आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141
श्लोक 142 से 151 नृत्य की सूक्ष्मता
देवियाँ अंगुलियों पर सूचीनाट्य, नाभि संग फिरकी। कटाक्ष फैलातीं। नाट्यरस शरीर में स्फुरित—कपोल, पाँव, हाथ, मुख, नेत्र, अंगराग, नाभि, कटि, मेखला। इंद्र की चेष्टाएँ पात्रों में बँटीं, आत्मा प्रविष्ट सा। भुजाओं पर यंत्र पुतली सा, इंद्रजाल-बाजीगर सा।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
कराङ्गुलीषु शक्रस्य न्यस्यन्त्यः क्रमपल्लवान् । सलीलमनटन् काश्चित् सूचीनाट्य मिवास्थिताः ॥१४२॥
कितनी ही देवियाँ इंद्र के हाथों की अँगुलियों पर अपने चरण-पल्लव रखती हुई लीलापूर्वक नृत्य कर रही थी और ऐसी मालूम होती थीं मानो सूचीनाट᳭य (सूई की नोक पर किया जाने वाला नृत्य) ही कर रही हों ।।142।।
Many celestial maidens were playfully dancing while placing their delicate feet on Indra’s fingertips, appearing as if they were performing Sūchīnāṭya (a dance performed on the tip of a needle). ||142||
श्लोक ( Shlok ) 143
भ्रेमुः कराङ्गुलीरन्य ‘सुपर्वास्त्रिदिवेशिनः । वंशयष्टीरिवारुह्य तद्ग्रार्पितनाभयः ॥१४३॥
कितनी ही देवियाँ सुंदर पर्वोंसहित इंद्र की अंगुलियों के अग्रभाग पर अपनी नाभि रखकर इस प्रकार फिरकी लगा रही थीं मानो किसी बाँस की लकड़ी पर चढ़कर उसके अग्रभाग पर नाभि रखकर मनोहर फिरकी लगा रही हों ।।143।।
Many celestial maidens, placing their navels on the tips of Indra’s fingers along with their beautiful curves, were spinning so gracefully that they appeared as if they were balancing on the tip of a bamboo stick and twirling enchantingly. ||143||
श्लोक ( Shlok ) 144
प्रतिबाह्वमरेन्द्रस्य सन्नटन्त्योऽमराङ्गनाः । सयत्नं संचरन्ति स्म पञ्चयन्त्योऽक्षिसंकुलम् ॥ १४४॥
देवियाँ इंद्र की प्रत्येक भुजा पर नृत्य करती हुई और अपने नेत्रों के कटाक्षों को फैलाती हुई बड़े यत्न से संचार कर रही थीं ।।144।।
The celestial maidens were gracefully dancing on each of Indra’s arms, moving with great effort while casting enchanting glances from their eyes. ||144||
श्लोक ( Shlok ) 145 – 147
स्फुटन्निव कटाक्षेषु कपोलेषु स्फुरन्निव । प्रसरन्निव पादेषु करेषु विलसन्निव ॥१४५॥
विहसन्निव वक्त्रेषु नेत्रेषु विकसन्निव । रज्यन्निवाङ्गरागेषु निमज्जन्निव नाभिषु ॥१४६॥
चलन्निव कटीष्वासां मेखलासु स्खलन्निव । तदा नाट्यरसोऽङ्गेषु ववृधे वर्द्धितोत्सवः ॥१४७॥
उस समय उत्सव को बढ़ाता हुआ वह नाट्यरस उन देवियों के शरीर में खूब ही बढ़ रहा था और ऐसा मालूम होता था मानो उनके कटाक्षों में प्रकट हो रहा हो, कपोलों में स्फुरायमान हो रहा हो, पाँवों में फैल रहा हो, हाथों में विलसित हो रहा हो, मुखों पर हँस रहा हो, नेत्रों में विकसित हो रहा हों, अंगराग में लाल वर्ण हो रहा हो, नाभि में निमग्न हो रहा हो, कटिप्रदेशों पर चल रहा हो और मेखलाओं पर स्खलित हो रहा हो ।।145-147।।
At that moment, the essence of dance, which enhanced the festivity, was intensifying within the celestial maidens’ bodies. It seemed as if it was manifesting in their glances, trembling on their cheeks, spreading through their feet, shining in their hands, laughing on their faces, blooming in their eyes, turning crimson in their body adornments, sinking into their navels, flowing over their waists, and slipping across their girdles. ||145-147||
श्लोक ( Shlok ) 148
प्रत्यङ्गममरेन्द्रस्य याश्चेष्टा नृस्यतोऽभवन् । ता एव तेषु पात्रेषु संविभक्ता इवारुचन् ॥१४८॥
नृत्य करते हुए इंद्र के प्रत्येक अंग में जो चेष्टाएँ होती थीं वही चेष्टाएँ अन्य सभी पात्रों में हो रही थीं जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो इंद्र ने अपनी चेष्टाएँ उन सब के लिए बाँट ही दी हों ।।148।।
As Indra danced, every movement of his limbs was mirrored by all the other performers. It seemed as if Indra had distributed his own gestures among them all. ||148||
श्लोक ( Shlok ) 149
‘रसास्त एव ते भावास्तेऽनुभावास्तदिङ्गितम् । अनुप्रवेशितो नूनमात्मा तेप्वमरेशिना ॥१४९॥
उस समय इंद्र के नृत्य में जो रस, भाव, अनुभाव और चेष्टाएँ थीं वे ही रस, भाव, अनुभाव और चेष्टाएँ अन्य सभी पात्रों में थीं जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो इंद्र ने अपनी आत्मा को ही उनमें प्रविष्ट करा दिया हो ।।149।।
At that moment, the essence, emotions, expressions, and gestures present in Indra’s dance were also reflected in all the other performers. It seemed as if Indra had infused his very soul into them. ||149||
श्लोक ( Shlok ) 150
सोऽमात्त्वभुजदण्डेषु नर्त्तयन् सुरनर्तकीः । तारवीः पुत्रिका मन्त्रफळकेप्वि व यान्त्रिकः ॥ १५०॥
अपने भुजदंडों पर देवनर्तकियों को नृत्य कराता हुआ वह इंद्र ऐसा शोभायमान हो रहा था मानो किसी यंत्र की पटियों पर लकड़ी की पुतलियों को नचाता हुआ कोई यांत्रिक अर्थात् यंत्र चलाने वाला ही हो ।।150।।
Indra, making the celestial dancers perform on his mighty arms, appeared as splendid as a puppeteer skillfully making wooden dolls dance upon the panels of a mechanical device. ||150||
श्लोक ( Shlok ) 151
ऊर्ध्वमुच्चलयन् व्योम्नि नटन्तीर्दंर्शंयन् पुनः । क्षणात्कुर्वन्न दृश्यास्ताः सोऽभून्मा हेन्द्रजालकः ॥ १५१ ॥
वह इंद्र नृत्य करती हुई उन देवियों को कभी ऊपर आकाश में चलाता था, कभी सामने नृत्य करती हुई दिखला देता था और कभी क्षण-भर में उन्हें अदृश्य कर देता था, इन सब बातों से वह किसी इंद्रजाल का खेल करने वाले के समान जान पड़ता था ।।151।।
Indra made the dancing celestial maidens soar into the sky at times, appear before him performing their dance, and then vanish in an instant. Through these marvelous acts, he seemed like a master illusionist performing a grand magical spectacle. ||151||
श्लोक 152 से 161
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 |