भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण Ādi purāṇa पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
श्लोक 156 से 162 कथा की शुरुआत
भव्यजनों को पुराण में अवगाहन करना चाहिए। वृषभनाथ का पुराण पहले कहा जाएगा। इसमें काल, कुलकर, वंश, और निर्वाण हैं। यह उपोद्धात है। सभा श्रेणिक के साथ सुनने को सावधान हुई। यह पुराण पाप धोकर शुद्धि देता है।
English translation of Ādi purāṇa parv 2- Shlok 156 to 162
श्लोक ( Shlok )156
वतो मध्यजनैः आर्द्धरषगास्यमिदं मुहुः । पुराणं पुण्यपुरस्नैर्भूतमन्भीयित्तं महत् ॥१५६॥
जब यह बात है तो श्रद्धालु भव्य जीवों को पुण्यरूपी रत्नों से भरे हुए इस पुराणरूपी समुद्र में अवश्य ही अवगाहन करना चाहिए ।।156।।
Since this is the case, the devoted noble souls should undoubtedly immerse themselves in this Purana, which is like an ocean filled with jewels of virtue. ||156||
श्लोक ( Shlok )157
तच पूर्वानुपून्यदं पुराणमनुवर्ण्यते । तत्राद्यस्य पुराणस्य संग्रहे कारिका विदुः ॥१५७॥
ऊपर जिस पुराण का लक्षण कहा है अब यहाँ क्रम से उसी को कहेंगे और उसमें भी सबसे पहले भगवान् वृषभनाथ के पुराण की कारिका कहेंगे ।।157।।
The Purana that has been described above will now be explained step by step, and first, we will discuss the verse of the Purana of Lord Vrishabhnath. ||157||
श्लोक ( Shlok )158-159
स्थितिः कुलधरोत्पत्तिवंशानामथ निर्गमः । पुरोः साम्राज्यमार्हन्त्यं निर्वाणं युगविच्छिदाँ ॥१५८॥
एते महाधिकाराः स्युः पुराणे वृषभेशिनः । यथावसरमन्येषु पुराणेध्वंपि लक्षयेत् ॥१५९॥
श्री वृषभनाथ के पुराण में काल का वर्णन, कुलकरों को उत्पत्ति, वंशों का निकलना, भगवान् का साम्राज्य, अरहंत अवस्था, निर्वाण और युग का विच्छेद होना ये महाधिकार हैं । अन्य पुराणों में जो अधिकार होंगे वे समयानुसार बताये जायेंगे ।।158-159।।
In the Purana of Lord Vrishabhnath, the descriptions of time, the origin of families, the emergence of lineages, the sovereignty of the Lord, the state of Arhants, Nirvana, and the separation of the Yugas are the major aspects. The other aspects found in other Puranas will be explained according to their respective times. ||158-159||
श्लोक ( Shlok )160
कथोपोद्धात एष स्यात् कथायाः पीडिकामितः । वक्ष्ये कालावतारं च स्थितीः कुलभृमपि ॥१६०
यह इस कथा का उपोद्धात है, अब आगे इस कथा की पीठिका, कालावतार और कुलकरों की स्थिति कहेंगे ।।160।।
This is the introduction to the story. Now, we will proceed with the background of this narrative, the incarnation of time, and the status of the family lineages. ||160||
श्लोक ( Shlok )161
प्रणिगति सप्त्तोत्थं गौतम भक्तिनम्रा सुनिपरिषदशेष। श्रोतुकामा पुराणम् । मगधनृपतिनार्मा सावधाना तडाभूजितमत्रगणेयेद् वाकः सुधीराप्तवाक्यम् ॥१६१ ॥
इस प्रकार गौतम स्वामी के कहने पर भक्ति से नम्र हुई वह मुनियों की समस्त सभा पुराण सुनने की इच्छा से श्रेणिक महाराज के साथ सावधान हो गयी, सो ठीक ही है क्योंकि ऐसा कौन बुद्धिमान् होगा जो कि आप्त पुरुषों के हितकारी वचनों का अनादर करे ।।161।।
Thus, upon the request of Gautam Swami, the assembly of monks, humbled with devotion, became eager to listen to the Purana along with King Shrenik. This is indeed proper, for who among the wise would disregard the beneficial words of the accomplished beings? ||161||
श्लोक ( Shlok )162
इत्याचार्यपरम्परीणममलं पुण्यं पुराणं पुरा कल्पे यद्भगवानुवाच वृषभक्रादिभत्रै जिनः । तद्वः पापकलङ्कपक्कमखिलं प्रक्षाल्य शुद्धिं परां देयात् पुण्यवचोजलं परमिदं तीर्थ जगत्पावनम् ॥१६२॥
इस प्रकार जो आचार्य-परंपरा से प्राप्त हुआ है, निर्दोष है, पुण्यरूप है और युग के आदि में भरत चक्रवर्ती के लिए भगवान् वृषभदेव के द्वारा कहा गया था, ऐसा यह जगत् को पवित्र करने वाला उत्कृष्ट तीर्थस्वरूप पुराणरूपी पवित्र जल तुम लोगों के समस्त पाप कलंकरूपी कीचड़ को धोकर तुम्हें परम शुद्धि प्रदान करे ।।162।।
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंयहे कथामुखवर्णनं नाम द्वितीयं पर्व ॥२॥
इस प्रकार आर्ष नाम से प्रसिद्ध, श्रीभगवज्जिनसेनाचार्य विरचित त्रिषष्टिलक्षण महापुराण के
संग्रह में ‘कथामुखवर्णन’ नामक द्वितीय पर्व समाप्त हुआ ।।2।।
Thus, the second section, titled Kathamukhavarṇan, in the collection of the Triśaṣṭilakṣaṇa Mahāpurāṇa, composed by the renowned Shri Bhagavajjineshwar Acharya, has been concluded. ||2||
पर्व 3 – श्लोक 1 से 10
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155 | श्लोक 156 से 162
पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71
Download PDF
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
Front Desk Jainism Forum (FDJF)
FAIR USE DECLARATION
This information is provided by the Front Desk Jainism Forum (FDJF) under Fair Use guidelines for educational and research purposes. To the best of our knowledge, it is in the public domain, and our goal is to make it more accessible.
If you are the intellectual property owner and have concerns, please contact us, and we will address the matter promptly. Users are advised to verify legal use in their jurisdiction before accessing this material. For more details, visit our website.