भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133
श्लोक 134 से 141 निर्नामा का पूर्व कर्म
मुनि ने बताया कि निर्नामा पूर्व में पलालपर्वत ग्राम में पटेल देविलमाम और सुमति की पुत्री धनश्री थी। उसने समाधिगुप्त मुनि के पास मृत कुत्ते का शव डालकर अपमान किया। मुनि के उपदेश पर क्षमा माँगी, जिससे थोड़ा पुण्य मिला और वह मनुष्य योनि में दरिद्र कुल में जन्मी। मुनि ने जिनेंद्रगुणसंपत्ति और श्रुतज्ञान व्रत लेने को कहा।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 134 to 141
श्लोक ( Shlok ) 134 – 135
इति पृष्टो मुनीन्द्रोऽसौ जगौ मधुरया गिरा । इहैव विषयेऽमुत्र पुत्रि जातासि कर्मणा ॥१३४।।
पलालपर्वतग्रामे देविलग्रामकूटकात् । सुमतेरुदरे पुत्री धनश्रीरिति विश्रुता ॥१३५॥
इस प्रकार पूछे जाने पर वे मुनिराज मधुर वाणी से कहने लगे कि हे पुत्रि, पूर्वभव में तू अपने कर्मोदय से इसी देश के पलालपर्वत नामक ग्राम में देविलमाम नामक पटेल की सुमति स्त्री के उदर से धनश्री नाम से अप्रसिद्ध पुत्री हुई थी ।।134-135।।
“Upon being asked this, the sage began to speak in a sweet voice: ‘O daughter, in your previous life, due to the rise of your karma, you were born in this same land, in a village called Palālaparvat. You were the obscure daughter of a village headman named Devīlamāma and his wife Sumati, and your name was Dhanaśrī.'”134-135
श्लोक ( Shlok ) 136 – 138
अन्येयुश्च ध्वमज्ञानात् शुनः पूतिकलेवरम् । मुनेः समाधिगुप्तस्य पठतोऽन्ते न्यधामुदा ॥१३६॥
मुनिस्तदवलोक्यासौ त्वामित्यन्वशिषत्तदा । त्वयेदं बालिके कर्म विरूपकमनुष्ठितम् ॥ १३७॥
फलिष्यति विपाके ते दुरन्तं कटुकं फलम् । दहत्यधिकमन्यस्मिन् माननीय विमानता ।।१३८॥
किसी दिन तूने पाठ करते हुए समाधिगुप्त मुनिराज के समीप मरे हुए कुत्ते का दुर्गंधित कलेवर डाला था और अपने इस अज्ञानपूर्ण कार्य से खुश भी हुई थी । यह देखकर मुनिराज ने उस समय तुझे उपदेश दिया था कि बालिके, तूने यह बहुत ही विरुद्ध कार्य किया है, भविष्य में उदय के समय यह तुझे दुःखदायी और कटुक फल देगा क्योंकि पूज्य पुरुषों का किया हुआ अपमान अन्य पर्याय में अधिक संताप देता है ।।136-138।।
“One day, while reciting your lessons, you placed the foul-smelling carcass of a dead dog near a sage named Samādhigupta. You were even pleased with this ignorant act of yours. Seeing this, the sage admonished you, saying, ‘O girl, you have committed a very wrongful act. In the future, when the consequences of this karma arise, it will bring you painful and bitter results, as the insult of revered individuals causes greater suffering in future lives.'”136-138
श्लोक ( Shlok ) 139
इति ब्रुवन्तमभ्येत्य क्षमामग्राहयस्तदा । भगवनिदमज्ञानात् क्षमस्व कृतमित्यरम् ॥१३९॥
मुनिराज के ऐसा कहने पर धनश्री ने उसी समय उनके सामने जाकर अपना अपराध क्षमा कराया और कहा कि हे भगवन् मैंने यह कार्य अज्ञानवश ही किया है इसलिए क्षमा कर दीजिए ।।139।।
“Upon hearing this from the sage, Dhanaśrī immediately approached him and sought forgiveness for her offense. She said, ‘O Lord, I committed this act out of ignorance, so please forgive me.'”139
श्लोक ( Shlok ) 140
तेनोपशमभावेन जाताल्पं पुण्यमाश्रिता । मनुष्यजन्मनीहाद्य कुले ‘परमदुर्गते ॥ १४०॥
उस उपशम भाव से क्षमा माँग लेने से तुझे कुछ थोड़ा-सा पुण्य प्राप्त हुआ था उसी से तू इस समय मनुष्ययोनि में इस अतिशय दरिद्र कुल में उत्पन्न हुई है ।।140।।
“Due to the calming disposition with which you sought forgiveness, you earned a small amount of merit. As a result of that merit, you were born in the human realm, though in this extremely impoverished family.”140
श्लोक ( Shlok ) 141
ततः कल्याणि ‘कल्याणं गृहाणो पोषितं ब्रतम् । ” जिनेन्द्रगुणसंपत्ति श्रुतज्ञानमपि क्रमात् ॥१४१॥
इसलिए हे कल्याणि, कल्याण करने वाले जिनेंद्रगुणसंपत्ति और श्रुतज्ञान इन दो उपवास व्रतों को क्रम से ग्रहण करो ।।141।।
“Therefore, O blessed one, embrace the two vows of fasting—dedicated to the virtuous qualities of the Jinas and the knowledge of the scriptures—in due order, as they lead to your welfare.”141
श्लोक 142 से 151
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133
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