भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101
नारकियों की स्थिति और धर्म की महिमा
नारकियों की विक्रिया विकृत और एकरूप होती है। पर्याप्तक पर उन्हें विभंगावधि ज्ञान मिलता है, जिससे पूर्व बैर स्मृत होते हैं। शतबुद्धि द्वितीय नरक में दुःख भोगता है। प्रीतिंकर ने कहा कि जैन धर्म दुःखों से बचाता, सुख और मोक्ष देता है। श्रीधरदेव धर्मप्रेम से प्रेरित हुआ।
English translation of Ādi purāṇa parv 10 – Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
अपृथगविक्रियास्तेषामशुभाद् दुरितोदयात् । ततो विकृतबीभत्सविरूपात्मैव सा मता ॥१०२॥
उन नारकियों के अशुभ कर्म का उदय होने से अपृथक् विक्रिया ही होती है और वह भी अत्यंत विकृत, घृणित तथा कुरूप हुआ करती है । भावार्थ―एक नारकी एक समय में अपने शरीर का एक ही आकार बना सकता है सो वह भी अत्यंत विकृत, घृणा का स्थान और कुरूप आकार बनाता है, देवों के समान मनचाहे अनेक रूप बनाने की सामर्थ्य नारकी जीवों में नहीं होती ।।102।।
“Due to the rise of their inauspicious karma, the hellish beings have limited and distorted bodily functions, which are extremely deformed, repulsive, and ugly.
Explanation: A hellish being can form only one shape of its body at a time, and even that is grotesque, repulsive, and ugly. Unlike celestial beings, they do not possess the ability to assume multiple forms at will.”
श्लोक ( Shlok ) 103
विबोधोऽस्ति विभङ्गारुयस्तेषां पर्याप्त्यनन्तरम् । तेनान्यजन्मवैराणां स्मरनन्त्युद् घट्टय न्ति च ॥ १०३॥
पर्याप्तक होते ही उन्हें विभंगावधि ज्ञान प्राप्त हो जाता है जिससे वे पूर्वभव से बैरों का स्मरण कर लेते हैं और उन्हें प्रकट भी करने लगते हैं ।।103।।
“As soon as they reach the stage of Paryaptaka (completion of essential activities), they attain Vibhanga Jnana (partial clairvoyance), which enables them to remember enmities from their previous births and reveal them as well.”
श्लोक ( Shlok ) 104
यदमी प्राक्तने जन्मन्यासन् पापेषु पण्डिताः । कद्वदाश्च दुराचारास्त द्विपाकोऽयमुल्वणः ॥१०४
जो जीव पूर्वजन्म में पाप करने में बहुत ही पंडित थे, जो खोटे वचन कहने में चतुर थे और दुराचारी थे यह उन्हीं के दुष्कर्म का फल है ।।104।।
“This is the result of the sinful deeds of those beings who, in their previous births, were highly skilled in committing sins, adept at speaking deceitful words, and engaged in immoral conduct.”
श्लोक ( Shlok ) 105
ईदृग्विधं महादुःखं द्वितीयनरकाश्रितम् । पापेन कर्मणा प्रापत् शतबुद्धिरसौ सुर ॥१०५॥
हे देव, वह शतबुद्धि मंत्री का जीव अपने पापकर्म के उदय से ऊपर कहे अनुसार द्वितीय नरक संबंधी बड़े-बड़े दुःखों को प्राप्त हुआ है ।।105।।
“O Lord, the soul of that minister Shatabuddhi, due to the rise of his sinful karma, has now attained the severe sufferings associated with the second hell as described earlier.”
श्लोक ( Shlok ) 106
तस्माद दुःखमनिच्छूनां नारकं तीव्रमीदृशम् । उपास्योऽयं जिनेन्द्राण्णवं धर्मो मतिमतां नृणाम् ॥१०६।।
इसलिए जो जीव ऊपर कहे हुए नरकों के तीव्र दुःख नहीं चाहते उन बुद्धिमान् पुरुषों को इस जिनेंद्रप्रणीत धर्म की उपासना करनी चाहिए ।।106।।
“Therefore, those wise beings who wish to avoid the intense sufferings of the hells described above should engage in the worship and practice of the religion prescribed by Lord Jina.”
श्लोक ( Shlok ) 107
धर्मः प्रपाति दुःखेभ्यो धर्मः शर्म तनोत्ययम् । धमों नैःश्रेयसं सौख्यं दत्ते कर्मक्षयोद्भवम् ॥१०७॥
यही जैन धर्म ही दुःखों से रक्षा करता है, यही धर्म सुख विस्तृत करता है, और यही धर्म कर्मों के क्षय से उत्पन्न होने वाले मोक्षसुख को देता है ।।107।।
“This very Jain religion protects beings from suffering, expands happiness, and grants the bliss of liberation that arises from the annihilation of karmas.”
श्लोक ( Shlok ) 108
धर्मादेव सुरेन्द्रत्वं नरेन्द्रत्वं गणेन्द्रता । धर्मात्तीर्थकरत्वं च परमानन्त्यमेव च ।।१०८॥
इस जैन धर्म से इंद्र चक्रवर्ती और गणधर के पद प्राप्त होते हैं । तीर्थंकर पद भी इसी धर्म से प्राप्त होता है और सर्वोत्कृष्ट सिद्ध पद भी इसी से मिलता है ।।108।।
“Through this Jain religion, one attains the positions of Indra, Chakravarti, and Ganadhara. The status of Tirthankara is also achieved through this religion, as well as the supreme state of Siddhahood.”
श्लोक ( Shlok ) 109
धर्मो बन्धुश्च मित्रं च धर्मोऽयं गुरुरङ्गिनाम् । तस्माध्दर्मे मतिं धत्स्व स्वर्मोक्षसुखदायिनि ॥ १०९॥
यह जैन धर्म ही जीवों का बंधु है, यही मित्र है और यही गुरु है, इसलिए हे देव, स्वर्ग और मोक्ष के सुख देने वाले इस जैनधर्म में ही तू अपनी बुद्धि लगा ।।109।।
“This Jain religion is the true companion of living beings, their friend, and their teacher. Therefore, O Lord, devote your intellect to this Jain religion, which grants the bliss of both heaven and liberation.”
श्लोक ( Shlok ) 110
तदा प्रीतिंकरस्येति वचः श्रुत्वा जिनेशिनः । श्रीधरो धर्मसंवेगं परं प्रापत् स पुण्यधीः ।।११०।।
उस समय प्रीतिंकर जिनेंद्र के ऊपर कहे वचन सुनकर पवित्र बुद्धि का धारक श्रीधरदेव अतिशय धर्मप्रेम को प्राप्त हुआ ।।110।।
“At that time, upon hearing the aforementioned words about the venerable Jina, Shridhar Deva, possessing a pure intellect, developed an intense love for righteousness.”
श्लोक ( Shlok ) 111
गत्वा गुरुनिदेशेन शतबुद्धिमबोधयत् । किं भद्रमुख मां वेत्सि शतबुद्धे महाबलम् ॥१११॥
और गुरु के आज्ञानुसार दूसरे नरक में जाकर शतबुद्धि को समझाने लगा कि हे भोले मूर्ख शतबुद्धि, क्या तू मुझ महाबल को जानता है ? ।।111।।
“Following the guru’s command, he went to the second hell and began to counsel Shatabuddhi, saying, ‘O foolish and ignorant Shatabuddhi, do you recognize me, mahabal?'”
श्लोक 112 से 122
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101