भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92
श्लोक 93 से 101 नारकियों का स्वरूप
आयु एक से 33 सागर तक। शरीर की ऊँचाई सात धनुष से 500 धनुष तक। नारकी विकलांग, काले, दुर्गंधयुक्त, कठोर स्पर्श वाले हैं। भावलेश्या कापोती से कृष्ण तक होती है।
English translation of Ādi purāṇa parv 10 – Shlok 82 to 92
श्लोक ( Shlok ) 93
एकं त्रीणि तथा सप्त दश सप्तदशापि च । द्वाविंशतिस्त्रयस्त्रिंश दायुस्तत्राब्धिसंख्यया ॥९३॥
उन नरकों में क्रम से एक सागर, तीन सागर, सात सागर, दस सागर, सत्रह सागर, बाईस सागर और तेंतीस सागर की उत्कृष्ट आयु है ।।93।।
“In those hells, the lifespan progressively increases as follows: one sagar, three sagar, seven sagars, ten sagar, seventeen sagar, twenty-two sagar, and thirty-three sagar.”
श्लोक ( Shlok ) 94
धनूंषि सप्त तिस्रः स्युररत्न्योऽङ्गुलयश्च षट् ।धर्मायां नारकोत्सेधो द्विर्द्विश्शेषासु लक्ष्यताम् ॥९४।
पहली पृथ्वी में नारकियों के शरीर की ऊँचाई सात धनुष तीन हाथ और छह अंगुल है । और द्वितीय आदि पृथ्वीयों में क्रम-क्रम से दूनी-दूनी समझनी चाहिए । अर्थात् दूसरी पृथ्वी में पंद्रह धनुष दो हाथ बारह अंगुल, तीसरी पृथ्वी में इकतीस धनुष एक हाथ, चौथी पृथ्वी में बासठ धनुष दो हाथ, पाँचवीं पृथ्वी में एक सौ पच्चीस धनुष, छठी पृथ्वी में दो सौ पचास हाथ और सातवीं पृथ्वी में पाँच सौ धनुष शरीर की ऊँचाई है ।।94।।
“In the first layer of the earth, the height of the hellish beings is seven bows, three hands, and six fingers. In the subsequent layers, the height doubles progressively:
- Second layer: fifteen bows, two hands, and twelve fingers
- Third layer: thirty-one bows, one hand
- Fourth layer: sixty-two bows, two hands
- Fifth layer: one hundred twenty-five bows
- Sixth layer: two hundred fifty bows
- Seventh layer: five hundred bows
(Note: ‘Bow,’ ‘hand,’ and ‘finger’ are ancient units of measurement.)”
श्लोक ( Shlok ) 95
पोगण्डा हुण्डसंस्थानाः षण्डकाः पूतिगन्धयः । दुर्वर्णाश्चैव दुःस्पर्शा दुःस्वरा दुर्भगाश्च ते ॥95॥
वे नारकी विकलांग हुंडक संस्थान वाले, नपुंसक, दुर्गंधयुक्त, बुरे काले रंग के धारक, कठिन स्पर्श वाले, कठोर स्वरसहित तथा दुर्भग (देखने में अप्रिय) होते हैं ।।95।।
“Those hellish beings are deformed, twisted in posture, impotent, foul-smelling, bearers of an unpleasant dark color, harsh to the touch, devoid of any pleasing taste, and visually repulsive.”
श्लोक ( Shlok ) 96
तमोमयैरिवारब्धा विरूक्षैः परमाणुभिः । जायन्ते कालकालाभा नारका द्रव्यलेश्यया ॥९६।।
उन नारकियों का शरीर अंधकार के समान काले और रूखे परमाणुओं से बना हुआ होता है । उन सबकी द्रव्यलेश्या अत्यंत कृष्ण होती है ।।96।।
“The bodies of those hellish beings are composed of dark and coarse particles, resembling darkness itself. Their material consciousness (Dravyaleshya) is extremely black.”
श्लोक ( Shlok ) 97 – 98
भावलेश्या तु कापोती जघन्या मध्यमोत्तमा । नीला च मध्यमा नीला नीलोत्कृष्टा च कृष्णया ॥97
कृष्णा व मध्यमोत्कृष्टा कृष्णा चेति यथाक्रमम् । धर्मादिसप्तमी यावत् तावत्पृथिवीषु वर्णिताः ॥ 98
परंतु भावलेश्या में अंतर है जो कि इस प्रकार है―पहली पृथ्वी में जघन्य कापोती भावलेश्या है, दूसरी पृथ्वी में मध्यम कापोती लेश्या है, तीसरी पृथ्वी में उत्कृष्ट कापोती लेश्या और जघन्य नील लेश्या है, चौथी पृथ्वी में मध्यम नील लेश्या है, पाँचवीं में उत्कृष्ट नील तथा जघन्य कृष्ण लेश्या है, छठी पृथ्वी में मध्यम कृष्ण लेश्या है और सातवीं पृथ्वी में उत्कृष्ट कृष्ण लेश्या है । इस प्रकार घर्मा आदि सात पृथ्वीयों में क्रम से भावलेश्या का वर्णन किया ।।97-98।।
- Second layer: Moderate Kapoti Bhavaleshya
- Third layer: Superior Kapoti and Inferior Neela (bluish) Bhavaleshya
- Fourth layer: Moderate Neela Bhavaleshya
- Fifth layer: Superior Neela and Inferior Krishna (black) Bhavaleshya
- Sixth layer: Moderate Krishna Bhavaleshya
- Seventh layer: Superior Krishna Bhavaleshya
Thus, the Bhavaleshya has been described progressively for the seven layers of Dharmaranya and beyond.”
श्लोक ( Shlok ) 99
यादृशः कटुकालाबुकाञ्जीरादिसमागमे । रसः कटुरनिष्टश्च तद्गात्रेष्वपि तादृशः ॥९९॥
कड़वी तूंबी और कांजीर के संयोग से जैसा कडुआ और अनिष्ट रस उत्पन्न होता है वैसा ही रस नारकियों के शरीर में भी उत्पन्न होता है ।।99।।
“Just as a bitter and unpleasant taste is produced by the combination of bitter gourd and wild cucumber, a similar bitter essence is present in the bodies of the hellish beings.”
श्लोक ( Shlok ) 100
श्वमार्जारखरोष्ट्रादिकुणषानां समाहृतौ । यद्वैगन्ध्यं तदप्येषां देहगन्धस्य नोपमा ॥१००॥
कुत्ता, बिलाव, गधा, ऊँट आदि जीवों के मृतक कलेवरों को इकट्ठा करने से जो दुर्गंध उत्पन्न होती है वह भी इन नारकियों के शरीर की दुर्गंध की बराबरी नहीं कर सकती ।।100।।
“The foul stench produced by gathering the carcasses of animals like dogs, cats, donkeys, and camels cannot match the foul odor emanating from the bodies of these hellish beings.”
श्लोक ( Shlok ) 101
यादृशः करपत्रेषु गोक्षुरेषु च यादृशः । तादृशः कर्कशः स्पर्शः तदङ्गेष्वपि जायते ॥१०१ ॥
करोत और गोखुरू में जैसा कठोर स्पर्श होता है वैसा ही कठोर स्पर्श नारकियों के शरीर में भी होता है ।।101।
“The bodies of hellish beings are as harsh to the touch as the rough surfaces of karot and gokhru (thorny plants).”
श्लोक 102 से 111
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92