भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121| श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
श्लोक 152 से 162 चित्रों का आदान-प्रदान और श्रीमती की प्रसन्नता
वज्रजंघ ने अपना चित्र पंडिता को देकर चित्रपट लिया, जो रेखाओं और भावों से स्पष्ट था। वह चला गया, और पंडिता श्रीमती के पास आई। श्रीमती ने चित्र देखकर सुख की साँस ली, जैसे चातकी मेघ, हंसी किनारा, या कोयल आमवन देखकर प्रसन्न होती है। उसकी आकुलता दूर हुई।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 152 to 162
श्लोक ( Shlok ) 152
द्वीपान्तराद् दिशामन्तात् अन्तरीपादपांनिधेः । विधिर्घटयतीष्टार्थमानीयान्दीपतां गतः ॥१५२॥
अनुकूलता को प्राप्त हुआ दैव अभीष्ट पदार्थ को किसी दूसरे द्वीप से, दिशाओं के अंत से, किसी टापू से अथवा समुद्र से भी लाकर उसका संयोग करा देता है ।।152।।
Destiny, when favorable, brings the desired object even from another island, from the ends of directions, from a distant islet, or even from the sea, and unites it. (152)
श्लोक ( Shlok ) 153 – 154
इतीरयन् वचो भूयः प्रस्विद्यस्करपल्लवः । तदस्मत्पङ्गकं पाणौ कृतवान् स कुतूहली ॥१५३॥
स्वपट्टकमिदं चान्यत् मम हस्ते “समार्पिपत् । यन्त्र स्वचित्रसंवादि” सर्वमालक्ष्यते स्फुटम् ॥१५४॥
इस प्रकार जो अनेक वचन कह रहा था, जिसके हाथ से पसीना निकल रहा था तथा जिसे कौतूहल उत्पन्न हो रहा था, ऐसे उस राजकुमार वज्रजंघ ने हमारा चित्रपट अपने हाथ में ले लिया और यह अपना चित्र हमारे हाथ में सौंप दिया । देख, इस चित्र में तेरे चित्र से मिलते-जुलते सभी विषय स्पष्ट दिखायी दे रहे हैं ।।153-154।।
Thus, the prince Vajrajangha, who was speaking many words, whose hands were sweating, and who was filled with curiosity, took our painting in his hand and handed his own portrait to us. Look, in this painting, all the features matching yours are clearly visible. ( 153-154)
श्लोक ( Shlok ) 155
सूत्रक्रमः स्फुटोऽत्रास्ति व्यक्तो वर्णक्रमोऽप्ययम् । क्रमों भवानुबन्धस्य प्रत्याहार इवास्त्यहो ॥ १५५ ॥
जिस प्रकार प्रत्याहारशास्त्र (व्याकरणशास्त्र) में सूत्र, वर्ण और धातुओं के अनुबंध का क्रम स्पष्ट रहता है उसी प्रकार इस चित्र में भी रेखाओं, रंगों और अनुकूल भावों का क्रम अत्यंत स्पष्ट दिखाई दे रहा है अर्थात् जहाँ जो रेखा चाहिए वहाँ वही रेखा खींची गयी है; जहाँ जो रंग चाहिए वहाँ वह रंग भरा गया है और जहाँ जैसा भाव दिखाना चाहिए वहीं वैसा ही भाव दिखाया गया है ।।155।।
Just as in the science of grammar (Pratyahara Shastra), the sequence of sutras, letters, and roots is clearly defined, similarly, in this painting, the sequence of lines, colors, and harmonious expressions is extremely clear. In other words, the appropriate line is drawn where it is needed, the right color is filled where it belongs, and the desired expression is depicted precisely where it should be. ( 155)
श्लोक ( Shlok ) 156
इदमर्पयतानूनमनुरागो मनोगतः । त्वन्मनोरथसंसिद्धौ सत्यङ्कारोऽर्पितोऽमुना ॥१५६॥
राजकुमार ने मुझे यह चित्र क्या सौंपा है मानो अपने मन का अनुराग ही सौंपा है अथवा तेरे मनोरथ को सिद्ध करने के लिए सत्यंकार (बयाना) ही दिया है ।।156।।
The prince did not merely hand me this painting; it is as though he has entrusted his heartfelt affection or given a token advance to fulfill your desires. ( 156)
श्लोक ( Shlok ) 157
ततः करं प्रसार्यार्थे पुनर्दर्शनमस्तु ते । व्रज व्रजाम इत्युद्भीः निरगात् स जिनालयात् ॥१५७॥
अपना चित्र मुझे सौंप देने के बाद राजकुमार ने हाथ फैलाकर कहा कि हे आर्ये, तेरा दर्शन फिर भी कभी हो, इस समय जाओ, हम भी जाते हैं । इस प्रकार कहकर यह जिनालय से निकलकर बाहर चला गया ।।157।।
After handing me his portrait, the prince extended his hands and said, “O noble lady, may I see you again sometime. For now, you may leave; I am also departing.” Saying this, he left the temple and walked away. ( 157)
श्लोक ( Shlok ) 158
गृहीत्वाहं च तद्वार्तामिहागामिति पण्डिता । प्रसारितवती तस्याः पुरस्ताच्चित्रपट्टकम् ॥१५८॥
और मैं उस समाचार को ग्रहण कर यहाँ आयी हूँ । ऐसा कहकर पंडिता ने वज्रजंघ का दिया हुआ चित्रपट फैलाकर श्रीमती के सामने रख दिया ।।158।।
“And I came here after receiving that news.” Saying this, Pandita unfolded the painting given by Vajrajangha and placed it before Shrimati. ( 158)
श्लोक ( Shlok ) 159 – 162
तन्निर्वर्ण्य चिरं जातप्रत्यया सा समाश्वसीत् । चिरोढप्रौढसंतापा चातकोव घनाघनम् ॥१५९॥
यथा शरन्नदीतीरपुलिनं हंसकामिनी । भव्यावली यथाध्यात्मशास्त्रं प्राप्य प्रमोदते ॥१६०॥
यथा कुसुमितं चूतकाननं कलकण्ठिका । द्वीपं नन्दीश्वरं प्राप्य यथा वा पृतनामरी ॥१६१॥
तथेदं पट्टकं प्राप्य श्रीमत्यासीदनाकुला । मनोज्ञेष्टार्थसंपत्तिः कस्य वा नोत्कतां हरेत् ॥१६२॥
उस चित्रपट को उसने बड़ी देर तक गौर से देखा, देखकर उसे अपने मनोरथ पूर्ण होने का विश्वास हो गया और उसने सुख की साँस ली । जिस प्रकार चिरकाल से संतप्त हुई चातकी मेघ का आगमन देखकर हर्षित होती है, जिस प्रकार हंसी शरद ऋतु में किनारे की निकली हुई जमीन देखकर प्रसन्न होती है, जिस प्रकार भव्यजीवों की पंक्ति अध्यात्मशास्त्र को देखकर प्रमुदित होती है, जिस प्रकार कोयल फूले हुए आमों का वन देखकर आनंदित होती है और जिस प्रकार देवों की सेना नंदीश्वर द्वीप को पाकर प्रसन्न होती है; उसी प्रकार श्रीमती उस चित्रपट को पाकर प्रसन्न हुई थी । उसकी सब आकुलता दूर हो गयी थी । सो ठीक ही है अभिलषित वस्तु की प्राप्ति किसकी उत्कंठा दूर नहीं करती ? ।।159-162 ।।
She gazed intently at the painting for a long time, and upon seeing it, she became confident that her desire would be fulfilled, breathing a sigh of relief. Just as the long-suffering Chātak bird rejoices at the sight of rain clouds, just as the land smiles in delight upon emerging during autumn, just as noble souls are elated upon seeing spiritual scriptures, just as the cuckoo delights at the sight of blossoming mango groves, and just as the army of gods rejoices upon reaching Nandishwar Island, similarly, Shrimati was filled with joy upon receiving that painting. All her restlessness vanished. Indeed, the attainment of a desired object dispels anyone’s anxiety, doesn’t it? ( 159-162)
श्लोक 163 से 173
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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