भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 |
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 122 to 132
श्लोक ( Shlok ) 122
आत्मादिमुक्तिपर्यन्ततत्त्व श्रद्वानमञ्जसा । त्रिभिर्मूढैरनालीढमष्टाङ्ग विद्धि दर्शनम् ॥१२२॥
जीवादि सात तत्त्वों का तीन मूढ़तारहित और आठ अंगसहित यथार्थ श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है ।।122।।
“True perception (Samyagdarshan) is having a correct and unwavering belief in the seven principles (Jivadi Tattvas) without any delusion and with eight essential components.”
श्लोक ( Shlok ) 123
तस्य प्रशमसंवेगावास्तिक्यं चानुकम्पनम् । गुणाः श्रद्धारुचिस्पर्शप्रत्ययाश्चेति पर्ययाः ॥ १२३॥
प्रशम, संवेग, आस्तिक्य और अनुकंपा ये चार सम्यग्दर्शन के गुण हैं और श्रद्धा, रुचि, स्पर्श तथा प्रत्यय ये उसके पर्याय हैं ।।123।।
“Calmness (Prasham), enthusiasm for liberation (Samveg), faith in the teachings (Aastikya), and compassion (Anukampa) are the four qualities of right perception (Samyagdarshan). Faith (Shraddha), interest (Ruchi), touch (Sparsh), and conviction (Pratyay) are its synonyms.”
श्लोक ( Shlok ) 124
तस्य निःशङ्कितत्वादीन्यष्टावङ्गानि निश्चिनु । यैरंशुभिरिवाभाति रत्नं सद्दर्शनाह्वयम् ॥ १२४॥
निःशंकित, निःकांक्षित, निर्विचिकित्सा, अमूढ़दृष्टि, उपगूहन, वात्सल्य, स्थितिकरण और प्रभावना ये सम्यग्दर्शन के आठ अंग हैं । इन आठ अंगरूपी किरणों से सम्यग्दर्शनरूपी रत्न बहुत ही शोभायमान होता है ।।124।।
“Fearlessness (Nishankit), desirelessness (Nishkankshit), doubtlessness (Nirvichikitsa), non-deluded vision (Amoodhadrishti), shielding (Upguhan), affection (Vatsalya), steadfastness (Sthitikaran), and glorification (Prabhavana) are the eight components of right perception. The jewel of right perception shines brilliantly with these eight radiating components.”
श्लोक ( Shlok ) 125 – 127
शङ्कां जहीहि सन्मार्गे भोगकान्क्षामपाकुरु । विचिकित्साद्वयं हित्वा भजस्वामूढदृष्टिताम् ॥१२५॥
कुरूपबृंहणं धर्मे मलस्थाननिगूहनैः । मार्गाच्चलति धर्मस्थे स्थितीकरणमाचर ॥१२६॥
रत्नत्रितयवत्यार्यसंङ्घे वात्सल्यमातनु । विधेहि शासने जैने यथाशक्ति प्रभावनाम् ॥१२७॥
हे आर्य, तू इस श्रेष्ठ जैनमार्ग में शंका को छोड़, किसी प्रकार का संदेह मत कर, भोगों की इच्छा दूर कर, ग्लानि को छोड़कर अमूढ़दृष्टि (विवेकपूर्ण दृष्टि) को प्राप्त कर दोष के स्थानों को छिपाकर समीचीन धर्म की वृद्धि कर, मार्ग से विचलित होते हुए धर्मात्मा का स्थितिकरण कर, रत्नत्रय के धारक आर्य पुरुषों के संघ में प्रेमभाव का विस्तार कर और जैन-शासन की शक्ति के अनुसार प्रभावना कर ।।125-127।।
“O noble one, abandon doubt in this supreme Jain path; do not entertain any form of skepticism. Let go of desires for sensual pleasures, relinquish remorse, and attain a discerning vision (Amoodhadrishti). Conceal the faults of others and promote the growth of true religion. Stabilize the virtuous who waver from the path, cultivate love within the community of noble individuals who uphold the Three Jewels (Ratnatraya), and spread the influence of the Jain doctrine to the best of your ability.”
श्लोक ( Shlok ) 128
देवतालोकपाषण्डव्यामोहांश्च समुत्सृज । मोहान्धो हि जनस्तत्वं पश्यन्नपि न पश्यति ॥१२८॥
देवमूढ़ता, लोकमूढ़ता और पाषंड मूढ़ता इन तीन मूढ़ताओं को छोड़ क्योंकि मूढ़ताओं से अंधा हुआ प्राणी तत्त्वों को देखता हुआ भी नहीं देखता ।।128।।
“Abandon the three delusions: delusion towards deities (Devamoodhata), worldly delusion (Lokamoodhata), and Guru delusion (Pashandamoodhata), because a being blinded by these delusions fails to perceive the truth even when it is in front of them.”
श्लोक ( Shlok ) 129
‘प्रतीहि धर्मसर्वस्वं दर्शनं चारुदर्शन । तस्मिन्नाप्ते दुरापाणि न सुखानीह देहिनाम् ।।१२९।।
। हे आर्य, पदार्थ के ठीक-ठीक स्वरूप का दर्शन करने वाले सम्यग्दर्शन को ही तू धर्म का सर्वस्व समझ, उस सम्यग्दर्शन के प्राप्त हो चुकने पर संसार में ऐसा कोई सुख नहीं रहता जो जीवों को प्राप्त नहीं होता हो ।129।।
“In this world, only that person has attained a noble birth, is truly fulfilled, and is wise, whose heart is illuminated by genuine and deceit-free right perception.”
श्लोक ( Shlok ) 130
लब्धं तेनैव सज्जन्म स कृतार्थः स पण्डितः । परिस्फुरति निर्व्याजं यस्य सद्दर्शनं हृदि ।।१३०॥
“O noble one, consider right perception, which enables the true understanding of the nature of substances, as the essence of religion. Once right perception is attained, there remains no happiness in the world that living beings cannot achieve.”
श्लोक ( Shlok ) 131 – 132
सिद्धिप्रसादसोपानं विद्धि दर्शनमग्रिमम् । दुर्गतिद्वारसंरोधि “कवाटपुटमूर्जितम् ।।१३१।।
स्थिरं धर्मतरोर्मूलं द्वारं स्वर्मोक्षवेश्मनः । शीलाभरणहारस्थ तरलं तरलोपमम् ॥१३२॥
हे आर्य, तू यह निश्चित जान कि यह सम्यग्दर्शन मोक्षरूपी महल की पहली सीढ़ी है । नरकादि दुर्गतियों के द्वार को रोकने वाले मजबूत किवाड़ हैं, धर्मरूपीवृक्ष की स्थिर जड़ है, स्वर्ग और मोक्षरूपी घर का द्वार है और शीलरूपी रत्नहार के मध्य में लगा हुआ श्रेष्ठ रत्न है ।।131-132।।
“O noble one, know with certainty that right perception is the first step to the palace of liberation. It is a strong barrier that blocks the gates to the realms of hell and misfortune, the stable root of the tree of righteousness, the doorway to the abode of heaven and liberation, and the finest jewel adorning the garland of virtue.”
श्लोक 133 से 141
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 |