भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
श्लोक 62 से 71 श्रीमती का रूप वर्णन (भाग 1)
श्रीमती का सौंदर्य कामदेव की पत्नी समान था। उसके नख कुरवक, चरण अशोक को जीतते थे। नूपुर भ्रमर समान, जंघाएँ तरकस समान, नितंब सरसी समान थे। उसका मध्यभाग त्रिवलियों और नाभि से नदी समान, रोमराजि सर्प मार्ग समान था। वह लता समान, भुजाएँ शाखा, नख फूल समान थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
नखैरापाटले स्तस्या जिग्ये कुरषकच्छविः । अशोकपल्लवच्छाया पादभासाधरीकृता ॥६२।।
उसके गुलाबी नखों ने कुरवक पुष्प की कांति को जीत लिया था और चरणों की आभा ने अशोकपल्लवों की कांति को तिरस्कृत कर दिया था ।।62।।
“Her rosy nails surpassed the radiance of Kuravaka flowers, and the brilliance of her feet outshone the beauty of Ashoka leaves.”( 62)
श्लोक ( Shlok ) 63
रणन्नूपुरमत्तालीझङ्कार मुखरीकृते । पादारविन्दे साऽधत्त लक्ष्म्या शश्वत्कृतास्पदे ।।६३।।
वह श्रीमती, रुनझुन शब्द करते हुए नूपुररूपी मत्त भ्रमरों की झंकार से मुखरित तथा लक्ष्मी के सदा निवासस्थान स्वरूप चरणकमलों को धारण कर रही थी ।।63।।
“Shrimati adorned her lotus-like feet, which seemed to be the eternal abode of Goddess Lakshmi, with anklets whose jingling sound resembled the humming of intoxicated bees.”( 63)
श्लोक ( Shlok ) 64
चिरं यदुदवासेनं दधत्कण्टकिता तनुम् । व्रतं चचार तेनाब्जं मन्येऽगात् तत्पदोपमाम् ।।६४।।
मैं मानता हूँ कि कमल ने चिरकाल तक पानी में रहकर कंटकित (रोमांचित, पक्ष में काँटेदार) शरीर धारण किये हुए जो व्रताचरण किया था उसी से वह श्रीमती के चरणों की उपमा प्राप्त कर सका था ।।64।
“I believe that the lotus, having lived in water for a long time and endured the thorny (prickling) nature of its stem, attained the comparison to Shrimati’s feet through its steadfastness.”( 64)
श्लोक ( Shlok ) 65
जङ्घे रराजतुस्तस्याः कुसुमेषोरिवेषुधी । ऊरुदण्डौ च विभ्राते कामेभालानयष्टिताम् ।।६५।।
उसकी दोनों जंघाएँ कामदेव के तरकस के समान शोभित थीं, और ऊरुदंड (जाँघें) कामदेवरूपी हस्ती के बंधनस्तंभ की शोभा धारण कर रहे थे ।।65।।
“Her thighs were adorned like the quiver of Kamadeva, and her waist (thighs) bore the beauty of the pillars binding the elephant-like figure of Kamadeva.”( 65)
श्लोक ( Shlok ) 66
नितम्बबिम्बमेतस्याः सरस्या इन सैकतम् । लसद्दुकूलनीरेण स्थगितं रुचिमानशे ॥६६।।
शोभायमान वस्त्ररूपी जल से तिरोहित हुआ उसका नितंबमंडल किसी सरसी के मरने टीले के समान शोभा को प्राप्त हो रहा था ।।66।।
“Her glistening waist, concealed by garments like water, radiated beauty akin to the mound of a sarasi (crane) after its death.”( 66)
श्लोक ( Shlok ) 67
“वलिभं दुक्षिणावर्तनाभिमध्यं बभार सा । नदोव जलमावर्त्तसंशोभिततरङ्गकम् ॥ ६७।।
वह त्रिवलियों से सुशोभित तथा दक्षिणावर्त्त नाभि से युक्त मध्यभाग को धारण कर रही थी इसलिए ऐसी जान पड़ती थी मानो भँवर से शोभायमान और लहरों से युक्त जल को धारण करने वाली नदी ही हो ।।67।।
She was adorned with three graceful folds and possessed a clockwise-shaped navel, making her appear as if she were a river adorned with whirlpools and flowing waves. ||67||
श्लोक ( Shlok ) 68
मध्यं स्तन भराक्रान्ति चिन्तयैवात्तत्तानवम् । रोमावलिच्छलेनास्या दवेऽवष्टम्भयष्टिकाम् ॥६८।
उसका मध्यभाग स्तनों का बोझ बढ़ जाने की चिंता से ही मानो कृश हो गया था और इसीलिए उसने रोमावलि के छल से मानों सहारे की लकड़ी धारण की थी ।।68।।
Her midsection seemed to have become slender, as if weighed down by the burden of her breasts, and for support, it appeared to have taken on a line of fine hair, like a deceptive staff. ||68||
श्लोक ( Shlok ) 69
नाभिरन्ध्रादधस्तन्वी रोमराजीमसौ दधे । उपध्नान्तरमन्विच्छोः” कामाहेः पदवीमिव ॥६९।।
वह नाभिरंध्र के नीचे एक पतली रोमराजि को धारण कर रही थी जो ऐसी जान पड़ती थी मानो दूसरा आश्रय चाहने वाले कामदेवरूपी सर्प का मार्ग ही हो ।।69।।
Below her navel, she bore a thin line of fine hair, which seemed like the path for the serpent-like god of love seeking another refuge. ||69||
श्लोक ( Shlok ) 70
लतेवासौ मृदू बाहू दधौ विटपसच्छवी । नखांशुमञ्जरी चास्या धन्ते स्म कुसुमश्रियम् ॥७०॥
वह श्रीमती स्वयं लता के समान थी, उसकी भुजाएँ शाखाओं के समान थीं और नखों की किरणें फूलों की शोभा धारण करती थीं ।।70।।
She herself was like a graceful vine, her arms resembling its branches, and the radiance of her nails adorned with the beauty of flowers. ||70||
श्लोक ( Shlok ) 71
आनीलचूचुकौ तस्याः कुचकुम्भौ विरेजतुः । पूणौंकामरसस्येव नीलरत्नाभिमुद्रितौ ॥७१॥
जिनका अग्रभाग कुछ-कुछ श्यामवर्ण है ऐसे उसके दोनों स्तन शोभायमान होते थे मानो कामरस से भरे हुए और नीलरत्न की मुद्रा से अंकित दो कलश ही हों ।।71।।
Her two breasts, with slightly darkened tips, appeared resplendent as if they were two urns filled with the essence of love and adorned with the brilliance of blue gemstones. ||71||
श्लोक 72 से 81
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
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