आचार्य पूज्यपादस्वामी विरचित इष्टोपदेश का आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-अध्यात्मयोग का अवलम्बन किस तरह लिया जाता है? किस प्रकार की विचारधारा से अध्यात्मयोग विकसित होता है, इसी विषय को स्पष्ट करते हुए आगे का श्लोक कहा जा रहा है-
कटस्य कत्र्ताहमिति, सम्बन्ध: स्याद् द्वयोद्र्वयो: ध्यानं ध्येयं यदात्मैव, सम्बन्ध: कीदृशस्तदा ॥25॥
अन्वयार्थ – (अहम्) मैं (कटस्य कर्त्ता) चटाई का कर्ता हूँ (इति सम्बन्धः) इस प्रकार कर्ता-कर्म सम्बन्ध (द्वयोर्द्वयोः) भिन्न-भिन्न दो पदार्थों में (स्यात्) होता है, परन्तु (यदा ध्यानं ध्येयं) जब ध्यान ध्येय (आत्मा एव) आत्मा ही हो (तदा) तब (कीदृशः सम्बन्धः) सम्बन्ध कैसा?
पद्यानुवाद
यूँ हि परस्पर दो दो में तो, होता है सम्बन्ध रहा,
कर्म रहा मम कट, कट का मैं, कर्ता हूँ प्रतिबन्ध रहा।
एकमेक जब ध्यान ध्येय हो, आतम का ही आतम ओ !
फिर किस विध सम्बन्ध बन्ध हो, दोपन ही जब खातम हो ॥२५॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 25
विवेचना
अध्यात्म कैसे आता है? पर पदार्थों के साथ कर्ता कर्म सम्बन्ध छोड़कर जब आत्मा में ही कर्ता-कर्म क्रिया घटित होती है, अर्थात् आत्मा ही ध्याता, आत्मा ही ध्येय, आत्मा ही ध्यान रूप और आत्मा ही जब ध्यान के फल रूप हो जाता है, ये सभी जब एकमेक हो जाते हैं, जहाँ पर किसी भी प्रकार की भेद-भिन्नता नहीं होती तब अध्यात्म आता है। मेरा तेरा आदि की जो बातें हैं इनमें अध्यात्म नहीं रहता। इस प्रकार के विकल्पों में अध्यात्म आना तो बहुत दूर की बात है, इनमें तो अध्यात्म की चर्चा भी संभव नहीं होती। विकल्पात्मक स्थिति में अध्यात्म की बात नहीं होती हैं क्योंकि अध्यात्म केवल कहने का विषय नहीं है। अध्यात्म की अवस्था में तो ऐसी स्थिति होती है कि कौन किसके लिए कह रहा है? यह भी पता नहीं और क्यों कह रहा? यह भी पता नहीं होता।
लोक प्रसिद्ध बात तो यह है कि भिन्न दो पदार्थों के बीच सम्बन्ध हुआ करता है। जैसे-मैं चटाई बनाने वाला हूँ। यहाँ चटाई बनाने वाला मैं पृथक् हूँ और बनने वाली चटाई पृथक् है तभी इनमें कर्ता-कर्म सम्बन्ध हुआ करता है। लोकप्रसिद्ध इस कर्ता-कर्म का सम्बन्ध अध्यात्म में कभी भी नहीं होता, किन्तु अध्यात्म में तो आत्मा स्वयं कर्ता, स्वयं कर्म और स्वयं क्रिया तथा स्वयं में ही क्रिया का फल घटित होता है। जैसा कि कारिका में स्पष्ट किया है कि-
“ध्यानं ध्येयं यदात्मैव, सम्बन्धः कीदृशस्तदा।”
जब आत्मा का परमात्मा के साथ एकीकरण हो जाता है तब आत्मा चिन्मात्र हो जाता है। उस समय आत्मा यश, कीर्ति, लाभ आदि की चाह से बहुत दूर हो जाता है। पर द्रव्यों के संयोगादि से उत्पन्न विकल्पों से भी दूर हो जाता है। अध्यात्म जिसके जीवन में रहता है भले ही वह बाजार में बैठा हो तो भी वह अध्यात्म रस का अनुपान कर सकता है। फिर भी अध्यात्म कोई गाजर-मूली जैसा थोड़े ही है कि जिस किसी को बाजार में मिल जाये।
अध्यात्म को प्राप्त करना महान् पुरुषार्थ का फल है। पुरुषार्थ का फल होते हुए भी उस पुरुषार्थ में पसीना नहीं आता। उसमें न हृदय धक् धक् करता है, न कषाय है, न राग है, न द्वेष है केवल साम्य भाव रहता है। वस्तुतः तत्त्व का मात्र जानना, देखना यही अध्यात्म है। अध्यात्म में जानने, देखने के अलावा और कुछ नहीं होता।
मान लो कहीं पर एक कन्या और एक लड़का, दोनों आपस में बचपन की मित्रता के तौर पर खेल रहे हैं, लेकिन धीरे-धीरे दोनों बड़े हो गये, दोनों का आपस में सम्बन्ध निश्चित कर दिया गया, फिर भी जब तक उन दोनों को सम्बन्ध ज्ञात नहीं होता तब तक भी वे खेल सकते हैं। पति- पत्नि के रूप में नहीं, क्योंकि सम्बन्ध ज्ञात नहीं है। इसके उपरान्त जब उन्हें सम्बन्ध की बात ज्ञात हो जाये तब भी मित्रता के रूप में खेलेंगे क्या? नहीं। क्या हो गया। क्या अन्तर पड़ गया! भावों में अन्तर आ गया कि अब हमारा मित्रता का सम्बन्ध नहीं है। कन्या सोचती है मैं तो पत्नि के रूप में हूँ और लड़का सोचता है मैं पति के रूप में हूँ। उनकी दृष्टि में सम्बन्ध आने से उनके भाव बदल गये और बिगड़ भी गये। यदि दृष्टि में सम्बन्ध नहीं आता तो भाव भी न बदलते, न बिगड़ते। आगे चलकर जब सम्बन्ध भी बिगड़ जाता है तो तलाक भी दे देते हैं। दक्षिण में तलाक को “छोड़- छुट्टी” कहते हैं। जो चिट्ठी लिखी थी, वह छोड़ दी, अब लेन-देन का कोई मतलब नहीं रहा। सम्बन्ध हुआ था बिगड़ गया। क्या बातों-बातों का सम्बन्ध था ? नहीं, सही का सम्बन्ध था।
कहने का तात्पर्य यह है कि जब संसार में भी मात्र बातों-बातों का काम नहीं तब मोक्षमार्ग में मात्र बातें-बातें या चर्चा-चर्चा क्यों करना चाहते हो? और स्वाध्याय में मात्र चर्चा करने से ही कर्म-निर्जरा हो जायेगी ऐसी धारणा क्यों बनाते हो ? मोक्षमार्ग में क्या होता है? इस मार्ग में यह धारणा मजबूत होना आवश्यक है कि जिसके पास जो कुछ भी है वह हमारा नहीं है, कोई हमारा नहीं है मैं भी किसी का नहीं हूँ। एकत्व भावना में पढ़ते हैं आप लोग-
आप अकेला अवतरै, परै अकेला होय।
या कबहूँ इस जीव को, साथी सगा न कोय ॥४॥
(भूधरदास कृत बारह भावना)
अकेला आया था, अकेला ही जायेगा। जहाँ पर भी जाओगे अकेले ही जाओगे। साथ में कोई दूसरा नहीं जायेगा। घर में भी माता-पिता लड़के-लड़की के सम्बन्ध कर देते हैं और सम्बन्ध होने के बाद वे कहते हैं-आप अपना भविष्य देखो। हम अपना भविष्य देख लेंगे। तुम्हें अपना काम स्वयं करना है, मैं किसी का कर्ता-धर्ता नहीं हूँ आदि-आदि विचार चलते हैं। इसी प्रकार अध्यात्म की बात है कि प्रत्येक पल कर्म के उदय में संयोग-वियोग होते रहते हैं, उनके प्रति उपयोग भले ही चला जाये, लेकिन कर्ता, क्रिया, कर्म की बात नहीं आना चाहिए। यदि कर्ता, कर्म, क्रिया की वात आये भी तो अपनी आत्मा में ही लगा लेना चाहिए। इसी का नाम अध्यात्म है, अन्यथा अध्यात्म की बात ही नहीं है।
अध्यात्म की गहराई को समझ कर सभी को अध्यात्म की चर्चा नहीं, किन्तु अध्यात्म के सरोवर में डुबकी लगाना चाहिए। अर्थात् मात्र अध्यात्म की चर्चा न करें, वरन् उसके प्रयोग करना भी सीखें। तभी अध्यात्म को समझने की सार्थकता है।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 25
इष्टोपदेश गाथा 25 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (अहम् ) में (कटस्य कर्त्ता) चटाई का कर्ता हूँ (इति सम्बन्धः) इस प्रकार कर्ता कर्म सम्बन्ध (द्वयोर्द्वयोः) भिन्न-भिन्न दो पदार्थों में (स्यात्) होता है, परन्तु (यदा ध्यानं ध्येयं) जब ध्यान ध्येय (आत्मा एव) आत्मा ही हो (तदा) तब (कीदृशः सम्बन्धः) कैसा सम्बन्ध हो सकता है ?
भावार्थ – जब भिन्न-भिन्न पदार्थ होते हैं तब तो एक पदार्थ दूसरे पदार्थ की पर्याय बदलने में निमित्त रूप में कर्ता होता है और जिस पदार्थ की पर्याय बदली जाती है, वह कर्म होता है। जैसे मैं चटाई बनाता हूँ इसमें मैं (चटाई बनाने वाला चटाई का कर्ता मनुष्य) अलग है और चटाई भिन्न जड़ पदार्थ है, इस कारण दोनों का कर्ताकर्म सम्बन्ध नहीं होता है, परन्तु आत्मा का परमात्मा के साथ एकीकरण काल में आत्मा ही ध्याता, आत्मा ही ध्यान और आत्मा ही ध्येय है, उसमें किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं है।
उत्थानिका – यहाँ पर शिष्य का कहना है कि भगवन् यदि आत्म द्रव्य और कर्म रूप पुद्गल द्रव्य का अध्यात्मयोग के बल से बन्ध न होना बतलाया जाता है तो फिर किस प्रकार से उन दोनों में आत्मा और कर्म रूप पुद्गल द्रव्यों में परस्पर एक के प्रदेशों में दूसरे के प्रदेशों का मिल जाने रूप बंध होगा ? क्योंकि वन्धाभाव तो बंध पूर्वक ही होगा। और बंध का प्रतिपक्षी, सम्पूर्ण कर्मों की विमुक्तावस्था रूप मोक्ष भी जीव को कैसे बन सकेगा ? जो कि अविच्छिन्न अविनाशी सुख का कारण होने से योगियों के द्वारा प्रार्थनीय हुआ करता है ? आचार्य कहते हैं गाथा 26
स्वाध्याय गाथा सं 24 & 25
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English Translation of Ishtopadesh Gatha 25
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