आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71
श्लोक 72 से 81 मेरु का वर्णन (भाग 2)
चार जिनमंदिर विमानों सा। सुवर्णमय, जंबूद्वीप मुकुट सा। अभिषेक से पवित्र, चारण मुनि सेवा करते। भोगभूमियाँ रक्षित। गुफाओं में देव-धरणेंद्र। पांडुक शिलाएँ स्फटिक सा। सौधर्मेंद्र सा तुंग, विबुध सेवित। प्रदक्षिणा देकर ऋषभदेव शिखर पर विराजित।
English translation of Ādi purāṇa parv 13 – Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
यस्मिन् प्रतिवने दिक्षु चैत्यवेश्मानि भान्त्यलम् । हसन्तीव द्युसद्मानि प्रोन्मिषन्मणिदीप्तिभिः ॥७२
इस प्रकार जिसके चारों वनों की प्रत्येक दिशा में एक-एक जिनमंदिर चमकते हुए मणियों की कांति से ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो स्वर्ग के विमानों की हँसी ही कर रहे हों ।।72।।
Thus, in each direction of Mount Sumeru, the four sacred Jin temples, adorned with the radiant glow of shimmering gems, appear so magnificent as if they are mocking the splendor of the celestial chariots of heaven. ||72||
श्लोक ( Shlok ) 73
हिरण्मयः समुत्तुङ्गो धत्ते यो मौलिविभ्रमम् । जम्बूद्वीपमहीभर्तुर्लंवणाम्भोधिवाससः ॥७३॥
जो पर्वत सुवर्णमय है और बहुत ही ऊँचा है इसलिए जो लवणसमुद्ररूपी वस्त्र पहने हुए जंबूद्वीपरूपी महाराज के सुवर्णमय मुकुट का संदेह पैदा करता रहता है ।।73।
That golden mountain, being exceedingly tall, creates the illusion of being the radiant crown of Jambūdvīpa, the great king, who is draped in the robe of the Lavaṇa Samudra (the Salt Ocean). ||73||
श्लोक ( Shlok ) 74
ज्योतिर्गंणश्च सातत्यात् यं पर्येति महोदयम् । पुण्याभिषेकसंभारैः पवित्रीकृतमर्हंताम् ॥७४॥
जो तीर्थंकर भगवान के पवित्र अभिषेक की सामग्री धारण करने से सदा पवित्र रहता है और अतिशय ऊँचा अथवा समृद्धिशाली है इसीलिए मानो ज्योतिषी देवों का समूह सदा जिसकी प्रदक्षिणा दिया करता है ।।74।।
Mount Sumeru remains eternally pure as it holds the sacred materials for the holy abhisheka (anointment) of the Tīrthaṅkara Bhagavān. Being immensely tall and majestic, it seems as if the celestial luminaries (Jyotiṣī Devas) perpetually circumambulate it in reverence. ||74||
श्लोक ( Shlok ) 75
आराधयन्ति यं नित्यं चारणाः पुण्यवाञ्छया । विद्याधराश्च मुदिता जिनेन्द्रमिव सून्नतम् ॥ ७५॥
जो पर्वत जिनेंद्रदेव के समान अत्यंत उन्नत (श्रेष्ठ और ऊँचा) है इसीलिए अनेक चारण मुनि हर्षित होकर पुण्य प्राप्त करने की इच्छा से सदा जिसकी सेवा किया करते हैं ।।75।।
That mountain, as exalted and lofty as Jinendra Bhagavān, is constantly served by numerous Chāraṇa Munis, who, filled with joy, seek to attain merit through their devoted worship. ||75||
श्लोक ( Shlok ) 76
देवोत्तरकुरून् यश्च स्वपादगिरिभिः सदा । आवृत्य पाति निर्बाधं तद्धि माहात्म्यमुन्नतेः ॥७६॥
जो देवकुरु उत्तरकुरु भोगभूमियों को अपने समीपवर्ती पर्वतों से घेरकर सदा निर्बाधरूप से उनकी रक्षा किया करता है सो ठीक ही है क्योंकि उत्कृष्टता का यही माहात्म्य है ।।76।।
Mount Sumeru, encircled by its neighboring peaks, constantly safeguards the Devakuru and Uttarakuru pleasure-lands without any obstruction. This is only natural, for such is the glory of true excellence. ||76||
श्लोक ( Shlok ) 77
यस्य कन्दरभागेषु निवसन्ति सुरासुराः । साङ्गनाः स्वर्गमुत्सृज्य नाकशोभापहासिपु ॥७७॥
स्वर्गलोक की शोभा की हंसी करने वाली जिस पर्वत की गुफाओं में देव और धरणेंद्र स्वर्ग छोड़कर अपनी स्त्रियों के साथ निवास किया करते हैं ।।77।।
The caves of that majestic mountain, which seem to mock the splendor of heaven, serve as a dwelling for Devas and Dharaṇendra, who leave their celestial abodes to reside there with their consorts. ||77||
श्लोक ( Shlok ) 78
यः पाण्डुकवनोद्देशे शुचीः स्फटिकनिर्मिताः । शिला बिभर्त्ति तीर्थे शामभिषेकक्रियोचिताः ॥७८॥
जो पांडुकवन के स्थानों में स्फटिक मणि की बनी हुई और तीर्थंकरों के अभिषेक क्रिया के योग्य निर्मल (पांडुकादि) शिलाओं को धारण कर रहा है ।।78।।
The mountain bears in Pānduka Vana the pure, crystal-like Pānduka stones, which are perfectly suited for the sacred abhisheka (anointment) rituals of the Tīrthaṅkaras. ||78||
श्लोक ( Shlok ) 79
वस्तुङ्गो विबुधाराध्यः सततर्तुसमाश्रयः । सौधर्मेन्द्र इवाभाति संसेव्योऽप्सरसां गणैः ॥७९॥
और जो मेरु पर्वत सौधर्मेंद्र के समान शोभायमान होता है क्योंकि जिस प्रकार सौधर्मेंद्र तुंग अर्थात् श्रेष्ठ अथवा उदार है उसी प्रकार वह सुमेरु पर्वत भी तुंग अर्थात् ऊँचा है, सौधर्मेंद्र की जिस प्रकार अनेक विबुध (देव) सेवा किया करते हैं उसी प्रकार मेरु पर्वत की भी अनेक देव अथवा विद्वान् सेवा किया करते हैं, सौधर्मेंद्र जिस प्रकार सततर्तुसमाश्रय अर्थात् ऋतुविमान का आधार अथवा छहों ऋतुओं का आश्रय है और सौधर्मेंद्र जिस प्रकार अनेक अप्सराओं के समूह से सेवनीय है उसी प्रकार सुमेरु पर्वत भी अप्सराओं अथवा जल से भरे हुए सरोवरों से शोभायमान हुए ।।79।।
Mount Sumeru shines resplendently, much like Saudharmendra, for both share similar grandeur and eminence. Just as Saudharmendra is tuṅga (lofty and supreme), so too is Sumeru, towering in height and majesty. Just as numerous celestial beings (Vibudha Devas) serve Saudharmendra, many Devas and learned sages revere and attend to Sumeru. Saudharmendra is the abode of the eternal seasonal chariot (Ṛtuvimāna) and the essence of all six seasons, and in the same way, Sumeru is adorned with Apsarās and lakes brimming with water, enhancing its divine beauty. ||79||
श्लोक ( Shlok ) 80
तमासाद्य सुराः प्रापुः प्रीतिमुन्नतिशालिनम् । रामणीयकसंभूति स्वर्गस्याधिदेवताम् ॥८०॥
इस प्रकार जो ऊँचाई से शोभायमान है, सुंदरता की खानि है और स्वर्ग का मानो अधिष्ठाता देव ही है ऐसे उस सुमेरु पर्वत को पाकर देव लोग बहुत ही प्रसन्न हुए ।।80।।
Thus, shining with majestic height, a treasure trove of beauty, and appearing as if it were the very presiding deity of heaven itself, Mount Sumeru filled the Devas with immense joy upon reaching it. ||80||
श्लोक ( Shlok ) 81
ततः परीत्य तं प्रीत्या सुरराजः सुरैः समम् । गिरिराजं जिनेन्द्रार्क मूर्द्धन्यस्य न्यधान्मुदा॥८१॥
तदनंतर इंद्र ने बड़े प्रेम से देवों के साथ-साथ उस गिरिराज सुमेरु पर्वत की प्रदक्षिणा देकर उसके मस्तक पर हर्षपूर्वक श्रीजिनेंद्ररूपी सूर्य को विराजमान किया ।।81।।
Thereafter, with great devotion, Indra, along with the Devas, joyfully circumambulated Mount Sumeru, the king of mountains. Filled with reverence, he then ceremoniously installed Lord Jinendra, the radiant sun of wisdom, upon its majestic peak. ||81||
श्लोक 82 से 91
आदिपुराण Ādi purāṇa
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71