आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
श्लोक 62 से 71 नाभिराज और मरुदेवी का वैवाहिक जीवन
मरुदेवी की मुसकान नाभिराज के मन को विस्तृत करती थी। नाभिराज उसे लक्ष्मी मानते थे। वह संभोग में अनुकूल थी। दोनों पुण्यवान, भोगभूमि लक्ष्मी के प्रतीक थे। इंद्र ने उनके लिए नगरी रची।
English translation of Ādi purāṇa parv 12 – Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
तद्वक्त्रेन्दोः स्मितज्योत्स्ना तन्वती नयनोत्सवम् । भर्त्तुश्चेतोऽम्बुधेः क्षोभमनुवेलं समातनोत् ॥६२॥
उसके मुखरूपी चंद्रमा की मुसकानरूपी चाँदनी, नेत्रों के उत्सव को बढ़ाती हुई अपने पति नाभिराज के मनरूपी समुद्र के क्षोभ को हर समय विस्तृत करती रहती थी ।।62।।
The moonlight-like radiance of her smile, emanating from her moon-like face, enhanced the delight of the eyes and constantly stirred the ocean of her husband Nabhiraja’s heart.
श्लोक ( Shlok ) 63
रूपलावण्यसम्पत्त्या “पत्या श्रीरिव सा मता । मताविव मुनिस्तस्यामतानीत् स परां धृतिम् ॥६३॥
महाराज नाभिराज रूप और लावण्यरूपी संपदा के द्वारा उसे साक्षात् लक्ष्मी के समान मानते थे और उसके विषय में अपने उत्कृष्ट संतोष को उस तरह विस्तृत करते रहते थे जिस तरह कि निर्मल बुद्धि के विषय में मुनि अपना उत्कृष्ट संतोष विस्तृत करते रहते हैं ।।63।।
King Nabhiraja regarded her as the very embodiment of Goddess Lakshmi due to her beauty and grace. His supreme contentment with her was as profound and ever-expanding as the deep satisfaction that sages experience in the pursuit of pure wisdom.
श्लोक ( Shlok ) 64
परिहासेष्वमर्मस्पृक् सम्भोगेष्वनुवर्त्तिनी । ‘साचिव्यमकरोत्तस्य नर्मणः प्रणयस्य च ॥६४॥
वह परिहास के समय कुवचन बोलकर पति के मर्म स्थान को कष्ट नहीं पहुंचाती थी और संभोग-काल में सदा उनके अनुकूल-प्रवृत्ति करती थी इसलिए वह अपने पति नाभिराज के परिहार और लेह के विषय में मंत्रिणी का काम करती थी ।।64।।
She never spoke harsh words, even in jest, to wound her husband’s heart, and during moments of intimacy, she always acted in harmony with his desires. Thus, she served as a wise counselor to King Nabhiraja in matters of both diplomacy and affection.
श्लोक ( Shlok ) 65
साभवत् प्रेयसी तस्य प्राणेभ्योऽपि गरीयसी । शचीव देवराजस्य परा प्रणयभूमिका ॥६५॥
वह मरुदेवी नाभिराज को प्राणों से भी अधिक प्यारी थी, वे उससे उतना ही स्नेह करते थे जितना कि इंद्र इंद्राणी से करता है ।।65।।
Marudevi was dearer to Nabhiraja than his own life; he loved her as deeply as Indra loves Indrani.
श्लोक ( Shlok ) 66
स तया कल्पवल्ल्येव लसदंशुकभूषया । समाश्लिष्टतनुः श्रीमान् कल्पद्रूम इवाद्युतत् ॥६६॥
अतिशय शोभायुक्त महाराज नाभिराज दैदीप्यमान वस्त्र और आभूषणों से सुशोभित उस मरुदेवी से आलिंगित शरीर होकर ऐसे शोभायमान होते थे जैसे दैदीप्यमान वस्त्र और आभूषणों को धारण करने वाली कल्पलता से वेष्टित हुआ (लिपटा हुआ) कल्पवृक्ष ही हो ।।66।।
The exceedingly radiant King Nabhiraja, adorned with resplendent garments and ornaments, appeared even more magnificent when embraced by Marudevi—just like a celestial wish-fulfilling tree entwined by a luminous, jewel-adorned celestial creeper.
श्लोक ( Shlok ) 67
स एव पुण्यवांल्लोके सैव पुण्यवती सती । ययोरयोनिजन्मा सौ वृषभो भवितात्मजः ॥६७॥
संसार में महाराज नाभिराज ही सबसे अधिक पुण्यवान् थे और मरुदेवी ही सबसे अधिक पुण्यवती थी । क्योंकि जिनके, स्वयंभू भगवान् वृषभदेव पुत्र होंगे उनके समान और कौन हो सकता है ? ।।67।।
In the world, King Nabhiraja was the most virtuous, and Marudevi was the most blessed. For who could be greater than the ones destined to have Lord Rishabhadeva, the self-manifested divine being, as their son?
श्लोक ( Shlok ) 68
तौ दम्पती तदा तत्र भोगेकरसतां गतौ । भोगभूमिश्रियं साक्षाच्चक्रतुर्वियुतामपि ॥६८॥
उस समय भोगोपभोगों में अतिशय तल्लीनता को प्राप्त हुए वे दोनों दंपती ऐसे जान पड़ते थे मानो भोगभूमि की नष्ट हुई लक्ष्मी को ही साक्षात् दिखला रहे हों ।।68।।
At that time, the royal couple, deeply immersed in luxurious pleasures, appeared as if they were the very embodiment of the lost prosperity of the celestial lands of enjoyment (Bhogabhumi).
श्लोक ( Shlok ) 69
ताभ्यामलंकृते पुण्ये देशे कल्पांघ्रिपात्यये । तत्पुण्यैर्मुहुराहूतः पुरुहूतः पुरीं व्यधात् ॥६९॥
मरुदेवी और नाभिराज से अलंकृत पवित्र स्थान में जब कल्पवृक्षों का अभाव हो गया तब वहाँ उनके पुण्य के द्वारा बार-बार बुलाये हुए इंद्र ने एक नगरी की रचना की ।।69।।
When the sacred land, adorned by Marudevi and Nabhiraja, lacked celestial wish-fulfilling trees, Indra, repeatedly invoked by their immense virtue, created a magnificent city there.
श्लोक ( Shlok ) 70
सुराः ससंभ्रमाः सद्यः पाकशासनशासनात् । तां पुरीं परमानन्दाद् व्यधुः सुरपुरीनिभाम् ॥७०॥
इंद्र की आज्ञा से शीघ्र ही अनेक उत्साही देवों ने बड़े आनंद के साथ स्वर्गपुरी के समान उस नगरी की रचना की ।।70।।
By Indra’s command, many enthusiastic deities quickly and joyfully built that city, making it as splendid as the celestial abode of the gods.
श्लोक ( Shlok ) 71
स्वर्गस्यैव प्रतिच्छन्दं भूलोकेऽस्मिन्निधित्सुभिः । विशेषरमणीयैव निर्ममे सामरैः पुरी ॥७१॥
उन देवों ने वह नगरी विशेष सुंदर बनायी थी जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो इस मध्य लोक में स्वर्गलोक का प्रतिबिंब रखने की इच्छा से ही उन्होंने उसे अत्यंत सुंदर बनाया हो ।।71।।
The gods crafted that city with such exceptional beauty that it seemed as if they intended to place a reflection of the heavenly realm in this middle world.
श्लोक 72 से 81
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31