भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
श्लोक 202 से 208 अच्युतेंद्र के भोग
अच्युतेंद्र का मैथुन और आहार मानसिक, श्वास 11 माह में एक बार था। देवांगनाएँ उसे कटाक्ष, हास्य, स्पर्श से संतुष्ट करती थीं। वह विमान में भोग भोगता, जिन पूजा करता था।
English translation of Ādi purāṇa parv 10 – Shlok 202 to 208
श्लोक ( Shlok ) 202
मानसोऽस्य प्रवीचारो ‘विष्वाणोऽप्यस्य मानसः । द्वाविंशतिसहस्त्रैश्च समानां सकृदाहरेत् ।।२०२।।
उस अच्युतेंद्र का मैथुन मानसिक था और आहार भी मानसिक था तथा वह बाईस हजार वर्षों में एक बार आहार करता था ।।202।।
“Achyutendra’s union was purely mental, and his nourishment was also mental. He consumed food only once every 22,000 years.”
श्लोक ( Shlok ) 203
तथैकादशभिर्मासैः सकृदुच्छ्वसितं भजेत् । त्र्यरत्निप्रमितोत्सेधदिव्यदेहधरः स च ॥२०३।।
ग्यारह महीने में एक बार श्वासोच्छ्वास लेता था और तीन हाथ ऊँचे सुंदर शरीर को धारण करनेवाला था ।।203।।
“He took a breath once every eleven months and possessed a beautiful body that was three hands high.”
श्लोक ( Shlok ) 204
धर्मेणेत्यच्युतेन्द्रोऽसौ प्रापत् सत्परम्पराम् । तस्मात्तदर्थिमिर्धर्मे मतिः कार्या जिनोदिते ॥२०४।।
वह अच्युतेंद्र धर्म के द्वारा ही उत्तम-उत्तम विभूति प्राप्त हुआ था इसलिए उत्तम-उत्तम विभूतियों के अभिलाषी जनों को जिनेंद्रदेव के द्वारा कहे धर्म में ही बुद्धि लगानी चाहिए ।।204।।
“That Achyutendra attained the highest glories solely through Dharma. Therefore, those who desire supreme prosperity should devote their intellect to the Dharma as preached by Jinendra.”
श्लोक ( Shlok ) 205
अथ सुललितवेषां दिव्ययोषाः सभूषाः सुरभिकुसुममालाः “स्रस्तचूलाः संलीलाः ।
मधुरविरुतगानारब्ध तानाः समानाः प्रमदभरमनून निन्युरेनं सुरेनम् ॥२०५॥
उस अच्युत स्वर्ग में, जिनके वेष बहुत ही सुंदर हैं जो उत्तम-उत्तम आभूषण पहने हुई हैं, जो सुगंधित पुष्पों की मालाओं से सहित हैं, जिनके लंबी चोटी नीचे की ओर लटक रही है, जो अनेक प्रकार की लीलाओं से सहित हैं, जो मधुर शब्दों से गाती हुई राग-रागिनियों का प्रारंभ कर रही हैं, और जो हर प्रकार से समान हैं―सदृश हैं अथवा गर्व से युक्त हैं ऐसी देवांगनाएँ उस अच्युतेंद्र को बड़ा आनंद प्राप्त करा रही थीं ।।205।।
“In that Achyuta heaven, celestial maidens—adorned with exquisite attire, wearing the finest ornaments, garlanded with fragrant flowers, their long braids elegantly hanging down, engaged in various playful pastimes, singing melodious tunes to initiate ragas and raginis, and either equal in beauty or brimming with pride—brought immense joy to Achyutendra.
“श्लोक ( Shlok ) 206
ललितपदविहारैर्भ्रू विकारैरुदारैर्नयनयुगविलासैरङ्गलासैः सुहासैः ।
प्रकटितमृदुभाबैः सानुभावैश्च भावैः जगृहुरत मनोऽस्त्राब्जोपमास्या वयस्त्राः ॥ २०६॥
जिनके मुख कमल के समान सुंदर हैं ऐसी देवांगनाएँ, अपने मनोहर चरणों के गमन, भौंहों के विकार, सुंदर दोनों नेत्रों के कटाक्ष, अंगोपांगों की लचक, सुंदर हास्य, स्पष्ट और कोमल हाव तथा रोमांच आदि अनुभवों से सहित रति आदि अनेक भावों के द्वारा उस अच्युतेंद्र का मन ग्रहण करती रहती थीं ।।206।।
“Celestial maidens, whose faces were as beautiful as lotus flowers, captivated Achyutendra’s heart with their graceful movements, expressive eyebrows, alluring glances from their enchanting eyes, the supple elegance of their limbs, charming laughter, delicate and clear gestures, and the subtle thrill of emotions—through various sentiments of love and affection.”
“श्लोक ( Shlok ) 207 – 208
तासःमिन्दुकलामले स्ववदनं पश्यन् कपोलाब्दके तवक्त्राम्बुजभृङ्गतां च घटयन्नाघ्रातवक्त्रानिलः । तन्नेत्रैश्च मनोजबाणसदृशैर्भ्रूचापमुक्तैर्भृशं विद्धं स्वं हृदयं तदीयकरसंस्पर्शैः समाश्वासयन् ॥२०७।।
रेमे रामाननेन्दुद्युतिरुचिरतरे स्वे विमाने विमाने भुञ्जानो दिन्यभोगानमरपरिवृतो यान् सुरेभैः सुरेभैः। जैनीं पूजां च तन्वन् मुहुरतनुरुचाभासमानोऽसमानो लक्ष्मीवानच्युतेन्द्रः सुचिरमुरुतर ” स्वांसकान्तः सकान्तः २०८॥
जो अपनी विशाल कांति से शोभायमान है, जिसकी कोई बराबरी नहीं कर सकता, और जो अपने स्थूल कंधों से शोभायमान है ऐसा वह समृद्धिशाली अच्युतेंद्र, स्त्रियों के मुखरूपी चंद्रमा से अत्यंत दैदीप्यमान अपने विस्तृत विमान में कभी देवांगनाओं के चंद्रमा की कला के समान निर्मल कपोलरूपी दर्पण में अपना मुख देखता हुआ, कभी उनके मुख की श्वास को सूँघकर उनके मुखरूपी कमल पर भ्रमर-जैसी शोभा को प्राप्त होता हुआ, कभी भौंहरूपी धनुष से, छोड़े हुए उनके नेत्रों के कटाक्षों से घायल हुए अपने हृदय को उन्हीं के कोमल हाथों के स्पर्श से धैर्य बँधाता हुआ, कभी दिव्य भोगों का अनुभव करता हुआ, कभी अनेक देवों से परिवृत होकर हाथी के आकार विक्रिया किये हुए देवों पर चढ़कर गमन करता हुआ और कभी बार-बार जिनेंद्रदेव की पूजा का विस्तार करता हुआ अपनी देवांगनाओं के साथ चिरकाल तक क्रीड़ा करता रहा ।।207-208।।
“The illustrious Achyutendra, radiant with his magnificent splendor, unmatched in grandeur, and resplendent with his broad shoulders, reveled in divine pleasures within his vast celestial aircraft. Sometimes, he gazed upon his own reflection in the mirror-like, pristine cheeks of his celestial maidens. At times, he inhaled the sweet fragrance of their breath, appearing like a bee hovering over their lotus-like faces. Occasionally, he soothed his heart—pierced by the arrow-like glances shot from their bow-shaped eyebrows—through the gentle touch of their delicate hands. He indulged in celestial pleasures, rode upon divine beings transformed into elephant-like forms, and journeyed amidst the company of numerous deities. Yet, time and again, he expanded the worship of Jinendra Bhagwan, all while engaging in joyous play with his celestial consorts for an immeasurable time.”
इत्यार्षे भगवजिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराण संय हे श्रीमदच्युतेन्द्रैश्वर्यवर्णनं नाम दशमं पर्व ॥१०॥
इस प्रकार आर्षनाम से प्रसिद्ध भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रह में श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन करने वाला दसवाँ पर्व समाप्त हुआ ।।10।।
“Thus, the tenth canto, describing the magnificence of the glorious Achyutendra, concludes in the renowned Triṣaṣṭi-Lakṣaṇa Mahāpurāṇa Saṅgraha, composed by the revered Bhagavān Jinsenacharya.”
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201