भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
श्लोक 162 से 171 श्रीमती की व्यथा और अनुरोध
श्रीमती ने कहा कि ललितांग उसके मन में बसा है। उसका दिव्य शरीर न होने पर भी वह स्मृति में है। वह उसकी प्राप्ति के बिना कृश है। अश्रु उसकी खोज के लिए बह रहे हैं। उसने पंडिता से ललितांग को खोजने को कहा, उसे चित्रपट बनाकर दिया, जिसमें गूढ़ विषय हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
उत्कीर्ण इव देवोऽसौ पश्याद्यापि मनो मम । अधितिष्ठति दिव्येन रूपेणानङ्गतां गतः ।। १६२ ।।
हे सखी, देख, यह ललितांग अब भी मेरे मन में निवास कर रहा है । ऐसा मालूम होता है मानो किसी ने टाँकी द्वारा उकेरकर सदा के लिए मेरे मन में स्थिर कर दिया हो । यद्यपि आज उसका वह दिव्य-वैक्रियिक शरीर नहीं है तथापि वह अपनी दिव्य शक्ति से अनंगता (शरीर का अभाव और कामदेवपना) धारण कर मेरे मन में अधिष्ठित है ।।162।।
O friend, look, Lalitangadeva still resides in my heart. It feels as if someone has etched his image into my soul with a fine tool, making it permanent. Even though his divine, celestial body is no longer present, he remains enthroned in my heart, embodying divine power and formlessness, like a celestial Kamadeva. ||162||
श्लोक ( Shlok ) 163 – 164
ललिताङ्गवपुः सौम्यं ललितं ललितानने । सहजाताम्बरं स्त्रग्वि स्फुरदाभरणोज्ज्वलम् ।। १६३ ।।
पश्यामीव सुखस्पर्श तत्करस्पर्शलालितां । तदलाभे च मदगात्रं क्षामत्तां नैतदुज्झति ॥ १६४॥
हे सुमुखि, जो अतिशय सौम्य है, सुंदर है, साथ-साथ उत्पन्न हुए वस्त्र तथा माला आदि से सहित हे, प्रकाशमान आभरणों से उज्जवल है और सुखकर स्पर्श से सहित है ऐसे ललितांगदेव के शरीर को मैं सामने देख रही हूँ, उसके हाथ के स्पर्श से लालित सुखद स्पर्श को भी देख रही हूं परंतु उसकी प्राप्ति के बिना मेरा यह शरीर कृशता को नहीं छोड़ रहा है ।।163-164।।
O graceful one, I see before me the exceedingly serene and beautiful form of Lalitangadeva, adorned with naturally manifesting garments, garlands, and radiant ornaments, glowing with brilliance and accompanied by a soothing touch. I even feel the tender and delightful sensation of his hand’s touch. Yet, without truly attaining him, my body refuses to shed its frailty. ||163-164||
श्लोक ( Shlok ) 165
इमेऽश्रुबिन्दवोऽजस्त्रं निर्यान्ति मम लोचनात् । मद्दुःखमक्षमा द्रष्टुं तमन्वेष्टुमिवोद्यताः ॥१६५॥
ये अश्रुबिंदु निरंतर मेरे नेत्रों से निकल रहे हैं जिससे ऐसा मालूम होता है कि ये हमारा दुःख देखने के लिए असमर्थ होकर उस ललितांग को खोजने के लिए ही मानो उद्यत हुए हैं ।।165।।
These tears continuously flow from my eyes, as if unable to bear witnessing my sorrow and instead eager to set out in search of Lalitangadeva. ||165||
श्लोक ( Shlok ) 166
इत्युक्त्वा पुनरप्येवमवादीत् श्रीमती सखीम् । शक्ता त्वमेव नान्यास्ति मत्प्रियान्वेषणं प्रति ॥ १६६॥
इतना कहकर वह श्रीमती फिर भी पंडिता सखी से कहने लगी कि हे प्रिय सखी, तू ही मेरे पति को खोजने के लिए समर्थ है । तेरे सिवाय और कोई यह कार्य नहीं कर सकता ।।166।।
Saying this, Shrimati continued, addressing her friend the learned one: “O dear friend, you are the only one capable of searching for my husband. No one else can accomplish this task.” ||166||
श्लोक ( Shlok ) 167
स्वयि सत्यां सरोजाक्षि कुतोऽद्य स्यान्ममासुखम् । नलिन्याः किमु दौःस्थित्यं तपस्यां सपनद्युतौ॥ १६७
हे कमलनयने, आज तेरे रहते हुए मुझे दुःख कैसे हो सकता है ? सूर्य की प्रभा के दैदीप्यमान रहते हुए भी क्या कमलिनी को दुःख होता है ? अर्थात् नहीं होता ।।167।।
O lotus-eyed one, how can I feel sorrow while you are here? Even with the radiant splendor of the sun, does the lotus (Kamalini) experience pain? That is, it does not. ||167||
श्लोक ( Shlok ) 168
सत्यं त्वं पण्डिता कार्यघटनास्वतिपण्डिता । तन्ममैतस्य कार्यस्य संसिद्धिस्त्वयि तिष्ठते ॥१६८॥
हे सखी, तू समस्त कार्यों के करने में अतिशय निपुण है अतएव तू सचमुच में पंडिता है―तेरा पंडिता नाम सार्थक है । इसलिए मेरे इस कार्य की सिद्धि तुझ पर ही अवलंबित हैं ।।168।।
O friend, you are exceptionally skilled in all tasks, and therefore, you are truly learned—your name as a scholar is meaningful. Hence, the success of my task depends entirely on you. ||168||
श्लोक ( Shlok ) 169
ततो रक्ष मम प्राणान् प्राणेशस्य गवेषणात् । स्त्रीणां विपत्प्रतीकारे स्त्रिय एवावलम्बनम् ॥१६९॥
हे सखि, मेरे प्राणपति ललितांग को खोजकर मेरे प्राणों की रक्षा कर क्योंकि स्त्रियों की विपत्ति दूर करने के लिए स्त्रियाँ ही अवलंबन होती हैं ।।169।।
O friend, find my life partner Lalitangadeva and save my life, for it is women who are the support for other women in times of distress. ||169||
श्लोक ( Shlok ) 170
तदुपायं च तेऽद्याहं ब्रुवे प्रस्तुतसिद्धये । मया विलिखितं पूर्वभवसंबन्धिपट्टकम् ॥१७०॥
इस कार्य की सिद्धि के लिए मैं आज तुझ एक उपाय बताती हूँ । वह यह है कि मैंने पूर्वभव संबंधी चरित्र को बताने वाला एक चित्रपट बनाया है ।।170।।
To ensure the success of this task, I will today tell you of a method. I have created a pictorial representation that narrates the story of my past life. ||170||
श्लोक ( Shlok ) 171
क्वचित् त्किचिन्निगूढान्तः प्रकृतं चित्तरञ्जनम् । तदूव्रजादाय धूर्त्तानां मनःसंमोहकारणम् ॥१७१॥
उसमें कही-कहीं चित्त प्रसन्न करने वाले गूढ़ विषय भी लिखे गये हैं । इसके सिवाय वह धूर्त मनुष्यों के मन को भ्रांति में डालने वाला है । हे सखी, तू इसे लेकर जा ।।171।।
In it, there are also certain profound topics that delight the mind. Additionally, it is capable of confusing the minds of deceitful people. O friend, take it with you. ||171||
श्लोक 172 से 181
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
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