भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
श्लोक 12 से 21 शतमति की दुर्गति और धर्म-अधर्म
शतमति दूसरी नरक में दुःख भोग रहा है। पाप से अधर्म और धर्म से सुख मिलता है। विषयासक्ति से पाप बढ़ता है, जो अधोगति का कारण बनता है। नरक का दुःख और कारण जानने के लिए श्रीधर को सुनने को कहा।
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 |
English translation of Ādi purāṇa parv 10 – Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
स एष शतबुद्धिस्ते मिथ्याज्ञानस्य दार्ढ्यतः । द्वितीयनरके दुःखमनुभुङ्क्ते ऽतिदारुणम् ॥१२॥
वह तुम्हारा शतबुद्धि मंत्री मिथ्याज्ञान की दृढ़ता से दूसरे नरक में अत्यंत भयंकर दुःख भोग रहा है ।।12।।
“Your minister Shatabuddhi, due to his firm attachment to false knowledge, is currently suffering extreme torment in the second hell.” (12)
श्लोक ( Shlok ) 13
सोऽयं स्वयंकृतोऽनर्थों जन्तोरघजितात्मनः । यदयं विद्विषन् धर्ममधमें कुरुते रतिम् ॥१३॥
पाप से पराजित आत्मा को स्वयं किये हुए अनर्थ का यह फल है जो उसका धर्म से द्वेष और अधर्म से प्रेम होता है ।।13।।
“This is the result of the sinful deeds of a soul defeated by sin — developing hatred toward Dharma and love for Adharma.” (13)
श्लोक ( Shlok ) 14
धर्मात् सुखमधर्माच्च दुःखमित्यविगानतः । धर्मैकपरतां धत्ते बुधोऽनर्थ जिहासया ॥१४॥
‘धर्म से सुख प्राप्त होता है और अधर्म से दुःख मिलता है’ यह बात निर्विवाद प्रसिद्ध है इसीलिए तो बुद्धिमान् पुरुष अनर्थों को छोड़ने की इच्छा से धर्म में ही तत्परता धारण करते हैं ।।14।।
“It is universally acknowledged and undisputed that Dharma brings happiness, while Adharma leads to suffering. Therefore, wise individuals, desiring to avoid misfortune, devote themselves wholeheartedly to Dharma.” (14)
श्लोक ( Shlok ) 15
धर्मः प्राणिदया सत्यं क्षान्तिः शौचं वितृष्णता । “ज्ञानवैराग्यसंपत्तिर धर्मस्तद्विपर्ययः ॥१५॥
प्राणियों पर दया करना, सच बोलना, क्षमा धारण करना, लोभ का त्याग करना, तृष्णा का अभाव करना, सम्यग्ज्ञान और वैराग्यरूपी संपत्ति का इकट्ठा करना ही धर्म है और उससे उलटे अदया आदि भाव अधर्म है ।।15।।
“Compassion toward living beings, speaking the truth, practicing forgiveness, renouncing greed, being free from desires, and accumulating the wealth of right knowledge and detachment — this is Dharma. In contrast, cruelty and other opposite tendencies constitute Adharma.” (15)
श्लोक ( Shlok ) 16
तनोति विषयासंगः सुखसंतर्षमङ्गिनः । स तीव्रमनुसंधत्ते तापं दीप्त इवानलः ॥१६॥
संतप्तस्तत्प्रतीकारमोप्सन् पापेऽनुरज्यते । द्वेष्टि पापरतो धर्ममधर्माच्च पतत्यधः ॥१७॥
विषयासक्ति जीवों के इंद्रियजंय सुख की तृष्णा को बढ़ाती है, इंद्रियजंय सुख की तृष्णा प्रज्वलित अग्नि के समान भारी संताप पैदा करती है । तृष्णा से संतप्त हुआ प्राणी उसे दूर करने की इच्छा से पाप में अनुरक्त हो जाता है, पाप में अनुराग करने वाला प्राणी धर्म से द्वेष करने लगता है और धर्म से द्वेष करने वाला जीव अधर्म के कारण अधोगति को प्राप्त होता है ।।16-17।।
“Attachment to sensual pleasures fuels the craving for sensory indulgence. This craving, like a blazing fire, causes intense suffering. A being tormented by craving becomes inclined toward sinful acts in an attempt to alleviate it. One who engages in sin develops aversion to Dharma, and this aversion to Dharma leads the soul to lower realms due to the influence of Adharma.” (16-17)
श्लोक ( Shlok ) 18
विपच्यते यथाकालं नरके दुरनुष्ठितम् ।अनेहसि समभ्यर्णे यथाऽलर्कशुनो विषम् ॥१८॥
जिस प्रकार समय आने पर (प्राय: वर्षाकाल में) पागल कुत्ते का विष अपना असर दिखलाने लगता है उसी प्रकार किये हुए पापकर्म भी समय पाकर नरक में भारी दुःख देने लगते हैं ।।18।।
“Just as the poison of a rabid dog manifests its effects at the right time (typically during the rainy season), similarly, sinful deeds also bear fruit in due time, causing immense suffering in hell.” (18)
श्लोक ( Shlok ) 19
यथोपच रितैर्जन्तुं तीव्रं ज्वरयति ज्वरः । तथा दुरीहितैः पाप्मा गाढीभवति दुर्दृशः ॥१९॥
जिस प्रकार अपथ्य सेवन से मूर्ख मनुष्यों का ज्वर बढ़ जाता है उसी प्रकार पापाचरण से मिथ्यादृष्टि जीवों का पाप भी बहुत बड़ा हो जाता है ।।19।।
“Just as consuming harmful food aggravates a foolish person’s fever, similarly, engaging in sinful conduct greatly increases the sins of beings with false beliefs.” (19)
श्लोक ( Shlok ) 20
दुरन्तः कर्मणां पाको ददाति कटुकं फलम् । येनात्मा पतितः श्वभ्रे क्षणं दुःखान्न मुच्यते ॥२०॥
किये हुए कर्मों का परिपाक बहुत ही बुरा होता है । वह सदा कड़वे फल देता रहता है; उसी से यह जीव नरक में पड़कर वहाँ क्षण-भर के लिए भी दुःख से नहीं छूटता ।।20।।
“The consequences of past actions are exceedingly harsh, always yielding bitter fruits. Because of this, the soul falls into hell, where it does not find relief from suffering even for a moment.” (20)
श्लोक ( Shlok ) 21
कीदृशं नरके दुःखं तत्रोत्पत्तिः कुतोऽङ्गिनाम् । इति चेच्छृणु तत्सम्यक् प्रणिधाय मनः क्षणम् ॥२१॥
नरकों में कैसा दुःख है ? और वहाँ जीवों की उत्पत्ति किस कारण से होती है ? यदि तू यह जानना चाहता है तो क्षण-भर के लिए मन स्थिर कर सुन ।।21।।
“What kind of suffering exists in hell? And what causes beings to be born there? If you wish to know, steady your mind for a moment and listen.” (21)
श्लोक 22 से 31
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 |
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