आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 61 अयोध्या प्रस्थान
इंद्र ने अयोध्या चलने का विचार किया। मार्ग में उत्सव, दुंदुभि, जय-शब्द, ऐरावत पर भगवान। आकाश उल्लंघन कर अयोध्या पहुँचे। गोपुर-पताकाओं से स्वर्ग सा। मणिमयी भूमि कुमुद सरसी सा। पताकाएँ स्वर्ग बुलातीं। महल विमानों सा, चंद्रकांत मणि से मेघ सा।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
भवन्तमित्यभिष्टुत्य नान्यदाशास्महे वयम् ।भक्तिस्त्वय्येव नौ’ भूयादलमन्यैर्मितैः फलैः ॥५२॥
हे देव, इस प्रकार आपकी स्तुति कर हम लोग इसी फल की आशा करते हैं कि हम लोगों की भक्ति आप में ही रहे । हमें अन्य परिमित फलों से कुछ भी प्रयोजन नहीं है ।।52।।
O Lord, by praising You in this manner, we seek only one reward—that our devotion remains solely in You. We have no desire for any other limited or temporary fruits. ॥52॥
श्लोक ( Shlok ) 53
इति स्तुत्वा सुरेन्द्रास्तं परमानन्दनिर्भराः । अयोध्यागमने भूयो मतिं चक्रः कृतोत्सवाः ॥५३॥
इस प्रकार परम आनंद से भरे हुए इंद्रों ने भगवान् ऋषभदेव की स्तुति कर उत्सव के साथ अयोध्या चलने का फिर विचार किया ।।53।।
Filled with supreme bliss, the Indras praised Bhagavān Ṛṣabhadeva and then, with great festivity, contemplated returning to Ayodhyā. ॥53॥
श्लोक ( Shlok ) 54
तथैव प्रहता भेर्यस्तथैवाघोषितो जयः । तथैवैरावतेभेन्द्र स्कन्धारूढं व्यधुर्जिनम् ॥५४॥
अयोध्या से मेरु पर्वत तक जाते समय मार्ग में जैसा उत्सव हुआ था उसी प्रकार फिर होने लगा । उसी प्रकार दुंदुभि बजने लगे, उसी प्रकार जय-जय शब्द का उच्चारण होने लगा और उसी प्रकार इंद्र ने जिनेंद्र भगवान् को ऐरावत हाथी के कंधे पर विराजमान किया ।।54।।
As they traveled back from Mount Meru to Ayodhyā, the same grand celebration took place as before. The celestial drums resounded once again, the chants of victory filled the air, and Indra once again seated Bhagavān Jinedra upon the shoulders of the divine elephant Airāvata. ॥54॥
श्लोक ( Shlok ) 55
महाकलकलैर्गीतैर्नृत्तेः सजयघोषणैः । गगनाङ्गणमुत्पत्य द्रागाजग्मुरमूं पुरीम् ॥५५॥
वे देव बड़ा भारी कोलाहल, गीत, नृत्य और जय-जय शब्द की घोषणा करते हुए आकाशरूपी आंगन को उलंघ कर शीघ्र ही अयोध्यापुरी आ पहुँचे ।।55।।
Amidst great rejoicing, with loud cheers, songs, dances, and proclamations of victory, the celestial beings swiftly crossed the vast expanse of the sky and soon arrived in the glorious city of Ayodhyā. ॥55॥
श्लोक ( Shlok ) 56
याचकाद् गगनोल्लङ्घिशिखरैः पृथुगोपुरैः । स्वर्गमाह्वयमानेव पवनोच्छितकेतनैः ॥५६॥
जिनके शिखर आकाश को उल्लंघन करने वाले हैं और जिन पर लगी हुई पताकाएँ वायु के वेग से फहरा रही हैं ऐसे गोपुर-दरवाजों से वह अयोध्या नगरी ऐसी शोभायमान होती थी मानो स्वर्गपुरी को ही बुला रही हो ।।56।।
“Ayodhya city appeared so magnificent with its towering gatehouses (Gopur-dwaras) that seemed to pierce the sky, adorned with fluttering banners swaying in the wind, as if it were inviting the very heavens themselves.”
श्लोक ( Shlok ) 57
यस्यां मणिमयी भूमिस्तारका प्रतिबिम्बितैः । । दधे कुमुद्वतीलक्ष्मीमक्षूणां क्षणदामुखे ॥५७॥
उस अयोध्यापुरी की मणिमयी भूमि रात्रि के प्रारंभ समय में ताराओं का प्रतिबिंब पड़ने से ऐसी जान पड़ती थी मानो कुमुदों से सहित सरसी की अखंड शोभा ही धारण कर रही हो ।।57।।
“The jewel-studded ground of Ayodhya, reflecting the stars at the onset of night, appeared as if it had assumed the uninterrupted beauty of a lake adorned with blooming lotuses.”
श्लोक ( Shlok ) 58
या पताकाकरैर्दूद्ररमुत्क्षिप्तै पवनाहतैः । आजुहूषुरिव स्वर्गवासिनोऽभूत् कुतूहलात् ॥५८॥
दूर तक आकाश में वायु के द्वारा हिलती हुई पताकाओं से वह अयोध्या ऐसी मालूम होती थी मानो कौतूहलवश ऊँचे उठाये हुए हाथों से स्वर्गवासी देवों को बुलाना चाहती हो ।।58।।
“Ayodhya, with its flags fluttering far and wide in the sky by the force of the wind, appeared as if it were eagerly raising its hands to beckon the celestial gods out of curiosity.”
श्लोक ( Shlok ) 59
यस्यां मणिमयैर्हर्म्यैः कृतदम्पतिसंश्रयैः । आक्षिप्तेव सुराधीशविमानश्रीरसंभ्रमम् ॥५९॥
जिनमें अनेक सुंदर स्त्री-पुरुष निवास करते थे ऐसे वहाँ के मणिमय महलों को देखकर निःसंदेह कहना पड़ता था कि मानो उन महलों ने इंद्र के विमानों की शोभा छीन ली थी अथवा तिरस्कृत कर दी थी ।।59।।
“The jewel-studded palaces of Ayodhya, inhabited by numerous beautiful men and women, undoubtedly seemed as if they had either stolen or surpassed the splendor of Indra’s celestial chariots.”
श्लोक ( Shlok ) 60
यत्र सौधाग्रसंलग्नैरिन्दुकान्तशिलातलैः । चन्द्रपादाभिसंस्पर्शात् क्षरद्भिर्जलदायितम् ॥६०॥
वहां पर चूना गची के बने हुए बडे-बड़े महलों के अग्रभाग पर सैकड़ों चंद्रकांतमणि लगे हुए थे, रात में चंद्रमा की किरणों का स्पर्श पाकर उनसे पानी झर रहा था जिससे वे मणि मेघ के समान मालूम होते थे ।।60।।
“The grand mansions of Ayodhya, built with lime and plaster, had hundreds of moonstone gems embedded on their front facades. When touched by the moon’s rays at night, these gems released droplets of water, making them appear like celestial clouds.”
श्लोक ( Shlok ) 61
या धत्ते स्म महासौधशिखरैर्मणिभासुरैः । सुरचा पश्रियं दिश्नु विततां रत्नभामयीम् ॥६१॥
उस नगरी के बड़े-बड़े राजमहलों के शिखर अनेक मणियों से दैदीप्यमान रहते थे, उनसे सब दिशाओं में रत्नों का प्रकाश फैलता रहता था जिससे ऐसा मालूम होता था मानो वह नगरी इंद्रधनुष ही धारण कर रही हो ।।61।।
“The towering peaks of the grand royal palaces in that city shone brilliantly with countless gems, radiating their luminous glow in all directions. This made the city appear as if it were adorned with a celestial rainbow.”
श्लोक 62 से 71
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51