भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251
श्लोक 252 से 261 विवाह की प्रशंसा
श्रीमती और वज्रजंघ रति-कामदेव समान थे। लोग श्रीमती को लक्ष्मीमती कहते थे। दर्शक आनंदित हुए, वज्रदंत और वसुंधरा की प्रशंसा की। दोनों के पूर्व पुण्य का फल यह विवाह था।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 252 to 261
श्लोक ( Shlok ) 252
वज्रजङ्घसमासंगाद श्रीमती व्यद्युतत्तराम् । कल्पवल्लीव संश्लिष्टतुङ्गकल्पमहीरुहा ॥२५२
उस समय वज्रजंघ के समागम से श्रीमती किसी बड़े कल्पवृक्ष से लिपटी हुई कल्प-लता की तरह सुशोभित हो रही थी ।।252।।
At that moment, with Vajrajangha’s union, Shrimati appeared as radiant as a wish-fulfilling creeper entwined around a great Kalpavriksha tree. ||252||
श्लोक ( Shlok ) 253
शा सोऽपि पर्यन्तवर्त्तिन्या तया लक्ष्मों परामधात् । स्त्रीसृष्टेः परया कोठ्या रत्येवकुसुमायुधः ।॥२५३।।
वह श्रीमती स्त्री-संसार में सबसे श्रेष्ठ थी, समीप में बैठी हुई उस श्रीमती से वह वज्रजंघ भी ऐसा सुशोभित होता था जैसे रति से कामदेव सुशोभित होता है ।।253।।
She, Shrimati, was the most exalted among women, and as she sat nearby, Vajrajangha appeared as radiant as Kamadeva, the god of love, is adorned by Rati. ||253||
श्लोक ( Shlok ) 254
गुरुसाक्षि तयोरित्थं विवाहः परमोदयः । निरवर्त्तत लोकस्य परमानन्दमादधत् ।।२५४।।
इस प्रकार लोगों को परमानंद देने वाला उन दोनों का विवाह गुरुजनों की साक्षीपूर्वक बड़े वैभव के साथ समाप्त हुआ ।।254।।
Thus, the marriage of the two, which bestowed supreme bliss upon everyone, was concluded with great splendor, in the presence of their elders as witnesses. ||254||
श्लोक ( Shlok ) 255
ततः पाणिगृहीती तो ते जना बहुमेनिरे । श्रीमती सत्यमेवेयं श्रीमतीत्युद्गिरस्तदा ॥२५५॥
उस समय सब लोग उस विवाहिता श्रीमती का बड़ा आदर करते थे और कहते थे कि यह श्रीमती सचमुच में श्रीमती है अर्थात् लक्ष्मीमती है ।।255।।
At that time, everyone held the married Shrimati in great esteem and said that she was truly Shrimati, meaning she was the embodiment of Lakshmi, the goddess of wealth. ||255||
श्लोक ( Shlok ) 256
तौ दम्पत्ती सदाकारी सुरदम्पतिढूंढे ढूंढे विभ्रमौ । जनानां पश्यतां चित्त निर्व बारामृतायितौ ।।२५६।।
उत्तम आकृति के धारक, देव-देवांगनाओं के समान क्रीड़ा करने वाले तथा अमृत के समान आनंद देने वाले उन वधू और वर को जो भी देखता था उसी का चित्त आनंद से संतुष्ट हो जाता था ।।256।।
The bride and groom, possessing exquisite forms, playing like gods and goddesses, and bringing joy as sweet as nectar, filled the heart of everyone who saw them with pure delight. ||256||
श्लोक ( Shlok ) 257
तत्कल्याणं समालोक्य देवलोकेऽपि दुर्लभम् । प्रशशंसुर्मुदं प्राप्ताः परमां प्रेक्षका जनाः ॥२५७॥
जो स्वर्गलोक में दुर्लभ है ऐसे उस विवाहोत्सव को देखकर देखने वाले पुरुष परम आनंद को प्राप्त हुए थे और सभी लोग उसकी प्रशंसा करते थे ।।257।।
Seeing the wedding celebration, which was as rare as it is in the heavenly realms, the onlookers were filled with immense joy, and everyone praised the event. ||257||
श्लोक ( Shlok ) 258
चक्रवर्ती महाभागः स्त्री रत्नमिदमूर्जितम् । योग्ये नियोजयामास जनश्लाघास्पदे पदे ॥२५८ ॥
वे कहते थे कि चक्रवर्ती बड़ा भाग्यशाली है जिसके यह ऐसा उत्तम स्त्री–रत्न उत्पन्न हुआ है और वह उसने सब लोगों की प्रशंसा के स्थानभूत वज्रजंघरूप योग्य स्थान में नियुक्त किया है ।।258।।
They said that the emperor is truly fortunate, for he has been blessed with such a precious gem of a wife, and he has placed her in a position of honor, worthy of admiration by all, in the form of Vajrajangha. ||258||
श्लोक ( Shlok ) 259
जननी पुण्यवत्वस्या मूर्ध्निसुप्रजसामसौ । ‘सत्प्रसूतिरियं सूता यया लक्ष्मीसमद्युतिः ॥२५९॥
इसकी यह पुण्यवती माता पुत्रवतियों में सबसे श्रेष्ठ है जिसने लक्ष्मी के समान कांति वाली यह उत्तम संतान उत्पन्न की है ।।259।।
This virtuous mother, who has given birth to such an excellent offspring with a radiance akin to Lakshmi, is the best among all mothers. ||259||
श्लोक ( Shlok ) 260
कुमारेण तपस्तप्तं किमेतेनान्यजन्मनि । येनासादि जगत्सारं स्त्रीरत्नममितद्युति ॥ २६०॥
इस वज्रजंघकुमार ने पूर्व जन्म में कौन-सा तप तपा था जिससे कि संसार का सारभूत और अतिशय कांति का धारक यह स्त्री-रत्न इसे प्राप्त हुआ है ।।260।।
What kind of penance did Prince Vajrajangha perform in his previous life that earned him this extraordinary gem of a wife, who embodies the essence and supreme radiance of the world? ||260||
श्लोक ( Shlok ) 261
धन्येयं कन्यका मान्या नान्या पुण्यवतीदृशी । कस्याप्यभागिनी यैषा वज्रजङ्घ पतिं वृता ॥२६१॥
चूँकि इस कन्या ने वज्रजंघ को पति बनाया है इसलिए यह कन्या धन्य है, मान्य है और भाग्यशालिनी है । इसके समान और दूसरी कन्या पुण्यवती नहीं हो सकती ।।261।।
Since this maiden has chosen Vajrajangha as her husband, she is blessed, honored, and fortunate. No other maiden can be as virtuous as she is. ||261||
श्लोक 262 से 271
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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