार्थ फल पूछने के लिए संसार के प्राणियों के हृदयवर्ती अंधकार को दूर करने वाले अतिशय प्रकाशमान और सबके स्वामी भगवान् वृषभदेव के समीप उस प्रकार पहुंची जिस प्रकार कमलिनी संसार के मध्यवर्ती अंधकार को नष्ट करने वाले और अतिशय प्रकाशमान सूर्य के सम्मुख पहुंचती है ।।119-120।।
“And, leaving her bed, she bathed in the auspicious waters of the morning, her body thrilled with joy. Then, desiring to inquire about the true meaning of her dreams, she approached the greatly radiant and supreme Lord Vrishabhadeva, who dispels the inner darkness of all beings—just as the lotus flower turns toward the brilliant sun, which destroys the surrounding darkness of the world.”
श्लोक ( Shlok ) 121
तमुपेत्य सुखासीना स्वोचिते मद्रविष्टरे। लक्ष्मीरिव रुचि मेजे मर्तुरभ्यर्णवचिनी ॥१२१॥
भगवान् के समीप जाकर वह महादेवी अपने योग्य सिंहासन पर सुखपूर्वक बैठ गयी । उस समय महादेवी साक्षात् लक्ष्मी के समान सुशोभित हो रही थी ।।121।।
“Approaching the Lord, Mahadevi gracefully seated herself on her rightful throne. At that moment, she shone radiantly, resembling Goddess Lakshmi herself.”
श्लोक 122 से 131
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111