आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182
श्लोक 183 से 191 विषय सुख की मिथ्या प्रकृति
विषयी जीव को विषय निंद्य सुख प्रतीत होते हैं। संभोग से शरीर काँपता, श्वास तीव्र होती, पसीना आता है—यह सुख नहीं। कुत्ता हड्डी चबाकर, विषयी परिश्रम को सुख मानते हैं। स्वाभाविक आह्लाद ही सुख है। स्वर्गीय सुख भी सामग्री के उपभोग से नहीं, केवल सत्ता से नहीं मिलता। यह आर्तध्यान का कारण है।
English translation of Ādi purāṇa parv 11 – Shlok 183 to 191
श्लोक ( Shlok ) 183
गूथकृमेर्यथा गूथरससेवा परं सुखम् । तथैव विषयानीप्सोः सुखं जन्तोर्विगर्हितम् ॥१८३॥
अथवा जिस प्रकार विष्ठा के कीड़े को विष्ठा के रस का पान करना ही उत्कृष्ट सुख मालूम होता है उसी प्रकार विषय-सेवन की इच्छा करनेवाले जंतु को भी निंद्य विषयों का सेवन करना उत्कृष्ट सुख मालूम होता है ।।183।।
“Just as a dung beetle perceives drinking the essence of filth as supreme bliss, in the same way, a being desiring sensual indulgence considers indulging in contemptible pleasures as the highest form of happiness.”
श्लोक ( Shlok ) 184
विषयाननुभुञ्जानः स्त्रीप्रधानान् सवेपथुः । श्वसन् प्रश्विन्नसर्वाङ्गः सुखी चेदसुखीह कः ॥१८४॥
जो पुरुष, स्त्री आदि विषयों का उपभोग करता है उसका सारा शरीर काँपने लगता है, श्वास तीव्र हो जाती है और सारा शरीर पसीने से तर हो जाता है । यदि संसार में ऐसा जीव भी सुखी माना जाये तो फिर दु:खी कौन होगा ? ।।184।।
“The man who indulges in sensual pleasures, like women and other worldly desires, finds his entire body trembling, his breath growing heavy, and his skin drenched in sweat. If such a being is considered happy in this world, then who can truly be called unhappy?”
श्लोक ( Shlok ) 185
आयासमात्रमत्राज्ञः सुखमित्यभिमन्यते । विषयाशाविमूंडात्मा श्वेवास्थि दशनैर्दशन् ॥१८५॥
जिस प्रकार दाँतों से हड्डी चबाता हुआ कुत्ता अपने को सुखी मानता है उसी प्रकार जिसकी आत्मा विषयों से मोहित हो रही है ऐसा मूर्ख प्राणी भी विषय-सेवन करने से उत्पन्न हुए परिश्रम मात्र को ही सुख मानता है । भावार्थ―जिस प्रकार सूखी हड्डी चबाने से कुत्ते को कुछ भी रस की प्राप्ति नहीं होती वह व्यर्थ ही अपने को सुखी मानता है उसी प्रकार विषय-सेवन करने से प्राणी को कुछ भी यथार्थ सुख की प्राप्ति नहीं होती, वह व्यर्थ ही अपने को सुखी मान लेता है । प्राणियों की इस विपरीत मान्यता का कारण विषयों से आत्मा का मोहित हो जाना ही है ।।185।।
*”Just as a dog chewing on a bone considers itself happy, so too does a foolish being, whose soul is deluded by sensual pleasures, mistake mere exhaustion from indulgence as true happiness.
Explanation—Just as a dog gains no real nourishment from a dry bone but still believes itself to be enjoying it, in the same way, a being indulging in sensual pleasures attains no true joy, yet falsely considers itself happy. The reason for this mistaken belief is the soul’s delusion caused by attachment to worldly desires.”*
श्लोक ( Shlok ) 186
ततः स्वाभाविकं कर्म क्षयात् तत्प्रशमादपि । यदाह्लादनमेतत् स्यात् सुखं नान्यव्यपाश्रयम् ॥ १८६॥
इसलिए कर्मों के क्षय से अथवा उपशम से जो स्वाभाविक आह्लाद उत्पन्न होता है वही सुख है । वह सुख अन्य वस्तुओं के आश्रय से कभी उत्पन्न नहीं हो सकता ।।186।।
“Therefore, the natural bliss that arises from the destruction or suppression of karmas alone is true happiness. Such happiness can never arise from dependence on external objects.”
श्लोक ( Shlok ) 187 – 188
परिवारद्धिंसामग्रया सखं स्यात् कल्पवासिनाम् । तदभावेऽहमिन्द्राणां कुतस्त्यमिति चेत् सुखम् ॥१८७॥
परिवारद्धिसत्तैव किं सुखं किमु तद्वताम् । तत्सेवा सुखमित्येवमत्र स्याद् द्वितयी गतिः ॥१८८॥
अब कदाचित् यह कहो कि स्वर्गों में रहने वाले देवों को परिवार तथा ऋद्धि आदि सामग्री से सुख होता है परंतु अहमिंद्रों के वह सामग्री नहीं है इसलिए उसके अभाव में उन्हें सुख कहाँ से प्राप्त हो सकता है ? तो इस प्रश्न के समाधान में हम दो प्रश्न उपस्थित करते हैं । वे ये हैं―जिनके पास परिवार आदि सामग्री विद्यमान है उन्हें उस सामग्री की सत्तामात्र से सुख होता है अथवा उसके उपभोग करने से ।।187-188।।
“Now, if one argues that the gods residing in the heavens derive happiness from their families and the abundance of divine possessions, whereas the Ahmindras lack such possessions, and thus, how can they experience happiness in their absence? To address this question, we present two counter-questions: Do those who possess families and material wealth attain happiness merely from their existence, or do they derive happiness only through their enjoyment?”
श्लोक ( Shlok ) 189
सान्तःपुरो धनींर्द्धीद्धपरिवारो ज्वरी नृपः । सुखी स्याद् यदि सन्मात्राद् विषयात् सुखमीप्सितम् ॥१८९।
यदि सामग्री की सत्तामात्र से ही आपके सुख मानना इष्ट है तो उस राजा को भी सुखी होना चाहिए जिसे ज्वर चढ़ा हुआ है और अंतःपुर की स्त्रियाँ, धन, ऋद्धि तथा प्रतापी परिवार आदि सामग्री जिसके समीप ही विद्यमान है ।।189।।
“If you claim that mere possession of material wealth brings happiness, then even a king suffering from fever should be considered happy, simply because his consorts, riches, divine powers, and glorious lineage are present nearby.”
श्लोक ( Shlok ) 190
तत्सेवासुखमित्यत्र दत्तमेवोत्तरं पुरा । तत्सेवी तीव्रमायस्तः कथं वा सुखभाग् भवेत् ॥ १९०॥
कदाचित् यह कहो कि सामग्री के उपभोग से सुख होता है तो उसका उत्तर पहले दिया जा चुका है कि परिवार आदि सामग्री का उपभोग करनेवाला, उसकी सेवा करने वाला पुरुष अत्यंत श्रम और कलम को प्राप्त होता है अत: ऐसा पुरुष सुखी कैसे हो सकता है? ।।190।।
“If you argue that happiness comes from the enjoyment of material possessions, then the answer has already been given—one who indulges in and serves such possessions only experiences great toil and suffering. How, then, can such a person be considered happy?”
श्लोक ( Shlok ) 191
पश्यैते विषयाः स्वप्नभोगाभा विप्रलम्भकाः । अस्थायुकाः कुतस्तेभ्यः सुखमार्तधियां नृणाम् ॥ १९१
देखो, ये विषय स्वप्न में प्राप्त हुए भोगों के समान अस्थायी और धोखा देनेवाले हैं । इसलिए निरंतर आर्तध्यान रूप रहने वाले पुरुषों को उन विषयों से सुख कैसे प्राप्त हो सकता है ? भावार्थ―पहले तौ विषय-सामग्री इच्छानुसार सबको प्राप्त होती नहीं है इसलिए उसकी प्राप्ति के लिए निरंतर आर्तध्यान करना पड़ता है और दूसरे प्राप्त होकर स्वप्न में दिखे हुए भोगों के समान शीघ्र ही नष्ट हो जाती है इसलिए निरंतर इष्ट वियोगज आर्तध्यान होता रहता है । इस प्रकार विचार करने से मालूम होता है कि विषय-सामग्री सुख का कारण नहीं है ।।191।।
“Look, these sensual pleasures are as fleeting and deceptive as pleasures experienced in a dream. How can those who are constantly engaged in distressful contemplation (ārtadhyāna) find true happiness in them?
Meaning—First, not everyone attains material pleasures as they desire, so they remain in a state of constant distressful contemplation to acquire them. Second, even if attained, these pleasures vanish quickly like dream experiences, leading to further sorrow due to their loss. Thus, upon reflection, it becomes clear that material pleasures are not the source of true happiness.”
श्लोक 192 से 201
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182